https://www.youtube.com/watch?v=rqfYxAANwDY
एक गुजराती गीत*
*
Sunday, 5 February 2017
🌾🌺 ऋतुराज आया है 🌳🎄
🌾🌺 ऋतुराज आया है 🌳🎄
जागा मधुमास मधुर मन के अरण्य में
किसलय-कलिकाएँ बनती अनल बीज।
दग्ध हुआ शिशिर का वह सघन शीत
ले आया रसवन्ती रसधारा भी सरसिज।।
पगलाया पवन भी ले कर के गन्ध-भार
गदराई अमराई भरती सी मदमत्त धार।
आँगन में उपवन में वीथिन में कुंजन में
बिखरी मधुरस की रसना रसमय अपार।।
शैल बने कनक-श्रृंग स्वर्णिम सी ऊषा में
पहन लिये पीत वसन अमलतास, सरसों ने ।
ढाँप लिया अग-जग को फूलों की चूनर ने
फैलाई अगरु गंध जन-जीवन में ऋतुपति ने।।
नव पल्लव नवल लता ले कर के नव विहान
गुंफित अवगुंठित हो रचते सब नव वितान।
अलियों के वृंद-वृंद करते मिल वृन्दगान
मधुपरियाँ जी भर कर करती मकरन्द पान।।
निवेदक
रामनारायण सोनी
जागा मधुमास मधुर मन के अरण्य में
किसलय-कलिकाएँ बनती अनल बीज।
दग्ध हुआ शिशिर का वह सघन शीत
ले आया रसवन्ती रसधारा भी सरसिज।।
पगलाया पवन भी ले कर के गन्ध-भार
गदराई अमराई भरती सी मदमत्त धार।
आँगन में उपवन में वीथिन में कुंजन में
बिखरी मधुरस की रसना रसमय अपार।।
शैल बने कनक-श्रृंग स्वर्णिम सी ऊषा में
पहन लिये पीत वसन अमलतास, सरसों ने ।
ढाँप लिया अग-जग को फूलों की चूनर ने
फैलाई अगरु गंध जन-जीवन में ऋतुपति ने।।
नव पल्लव नवल लता ले कर के नव विहान
गुंफित अवगुंठित हो रचते सब नव वितान।
अलियों के वृंद-वृंद करते मिल वृन्दगान
मधुपरियाँ जी भर कर करती मकरन्द पान।।
निवेदक
रामनारायण सोनी
🍫"सिरहाने से"🍢
नज़्म :-
"सिरहाने से"
तकिया सिरहाने का
सुनता भी है, कुछ कहता भी है
जो पी चुका है
अनगिनत खारे आँसू
गवाह है मेरे उन
जागते हुए देखे सपनों का
सोते हुए जागे सपनों का
छत को अपलक निहारती
पथराई, अलसती आँखों का
याद आती है मुझे कभी
सिरहाना बनी बाहों की
तकिया, धुले हुए काजल को
सहेजा जिसने बड़े जतन से
तकिया सिरहाने का
सुनता भी है, कुछ कहता भी है
थपकी देती हूँ इसे
जैसे यह तुम हो
छुअन देती हूँ इसे
जैसे यह तुम ही हो
प्यार का मीठा पैगाम
जैसे तुम तक पहुँचेगा ही
इसके कानों में फुस फुसा कर
कह जाती हूँ कुछ
जैसे सुन लोगे अभी तुम
फिर कहता है हौले से
बाहें वे लौटेंगी जैसे ही
दूर कहीं चला जाऊँगा
तकिया सिरहाने का
सुनता भी है, कुछ कहता भी है
शकुन्तला सोनी
(रामनारायण सोनी)
"सिरहाने से"
तकिया सिरहाने का
सुनता भी है, कुछ कहता भी है
जो पी चुका है
अनगिनत खारे आँसू
गवाह है मेरे उन
जागते हुए देखे सपनों का
सोते हुए जागे सपनों का
छत को अपलक निहारती
पथराई, अलसती आँखों का
याद आती है मुझे कभी
सिरहाना बनी बाहों की
तकिया, धुले हुए काजल को
सहेजा जिसने बड़े जतन से
तकिया सिरहाने का
सुनता भी है, कुछ कहता भी है
थपकी देती हूँ इसे
जैसे यह तुम हो
छुअन देती हूँ इसे
जैसे यह तुम ही हो
प्यार का मीठा पैगाम
जैसे तुम तक पहुँचेगा ही
इसके कानों में फुस फुसा कर
कह जाती हूँ कुछ
जैसे सुन लोगे अभी तुम
फिर कहता है हौले से
बाहें वे लौटेंगी जैसे ही
दूर कहीं चला जाऊँगा
तकिया सिरहाने का
सुनता भी है, कुछ कहता भी है
शकुन्तला सोनी
(रामनारायण सोनी)
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- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन