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Friday, 23 December 2016

वहाँ तुम ही हो


उस ऊँचे से शिखर की ढलान से
एक लुढ़कता पत्थर कहता है
वहाँ कोई है मेरा अपना,
अल्हड़ बादल के टुकड़े सा लहराता
मचलता वह सफेद सा दुपट्टा
कह रहा है इशारे से वहाँ तुम ही हो,
फिर आहटें वे फुसपुसाती कुछ
जैसे घुँघरू एक साथ झनक उठे हों
आम के वे सूखे जर्द  पत्ते
कह रहे है जैसे, वहाँ तुम ही हो

मचलती लहराती  रेशमी पगडंडियाँ
ले जाती है रोज तुम्हें इधर से उधर
लाँघती उस विशाल राजपथ को
मटमैली सर्पिल इतराती पगडंडियाँ
मखमली नर्म हरी चादरों में लिपटी
आकाश से रेंगती, उतरती, सरकती
मेरे घर तक, हृदय तक, अंतस तक
दीखती हो तुम कभी कभी न हो कर भी
उडती उस धुल के उस पार जैसे
कह रहा है हवा का झोंका वहाँ तुम ही हो,

मैं जब भी गीत लिखता हूँ

मैं जब भी गीत लिखता हूँ
कलम पर कोई बैठ जाता है
कभी मैं अपने हाथ को 
तो कभी कलम को देखता हूँ
बन करके वो सियाही मेरे
पन्नों पे उतर आता है

बन गया है गीत कोई या बनी गज़ल
लिखता वही हूँ केवल जो

तू आखों से बोल  जाता है

मुक्तक


सोई पड़ी है बिजलियाँ इन आँखों में, अभी मत जगाओ इन्हें।
मुस्कुराहटें सुस्ता रही इन आँखों मे, अभी मत जगाओ इन्हें।।
शोखियाँ दबी पड़ी है आँखों में, अभी मत जगाओ इन्हें।।
पलकें आधी गिरी आधी खुली है, न गिराओ न उठाओ इन्हें।

न खुद देख लेना उठ कर तुम, आइने से बचाओ इन्हें।
बिजलियाँ, शोखियाँ, शरारतें कहीं बिखर न जाए बचाओ इन्हें।।
हया के झीने परदे में ही रहें, बहुत शुमारी से बचाओ इन्हें।
जमाने को रखो ताक में हमारी नजरों से बचाओ इन्हें।।

तलाश करता हूँ अर्से से

वो जगह तलाश करता हूँ अर्से से
गुजरे वक्त के लमहात जहाँ ठहरे हों
वो दरिया तलाश करता हूँ अर्से से
नदिया के कहीं बाकी जहाँ कतरे हों

देती है गवाही ये हसीन वादियाँ जैसे
अभी हाल में फरिश्ते यहाँ से गुुजरे हों
नजरें हजारों घूरती रहती मुझे दर रोज
ढूँढता हूँ इनमें से जो तुम्हारी नजरें हों

ढूँढता रहा मुझे तुझमें एक अर्से से
मुलाकात का कोई रास्ता तो मिले
अंजाम खोज का कोई न था जब लौटा 
मेरे दिल में ढूँढा तो तुम्हीं बाबस्ता मिले

जो लम्हा साथ है उसे जी भर के जी लेना
खिली हो चाँदनी उसे जी भर के पी लेना
भुला कर दर्द के किस्से, अंधेरी रात के साए
मिले खुशियाँ जहाँ से भी, उन्हें जी भर के जी लेना।।

सूख गए फूटते ही अंकुर

सूख गए फूटते ही अंकुर


















पहाड़ की सूनी सी गोद में 
उजड़ी हुई इस बस्ती में
पसरा सन्नाटा, काई भरे परकोटे
यह खंडहर कुछ कहता है 
यहाँ टूटे हर एक पत्थर के तले
दबी पड़ी है एक एक कहानी
यादों के आइने की गर्द के पीछे
काली-लाल फर्शियोँ के वे टुकड़े
ढूँढता हूँ इसी बिखरे मलबे से 
जो बने थे कुछ दीवार, तो कुछ खंभे
कुछ मेहराब, तो कुछ आसंदी 
खेले थे हम "ख्वाबों का आशियाना" 
खो गया वक्त की गहरी खाई में
छोड़ गया गुजरे साँप की सी लकीर
कभी मैं ढूँढता हूँ इस के इर्द गिर्द 

बस एक टुकड़ा खिड़की की 
आधी अधूरी उन सीखचों का 
आवाज देता है मलबे से, मैं यहाँ हूँ
वह कहानी का टुकड़ा बयान करता है
खिड़की इधर भी थी, उधर भी
पीछे से उभर आई स्निग्ध सी सूरत
ताकती वे एक जोड़ी शोख आँखे 
झाँकती, अपनी ओर खींचतीं आँखें
गड़ गई थी सीने में गहरी 
कभी भी न निकलने के लिए
पाता हूँ जहाँ की तहाँ आज भी

तुम्हें याद होगा अब भी वह 
कंकर फेंक कर दुबक जाना
बात बात में मुँह चिढ़ाना
झरनों सी झर-झराती हँसी
सुन रहे है कान मेरे वही अनुगूँज
लगता है बूढ़े बरगद के पीछे से 
दौड़ कर अभी निकल आओगी
खोजता हूँ कहानी के शेष टुकड़े
फेंके गए वे कुछ कंकर, 
बरगद के पीछे तुम्हें, 
यहीं कहीं होगी तुम
ढूँढता हूँ झाड़ियों झंकाड़ों में
काँटों में फँसे ओढ़नी के कुछ रेशे

टुकड़ा खिड़की की सीखचों का 
झरोखा बनता है उसी कहानी का
ख्वाबों के रंगीन आशियाने का 
खिड़की का वह टुकड़ा पड़े पड़े
करता है बातें रूमानी, अब भी अकसर 
उकेरता है एक अधूरी कहानी
जिन्दगी के एक बारीक सुराख से
झाँकती रहती है यह कहानी अक्सर

सपनों के सब्ज बीज से
जैसे सूख गए फूटते ही अंकुर,
उड़ गया हो कपूर थाली से
जैसे आरती के पहिले ही
आ गयी हो रात अंधियारी 
जैसे शाम आने के पहिले ही
खिड़की का वह टुकड़ा पड़े पड़े
करता है बातें रूमानी, अब भी अक्सर 

Sunday, 18 December 2016

🙏"मैं कृतज्ञ हूँ तेरा प्रभुवर"🙏


"मैं कृतज्ञ हूँ तेरा प्रभुवर"

क्यों चले आते अचानक, फँस रहा होता भँवर में
क्यों बढ़ाते हाथ अपने, गिर रहा होता डगर में
कौन हो तुम जो लगे हो, साथ हर दम इस सफर में
कौन काँटे राह के यह बीनता फिरता शहर में।।


डूबता भव सिंधु में जब, कौन माझी आ खड़ा है
जन्म से प्यासे पथिक का, भर रहा खाली घड़ा है
भूलता जब राह अपनी, घेरती जब ज्वाल जग की
कौन भरता अंक में है, वह दयामय ही बड़ा है।।


जानता ही मैं नहीं वह, कौन है आता कहाँ से ?
सिंधु में आनन्द के नित, रसपान करवाता मुझे
थाम करके बाँह मेरी थपकियाँ जो दे रहा
कौन है जो इस हृदय में, साथ मेरे बस रहा।।


है करुण रस धार तेरी, नित निरंतर बह रही
प्रेम बन कर इस जगत में अनवरत ही चल रही
तुम अकारण ही कृपा, इस जीव पर जो कर रहे
यह रहे विश्वास अविचल, जब तलक जीवन रहे।।

पुरानी सी मेरी डायरी के जर्द पड़ गए पृष्ठों में

पुरानी सी मेरी डायरी के
जर्द पड़ गए पृष्ठों में
पृष्ठों में सियाही जो है
मेरी कलम की ही है, पर
हर शब्द में रूह तुम्हारी ही है
सौंधी सी महकती है सुगन्ध बन कर
उन अक्षरों में तुम्हारे तन बदन की
कैसे अजीब संगतराश हैं ये
मिल कर तुम्हारी सूरत बना देते हैं
एक अक्षर पर चढ़ी बिंदी
उतरी थीं तुम्हारे ही माथे से

और कहीं
सपनीले गुलाबी एक पृष्ठ पर
यादों की लेई से चिपके अक्षर
गूँजते रहते हैं अक्सर
रूह की आवाज बन कर
उस खास कमरे में दिल के
नहीं आता जाता जहाँ कोई और
सुनता हूँ इनको मैं जी भर भर कर
"चुपके चुपके कुछ कहते हैं
आसमान के झिलमिल तारे
भाव भरे है ऐसे ही
देखाे ये शब्द हमारे"

और इसमें कहीं
छुपाया था ताजा ताजा
गुलाबी गुलाब का वह फूल
झड़ गया था कहीं सूख कर
वक्त की डाल से टूटे लम्हे की तरह
पन्ने पर छूटे हुए निशान में
एक चेहरा झाँकता है कनखियों से
तकता है मुझे अजनबी की तरह
पूछता है, कौन हो तुम?
और मैं कह उठता हूँ
जिन्दगी की डायरी है गवाह
जानती है केवल तुमको
यहाँ कोई और नहीं,
केवल तुम ही तुम हो।।

इसमें मौजूद है फिंगर प्रिन्ट
टेसू के चटकीले रंग भरे
फेंके थे पीले, गुलाबी रंग तुमने
अकसर पृष्ठ पर से निकल कर
घुस जाते हैं जेहन में
कर जाते तर बतर तन मन
उदास होता मैं जब कभी
दौड़ता हूँ इन पृष्ठों में इधर से उधर
निकलता हूँ ताजा दम हो कर
जिन्दगी की डायरी है गवाह,
जो जानती है केवल तुमको
यहाँ कोई और नहीं,
केवल तुम ही तुम हो।।

पुरानी सी मेरी डायरी के
जर्द पड़ गए पृष्ठों में
पृष्ठों में सियाही जो है
मेरी कलम की ही है
मेरी दौलत है, सनद यही है
इसमें मैं भी नहीं हूँ
हाँ, यहाँ कोई और नहीं,
केवल तुम ही तुम हो।।

सूख गए फूटते ही अंकुर

सूख गए फूटते ही अंकुर

पहाड़ की सूनी सी गोद में
उजड़ी हुई उस बस्ती में
पसरा सन्नाटा, काई भरे परकोटे
यह खंडहर कुछ कहता है
यहाँ टूटे हर एक पत्थर के तले
दबी पड़ी है एक एक कहानी
यादों के आइने की गर्द के पीछे
काली-लाल फर्शियोँ के वे टुकड़े
ढूँढता हूँ इसी मलबे से जो
बने थे कुछ दीवार तो कुछ खंभे
कुछ मेहराब तो कुछ आसंदी
खेले थे हम ख्वाबों का आशियाना
खो गया वक्त की गहरी खाई में
छोड़ गया गुजरे साँप की सी लकीर

बस एक टुकड़ा खिड़की की
आधी अधूरी उन सीखचों का
आवाज देता है मलबे से, मैं यहाँ हूँ
कहानी का टुकड़ा बयान करता है
खिड़की इधर भी थी, उधर भी
पीछे से उभर आई मोहनी सी सूरत
ताकती वे एक जोड़ी शोख आँखे
झाँकती, अपनी ओर खींचतीं आँखें
गड़ गई थी सीने में गहरी तभी
कभी भी न निकलने के लिए
पाता हूँ जहाँ की तहाँ है आज भी

तुम्हें याद होगा अब भी वह
कंकर फेंक कर दुबक जाना
बात बात में मुँह चिढ़ाना
झरनों सी झर-झराती किलकारी
सुन रहे है कान मेरे वही अनुगूँज
लगता है बूढ़े बरगद के पीछे से
दौड़ कर अभी निकल आओगी
खोजता हूँ कहानी के बाक़ी टुकड़े
फेंके गए वे कंकर,
बरगद के पीछे तुम्हें,
यहीं कहीं होगी तुम
ढूँढता हूँ झाड़ियों झंकाड़ों में
काँटों में फँसे ओढ़नी के कुछ रेशे

टुकड़ा खिड़की की सीखचों का
झरोखा बनता है उसी कहानी का
ख्वाबों के रंगीन आशियाने का
हाँ, खिड़की का वह टुकड़ा पड़े पड़े
करता है बातें मुझसे, अब भी
उकेरता है एक अधूरी कहानी
जिन्दगी के एक बारीक सुराख से
झाँकती रहती है वही कहानी अक्सर
सपनों के सब्ज बीज से
जैसे सूख गए फूटते ही अंकुर,
उड़ गया हो कपूर थाली से
जैसे आरती के पहिले ही
आ गयी हो रात अंधियारी
जैसे शाम आने के पहिले ही
खिड़की का वह टुकड़ा पड़े पड़े
करता है बातें मुझसे, अब भी

Wednesday, 14 December 2016

है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे

मैं, अकसर बेखबर सा
खुद को देखता हूँ अचरज से
क्या बताऊँ, किसको बताऊँ
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
न मुड़ कर कभी देखा
न रुक कर कभी सोचा
न अपनी पहिचान रही बाकी
क्योंकि मैं तो स्वयं ही
मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?

है कोई तजबीज या सक्ष कहीं?
जो लगी जंग मेरी अस्मिता को
मुझ से छुड़ा दे
है छिपा कोई रश्मि पुँज मुझमें ही
फूँक कर अज्ञान के कोहरे को
परमज्योति का जो दर्शन करा दे
दूर बज रही है प्रणव की भेरियाँ
कानों पर लगे हैं माया के ढँकने
आकर कोई अब तो हटा दे
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?

मैं खड़ा था कुण्ठित सा
दुनिया के मोहक मायावी रंगमंच पर
तभी विस्तीर्ण नेपथ्य से
एक छाया सी उतरी
छुआ उसने रेशमी उँगलियों से
तब मैं जगत देख रहा था
उसने मुझे उल्टा घुमा दिया
और जाते जाते यह कह गई
यहाँ से केवल तीन छ्लाँग दूर पर
तुरीय का सत्य बोध है
वैश्वानर से तैजस, तैजस से प्राज्ञ
और प्राज्ञ से ओंकार

यह रूप की नहीं स्वरूप की यात्रा है
यात्रा है अपनी उपाधियों के विसर्जन की
यात्रा है मेरी मुझमें लौटने की
अभी नहीं होगी तो कभी नहीं होगी

यह प्रयाण नहीं आरोहण है
क्योकि मैं तो सिर्फ "मैं" हूँ....
"अहं ब्रह्मास्मि"

पहली छलाँग स्वप्न में
दूसरी सुषुप्ति में और तीसरी
तीसरी उस विराट में, परमचेतना में
छाया नेपथ्य में विलीन हो गई

शायद  मुझे तलाश थी
इसी जामवन्त की,
युगों युगों से
जन्म जन्मान्तरों से

🙏"मैं कृतज्ञ हूँ तेरा प्रभुवर"🙏

🙏🙏  🌺🌺  🙏🙏

🙏"मैं कृतज्ञ हूँ तेरा प्रभुवर"🙏

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क्यों चले आते अचानक, फँस रहा होता भँवर में
क्यों बढ़ाते हाथ अपने, गिर रहा होता डगर में
कौन हो तुम जो लगे हो, साथ हर दम इस सफर में
कौन काँटे राह के यह बीनता फिरता शहर में।।

डूबता भव सिंधु में जब, कौन माझी आ खड़ा है

जन्म से प्यासे पथिक का, भर रहा खाली घड़ा है
भूलता जब राह अपनी, घेरती जब ज्वाल जग की
कौन भरता अंक में है, वह दयामय ही बड़ा है।।

जानता ही मैं नहीं वह, कौन है आता कहाँ से ?

सिंधु में आनन्द के नित, रसपान करवाता मुझे
थाम करके बाँह मेरी थपकियाँ जो दे रहा
कौन है जो इस हृदय में, साथ मेरे बस रहा।।

है करुण रस धार तेरी, नित निरंतर बह रही

प्रेम बन कर इस जगत में अनवरत ही चल रही
तुम अकारण ही कृपा, इस जीव पर जो कर रहे
यह रहे विश्वास अविचल, जब तलक जीवन रहे।।

कृतज्ञ

रामनारायण

Tuesday, 6 December 2016

यादों के झुरमुट से


यादों के झुरमुट से

तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो।।

खुले नयन है गहन गगन में, अंतरतम के सरल सृजन हैं।
स्वर्णिम यादों की परतों में,  मृदुल करों का अवगुंठन है।
बिन छुए छुअन की सिहरन है, स्वाँस- स्वाँस में चन्दन वन है।
प्रीत अरुण ले प्राची में तुम, ऊषा बन कर आती हो।।

      तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
      सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो।।

सपनों पर अपना जोर नहीं, वह उनका बहशीपन है।
ले जावें किस ओर उड़ाकर दिग दिगंत का ठौर नहीं।।
किससे पूछूं किससे जानूं मेरे प्रिय की बसर कहाँ है ।
इस बस्ती से उस नगरी तक बंजारे की डगर कहाँ है।।

     तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
     सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती  हो।।

जब दूर क्षितीज में सांझ ढले, और शीतल मंद बयार चले।
बरगद की साखों पर पंछी, कल-कल कलरव गान करे।।
धरती पे है निविड़ निशा, तारों की चूनर ओढ़ प्रिये।
मेरे मन के उपवन मे तुम, प्रणय प्रसंग लिये आती हो  ।।

    तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो ।।

"जन्मदिन मेरा"

"जन्मदिन मेरा"

कभी यह
अगली सीढ़ी की पायदान है
चढ़ भी सकता हूँ
कामयाबी एक नए शिखर पर
उतर भी सकता हूँ
नीचे किसी गिरते हुए को उठाने
मुड़ भी सकता हूँ
अपने खुशनुमा साथी को
प्यार से संग लाने को
ठहर भी सकता हूँ
टूटते, छूटते, बिखरते रिश्तों को
जोड़ने को संवारने को जिलाने को

कभी यह
पिछली जिन्दगी का झरोखा है
देख सकता हूँ मील के पत्थरों को
गुजिस्ता लम्हों को
जिनमें कुछ पाया, कुछ खोया
कभी उठ कर गिरा, नसीब से
कभी गिर कर उठा, हौंसलों से
कोई मिल कर छूटा, रूठ कर
कोई छूट कर मिला, प्यार से

उतरते चढ़ते, चढ़ते उतरते
जिन्दगी की यह दहलीज है
मंजिल-ए-मकसूद पता नहीं
पर ये रास्ते, ये हम सफर
ये दोस्त, ये रहगुजर
ये मुश्किलें, ये दुश्वारियाँ
चाहे जो मिलें
हौंसले न टूटे, विश्वास न छूटे
यही उस ईश से अभिलाष है
जिन्दगी बस खुशनुमा रहे।।

उन्मद है तन-मन

जब यादों में गहराते हो
अन्तस्तल पर उभर आते हो।।

वे संवाद, वे अवसाद,
वे केकी से कहकते स्वर
और मुस्कराते अरुण अधर
हवाओं में तैरते-लरजते स्पन्दन
हथेलियों पर फुदकते लम्हों
तुम कानों में कुछ कह जाते हो।।

जब यादों में गहराते हो
अन्तस्तल पर उभर आते हो।।

अलकों में उलझते पोर
उन्मद हो जाता मैं अकसर
सहसा कौंधती झुरझुरी
फैलती बाहें, बोलती निगाहें
उतर कर अम्बर से आहिश्ता
जब यादों में गहराते हो।।

जब यादों में गहराते हो
अन्तस्तल पर रुबाई लिख जाते हो।।




Tuesday, 29 November 2016

मैं अदना सा दीपक


सारा जग तम से भर जाए
जब सूरज अपने घर जाए
देना तुम मुझको आवाज
अदना सा दीपक हूँ तो क्या
मैं तो जलने को तत्पर हूँ


(तैल जिसे आयुर्विज्ञान स्नेह कहता है)
मुझमें स्नेह भरा है
अमल, तरल, विरल
जो उत्सर्ग के लिए खड़ा है
बाती के रस्ते दौड़ कर
अपनी अस्मिता की आस छोड़ कर
तुम्हे रोशनी देने को तत्पर है

बाती, महीन सी खोखली सी
मुझको हौले से कहती 
मार्ग बनूँगी उत्सर्ग को जाते स्नेह का

मिट जाएगा स्नेह 
तब मैं भी जलूँगी
जल कर भी अपने परिचय की 
बन कर धुअाँ-धुअाँ  
छोड़ जाऊँगी एक खुशबू
मैं भी जलने को तत्पर हूँ।।

अदना सा दीपक हूँ मैं
रोशनी पहचान मेरी
संघर्ष है स्वभाव मेरा
उजालों में मौन हूँ पर
जब हाथ को हाथ बूझे
पथिक को बाट न सूझे
जीवन रुक जाए ठिठक कर 
मुझे याद करना, 
मैं जलने को तत्पर हूँ।।

अन्धकार, शत्रु नही मेरा
वह मेरा चिर संगी है
गर्भ में उसके ही
ढूँढता हूँ एक कक्ष
भरता हूँ रोशनी उसमें
मैं जलने को तत्पर हूँ।

पर, ए दोस्त!
अधूरा हूँ मैं भी
सुलगने को मुझे
एक अगन चाहिए, 
कोई और दीप की तपन चाहिए
जिन्दगी हो तुम्हारी उजालों भरी
इसलिए, मैं तपने को तत्पर हूँ
मैं जलने को तत्पर हूँ।।


कभी तुमने देखा नहीं ..गीत

पत्थरों पर लिखा नाम मिटता नहीं, सिर झुका कर कभी तुमने देखा नहीं।
सर्द उस रात की चाँदनी में जिया, जज्ब लम्हा तुम्हें याद है कि नहीं।।

काफिले रोशनी के देखे कई, टिमटिमाता दिया याद है कि नहीं।
गुल को गुलशन को तुम देखती ही रही, बुत बने थे खड़े हमको देखा नहीं।।

रात आती रही रात जाती रही, दीप आले का भी युंही जलता रहा।
न दस्तक सुनी द्वार पर ही कहीं, डबडबाए नयन ले कर खड़ा ही रहा।।

कैसी लाचारियाँ बेबसी आ पड़ी, धड़कने अपनी खुद ही मैं सुनता रहा।
चैन मेरा गया तुमने जाना नहीं, वक्त चलता गया मैं खड़ा ही रहा।।
तर्ज- फूल बन जाऊंगा शर्त ये है मगर 



Friday, 4 November 2016

Poojya Swamijj !

the pray

This Deepavali
The day of lights to
The darkness of Universe
D darkness of 'Agyan- timir'

Is d Pray of the day
I, may not only wish
But surely pray 
to the most supreme "Onkar" 
The light of all lights,
The power of all energies
The Omnipresent,
The life of the whole universe.

May 'He' offer lights of still
More enlightenment to you
So as we, our heart and fate
May be spiritually benefited
In the shadow of your blessings
The messages of "His"
May regained to us
Through your "Vani"

Yours 
Patiently waiting for
Blessings

इस दीवाली दिया धरें

एक दिया ऐसा भी हो,
जो भीतर तलक प्रकाश करे,
एक दिया कुण्ठित जीवन में
फिर आकर क़ुछ सुश्वास भरे
एक दिया सादा हो इतना,
जैसे सरल सन्त का जीवन,
एक दिया इतना सुन्दर हो,
जैसे देवों का हो उपवन

एक दिया जो भेद मिटाये,
क्या तेरा और क्या मेरा है,
एक दिया जो याद दिलाये,
हर रात के बाद सवेरा है
एक दिया उनकी खातिर हो,
जिनके घर कोइ दिया नहीं हो,
एक दिया उन बेचारों का,
जिनको घर ही दिया नहीं

एक दिया सीमा के रक्षक,
अपने वीर जवानों का
एक दिया मानवता - रक्षक,
चंद बचे इंसानों का हो !
एक जले आशा का दीपक,
जिनकी हिम्मत टूट गयी ,
एक दिया उस राह लगा हो ,
जो कल पीछे छूट गयी

एक दिया जो अंधकार का ,
जड़ के साथ विनाश करे ,

एक दिया ऐसा भी हो
जो सुख का संचार करे,
एक दिया ऐसा जरूर हो ,
भीतर तलक प्रकाश करे।

Wednesday, 12 October 2016

दीप कविता का जलाना चाहता हूँ

उम्र की चादर समय ने ही कुतर दी
कुछ पलों को जोड़ कर पैबंद भर दूँ,
झड़ चुके जो पात तरु के कब जुड़े
आज प्रिय कुछ पुष्प तेरे शीश धर दूँ,
मौन साधे रैन भी है घोर तम की ।
   
      रोशनी को फिर बुलाना चाहता हूँ।
      दीप कविता का जलाना चाहता हूँ।।

ढह चुका प्राचीर प्रीतम के नगर का
एक कोना ढूँढ कर बगिया सजा दूँ.
हमने बोये जो सपन थे प्यार के
भग्न आले खोज कर के ठीक कर दूँ,
फेंक कर दुःस्वप्न सारे इस घड़ी मैं।

       रोशनी को फिर बुलाना चाहता हूँ।
       दीप कविता का जलाना चाहता हूँ।।

Wednesday, 5 October 2016

चाँदनी चुभती रही

क्यों हुए आतुर हमारी
नापने गहराई मन की
क्यों छुआ है घाव मेरा
जागती है पीर तन की।
चाँदनी भी चुभ रही है
जो जगाती याद उनकी
कोई चुनरी तान दे अब
तारकों की और तम की।।

सूझता ना पथ कोई भी
गर्दिशों की धुन्ध इसमें
फूल हैं न पात है अब
इस चमन की अंजुमन में।
ये कदम भी आज अँकड़े
वे नहीं हैं  जब सफर में
डूबता अभिसार गहरी
क्षोभ की नीरव निशा में।।

दीप की लौ सी किरण भर
रोशनी गलती रही
झर झराते अश्रु कण ले
मानिनी जगती रही।
आस के नभ में विचरते
स्वाँस के पंछी रुपहले
प्रीत के पाहुन पधारो
प्राण के जाने से पहले।।



मन की पर्तें मन ही खोले

मन है आज सखी री मेरा
बोझिल कुछ कुछ अलसा कुछ कुछ
मन की पर्तें मन ही खोले
उघरी कुछ कुछ, बिखरीं कुछ कुछ

कभी झूलता उनके संग संग
रुचिर हिंडोले कर के कुछ कुछ
मन की सिगरी मन ही खोले
हृदय गड़ी थी छाया कुछ कुछ

गाता सुनता गीत स्वयं ही
ढोल मजीरे रुनझुन कुछ कुछ
तार एक बस तानपूरे का
मेघ मल्हार ये गाता कुछ कुछ

कैसा है मन निपट बावरा
भीड़ भाड़ में खोजे कुछ कुछ
नयन कटोरे रीत गए पर
आस लगी है अब भी कुछ कुछ

तब से टँगा अलगनी पर मन
कुछ कुछ तुमने इसे कहा था
खोल किवारे लगा टकटकी,
चौंक पड़ा बिन आहट कुछ कुछ

इसके क्रन्दन के विह्वल स्वर
क्या तुम तक ना पहुँचे कुछ कुछ
या पथराई भाव नगरिया
स्मृतियाँ क्या बची है कुछ कुछ?

Friday, 30 September 2016

स्वप्न बुलाता हूँ


स्वप्न कब किसके हुए, सब जानते हैं
आज मैं सारे जतन कर सो रहा हूँ
कल सपन के गीत का आरोह मैं था
वे भरेंगे रागिनी इस यामिनी में
बाँध लूँगा किंकिणी उन मृदु करों में
तार मैं अपने हृदय के कस रहा हूँ।
    स्वप्न का सुरमई झरोखा खोल कर
    प्राण! हौले से हृदय में तुमही आ जाना।।

















टाँक तारे लाएगी चूनर सजीली यामिनी
साथ होगी संगतें भी झुनझुनाते झींगुरों की
दूर बजती थालियाँ संकेत देगी मोद की
थाप की थिरकन भरी पिघली शिराएँ
झूमती उन्मादिनी लिपटी लताएँ
साथ होंगी हूँक भी वन कुंजरों की।।
    स्वप्न का सुरमई झरोखा खोल कर
    प्राण! हौले से हृदय में तुमही आ जाना।।

जब सजेगी यामिनी भी, रागिनी भी
जब बजेगी दुन्दुभी मन मोदनी भी
जब सितारे रोशनी मद्धिम बिखेरें
तब नगर होगा सभी से बेखबर
स्वप्न का सुरमई झरोखा खोल कर
प्राण! हौले से हृदय में तुमही आ जाना।।

    स्वप्न का सुरमई झरोखा खोल कर
    प्राण! हौले से हृदय में तुमही आ जाना।।


Tuesday, 27 September 2016

प्रतीक्षा उनकी


खो गया मैं ही कहीं फिर
कुन्द कुंजों में उलझ कर
प्यास अधरों पर लिपटती
दामिनी घन में मचलती
कौन बन्दी धड़कनों को
धड़कने कह पाएगा
क्या कभी जो स्वप्न बिखरे
फिर मुझे लौटाएगा।।

मौन गुम्फित और सहमे
इस हृदय की कोटरों में
शब्द जो छाया बने हैं
प्रीत के रस से सने हैं
कौन धुंधली सांझ वह
दीप की झिलमिल सुनहली
राह तकती प्रियतमा से
फिर मुझे मिलवाएगा।।


पात पीपल के मचाते
शोर बजते कान बींधे
कोयलें, सुग्गे, पपीहे
मौन क्यों हैं इन पलों में
कौन सी है वे दिशाएँ,
गुम हुए हैं रास्ते, पगडंडियाँ
कौन वे पद चाप पथ की
फिर मुझे सुनवाएगा।।

अधरों की पीड़ा


जिन पर शब्द युगों तक ठहरे 
इन अधरों की पीड़ा समझो
बिछे रहे जो आगम पथ में 
थकित नयन की साधे समझो 
जिस उपवन में पतझड़ ठहरा
उसमें भ्रमर नहीं है आते
जिस कुटीर में छाव नहीं हो
उनमें पथिक नहीं रुक पाते
खुले नयन से स्वप्न देख् कर 
पानी पर क्यों चित्र बनाते 
जो बस्ती वीरान पड़ी हो
उसमें पाहुन कभी न आते
अनछुई छुअन की आस पोर को
तुहिन कणों की प्यास भोर को
तुम अनंत के पथिक बिचारे
खोज रहे अनजान ठौर को
तुम आशा के दीप तुम्हारा
आलम्बन् क्या गठबंधन है
मैं विस्मित हूँ स्तम्भित हूँ
कितना विश्वास अटल है

Sunday, 25 September 2016

"मैं गीत शान्ति के गाता हूँ"

"मैं गीत शान्ति के गाता हूँ"

वेदों की अमृत वाणी को, 
अपने शब्दों में गाता हूँ।
कैसे जग में शान्ति रहे, 
उनका संदेश सुनाता हूँ।।
ऋषियों के पावन अन्तस में
सब वेद ऋचाएं उतरी हैं।
चिन्तन की मंगल धारा के,
कुछ-कुछ संकेत बताता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।

सूरज का सबको तेज मिले, 
जल स्वच्छ मिले जीवन में।
धरती का वैभव सबका है, 
बसा ईश कण-कण में।।
अंबर जो मेरे ऊपर है वह, 
मेरा भी है सबका भी।
औषध है तरु, पादप, पल्लव, 
ध्यान रखें सब इनका भी।।

केवल अपने ही सुख को हम, 
शान्ति समझ बैठे हैं।
जग के शेष प्रजाजन को हम, 
विष के घूँट पिला बैठे हैं।।
अब तक पुरखों की थाती को, 
हमने खूब भुनाया है।
जान नहीं पाए हम भू में, 
जल में कितना गरल मिलाया है।।

शान्ति नहीं बिकती बजार में, 
खोज हृदय में करनी होगी।
बाहर की मृगतृष्णा तज कर, 
अन्तर की भी सुननी होगी।।
भीतर है शान्त महासागर, 
आनन्द जहाँ नित बसता है।
करुणाकर की मृदु-करुणा का, 
पीयूष झमाझम झरता है।।

संग चलो और मिल कर बोलो, 
मन भी संग मिला लो सब में।
एक अकेले सुख को छोड़ो, 
शान्ति कपोत उड़ा लो नभ में।।
ऋषियों के पावन अन्तस में
सब वेद ऋचाएं उतरी हैं।
चिन्तन की मंगल धारा के,
कुछ-कुछ संकेत बताता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।


reference

●【ॐ संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्, 
देवा भागम् यथा पूर्वे संजानाना उपासते।।'
(ऋग्वेद-)

यानी हम सब साथ-साथ चलें, प्रेमपूर्वक वार्तालाप करें, हमारे मन एक हों। जिस प्रकार हमारे विद्वान पूर्वज सौहार्दपूर्ण रहते थे, उनका अनुसरण करते हुए उसी प्रकार साथ रहें।

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति: पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: सर्वँ शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि॥

ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥ (यजुर्वेद)】●

Saturday, 24 September 2016

तू सबका ही शिल्पकार है

अगणित सरवर, तरुवर, गिरिवर
हिम-आच्छदित शैल-शिखर पर
मेघ रुचिर छूते नीलाम्बर l
        इन सबका तू शिल्पकार है l 
       तेरी महिमा अमित अपार है l l

हहर-हहर कर झरते निर्झर
कल-कल बहती सरिता अविरल
हरित-वसन धरि वसुधा सुन्दर
          इन सबका तू शिल्पकार है l
         तेरी महिमा अमित अपार है l l

बिंदु, बिंदु से सिन्धु बनाता
कुंद-इंदु से रस सरसाता
पुष्प-पुष्प में गंध समाता
          इन सबका तू शिल्पकार है l
         तेरी महिमा अमित अपार है l l

अग-जग, अचर-जीव सृष्टि में
रवि-शशि आतप और वृष्टि में
अविरल है क्रम सृजन-क्षरण का
          इन सबका तू शिल्पकार है l
          तेरी महिमा अमित अपार है l l

विश्व सकल तेरा है मंदिर
कण-कण तेरा विलास है
सत्य सनातन मेरे प्रभुवर
          इन सबका तू शिल्पकार है l
          तेरी महिमा अमित अपार है l l
              रामनारायण सोनी 

प्रणय गंध

पोर-पोर प्रीतम की
प्रणय गंध छाई है।

भ्रमरों का भ्रम होता
उलझे से कुन्तल में
वेणी के सुमनो पर
झूम रहे गुन गुन कर
     अभी अभी पवन गंध
     अंजुरि भर लाई है।

        पोर-पोर प्रीतम की
        प्रणय गंध छाई है।

खंजन से नयनों से
ठहरी सी चितवन से
अलसाई पलकों की
झीनी सी ओट लिये
      अभी अभी चिलमन से
      झाँक उठी अरूणाई

       पोर-पोर प्रीतम की
       प्रणय गंध छाई है।

कोई सुर साज नहीं
कोई लय ताल नहीं
नीरव है रजनी भी
ठहरी है धड़कन भी
        ऐसे में पगला मन
        सुनता है शहनाई
     
        पोर-पोर प्रीतम की
        प्रणय गंध छाई है।

कैसा ये कंपन है
अधरों में, तन-मन में
वाणी जब सूख गई
आँखे सब बोल गई
     दोनों मन महक उठी
     भावों की अमराई
   
     पोर-पोर प्रीतम की
     प्रणय गंध छाई है।

धरती ने गगन छुआ
सिहरन सी छाई है
तरुवर में अवगुंठन
लतिका क्यों शरमाई
       सिन्दूरी सपनों की
       बिखर गई तरूणाई
     
     पोर-पोर प्रीतम की
     प्रणय गंध छाई है।

मैं गीत शान्ति के गाता हूँ

"मैं गीत शान्ति के गाता हूँ"

वेदों की अमृत वाणी को,
अपने शब्दों में गाता हूँ।
कैसे जग में शान्ति रहे,
उनका संदेश सुनाता हूँ।।
ऋषियों के पावन अन्तस में
सब वेद ऋचाएं उतरी हैं।
चिन्तन की मंगल धारा के,
कुछ-कुछ संकेत बताता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।

सूरज का सबको तेज मिले,
जल स्वच्छ मिले जीवन में।
धरती का वैभव सबका है,
बसा ईश कण-कण में।।
अंबर जो मेरे ऊपर है वह,
मेरा भी है सबका भी।
औषध है तरु, पादप, पल्लव,
ध्यान रखें सब इनका भी।।

केवल अपने ही सुख को हम,
शान्ति समझ बैठे हैं।
जग के शेष प्रजाजन को हम,
विष के घूँट पिला बैठे हैं।।
अब तक पुरखों की थाती को,
हमने खूब भुनाया है।
जान नहीं पाए हम भू में,
जल में कितना गरल मिलाया है।।

शान्ति नहीं बिकती बजार में,
खोज हृदय में करनी होगी।
बाहर की मृगतृष्णा तज कर,
अन्तर की भी सुननी होगी।।
भीतर है शान्त महासागर,
आनन्द जहाँ नित बसता है।
करुणाकर की मृदु-करुणा का,
पीयूष झमाझम झरता है।।

संग चलो और मिल कर बोलो,
मन भी संग मिला लो सब में।
एक अकेले सुख को छोड़ो,
शान्ति कपोत उड़ा लो नभ में।।
ऋषियों के पावन अन्तस में
सब वेद ऋचाएं उतरी हैं।
चिन्तन की मंगल धारा के,
कुछ-कुछ संकेत बताता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।

Thursday, 22 September 2016

नजरिया

जिंदगी एक फ़लसफ़ा है, हमें नजरिये की तलाश हो
उम्र बँधी है वक्त से, मंजिल नहीं रास्ते की तलाश हो।

खूबसूरत हो रास्ते तो, मंजिल की पर्वाह मत कर
रास्ते तुझको लगे अच्छे, ग़ाफ़िल न हो, इख़्तियार कर।

बरगद और बाशिन्दे

बरगद और बाशिन्दे


बरगद की साखों पर पातों के झुरमुट में
शयन किये पंछी हैं राका के नीरव में।
गद्गद् हो देख रहा बरगद यह गोद में
धन्य हुआ तन मेरा पुलकित मन मोद मे।।

रोज  सुबह इनकी तो ऐसी ही आती है
सुनता हूँ भैरव का आरोहण अवरोहण।
सुनता हूँ जीवन की उमगों का स्पंदन
झूम-झूम उठता है पुलकित हो मेरा मन।।

रोली सी फ़ैल गई प्राची के अम्बर में
चिचियाते चूज़े भी भूख भरे चोंच में।
आतुर हो उचकाते पंखों को सोच में
मैं भी कल ऐसे ही नापूँगा अम्बर को।।

गद्गद् हो देख .रहा बरगद यह गोद में
धन्य हुआ तन मेरा पुलकित मन मोद मे।।

पेड़ की पीड़ा

यह पेड़ भी बड़ा अजीब है

१.
जो उसे काटने आया
उसे भी छाया दे रहा है,
उसे भी प्राणवायु दे रहा है,
उसे भी फल दे रहा है,
उसे भी प्यार दे रहा है,
यह पेड़ भी बड़ा अजीब है

इसमेंं भरा सत्य है,
अजस्र प्रेम है,
पलती कोमल करुणा है,
रग-रग में कर्मयोग सना है,
यह सहिष्णु भी है,
और पालक विष्णु भी है,
शंकर सा विष पीकर
जगती के जीवन हित
बस प्राण ही उगलता है
यह पेड़ भी कितना सजीव है

तपती धूप को ओढ़ता है,
तूफान को तोड़ता है।
धरा-गगन को जोड़ता है
जमीं पकड़ कर खड़ा है,
सबसे मेरे लिये लड़ा है।
२.
अचरज से भरता है-
हर कुल्हाड़े में मैं हूँ
दुश्मन और दोस्त की,
खिड़की मे मैं हूँ
दर पर आगन्तुक की
दस्तक में मैं हूँ
घर की चौखट में,
देवों के मंदिर में मैं हूँ
बालक के पलने में और
विदा होते मानव संग में मै हूँ
३.
कातर हो तरुवर ने
अनुनय यह भेजी है
जीवन जो मेरा है
जीता हूँ तेरे हित
मर कर भी जीता हूँ
बस केवल तेरे हित
असमय में मुझे मार
सब कैसे जी पाओगे

मेरे अन्तर की
पीड़ा है बस इतनी ही
मेरे जीने की
प्यास नहीं यार मेरे
मेरे बिन इस जग में
सब कैसे जी पाओगे।


सोनं चिरैया

सोन चिरैया बोली इक दिन
मुझे छोड़ तुम मेरे प्रियवर, 
उड़ कर तो न चले जाओगे ?
सुन कर आँखें छलक गईं। 
उसने कहा अभी मेरे पर
बाँधो टहनी से कस कर 
अब हम संग रहेंगे हरदम
और जिएँगे जी भर-भर कर

तभी जोर का झंझा आया,
चिड़िया मन ही मन घबड़ाई
प्यार से वह बोला प्रिये तुम
उड़ जाओ मैं उड़ न सकूँगा
जाते-जाते चिड़िया बोली 
प्रियतम अपना ध्यान रहे।
...

जब तूफान थमा 
एक यथार्थ सामने खड़ा था
सूनी उस टहनी पर
वह बेजान टँगा पड़ा था
बाहर के तूफान से
भीतर का तूफान बड़ा था।
मौत से तो कई बार लड़ा पर 
जिन्दगी से पहली बार लड़ा था
हार कर जीतना चाहा पर
जीत कर हारना उससे बड़ा था

प्रीत की चादर बुनी थी
तार तार क्यों हो गई
झोलियाँ विश्वास की अब
जार जार क्यों हो गई
शाम होने से भी पहले
रात का अंधियार क्यों है 
सोम झरती चाँदनी में
गिर रही विषधार क्यों है।

सोन चिरैया बोली इक दिन
मुझे छोड़ तुम मेरे प्रियवर, 
उड़ कर तो न चले जाओगे ?

जवाब के सवाल

  जवाब के सवाल

मीत मेरे!

मैनें मना लिया, जब भी तुम रूठे
मैं रूठा, अब मनाएगा कौन
वक्त की दरार को भरेगा कौन,
तूफान में घिरी है कश्ती
साहिल पर लगाएगा कौन,
सवाल के जवाब हजारों हैं
पर पल पल चुभते जवाबों के
सवालों को बुझाएगा कौन,

पतझार तो हर बरस होगा
पर मधुमास लौटाएगा कौन
सपनीली यादों का अक्स लिए
फूल जो किताब में सूख गया
खुशबू अब लौटाएगा कौन
पथराए नयन राहों को देख देख
अंबर में फैल रही बाहों को
गलबहियाँ बनाएगा कौन,

अपने इन सवालों के शोर से
बाहर अब लाएगा कौन

मैनें मना लिया, जब भी तुम रूठे
मैं रूठा अब मनाएगा कौन

Thursday, 15 September 2016

दरकते सवाल

लुढ़कते आँसू
दरकते सवाल

हाथों की उलझती रेखाएँ,
मरी-मरी मानवी संवेदनाएँ

बेपैर घिसटती जिन्दगी
खुद में सिमटता आदमी
मिट्टी से निकले हीरे
मिट्टी से ही बेखबर
पत्थर से निकली मूरत
पत्थर से नफरत
कैसी ये उलटबासियाँ

एक विप्लव न हो जाए
एक आघात न ठहर जाए
इस दलदली जमीन में
कोई बारूद न भर जाए
इससे पहले कि संवेदनाएँ
कपूर की तरह उड़ जाए

एक बढ़ा हाथ चाहिए
एक अदद साथ चाहिए
उसे काँटा लगे तो
यहाँ चुभन चाहिए
कुछ करो न करो दोस्त
दो बूँद मरहम की
दिलों के बीच चाहिए
दम न घुटे इस जिन्दगी का
एक चुटकी साँस चाहिए
एक झप्पी, एक दुलार चाहिए

निवेदक
रामनारायण सोनी

बसन्ती बयार

🌊 बसन्ती बयार 🌊

मैं नहीं जानता हूँ सुरों का नगर
शब्द बसते कहाँ कौनसी है डगर।
बोल तुमने कहे बैठ दिल में गए
गीत गढ़ता नहीं गीत खुद बन गए।।

एक बहकी हवा जुल्फ लहरा गई
ओट में छुप रहा चाँद दिखला गई।
अर्श से फर्श तक आज महकी फिजा
रूप की चाँदनी मुझको नहला गई।।

फूले टेसू अमलतास कचनार है
हो गई गुलसिताँ मन की सिगरी गली।।
ओढ़ लो अब बसंती चुनर तुम प्रिये
आज मौसम स्वयं बन उठा संदली।

बोल तुमने कहे बैठ दिल में गए
गीत गढ़ता नहीं गीत खुद बन गए।।

रामनारायण सोनी

Thursday, 8 September 2016

एहसास हमारे होने का

🐥एहसास हमारे होने का🐤

जब तुम न थे
न राग था न रंग थे
अनबूझे इन अधरों पर
प्यास थी न गीत थे
तुम आये, सब लाए
जाने क्यों मन भाए
कुनमुनी प्रीत जगी,
सूने से आँगन के
पीपल की टहनी पर
चंचरीक चहक उठी
जीवन में चाह जगी
कैसे तुम दबे पाँव, चुपके से
हाँ! जीवन में ऐसे तुम आए

फिर!.

जाग उठी संवेदना,
गिरता आत्मविश्वास,
गहराती खामोशियॉ,
एहसास हमारे होने का
और फिर एहसास न होने का,

एक अस्तित्व मेरे होने का
एक आभास तुम्हारे होने का
तुम्हारे संग का असंग का
संग की प्यास का
असंग की पीड़ा का
गाँठ है भारी गठरी सी
यादें भी भरी-भरी सी
पर मन की सभी वीथियाँ
फिर भी क्यों खाली है
चाँदी सी चाँदनी में
रजनी क्यों काली है।

बिछा लिया सुख तो
ओढ़ना दुःख, क्या नियति है?
बुन लिए गर स्वप्न तो
टूटना-बिखरना क्या नियति है?
कभी न समझ पाया मैं
एक बार में एक ही मिलेगा
तुम या एहसास तुम्हारे होने का
मैं या एहसास मेरे होने का
नहीं समझ पाया कभी
दोनों में जलन उतनी ही
तुषार या हो अंगार

मैं रूठा, अब मनाएगा कौन
वक्त की दरार को भरेगा कौन
पतझार हर बरस होगा
पर मधुमास लौटाएगा कौन
फूल तेरा सूख गया पुस्तक में
खुशबू अब लौटाएगा कौन
अंबर में फैली इन बाहों को
गलबहियाँ बनाएगा कौन
अपने इन प्रश्नों के शोर से
बाहर अब लाएगा कौन
कौन? कौन? कौन?

तुम या एहसास तुम्हारे होने का
मैं या एहसास मेरे होने का
या एहसास हमारे होने का।

Friday, 22 July 2016

मुक्तक

इस ह्रदय की पीर गल कर, शब्द बनता काव्य है 
काँपती ध्वनियाँ नहीं ये वेदना के घाव हैं 
अश्रु कोरों में रुके जो, मर्म ही का स्राव है 
श्वाँस के हिम खण्ड झरते, क्रन्दनों के भाव हैं 
जिंदगी एक फ़लसफ़ा है, हमें नजरिये की तलाश हो
उम्र बँधी है वक्त से, मंजिल नहीं रास्ते की तलाश हो।
खूबसूरत हो रास्ते तो, मंजिल की पर्वाह मत कर
रास्ते तुझको लगे अच्छे, ग़ाफ़िल न हो, इख़्तियार कर।
मैनें भ्रम पाला, इसी क्षितिज, आकाश धरा से मिलता है 
दो कूल नदी के खड़े निकट, कभी नहीं कोइ मिलता है
चट्टानों से बहते सोते, शायद,  दिल उसका ही झरता है 
मेरा प्रतिबिम्ब दिखा मुझको ही, क्यों दर्पण यूँ रोता है 

Thursday, 25 February 2016

भाव निर्झर



भाव निर्झर 
चुपके चुपके कुछ कहते हैं 
आसमान के झिल मिल तारे 
भाव  भरे हैं ऐसे ही 
देखो ये शब्द हमारे 












 मिताली 

Monday, 11 January 2016

आँसू


आँसू


आँसू
तरह तरह के,
पर सभी खारे आँसू.

प्रेम के, ख़ुशी के आसू
रुदन के, विलाप के आँसू
कुटिलता के, मगरमच्छ के आँसू

प्रेम के, रुदन के गर्म हैं आँसू
पानी न समझ लेना मर्म है आँसू
ह्रदय भरे भावों से उगलता
तन-मन को भिंगो देता आँसू

अपनी जुबाँ में बोलते है आँसू
धडकनों का पता देते आँसू
अंतर के भेद खोलते आँसू
वेदना के उबलते आँसू
अपने संग हमें ले चलते है आँसू


अंचल में झेलता कोई आँसू 
अंजन को घोलता कोई आँसू 
करुणा से हमें डुबोता कोई आँसू 
दिल को गुदगुदाता कोई आँसू 
अंतस में उतरता कोई आँसू 
दिल के छाले बताता कोई आँसू
कोई साथ सिसकी भी लाता है आँसू
कोई प्रेम गंगा बहाता है आँसू
कोई भक्त मधुबन में बोता है आँसू
कोई दोस्त रिश्ते को धोता है आँसू

आँसू
तरह तरह के,
पर खरा ही होता है 
हर एक आँसू.

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