मेरा जन्म हुआ
सिर्फ उजालों के खातिर
मैं दिया हूं,
मैं बस देता ही देता हूँ
तब तक,
जब तक खाली न हो जाऊँ
हवाएँ तो
व्यर्थ दुश्मनी में लगी है
ये शायद
बुझा कर भी बन्द न होगी
जिद है बस
उसकी अपनी, मेरी अपनी
*
*
Tuesday, 4 December 2018
जिद अपनी अपनी
Monday, 26 November 2018
स्वप्न की निशिगन्ध
हमारे स्वप्न भी
उच्छृंखल हो गए हैं
कभी ये नींद उड़ा देते हैं,
कभी जागते में कहीं ले जाते हैं
बैठ कर हवा के रेशमी परों पर
देखता हूँ माटी का गेरूआ रंग
बौराए आम की घनी छाँव मे
ठहर जाता है वक्त किसी
पलक भूल जाती है
अपना झपकना
उन्मत्त स्वाँसों की
महक उठती है निशिगंध
दो दो नयन
स्वप्न भी उच्छृंखल हो गए हैं
कभी नींद उड़ा देते हैं
तो कभी जागते में कहीं ले जाते हैं
बैठ कर हवा के रेशमी परों पर
देखते हैं माटी का गेरूआ रंग
ठहर जाता है वक्त किसी
बौराए आम की घनी छाँव में
पलक भूल जाती है
अपना झपकना
बस नयन ही कहते रहे
सुनते ही रहे नयन
हमारे अयन
तू करुण रसधार
तू करुण रसधार है,
हूँ मैं विरल निश्वास।
नील नभ की पाँख है तू
मैं तृषित अहसास।।
मानिनी मन मोद की तू ,
मैं विखण्डित तार।
ज्योत्सना है तू शरद की,
मैं शिशिर का ज्वार।।
Saturday, 24 November 2018
मेरे एहसास हो तुम
तुम्हे कभी पा नहीं सका
पर एक बड़ी उम्र भर से
तुम्हें खो भी नहीं सका
किसी एक पल भी
अपनी स्मृतियों में अमिट हो
मैं अकेला रहना चाहता हूँ
तो सामने खड़े हो जाते हो
आकाश में विचरते बादलों में
उड़ते रुई के फाए जुड़ जुड़ कर
तस्वीर बना डालते है तुम्हारी
और मैं मगन हो लेता हूँ
मगन हो लेता हूँ
जैसे तुम यहीं हो
आस पास, अंदर बाहर
मेरे एहसास हो तुम
कुनमुनी धूप हो
अनछुई छुअन हो
क्या इतना काफ़ी नही है
मेरे जीने के लिये
Sunday, 4 November 2018
किताब और जीवन का अनुक्रम
किताब की कुछ कविताएँ
कहती हैं यह पन्ना मेरा है
कुछ पन्ने कहते हैं
सुनो! यह कविता मेरी है
तो कहीं कविता पता बन गई
ऐसे ही..
कहीं जीवन के रिश्ते हैं
तो कहीं रिश्तों में जीवन है
कहीं जीवन के अनुबन्ध हैं
तो कहीं अनुबन्धों में जकड़ा जीवन
कोई रास्ते बनाते बनाते खप जाता है
तो कोई रास्तों पर चलते चलते
जो तैर कर तर जाए
दो पहियों की गाड़ी पर चलता है यह
हाँ; जिस तरह किताब समग्रता है
जीवन एक समग्रता है
साँसों की धुरी पर
धुरी पर घूमता है जीवन
साथ साथ ही घूमते हैं
कुछ साबुत, कुछ टूटे रिश्ते
साँस रोक कर सुनो!
साँस खत्म तो रिश्ते खत्म
साँस खत्म तो अनुबन्ध खत्म
जीवन के उस पार
तुम्हारे स्नेह के अखूट खजाने से
मन के अवशोषित भावों की
उस सख्त चट्टान से मैने
मीठे सोते बहते देखे हैं
अतीत के सब्ज लम्हों से
कोई शब्द, कोई संदेश
देना चाहो अगर तो
दे दो अभी
जिसे रख लूँ गिरह में
अब मैं चुक रहा हूँ
प्रयाण के सर्ग
उत्सवी हो चले हैं
मृत्यु के उस पार तक
दिखा दूँगा तब भी
कि मेरी चिर प्रतीक्षा
अमृत पिये खड़ी है
वहाँ भी तुम्हारे हृदय की
दहलीज पर खड़ा मुझे पाओगे
रामनारायण सोनी
Tuesday, 16 October 2018
गुरू की तलाश
चल चलें प्राची में
अरुणिम जीवन का
अनुसन्धान करें हम
ढूँढ ही लेगी मृत्यु हमे
इस क्षण चूके यदि हम
भव्य भवन है जीवन का
एक से एक सुन्दर
अट्टालिकाएँ, मेहराबें, कंगूरे
गेलरियाँ, एलीवेशन, रंग रोगन,
आलीशान है शोहरत
परन्तु...
अधूरा है सब
इन्टीरियर डेकोरेटर के बिना
वह गुरु करेगा
चलो..
"वरान्निबोधत"
साहस मेरा
जानता हूँ
मेरी चोंच में भरे पानी से
आग तो बुझेगी नही
पर मैं रुकूँगा नही
मानता हूँ
उछाला पत्थर मैने
नही भेद सकेगा कभी
इस गर्वीले आसमान को
पर मैं रुकूँगा नही
समझता हूँ
जलता हुआ अदना दिया हूँ
आँधियाँ हर दिशा से चल रही
पर मैं बुझूँगा नही
Friday, 12 October 2018
अंधेरी रातें और भी हैं
अगर ये दस्तूर है
कि दीवाली की रात मे दिया जले
तो यारों!
अंधेरी रातें
कई और भी हैं
सृजन करें
आओ सब मिल कर
"सृजन" को सृजन बनाएँ हम
बारिश के इस मौसम में
सपनों का घरौंदा बनाएँ हम
कागज की नन्ही सी नाव
अपनी गलियों में दौड़ाएँ हम
काले इतराते घन को
यूँ फिट्टे मुँह चिढ़ाएँ हम
उथले से पानी में
छ्पकती छपाक परनाली में
खोया वह अल्हड़पन
थोड़ा तो ढूँढ लाएँ हम
बरखा की बूँदों जैसा
बरखा की बूंदों के जैसा
बनता मिटता मेरा मन
बरखा की बूँदो के जैसा
झर झर झरता मेरा मन
जीता सारे ही जग को
पर हारा तुम से मेरा मन
जीता सारी दुनिया को
पर हारा तुमसे मेरा मन
आँगन का पीपल
आँगन का पीपल
भोर अरुणाई में
कानों में कह गया कुछ
क्यों मायूस हो तुम
देखते हो!
मैं बूढ़ा नहीं, पुराना हूँ
करता हूँ हर बरस
श्रृंगार नूतन
पुराने जीर्ण पत्तों को झाड़ कर
जोड़ता हूँ उमंग, उत्साह खुद में
जीता हूँ ले कर जिजीविषा
चलो! हम साथ जिएँ
जी भर कर
थोड़ा अपने लिए
बाकी सब के लिए
Wednesday, 10 October 2018
मुक्तक
लोचन में प्लावित अश्कों को।
करुणा के कातर क्रन्दन और
विगलित तन बुझती पलकों को।।
भीनी महकी हुई बगिया को।
कीचड़ भरी तंग बस्ती पर
लिखना शेष अभी है मुझको।।
जीवन-मृत्यु-अमर्त्य
साँस आती है, साँस जाती है
जीवन भर फिर फिर दोहराती है
एक दिन एक तरफा हो जाती है
बस एक ही बार नहीं दोहराती है।
साँसों के पार भी कहीं जीवन होगा
जीवन के उन दोनों छोर परे भी
इक जीवन था, फिर जीवन होगा।
''मैं" हो जाऊँगा फिर अनभिव्यक्त
अक्षुण्ण, अभेद्य, अछेद्य,
अक्लेद्य, अदाह्य, अमृत हूँ "मैं"
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा
न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।गीता2.22।।]
प्रेमोपासना
उपचार ढूँढने चला था
दुनिया में प्रेम का
पता चला "प्रेम" रोग नहीं
"प्रेम" तो उपासना है
इसमें क्या फर्क है कि
मैंने तुम से किया, या,
तुम ने मुझसे
जब तक "हम" नहीं
कभी वह पूरा नहीं
गल जाए, पिघल जाए "मैं"
एक युग्म तैयार हो
युग्म प्रेम रस का
आनन्दोत्सव
रूहों के एकात्मक होने का
फिर तो/फिर से
पिघल जाएँ हम
मौन का स्वर
चूम लिये सहसा
मैंने फिर फिर
जीवित इनमें हैं मधुमय
वे प्रथम संस्पर्श
प्रेम रसधार गिरी
स्वप्निल इस झील में
व्यक्त हुए हो तुम
जल लहरियों पर
अम्बर की खिड़की से
स्मित अधरों की
छलका मकरंद
भीग गए शहदीले
चूम लिए सहसा
मैने फिर फिर
जीवित इनमें हैं मधुमय
वे अप्रतिम संस्पर्श
यायावरी
उम्र भर ढोये कनस्तर
जिन्दगी हुई ऐसी बसर
इस शहर से उस शहर
चलता रहा शामो सेहर
यायावरी अभी अभी ठहरी
पीठ पर लदे अहसास
गाँठ में बंधे थोड़े रोमाञ्च
धागों से बंधे मजबूत रिश्ते
कर्म के तानों बानों पर
बुनी चादर, बैठी जीत हार
मेरी जिन्दगी की यह बही
मन के नूपुर
आवाज सुनी है
नूपुर की तुमने जो
मन ने मेरे बाँध रखे हैं
समझी जो तुमने
रूहों की अदला बदली है
छलक उठी है
प्रीत हमारी बह निकली है
तुम मेरे-मैं तुम्हारा
दिग्दिगन्त में
तुम तक आने के लिए
चाहे तुम मिलो, चाहे न मिलो
सर्वत्र ही पाता हूँ स्पन्दन तुम्हारा
महसूस करता हूं दिन-रात तुम्हें
इसलिए, हाँ इसीलिए.........
मैं तुम्हारे पास होऊं या नही
जानता हूँ मैं सिर्फ सफर
तुम पास हो सदा ही
सदैव तुम मेरे हो
और मैं तुम्हारा
खो गए हम दोनों ही
बस न सके
तुम न मिल सके कभी
और खो गए
जिन्दगी का उजास तुम
वह पृष्ठ क्या खुला
लिखा था नाम
सिर्फ तेरा ही तेरा
सपनों के रंग,
महकी है जुही
चम्पा के संग
और तरबतर मेरा मन
निखरो उन्मुक्त हो कर
उछालो आकाश में
देख लो खुले दृगों से
पूरा आकाश तुम्हारा
भर गया चटख रंगों से
बिखरो उन्मुक्त हो कर
निखरो बिखर कर
रंगोलियाँ नहीं है
कटोरियों में
विविधा
स्वेद का स्नान कर लो, शूल राहों के कुचल
मुफ्त मे शिखर के सुख भी मिले तो क्या मिले।
[डॉ मोहन गुप्त ने सुझाया....
मुफ्त में ही शिखर के सुख भी मिले तो क्या मिले/चौथी पंक्ति ह ठीक रहेगी।छन्दोभंग भी न होगा।शुभ कामनाऐं।]
यादें बरस गई
तन दहकता ही रहा
साँसें दरक गई
जिन्दजी के वे सफ़े
फर्श पर बिखरे युँही
वक्त फिसला रेत सा
किस्मत सरक गई
जिन्दजी के वे सफ़े फर्श पर बिखरे युँही
वक्त फिसला रेत सा किस्मत सरक गई
अटल जी को श्रद्धाञ्जली
भाव भींगे जम गए हैं
व्योम सा विस्तीर्ण मानस
आज कुण्ठित हो गए हैं
जरा गुजर कर देखना तुम
नमन करते शीश को मत रोकना तुम
वनाञ्चल की पत्रिका में प्रकाशित]
महुए के फूल
हो जाओ कली तुम
पलके उघाड़ते ही
फिजाएँ महक उठेगी
बिखरो आकाश में
झाँकेगी छैल छ्टा
इन्द्रधनुषी तुम में से
निष्कम्प अग्नि शिखा
अपने पिघले मोम को
बदल दो उजास में
उतरो प्राणों सी फूँक बन
बिखरोगी रन्ध्रों से
रागिनी रसवन्ती बन
अंकुर के उगने को
अंतस के प्रस्तर से
देख रहा बाट कब से
कब महुआ बन फूलूँ मैं
कहानी ढाई आखर की
अर्से से पड़ी है
मेरी पतलून की जेब में
केवल ढाई आखर ही की थी,
जिन्दगी की अलिखित किताब के
हैडर पर ही वह लिखी रह गई
एक दिन वक्त की उस निर्मम
तेज तेज धुलाई मे गल कर,
पिट कर, मैल की तरह
नालियों में बह जाएगी
पर, हृदय की गुहा में
तपन रह जाएगी
[कलश छन्द ]
अंतस के छन्द
निकली कविता
आवाज आत्मा की
है वह निःशब्द प्रकाश
नहीं सह सकते जब
भावों का अधिभार
अंतस का निनाद
आत्मा सुनती
आत्मा की
आवाज
पावन - निश्छल
मिट्टी का कर्ज
इरस मिट्टी से मैं
लेता ही जा रहा हूँ
बेहिसाब, जी भर कर
यह कर्ज उतर जाएगा
सूद सहित, मूल सारा
साक्षी उस पल के
होगे तुम सब
कणिकाएँ
किसी के लिये होऊँ या न होऊँ
मेरे लिए मैं होऊँ या कि न होऊँ
तुम्हारे होने का जिक्र होता रहे
इसके लिए मेरा होना जरूरी है
👁👁👁👁👁
प्रीत के सागर में
डूबता हूँ मैं अगर
किनारे पर
खड़े रहना तब तक
जब तक
साँसों के बुलबुले
सारे न निकल जाएँ
👁👁👁👁👁👁
आप मेरे अपने हैं।
मुझ पर अपनों का प्यार बहुत है
यह प्यार ऐसा ही रहने दो
यह बड़ा खूबसूरत कर्ज है
मुझे ऐसा ही कर्जदार रहने
रंग नही रूह हो तुम
खाली कैनवास पर तो
मन रेखाएँ खींच लेता है
कूँचियाँ क्यों सहम जाती है
उतर नही पाते कैनवास पर
क्योंकि तुम रंग नहीं
रूह ही हो तुम तो
मन के भीतर ही
अमिट छबि में
महफूज हो
बने रहो सदा-सदा
एकलव्य और द्रोण
गुरू द्रोण!!
मान्यता, श्रद्धा,
साधना, समर्पण
और भाव-भूमि पर,
एकलव्य का अंगूठा
गाण्डीव पर भारी है
जो तुमने दिया ही नही
प्रतिकार उसका माँगा?
कैसे न्यायकारी हो
गुरुता पर लघुता
कितनी भारी है
अंततोगत्वा
इसीलिए छलना हारी है।
पर्व पर्यूषण
कुन्दन बनेगी ज़िंदगी
इस कड़कती दुपहरी में,
मेरा साया मेरे कदमों तले है
छाँव होती अगर
यह तपिश
कोई साजिश नहीं
कुन्दन बनाती है
जीतूँगा डूब कर
वास्कोडीगामा
साहसी है कि हम!
लेकर कागज़ की नाव
न कुतमनुमा, न पतवार
उतर पड़े हम
असीम प्रेम सागर में
तरना किसे है!
जीतेंगे डूब कर
मुझे मुझ से मिला दो
मन ही नहीं करता
थक कर स्वयं में जब
लौटना चाहता हूँ
तो स्वयं भी खो जाता हूँ
मुझ से मुझे मिला दो
पीड़ा का सुख
मेरी सुख-बोध की
गर्द जमी आख्यायिकाएँ
नहीं पढ़ता कोई,
अब मैं भी नहीं
चौथी बार सुने
उसी चुटकुले की तरह
उबाऊ हो गई हैं वे
समय के वक्ष पर
सिक्त पड़े वृण
छूते ही हरियाते हैं
रोकूँ तो रिस जाते हैं
कुकुरमुत्ते की तरह
भाते हैं जाने क्यों
उन्हें भी, मुझे भी
अजीब है मन भी
ढूँढता है पीड़ा में
फिर पीड़ा का सुख
रामनारायण सोनी
Monday, 8 October 2018
पीर ही साजन हो गई
तुमने अपनी वंशी को
विराम दे दिया है
मेरे कान बहरे नहीं हुए
तुम्हारी पदचाप ही
ठहर गई हैं कहीं
आँखें अभी पाथर नहीं हुई
पर देखो रास्ते खुद
रास्ता देख रहे हैं
मेरी कविता मरी नहीं अभी
स्मृतियों के अमर कोष के
वेन्टीलेटर पर जी रही हैं
एक हाथ की ताली
बावरी मीरा नेपथ्य से बोली....
जो मैं ऐसा जानती,
प्रीत किये दुःख होय...
मेरी प्रीत सुहागन हो गई
Monday, 23 July 2018
एक और अपेक्षा चाहिए
Sunday, 22 July 2018
तुम मेरे और मैं तुम्हारा
दिग् दिगन्त में
महज चलने के लिए
चाहे तुम मिलो न मिलो
पर कहीं न कहीं हो तुम
जरूर यहीँ कहीं हो तुम
सर्वत्र ही पाता हूँ स्पन्दन तुम्हारा
महसूस करता हूं दिन-रात तुम्हें
इसलिए
मैं तुम्हारे पास होऊं या नही
तुम मेरे पास हो सदा ही
शायद तुम्हें पता ही नहीं
या शायद पता हो भी
पर तुम मेरे हो
और मैं तुम्हारा
Wednesday, 18 July 2018
मन के पैर बँधे नूपुर
आवाज सुनी है
नूपुर की जो तुमने
समझी जो तुमने
वह रूहों की अदला बदली है
वह मेरी प्रीत
पास होते अगर तुम
... अगर तुम
तो देख पाते
कैसे टूटता हूँ
हर रात और
फर्श पर बिखरी
पड़ी वे उम्मीदें
सुन पाते प्रतिध्वनियाँ
उन रुँधी - रुँधी
खामोशियों की
ले पाते खुशबू
हृदय-पुष्प की
बिखरी इन पंखुड़ियों की
पास होते
... अगर तुम
मुक्तक
कलम झूम कर जब रवानी लिखेगी
रगों में मचलती जवानी लिखेगी
सुरों में सजी रागनी भी प्रणय की
निशा चाँदनी की सुहानी लिखेगी
Friday, 13 July 2018
एकत्व का महोत्सव
सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते।।गीता13/32।।
जिस प्रकार सर्वगत आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता। उसी प्रकार सर्वत्र देह में स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।गीता2/30।।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।गीता13/31।।
कौन्तेय अनादि और निर्गुण होने से यह परमात्मा अव्यय है। शरीर में स्थित हुआ भी वस्तुत वह न करता है और न लिप्त होता है।।
Monday, 2 July 2018
अहसासों का अहसास
अहसास तुम्हे हो जाए तो
कह देना थोड़ा मुझ को भी
नम कर दे तेरा हृदय कहीं
कह देना थोड़ा मुझ को भी
धड़कन में मिल न सके तेरे
कह देना थोड़ा मुझ को भी
बोलों के भाव न भाए तो
कह देना थोड़ा मुझ को भी
समझूँगा मुझ में कशिश नहीं
तो सहने दो थोड़ा मुझ को भी
Thursday, 28 June 2018
जीवन-मृत्यु-अमर्त्य
जीवन-मृत्यु-अमर्त्य
साँस आती है, साँस जाती है
जीवन भर फिर फिर दोहराती है
एक दिन एक तरफा हो जाती है
बस एक ही बार नहीं दोहराती है
साँसों के पार भी जीवन था
साँसों के पार भी जीवन होगा
जीवन के उन दोनों छोर परे
जीवन था फिर जीवन होगा
"मैं" था, पर था अनभिव्यक्त
''मैं" हो जाऊँगा फिर अनभिव्यक्त
अक्षुण्ण, अभेद्य, अछेद्य,
अक्लेद्य, अदाह्य, अमृत हूँ "मैं"
रामनारायण सोनी
सुनहरा बालपन
चल फिर बालेपन में।
अपने सब कहीं छूट गए हैं
नए नए रिश्ते हैं देश बेगाना
आ! चल चलें बिसरे लोगन में।
रे मन!
चल फिर बालेपन में।
चकाचौंध सब ओर घणी है
बहरा गए कान चिल्ल पों से
लौटें शीतल गाँव गलियन में
रे मन!
चल फिर बालेपन में।
फूली साँस थके अँग अँग
पायो नही विश्राम, घड़ी भर
सो ले मैया की गोदन में।
रे मन!
चल फिर बालेपन में।
Tuesday, 26 June 2018
लिखना शेष अभी है
लिखना शेष अभी है मुझको
लोचन में बहते अश्कों को।
करुणा के कातर क्रन्दन और
विगलित तन बुझती पलकों को।।
बहुत लिखा है सोनजुही से
भीनी महकी हुई बगिया को।
कीचड़ भरी तंग बस्ती पर
लिखना शेष अभी है मुझको।।
Sunday, 17 June 2018
प्रार्थना न मैं करूँगा
कर चुका समर्पण खुद ही का
चाहने वाला ही खुटा-मिटा ही
और बचा न पाने वाला भी
कबीर ने बड़ा अटपटा बोला -
बूँद बूँद चू गया
कोई सुराख सा हो गया
सहेजा जिन्दगी भर से
बूँद बूँद कर ही चू गया
बस झाँकती है अतीत में
जाने कौन घड़ी याद का
सर से दामन सरक गया
उड़ा ले जाती रिमझिम को
वो चाँद भी रोशनी कम
जलन की बौछार कर गया
नशा है इश्किया इसका
नहीं पतवार कश्ती में ये
तूफाँ पर भरोसा कर गया
ये कौन सक्ष है..
आँसू से पसीज गया
ये कौन सक्ष है...
गरीब की झोंपड़ी से
दर्द उधार ले गया।
जो तुम्हारे बुखार से
इतना तप गया
ये सक्ष कौन है...
जो तुम्हारे पग में लगे
काँटों से बिंध गया।
तन मन में बैठ गया है
जगत की संवेदनाओं का
व्यवहार करता है
कौन है वह जो पढ़ लेता है
एक बूढ़े के चेहरे की
सिलवटों में से अमुभव के छ्न्द
पागल, आवारा, दीवाना, फुर्सती है
शरारती, अक्खड़ लोगों ने
और भी कई उपाधियाँ खोज ली होंगी
पर वह सक्ष दीनों का हमदर्द है
रंगकर्मी है, लेखक है या कवि है
संत भय्यू जी महाराज
जिन्दगी के अजब रंग है
रोशनी ले कर चला वह
पर छाया संग थी
न जान सके वे
सफर में अकेले नहीं
दुखियारे, पतित, असहाय संग थे
यह आधी दुनिया की जीत अधूरी
जंग एक बाहर थी जीत ली
जंग थी एक भीतर से
वह पुरोधा,
बाहर महारथियाँ से लड़ता रहा
पर हार गया
भीतर के पिद्दलों से
बाहर शबाब ही शबाब
भीतर कोलाहल और विक्षेप
संतुलन की अवधारणा
क्यों हुई ध्वस्त
यथार्थ उस कालजयी का
बाहर से कभी नहीं
हा! हार गया भीतर ही से
*इसलिये गीता कहती हैं*
अभ्यास करो उस समन्वय योग का।
*सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।*
*ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।2/38।।*
जयपराजय लाभहानि और सुखदुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा।
रामानारायण सोनी
Saturday, 16 June 2018
छबि तुम्हारी
तुझ में है मलय गंध
मैं बिखरी रज कण
तू छंदों का मधुर बंध।।
क्रन्दन के गाँव मेरे
तुम झिलमिल झीलों के
टूटे सुर साज मेरे
तुम सप्तक शुभ वंशी के।।
मैं दर्पण हूँ कोरा सा
पर आते तुम जब जब
अलबेली अठखेली
सजती वो छबि तब तब।।
रामनारायण सोनी
Thursday, 14 June 2018
याद का सन्दूक
कमी जरूर मुझ में ही होगी कहीं
कि
तुम्हारी याद के सन्दूक से
कपूर की तरह उड़ गया,
क़तरा क़तरा बिखर गया
बिखर बिखर मैं,
देखता रहता हूँ
बस तुम्हें ही
पगडंडियों का राहगीर
लहरिया पगडंडियों का राहगिर हूँ
राजपथ के राहियों से तौलना मत।
मंजिलों की सीढ़ियाँ पर्याप्त मुझको
शिखर छूने की मुझे तुम बोलना मत।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।
झेलती झंझा उदधि की हूँ मैं लहर
झील की सी शान्ति मुझ में हैं नहीं ।
पा लिया स्पन्द रव का मस्तियों में
वो चाँद की परछाइयाँ मुझ में हैं नहीं।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।
छ्त मेरी नित नील तारक से मढ़ी है
पवन झलती मन्द शीतल मलय गंंधी।
है हरित वसना धरा की गोद मुद मय
चाहना फिर स्वर्ग की तुम घाेलना मत।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।
प्रिय आत्मन्
Come
Come my dear!
Come aloof
With mind and the Soul
Rejoice within selfness
Let us listen
The holy song
The song of silence
Of that ocean of Peace
आओ!
आओ मेरे प्रिय आत्मन्!
आओ अकेले ही
मन अौर आत्मा के सहित
स्वयं का आनन्द प्राप्त करें
हम सुनें
वह पवित्र गीत
गीत निस्तब्धता का
उस शान्ति के सागर का
Thursday, 31 May 2018
नशा है इश्किया इसका
लगता है मेरे प्रेम-घट में
कोई सुराख सा हो गया
सहेजा जिन्दगी भर से
बूँद बूँद कर ही चू गया
मेरी यह प्रीत की दुल्हन
बस झाँकती उस कल में
जाने कौन घड़ी याद का
सर से दामन सरक गया
अब तो बारिशें खुद ही
उड़ा ले जाती रिमझिम को
ये चाँद भी रोशनी कम
जलन की बौछार कर गया
गुनाह मेरा, मेरे दिल का
नशा है इश्किया इसका
नहीं पतवार कश्ती में ये
तूफाँ पर भरोसा कर गया
Wednesday, 23 May 2018
ये गीत मेरे बस भाव मई
इनकी सौरभ और सुन्दरता
भावों की निर्मल कोमलता
ढलती है भावों के साँचों में
उतरे भाव तेरे अन्तस में
ये गीत मेरे बस भाव मई
भावों का स्पन्दन शब्द बने
ये गीत मेरे हैं शब्द वो ही
ये भाव मेरे है बन्द वही
मेरी इनमें ही प्रीत बही
ये गीत मेरे बस भाव मई
कैसी ये फगुनाहट है
टेसू क्या दहका है, मन क्यूँ बहका है
वसुधा का कण कण ऐसा दरका है।
गौरी के गाँव मुआ महुआ भी महका है
गंध फाग खेल रहे कनक जुही चम्पा है।।
महुए की मण्डी से ताड़ी की हण्डी से
पी पी जन डोल रहे हाट बाट मस्ती से।
मचल उठी मस्त मगन छैल छबीली गौरी भी
देते तन ताल थिरक वासंती मन गुंजन भी।।
कैसी फगुनाहट यह मदिर मदिर मौसम की
खुसुर पुसुर जाहिर है अमलतास बेला की।
अल्हड़ अलबेली ताल बजी पीपल की
बेला आ पहुंची अब साजन के आवन की।।
बजते माँदल पर थाली की थाप पड़ी
चूनर की ओटों से गौरी की आँख भिड़ी।
रसवन्ती रसना की मादक धुन सुन
हुलसे हुरियारे की गलबाहियाँ आन जुड़ी।।
आँखाँ ही आँखों में अनुबन्ध हुए बंधन के
मल गया गुलाल गाल लिये साध जीवन के।
वनजन गिरिजन रचते यह समवेत स्वयंवर
यह भगोरिया उत्सव है गर्व करें इन पर।।
अर्चना हम कर रहे
दीप जलाने का सबब केवल यही है
रोशनी को हम निमंत्रण दे रहे।
जो अंधेरों में खड़े अभिशाप लेकर
अर्चना उनके लिए ही कर रहे।।
अधिकार-पत्र
रंगों की बौछार तुम्हारी छबि को रंग डालूँगा।
सँवर सको तो इस दरपन पर
सोख नजर की अरुणिम रोली मल डालूँगा।।
पारिजात के नव पुष्पों से सेज सजी है।
लाँघ सको तो दाद तुम्हे दूँगा
मेरे उर के मंदिर की दहलीज अड़ी है।।
खुद ही चल कर पास तुम्हारे आ जाएँगे।
मोल सको तो मुफ्त मिलूँगा
सब कुछ अपना, बिना मोल हम बिक जाएँगे।।
मेरी ये आँख तुम्हें मैं खुद दे देता हूँ
क्या हो तुम मेरे जीवन मे
