यादों के झुरमुट में
श्रृंगार की अजस्र धारा
तुम्हारे लिए
आमों की शाखों पर कुहकी, छेड़ रही सरगम है.
किंशुक कुसुम बिछे हैं पथ में, बौराया मदमस्त पवन है.
रंग बिरंगी चादर ताने, बेले जूही के बाने है.
साड़ी बगिया ढूंढ चूका हूँ , जाने तुम खो गई कहाँ हो.
सृजन से श्रृंगार की ओर_
आओ हम सभी सृजन से श्रृंगार की ओर चलें . सृजन ईश्वर और कवि का स्वभाव है. कवि जब ईश्वर द्वारा सृजित कृति को और अधिक सुन्दर बनाने का उद्योग करता है तो सृंगार स्वमेव अवतरित हो जाता है. काव्य अपने आप में सुन्दर होता है उस पर श्रृंगार- यह आपके अंतरतम की गहराइयों में उतर जाता है. हम सब मिलकर इस तरह का एक प्रयास करें- सुन्दर को अदम्य सौन्दर्य बनाने का. संसार में कुछ भी असुंदर नहीं है. दृष्टी, विचार, कल्पना और चाह आलंबन को सुन्दरता के सिंहासन पर बैठा देता है. श्रृंगार सृष्टिकर्ता का वरदान,मानव की कल्पना है, प्रिय का आवाहन है, और मन का आह्लाद है. संयोग सुखानुभूति का चरमोत्कर्ष है तो वियोग चिर स्मृतियों का खुला निमंत्रण है. वियोग स्मृतियों का आवाहन तो है ही यह अवसाद की चरम स्थिति भी है. इस वियोग में प्रेमी अपने प्रिय से अपनी कल्पना में परोक्ष में संयोग का ही सृजन करता है. वियोग स्वच्छंद है. वियोग का विस्तार संयोग से भी बड़ा है. प्रियतम का साक्ष्य हो न हो प्रिय अपना आलंबन स्वयं गढ़ लेता है.
-: जाने तुम खो गई कहाँ हो :-![]() |
| आप से हम यहीं मिलें |
मैं तेरे अंतर में रम जाऊं, तुम मेरे उर में बस जाओ.
आमों की शाखों पर कुहकी, छेड़ रही सरगम है.
किंशुक कुसुम बिछे हैं पथ में, बौराया मदमस्त पवन है.
रंग बिरंगी चादर ताने, बेले जूही के बाने है.
साड़ी बगिया ढूंढ चूका हूँ , जाने तुम खो गई कहाँ हो.
अल्हड़ सरिता की कलकल में, तारों की झिलमिल में
झर झर करते इस प्रपात में, कमल दलों के उस तड़ाग में
देख रहा हूँ विकल ह्रदय से, सागर के उस दूर क्षितिज में
डगर डगर में ढूंढ़ चूका हूँ' जाने तुम खो गई कहाँ हो
अपने कान दिए सुनता हूँ, पनघट पर चौबारों पर
नजर जमाये बैठा हूँ मैं, सूने पथ और चौबारों पर
याद तुम्हारी पल पल लेकर, अपने रूखे अधरों पर
आकुल तन मन आज हुआ है, जाने तुम खो गई कहाँ हो
सावन की रिमझिम फुहार में, चातक मन पिऊ पिऊ पुकारे
चंचल मेंघों के छौने मिल, तेरा आगम पंथ बुहारे
एकाकी मैं झूल रहा मैं, जाने तुम खो गई कहाँ हो
पाती लिखता मैं तुमको, पर रूठी आज कलम से स्याही
लील गया सपनों का विषधर, मेरे अंतर की तरुणाई
बिखर गई नौका सिकता में, लहर लहर दे गई बिदाई
आज सपन हो गया तपन मय, जाने तुम खो गई कहाँ हो


