*

*
*

Friday, 24 September 2021

मैं सम्पूर्ण हो गया हूँ

सुचिते!
तुम !
और तुम्हारा आस पास का 
वह सब
इनमे से
चाहा और चुना है मैंने 
सिर्फ तुम्हें ही
और देखो! सम्पूर्ण हो गया हूँ मैं

रामनारायण सोनी

मैने लिखना छोड़ दिया है

 

यह प्रदीप, ये नीहारिकाएँ

ये गुल्म और लताएँ

मन और सारी आशाएँ

ठहरे ठहरे और निष्प्राण हैं

अब लौट भी आओ शुभे!

मेरे उस महाप्रयाण से पहले

 

रामनारायण सोनी

 

२४.०९.२१

 

मैंने लिखना छोड़ दिया है

क्योंकि मैं...

किताबों में लिखे चेहरे

और चेहरे पर लिखी किताब

पढ़ना चाहता हूँ

इसलिये मैंने लिखना छोड़ दिया है

 

मैंने कहना छोड़ दिया है

क्योंकि मैं..

तुम्हारी पीड़ा, सुख-दुःख

तुम्हारी अनुभूतियाँ,

जिन्दगी के कड़वे, खट्टे-मीठे

सच सुनना चाहता हूँ

इसलिये मैंने कहना छोड़ दिया है

 

मैंने देखना छोड़ दिया है

अब मुझे महलों दुमहलों की

खिड़कियाँ, मेहराबें और कंगूरे

कुछ भी अच्छे नहीं लगते

क्योंकि मुझे..

पसीने से लथपथ इन मजूरों की

बरसाती से ढँकी वे झुग्गियाँ 

वे निचली बस्तियाँ, बस्तियों में

दौड़ता, हाँफता, बिलखता, आदमी

जहाँ टप्परो से टपकते हैं संत्रास,

उनमें सब और पैली

मच्छरों, मक्खियों के भिनभिनाहट

मुझे चैन से रहने नहीं देती

 

मैंने देखना - दिखाना छोड़ दिया है

जबकि वहाँ...

हमारे - तुम्हारे, इनके-उनके

फेंके गए कबाड़, उतरे- पुतरे

बीनते - बटोरते टालते - टटोलते

वे छोटे बड़े अधमरे जिस्म

मेरे जेहन में, चेतना के संसार में

तैरते रहते हैं

मैं देखता हूँ ठगा - ठिठका

मेरी इन छलछलाई ऑंखों से

नहीं देख पाता हूँ

वे गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ

सभ्यता के शिखरों की चौंधियाती चमक

 

शायद इसलिये

छोड़ दिया है मैंने..

लिखना, कहना और दिखना

 

रामनारायण सोनी

लौट भी आओ!

यह प्रदीप, ये नीहारिकाएँ
ये गुल्म और लताएँ
मन और सारी आशाएँ
ठहरे ठहरे और निष्प्राण हैं
अब लौट भी आओ शुभे!
मेरे उस महाप्रयाण से पहले

रामनारायण सोनी
२४.०९.२१


तीन लघु कविताएँ

मैं 
और जीवन यह मेरा
दीवार पर टँगे दर्पण सा
कैसा यह बीत गया
रीता और क्रपण सा
लोग आये, लोग गये
अपने तन लेकर
और अपने मन लेकर
चुटकी भर धूल
लिपटी ही रही
जीवन के इस दर्पण पर
शायद देख नहीं पायेगा
रीतापन जीवन का

रामनारायण सोनी
५.९.२१

कितनी मजबूर है
उड़ने को चिड़िया
तैरते रहने को मछली
बहने को यह समीर
उठने को धुआँ
मैं भी
तुम्हें निरन्तर याद करने को

रामनारायण सोनी
५.९

दमकता मुखड़ा 
उस सुर्ख गुलाब का
सौंदर्य और सुवास से सिक्त
अभिभूत और स्तब्ध हो
धरती के आँगन में
देखता ही रह गया मैं
और यह क्या कमाल हो गया?
यकायक महक उठा है 
सारा का सारा 
मेरे भीतर का उपवन
हे शुभे!
एक से ही तो हो तुम दोनों

रामनारायण सोनी

दो लघु कविताएँ

पूछना है तो पूछो
इतिहास मेरा, तुम्हारा, उनका
इन कतरनों और पुर्जियों से
आइने तो बस
रनिंग कॉमेन्ट्री सुनाएँगे

रामनारायण सोनी
२३.०८.२१

तुमने कहा था
रहेगा तुम्हारा साया
साथ सदा ही मेरे
पर यहाँ तो और कुछ भी नहीं है
मेरी परछाइयों के सिवा

रामनारायण सोनी
२३.०८.२१


मुक्तक

शब्द नही अहसास लिखो
कहीं दूर नही आसपास लिखो
आईने मे कोई बसा नही 
बस बिम्बों का अहसास लिखो

क्या बताऊँ सुचिते

क्या बताऊँ सुचिते!
ठगे, ठिठके इन नयनों के
ये रास्ते सभी
बहुत खारे और नम हैं
जिनसे तुम
उतरे हो हृदय में,
ये शब्द भी तो
कितने शबनमी हो गए हैं
हिफाजत करता हूँ इनकी
धूप और हवा से
महसूस होती है इनमें
खुशबू तुम्हारी ही

रामनारायण सोनी
११.०८.२१


हाँ यही तो है वह

वो क्या चीज़ है कि

चोट मुझे लगे और दर्द तुम्हें हो
गर मैं खुश नहीं रहता हूँ
तो तुम भी उदास हो जाते हो
गर मैं सोता हूँ
तो सिरहाने बैठे जागते रहते हो
जैसे ही मैं कुछ बोलने जाता हूँ
वह कहने के पहले ही
तुम्हारे मुँह से निकलने लगता है
जैसे ही हम चुप होते हैं 
चुप्पियाँ जोर जोर से बतियाने लगती हैं
जो जुबाँ नही कह सकी
वह दिल बोलता है, आँखे बोलती है
वे बातें बस तुम्हारी हमारी
मुझमें तुम महसूस होने लगते हो
पूरी सिद्धत से
और शायद तुम में भी मैं उसी तरह
क्यों? क्या रूहें घर भी बदलती हैं?
तुम मुझे यहाँ ढूँढते हो
और मैं तुम्हें वहाँ
जब लौटता हूँ तो तुम्हें
हाँ तुम्हें, मुझी में तुम्हें पाता हूँ
क्या यह अलौकिक प्रेम नहीं है?
एक दम निश्छल, अविरल, अविचल
शायद प्रेम यही है, हाँ बिल्कुल यही है
प्रेम वह परमात्म अनुभूति है

रामनारायण सोनी
२९.७.२१

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन