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Wednesday, 23 September 2015

drafts for


जिन पर शब्द युगों तक ठहरे
उन अधरों की पीड़ा समझो
बिछे रहे जो आगम पथ में
थकित नयन की साधें समझो।

जिस उपवन में पतझड़ ठहरा
उसमें भ्रमर नहीं है आते
जिस कुटीर में छाव नहीं हो
उनमें पथिक नहीं रुक पाते।

खुले नयन से स्वप्न देख कर
पानी पर क्यों चित्र बनाते
जो बस्ती वीरान पड़ी हो
उसमें पाहुन कभी न आते।

अनछुई छुअन की आस पोर को
तुहिन कणों की प्यास भोर को
मैं अनंत का पथिक बिचारा 
खोज रहा अनजान ठौर को।

युग बीते तकते ड्योढ़ी को
आशा के दीप धरे बैठा हूँ

कितना विश्वास अटल है

 corrections

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चल जीवन में मधुमास भरें

मूक हृदय के स्पंदन में, विगत युगों की संचयनी है
कोमल भावों के निर्झर में, एहसासों का पानी है
जीवन के छ्न्दों का मधुरिम, निश्चल मन यह निर्विशेष है
आज चेतना संग चली है, मूर्तमान हम-तुम अशेष है

जगती के कोलाहल में, मानस के सूने प्रकोष्ठ में
दिशा दिशा में, वातायन में, तुम ही तुम प्रतिबिंबित हो
सहसा युग से बंद द्वार पर, दस्तक सुन कर उद्वेलित हूँ
प्यासे नयनों में करुण हृदय ने, खोया कोष अभी पाया हूँ

वाणी अब नि:शब्द हुई, मंत्रमुग्ध है मेरा मन
विधि ने भंग विराग किया है, रोम रोम पुलकित है तन
आशा पर आकाश थमा था, पल का कौन हिसाब करे
उस पार शिशिर के मधुबन है, चल जीवन में मधुमास भरें

सागर का अन्तर निश्चल है, सतही ज्वारों से डरो नहीं
मेरे अन्तर की पीड़ा को, फिर घावों से भरो नहीं

क्या दूर् क्षितिज तक धरती और अंबर को किसने नापा है
जीवन सीमा के आगे भी, क्या तुमने सत् में झांका है
इक अशेष चिंगारी में ही, ज्वाल शिराऐं पलती हैं
तुमने इसमें पवन डुलाया, तब स्वच्छंद लरजती है

अपने छोटे आँगन में ये, संचयनी के बीज गुने हैं
सदा सदा से प्यार तरुण है, हम विशुद्ध हैं शुद्ध बुद्ध हैं
युगों युगों के बीते पर नित, नूतन प्रेम हमारा है
उस पार शिशिर के मधुबन है, चल जीवन में मधुमास भरें


Friday, 18 September 2015

गगन की अगन

गगन की अगन


दो कल के बीच स्वयं को संभालना मुश्किल है
जो बीत गया बदल सकता नही
जो आएगा वह विधना की लेखनी मे भरा
अस्मिता है उधार के पलों पर ठहरी
उधार, जो साहूकार तय करता है
डेबिट कार्ड क्रेडिट कार्ड मे बदल गया है

क्षण मिले वो आसमां ताकते खर्च हो गए
वो कभी जो आज थे कल हो गए
रेशमी रिमझिम बरसती ये मेघना
वो पपीहे के लिये किस काम की,
सागर भी उसके किस काम का ,
स्वाँति की ना मिल सकी इक बूँद भी
जी रहा अगले बरस की आस में

गर लिखा विधि ने कभी का मिल गया होता
पर पपीहा जानता  इतना फकत
आकाश आस की बल्लियों पर ठहरा है,


बन गया निष्ठुर नियति आकाश अब तो
विधाता स्वाँति लिखना ही भूल गया
प्यास की पहचान उसको है नही
इस गगन मे शेष केवल है अगन ही

Wednesday, 16 September 2015

क्योंकि तुम हो





















जिंदगी मे जो कुछ अच्छा है
इसलिये कि....
कि जो-जो मिले अच्छे मिले,
कुछ से हम मिले,
शेष उस परमात्मा की अनुकंपा से मिले।

और तुम ....
.... तुमको तो प्रभु  ने ,
खास मेरे लिये नवाजा है,
इसी लिये जिंदगी तरोताजा है,
जानता है वह जीने के लिये
साँस  का होना जरूरी है।

आकाश तो निखालिस खाली है
पर उसने अनगिनत आशाएँ भर डाली है
साँस भी इसकी फिजा मे भरी हवा से ही चलती है
जिंदगी इसीसे चलती है,
इसी आकाश में पलती है, फलती है

शायद तुम यह जानते नही !
इन सांसो को गौर से देखो,
इसमे तुम हो कि नहीं,
स्पन्दन तुम्हारा है कि नही,
सूँघ कर कहो वहीं से आयी  कि नहीं
ये धडकनो का हिसाब है कि नही
इनमे तुम्हारी स्मृतियों का अरमान है कि नही
तुम तलक पहुँच सके- ये प्यास है कि नही
महसूस करो इन्हें ये तुम्हारे आस-पास है कि नही

आशाएँ पकड मे आती नही है,
महज जिंदगी का खालीपन भरती है
बडा सा मेस्मेरिजम है
सुहावना, लुभावना-
जिंदगी इसीका हाथ पकड कर चल रही है
चलती ही चली जा रही है

इसलिये कि कही न कहीं तुम हो
हाथ मे अनपढी सी कोई लकीर
वो तो आस बाँध कर बैठी है
वरना तो मन है महज फकीर

जिंदगी का बीतते चले जाना
किसके बूते में  रोक पाना है 
पल दर पल जिंदगी में खर्च कर दिये,  
अबसे तुम पर खर्च किया जाना है

पल दर पल जिंदगी में खर्च कर दिये,  
अबसे तुम पर खर्च किया जाना है। 

…… रामनारायण सोनी 

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन