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Friday, 14 February 2020

छत पर जाता नहीं हूँ

बहुत दिन हो गये
तुम से मिले
छ्त पर चढ़ कर
सितारे और आकाश गंगाएँ
रोज आती है छत पर, 
लौट जाती है इंतजार कर 
फिर उसी अन्तरिक्ष में

चाँद आता है
सीढ़ियों, खिड़कियों को 
चला जाता है चाँदनी ओढ़ा कर
पर अमावस मेरी जाती नही
वहाँ अब न तुम हो
न इनमें से कोई और ही


रामनारायण सोनी
०८/०२/२०२०

Friday, 7 February 2020

छत पर जाता नहीं हूँ

बहुत दिन हो गये
तुम से मिले
छ्त पर चढ़ कर
सितारे और आकाश गंगाएँ
रोज आती है छत पर, 
लौट जाती है इंतजार कर 
फिर उसी अन्तरिक्ष में

चाँद आता है
सीढ़ियों, खिड़कियों को 
चला जाता है चाँदनी ओढ़ा कर
पर अमावस मेरी जाती नही
वहाँ अब न तुम हो
न इनमें से कोई और ही


रामनारायण सोनी
०८/०२/२०२०

Monday, 3 February 2020

गीत बसन्ती

गीत बसन्ती 

आँगन में उतरी बहार, बसन्ती फूल खिले।
सखि! गाओ सुमंगल गान, बेला झूम चले।।

चम्पा चमेली ने है माँडी रंगोली, 
अँबुवे की डाली पे कोयल बोली,
पपिहे ने कानों में मिसरी है घोली,
टेसू-जुही मिल के करत ठिठोली,
महुए पे छाया खुमार, समीरन चंवर डुले।
आँगन में उतरी बहार, बसन्ती फूल खिले।
सखि! गाओ सुमंगल गान, बेला झूम चले।।

रागों ने छन्दों से रास रचाया,
फागों ने खुशबू का कीच मचाया,
शब्दों ने भावों का उबटन लगाया,
साजों-सुरों ने है अलख जगाया,
गीतों ने ओढ़ा सिंगार, रसिया आन मिले।
आँगन में उतरी बहार, बसन्ती फूल खिले।
सखि! गाओ सुमंगल गान, बेला झूम चले।।

रामनारायण सोनी
०४/०१/२०२०

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