अजनबी कौन हो तुम
ए अजनबी तुम कौन हो ?
बचपन से अभी तक तो तुम्हें कहीं देखा नहीं
न किसी ने कोई पहचान बताई
किस देश के हो तुम ?
न कोई कहानी न फलसफा
न मुझमें पूछने का साहस-
न कुछ कहने की हिम्मत
आखिर कौन हो तुम ?
तुम्हें न कहीं पढ़ा- न कभी सुना
न पहले कभी मिले तुम, न तुम्हारी परछाई
ना ही था कोई सुराग तुम्हारा,
न पहले कभी खुद आए न कोई सन्देश
सचमुच कौन हो तुम ?
तब अचानक रूह मेरी सुगबुगाई
दूर उस नेपथ्य से एक रूह बुदबुदाई
तब युगों से अचेते भाव मन के
धुंध के उस पार से सुधियाँ समेटे
पूछने यूँ मैं लगा सहसा ठिठक कर
जाने-पहचाने से अजनबी कौन हो तुम ?
आईने पर की गर्द की परतें हटी तो
सामने थे तुम,
तुम्हारा मौन ही सब कह गया
रूह ने बातें कही और रूह ने बातें सुनी
सिलसिले दर सिलसिले वो ही चलते गए
फासले सब कदम दर कदम मिटते गए
प्रश्न विगलित व्योम में काफूर थे
अब कहें क्यों हम ; अजनबी कौन हो तुम ?
रामनारायण सोनी