हो प्रिय तुम कितने मेरे, जान तभी पाओगे।।
कोरी वसीयत पर केवल मेरे हस्ताक्षर है।
अधिकार नही अब मेरा मुझ पर
हक सारे के सारा अब से तेरा मुझ पर है।।
मुक्तक
हौंसले बुलन्द हैं आपके अंधेरे माँग बैठे हो
जिन्दगी सारी की सारी हमारे नाम कर बैठे हो।
लेन देन करते हैं हम फ़कत रोशनी ही का
चौदहवीं के इस चाँद से अमावस माँग बैठे हो।।
याद का अजब स्पर्श, किसकी छुअन है ये।
आँख क्यों नम हुई किसकी तपन है ये।।
मन दौड़ दौड़ जाता है कहाँ कैसी लगन है ये।
खुशबुएँ फैली फ़िजां में महकता वही सुमन है ये।।
कहाँ आ गए हम
रिश्तों को चबाते रिश्ते
मासूमियत की कव्र पर
खड़ी गर्व की मीनारें
तब पाँच पैसे में मिल गई थी
ढेरों झमाझम खुशियां
अब बेखौफ़ यह
भुट्टे सी अकड़न।।
लीलते मेटल हेलाइङ्स
खपरैलों का एयरकंडीशन हुअा दफन
विकास के डोजर तले
रौंदी गई संस्कृति।।
कहाँ आ गए हम?
रास्ते अगर ये हैं
तो गन्तव्य कैसा होगा?
बहता लावा दीखता है
वह ज्वालामुखी कैसा होगा।।
Tuesday, 22 May 2018
राज पथ के राहियों से तौलना मत
राजपथ के राहियों से तौलना मत।
मंजिलों की सीढ़ियाँ पर्याप्त मुझको
शिखर छूने की मुझे तुम बोलना मत।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।
झील की सी शान्ति मुझ में हैं नहीं ।
पा लिया स्पन्द रव का मस्तियों में
वो चाँद की परछाइयाँ मुझ में हैं नहीं।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।
पवन झलती मन्द शीतल मलय गंंधी।
है हरित वसना धरा की गोद मुद मय
चाहना फिर स्वर्ग की तुम घाेलना मत।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।
Monday, 21 May 2018
मातृत्व के बीज
जो इक माँ की ही बेटी है
वन्दन,अर्चन, अभिनन्दन करता हूँ
जिसके कारण हम तुम और सब है
जिसमें मातृत्व के बीज पल रहे हैं
जिसमें नव संस्कृति के
आकार ढल रहे हैं
Friday, 11 May 2018
जिन्दगी के रंग कई रे!
नौ रंगों से है रंगी यह जिन्दगी।
करम-धरम आचार मय है बन्दगी।।
श्वेत तो उस सत्य का संधान है।
रक्त ऊर्जा की परम पहचान है।।
बैंगनी के पार तीखी मार है।
श्याम रंग तो दु:ख की भरमार है।।
नील वर्णी शान्ति की आभा अमर।
रंग पीला है उदासी की खबर।।
आसमानी वृहद अपनी गोद फैलाए खड़ा।।
हो सहिष्णु सर्वहारा भाईचारा ले बड़ा।।
रंग केशरिया उछाह उत्सर्ग है।
जिन्दगी अविराम बहते सर्ग है।।
इस धरा का रंग हरित पारिधान है।
त्याग, आर्जव, दम, शील महान है।।
रंग हर कोई नियति का मान है।
धर्म की सद् राह हो यह आन है।।
जिन्दगी इन सब रंगों की मेल है।
ईश का वरदान और नसीबा खेल है।।
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