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Saturday, 29 June 2019

मृदुहास


मन की कोरी चादर पर कुछ स्वप्न धरे हैं
अधरों पर कुछ प्यास गुलाबी ले कर आना
नयनों की कोरों में श्यामल सांझ खिली हो
मदिर मदिर मौसम का मृदुहास लिये आना।

आज तूलिका अंतस के कुछ रंग भरे बैठी है
उसके प्राणों के रेशों से तुम हौले ख़ुद उतराना।
उलझे कुन्तल के वलय सभी उलझे उलझे हों
प्रखर प्रणय की संध्या के मधुमास लिये आना।।

Tuesday, 18 June 2019

मैं वहाँ तुम यहाँ

"मैं वहाँ तुम यहाँ"

मैं ही उतरा था एक दिन!
जैसे परिंदा कोई
उतरता है तुम्हारे आंगन में
बहती थी जहाँ
शीतल मंद सुगन्धित समीरण

मैं ही तो था वह!
इक नन्हे बच्चे सा
अपनी खोई गिल्लियॉ लेने
आ गया हो ऐसे ही,
महके उस उपवन में
जैसे आ जाती है गोरैया
फरफराती उजालदानों पर

न दी दस्तक ही दरवाजे पर 
सरसराते पत्तों ने
पुकारा था तुम्हे नाम लेकर
देखता रहा वक्त रुक कर
तुम्हारी बाहों के झूले पर
हाँ, था वह मैं ही
सिरहाने थे रेशमी अहसास
उतर न पाए थे बोल 
चिपके रह गए हो जैसे
शहदीले अधरों में

लौट कहाँ पाया
पूरा मैं अब तक
छूट गया कुछ-कुछ मैं ही 
साथ चल रहे हो 
तब से अब तलक तुम भी

छूटे हम, पर छूटे कहाँ
फिर ख़ुद-ब-ख़ुद
एक-दूसरे को पाने को
क्योंकि, मैं हूँ वहाँ, तुम हो यहाँ
निरन्तर, अविरल, अविचल

Sunday, 2 June 2019

"वृक्षों के शव पर बैठे हैं"


वृक्षों के शव पर बैठे हो
प्रश्न तुम्हारे प्रश्न हुए हैं
क्यों तपती है धरती माता
क्यों आँगन अंगार हुए हैं।

शासन और प्रशासन दोनों
डंठल बो कर कागज भरते
जंगल के रखवाले खुद ही
जंगल खा कर मिट्टी करते।

इस पावस में मेघ न बरसे
आकर वापस लौट गए हैं
तपती धरा रही प्यासी ही
ताल तलैया रीत गए हैं।

हरियाली के पोस्टर होंगे
सपनों में जंगल देखोगे
लद गए दादी के वे किस्से
मंगल जिल्दों में देखोगे।

झरनों और प्रपातों के शव
उनकी बयाँ कहानी होगी
शेष रही चट्टानो को ही
व्यथा कथा सब गानी होगी।

पीपल वट ऑवल के तरु की
हम पूजा क्यों करते हैं
वृक्षों में देवत्व बसा है
ढोंग धतूरा क्यों धरते हैं।

मेढ़ों पर बूढ़े वृक्षों की
जड़ में मठ्ठा ही भरते हैं
पंछी आ कर चुग जाएँगे
फसल हमारी हम डरते हैं।

अब अभिशाप भुगतने होंगे
हमने कुदरत से खेला है
कृत्रिम खाद ठूँस दी इतनी
मिट्टी अब केवल ढेला है।

दूर नही दिन लिख लो यारों
प्लास्टिक के ताबूत बनेंगें
बिन लकड़ी के सारे शव ही
बिजली के शव-दाह दहेंगे।

रामनारायण सोनी

(02.06.2019)

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