जिन पर शब्द युगों तक ठहरे
उन अधरों की पीड़ा समझो
बिछे रहे जो आगम पथ में
थकित नयन की साधें समझो।
जिस उपवन में पतझड़ ठहरा
उसमें भ्रमर नहीं है आते
जिस कुटीर में छाव नहीं हो
उनमें पथिक नहीं रुक पाते।
खुले नयन से स्वप्न देख कर
पानी पर क्यों चित्र बनाते
जो बस्ती वीरान पड़ी हो
उसमें पाहुन कभी न आते।
अनछुई छुअन की आस पोर को
तुहिन कणों की प्यास भोर को
मैं अनंत का पथिक बिचारा
जिस कुटीर में छाव नहीं हो
उनमें पथिक नहीं रुक पाते।
खुले नयन से स्वप्न देख कर
पानी पर क्यों चित्र बनाते
जो बस्ती वीरान पड़ी हो
उसमें पाहुन कभी न आते।
अनछुई छुअन की आस पोर को
तुहिन कणों की प्यास भोर को
मैं अनंत का पथिक बिचारा
खोज रहा अनजान ठौर को।
युग बीते तकते ड्योढ़ी को
आशा के दीप धरे बैठा हूँ
कितना विश्वास अटल है
युग बीते तकते ड्योढ़ी को
आशा के दीप धरे बैठा हूँ
कितना विश्वास अटल है
corrections
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चल जीवन में मधुमास भरें
मूक हृदय के स्पंदन में, विगत युगों की संचयनी है
कोमल भावों के निर्झर में, एहसासों का पानी है
जीवन के छ्न्दों का मधुरिम, निश्चल मन यह निर्विशेष है
आज चेतना संग चली है, मूर्तमान हम-तुम अशेष है
जगती के कोलाहल में, मानस के सूने प्रकोष्ठ में
दिशा दिशा में, वातायन में, तुम ही तुम प्रतिबिंबित हो
सहसा युग से बंद द्वार पर, दस्तक सुन कर उद्वेलित हूँ
प्यासे नयनों में करुण हृदय ने, खोया कोष अभी पाया हूँ
वाणी अब नि:शब्द हुई, मंत्रमुग्ध है मेरा मन
विधि ने भंग विराग किया है, रोम रोम पुलकित है तन
आशा पर आकाश थमा था, पल का कौन हिसाब करे
उस पार शिशिर के मधुबन है, चल जीवन में मधुमास भरें
सागर का अन्तर निश्चल है, सतही ज्वारों से डरो नहीं
मेरे अन्तर की पीड़ा को, फिर घावों से भरो नहीं
क्या दूर् क्षितिज तक धरती और अंबर को किसने नापा है
जीवन सीमा के आगे भी, क्या तुमने सत् में झांका है
इक अशेष चिंगारी में ही, ज्वाल शिराऐं पलती हैं
तुमने इसमें पवन डुलाया, तब स्वच्छंद लरजती है
अपने छोटे आँगन में ये, संचयनी के बीज गुने हैं
सदा सदा से प्यार तरुण है, हम विशुद्ध हैं शुद्ध बुद्ध हैं
युगों युगों के बीते पर नित, नूतन प्रेम हमारा है
उस पार शिशिर के मधुबन है, चल जीवन में मधुमास भरें
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चल जीवन में मधुमास भरें
मूक हृदय के स्पंदन में, विगत युगों की संचयनी है
कोमल भावों के निर्झर में, एहसासों का पानी है
जीवन के छ्न्दों का मधुरिम, निश्चल मन यह निर्विशेष है
आज चेतना संग चली है, मूर्तमान हम-तुम अशेष है
जगती के कोलाहल में, मानस के सूने प्रकोष्ठ में
दिशा दिशा में, वातायन में, तुम ही तुम प्रतिबिंबित हो
सहसा युग से बंद द्वार पर, दस्तक सुन कर उद्वेलित हूँ
प्यासे नयनों में करुण हृदय ने, खोया कोष अभी पाया हूँ
वाणी अब नि:शब्द हुई, मंत्रमुग्ध है मेरा मन
विधि ने भंग विराग किया है, रोम रोम पुलकित है तन
आशा पर आकाश थमा था, पल का कौन हिसाब करे
उस पार शिशिर के मधुबन है, चल जीवन में मधुमास भरें
सागर का अन्तर निश्चल है, सतही ज्वारों से डरो नहीं
मेरे अन्तर की पीड़ा को, फिर घावों से भरो नहीं
क्या दूर् क्षितिज तक धरती और अंबर को किसने नापा है
जीवन सीमा के आगे भी, क्या तुमने सत् में झांका है
इक अशेष चिंगारी में ही, ज्वाल शिराऐं पलती हैं
तुमने इसमें पवन डुलाया, तब स्वच्छंद लरजती है
अपने छोटे आँगन में ये, संचयनी के बीज गुने हैं
सदा सदा से प्यार तरुण है, हम विशुद्ध हैं शुद्ध बुद्ध हैं
युगों युगों के बीते पर नित, नूतन प्रेम हमारा है
उस पार शिशिर के मधुबन है, चल जीवन में मधुमास भरें
