बोल नहीं जो बता सकूँ मैं
पर मेरे तुम जीवन धन हो
तुम ही हो वे शब्द जिसे मैं
निशि-दिन बोला करती हूँ
तुम ही हो वह गीत सुरीले
जिसको अधरों पर बुनती हूँ।
दर्द तुम्हारे मेरे अपने
संवेदन बन जाते हैं
मेरे तो सपने ही तुम हो
जो सच में ढल जाते हैं।
तुम ही हो वह मेघ बरसते
जिसमें भींग-भींग जाऊं मैं
तुम ही हो वह पवन झकोरा
जिस संग उड़-उड़ जाऊं मैं।
तुम ही तो वह दरपन हो
जिसमें देख दमक जाऊं मैं
तुम अतीत हो मेरे अपने
जिसमे छबि मेरी पाऊँ मैं।
तुम हो सुन्दर खिले सुमन
जिसकी सौरभ मेरी थाती
तुम ही तो हो कथा जिसे मैं
फिर फिर पढ़ने जाती।
स्वास मेरी तुम स्पंदन हो
तुम मेरे ही वृन्दावन हो
प्रेम-चुनरिया ओढ़ फिरूँ मैं
तुम मेरा जीवन धन हो।
रामनारायण सोनी




