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Thursday, 21 January 2021

ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं

"ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं"

मौज में जब चलती हैं
खेलती हैं सरोवर मे शान्त जल से
उछालती हैं अलमस्त लहरों को!!
उपवन के फूलों से चुराती हैं
और ला कर उन सुगन्धों को
डाल जाती है नथुनों में मेरे
....ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं!!

सूखे बिखरे पत्तों को बजाती है
सितार की स्वर तंत्रियों सा
जगाती है उनींदी प्रणयिनी को
खोलती है वे शनै शनै
सुबह-सुबह अलसती अँखुड़ियों को
बिखेर देती है फिर अलकों को
उदात्त से उन स्कन्धों पर
देवदार की गहन छाया
ओढ़ ली हो जैसे बाजुओं पर
...ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं!!

लहरा देती है चीर को
मंदिरो की ध्वजाओं सा
बिछा देती है स्निग्ध  दरियाँ
नदी की देह पर नर्म शैवाल सी
लाती हैं चिट्ठियाँ दूर दूर से
तमाल के भीने पृष्ठों पर
बिन लिखी बिन कही कहानियाँ
...ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं!!

उठाती है गोद में रज कणों को
झुलाती है लाड़ प्यार से
चाँद के झूले पर
बिठाती है शिखर के शीश पर
सुवर्णमयी मुकुट सा
सजाती है रंगोलियाँ
फूलों की पंखुड़ियों से
टेसू, कचनार, अमलतास, गुलमोहर की
...ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं।

ये हवाएँ कभी गर्म है, कभी सर्द
कभी अमृत सी पवित्र
कभी जहर सा कहर
कभी जीवन के प्रहर
कभी पंचतत्व में से एक तत्व
सबके जीवन का सत्व
सुनो सब!!!
मत छीनो इनसे इनका निसर्ग
क्योंकि ये जियेंगी भी
तो सिर्फ हमारे, तुम्हारे, सब के लिये
....ये हवाएँ हमें पुकारती हैं

....ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं।

    रामनारायण सोनी
     २०.०१.२१

समय नही है

समय नहीं है

क्यों? समय नहीं है?
"क्योंकि समय नहीं है,"
या कि समय नहीं है?

घड़ी कि सुइयाँ समय नहीं है
प्रहर की घड़ियाँ समय नहीं है
मील के पत्थर समय नहीं है
काल के चक्र में लिखे पुराण
लिर्फ गाथाएँ है समय नहीं है!!

समय अपने समय से बीतता रहता है
हम बस कहते ही रहते हैं
समय है, पर जाने क्यों
अपने और अपनों के लिये समय नहीं है!!

उठो! जागो!!
समय कहीं यह नहीं कह डाले 
कि मेरे पास....
.....मेरे पास समय नहीं है!!!

      रामनारायण सोनी  
      २२. ०१. २१

Wednesday, 20 January 2021

जीवन कितना जी पाता है


अपने सपनों का इन्द्रजाल, सम्मोहन का महाव्याल

गगन चूमती आशाओं के, मगरी चढ़ते अमित ख्याल
उच्छ्वासों के बीच टँगी भूधर सी लिप्साएँ विशाल
युगों युगों से संघर्षो की यही कहानी दोहराता है
        जीवन कितना जी पाता है

अपने शुष्क मरुस्थल में ही मृगशावक प्यासे दौड़े
अपने घावों को धोने में निज के अश्रु हुए थोड़े
अपने तन में अपनों ने ये रिसते व्रण ही हैं छोड़े
जग के करुण कथानक में क्रन्दन से ही नाता है
             जीवन कितना जी पाता है

इस पाप-पुण्य की पोथी में काले पीले पृष्ठ भरे
कनक घटों के अन्तर में अमिय नहीं हैं जहर भरे
सच के माथे मुकुट चढ़े ये झूँठ जड़े हैं शूल धरे
पल पल के उत्पीड़न में मन टूट टूट जाता है
          जीवन कितना जी पाता है

रंगों से रँगे वितान सभी इक दिन श्याही हो जाते हैं
फूले प्रसून के पादप भी तप कर कहीं बिखर जाते है
श्यामल मेघ सुहानी सुषमा छोड़ छाड़ गल जाते हैं
झर झर करता निर्झर फिर फिर पत्थर से टकराता है
       जीवन कितना जी पाता है

पग पग पर छलती छलना में बाँह थाम कर रखना
तूफानों में इस कश्ती की पतवार थाम कर रखना
कालमेघ के भीषण रव में सिर पर हाथ धरे रहना
तेरी करणा की बरखा में यह मन भींग भींग जाता है
       तब ही जीवन जी पाता है

    रामनारायण सोनी
        २०.०१.२१

Saturday, 16 January 2021

वहीं तो हूँ

तुम पास हो तुम्हारे
मैं भी वहीं तो हूँ
मैं खो गया मुझी से
मैं भी वहीं तो हूँ

रामनारायण सोनी
२८.१२.२०२०

तुम न थी, जब तुम न थी

शब्द में हैं अर्चनाएँ



है अभी तो रक्त में 
घुलती हुई संवेदनाएँ
रागिनी से सिक्त है इन 
शब्द में ये अर्चनाएँ।
प्राण की वंशी निनादित 
हैं गमकती व्यंजनाएँ
पुष्प की सौरभ लिये 
गुंजन भरी अभ्यर्थनाएँ।।

रात जागी कामिनी के 
कुन्द होते करतलों में
कुनमुनी नलिनी अलापे 
प्रीत के मधुरिम पलों में।
रंग रांची है महावर 
नव उदित है कोंपलों में
फिर रुहानी सी कहानी 
कह रही इन शतदलों में।।

रामनारायण सोनी
२७.१२२०२०



पतझड़ फिर जीत गया


पल पल ढलते सूरज ने
लम्बा कर दिया मेरा अपना साया
एक और दिन की निर्मम
शाम का धुँधलका इसको फिर लील गया

चलो, अलाव जला लें..!
बुझते सपनों को
ताप में गुनगुना बना लें
अनचीते जुगनू से इन पलों की
मशालें फिर से सुलगा लें
मन के बढ़ते रीतेपन में
अपनों में अपने, ढूँढ रहे सपने
मावस की काली रातों में
सांसों की आस घटी, उम्र लगी कटने
जीवन की झोली के पैबन्द लगे फटने
गागर सा रीत गया,
अपना हर मीत गया
बासन्ती इस उपवन मे
पतझड़ फिर जीत गया।।
पतझड़ फिर जीत गया।।

रामनारायण सोनी
२७।१२।२०२०

नेह धरा पर ऐसे उतरें


गीत गगन के गाऊँ मै, तुम गाओ मेघ मल्हार
प्रीत का पावन पावस ले हम नेह धरा पर उतरें।
मेघ बचे न बचे गगन न बोल बचे न बचे अगन
बूँद बनें हम एकल होवें नेह धरा पर ऐसे उतरें।।
                   हम तुम नेह धरा पर ऐसे उतरें।।

मन में मन को ऐसे घोलें जैसे जल में मिसरी
भावों के मीठे पानी से भरी रहे मानस की गगरी।
अरुणिम आभा लेकर ऊषा अपने आँगन उतरी
तेरी मेरी व्यथा-कथा अब तन से मन से बिसरी।।
                 हम तुम नेह धरा पर ऐसे उतरें।।

पवन बसन्ती बनो लहरिया फूले इस उपवन में
मैं पराग शतदल का हो कर संग उडूँ कानन में।
जगती को मिल कर महकाएँ उतरें जन गण मन में
अलग अलग रह हो न सकेगा पड़े नहीं भटकन में।।
                   हम तुम नेह धरा पर ऐसे उतरें।।

रामनारायण सोनी
१६.१२.२०२०

तन की तह के पार


तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है
मन की मन्थर धार शुभे! यह कितनी सुन्दर है।
मन का वैभव मन से दीखे कैसा सुन्दर दरपन है
मुझ से तुम तक गुपचुप जाना सुन्दर आवर्तन है।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

रागों की रसवन्ती ताने मन की वीणा बजा रही
रजनी के माथे चंदा की सुन्दर बेंदी लगा रही।
मन द्वारे साँझ सकारे चितवन चंचल झाँक रही
पलकन की चादर के पीछे मन की शोखी ढाँक रही ।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

मोद भरी अलियों की गुंजन मन का सौरभ पीती
मन के मधुकर की वे रातें अवगुण्ठन में ऐसे बीती।
खामोशी की बीन बजा कर सोन चिरैया रीती
मन कहता मन ही सुनता है मन की न्यारी नीती।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

मन का ही फानूस टँगा है तन के मौन भवन में
चारों ओर उजाले इसके हुई रोशनी नन्दन वन में।
मन के बादल मन की धरती मन के नील गगन में
टिप टिप करती बरखा मन की भीगा मन ही मन में।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

दूर खड़ा तन देख रहा है छबियाँ कितनी दौड़ रही
मन ने मन को अन्दर अन्दर प्रेम कहानी कई कही।
मन के कुन्दन की स्वर्णाभा तप कर कितनी और बही
मन की सरिता मन का पानी मन की शीतल धार बही।।

तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

रामनारायण सोनी
१५.१२.२०२०

अभी तक तुम नहीं आये


सखे! लौटा फिर मधुमास
शरद भर सिहरी पवन यह
फिर मलय की गंध ले आई
सुमन जागे, कामना जागी।
       अभी तक तुम नहीं आये।।

प्रीत के पाहुन मुखर हो
हो चले हैं फिर बटोही
इन अलिन्दों के नगर में
भ्रमर जागे, प्यास जागी।
        अभी तक तुम नहीं आये।।

कोकिला के कंठ जागे
वीतरागी गुल्म भी जागे
मधुपरी के दुःस्वप्न भागे
मीन की फिर आस जागी।
         अभी तक तुम नहीं आये।।

मेरे मन के नन्दन वन में
प्रीत का मधुरास जागा
रागिनी लय छ्न्द ले कर
सुर मुखर धर वेणु जागी।
          अभी तक तुम नहीं आये।।

हर दिशा हर कोण में है
मकरन्द के मदमस्त मेले
हर लता गलबाँह लेती
हर विटप की पीर भागी।
           अभी तक तुम नहीं आये।।

     रामनारायण सोनी
             25.11.20
                         

छोटी सी विराट कहानी

जब कविता
थी अपने शैशवकाल में,
नन्हे नन्हे डग चलीं थी
भावनाएँ अँकुआ रही थी
हल्के जर्द पड़े डायरी के पन्नों में
सूखी वे गुलाब की पंखुडियों
मुस्कुराई, महमहाई...!
काल की कील पर टँगी
सुइयाँ पीछे दौड़ी,
ठिठकी, कहीं ठहर गई
वहाँ, जहाँ लिखीं थी
ढाई आखर की
छोटी सी विराट कहानी...!

रामनारायण सोनी
२२. १२. २०२०

स्मित आनन की छबि ललाम

तुम खुले पृष्ठ की पोथी हो
जिसमें जीवन के सर्ग सप्त
होती अलियों की मधुर तान
मुख पर उन्नत सा भाल तप्त

मौज भरी चितवन अपार
जहँ भरे स्वप्न का नव विलास
उर में है मधुऋतु की सुवास
धड़कन का तुम प्रिय प्रवास

भौहों में खिंचते मदनबाण
किसलय की लघु कलिकाएँ
अधरों पर ठहरा मधु-निकुंज
पलते पराग के मधुर-पुंज

स्मित आनन की छबि ललाम
श्यामल कुन्तल की कुटिल रेख
कानों के कुन्दन कर्णफूल
होता सम्मोहन देख-देख

रेशम सी मन की पर्तों में
यह प्रीत सुहानी पलती है
सुकुमार सलोने सपनीले
भावों की सरिता बहती है

रामनारायण सोनी
३०।११।२०१४

मौन क्या क्या कह रहा


मौन कितना बोलता तू सुन कभी
सरसराती पत्तियाँ कुछ कह रहीं।
फूल महके, बाग चहके आज तड़के
भैरवी की तान बुलबुल गा रही।।

मौन साधे महमहाता गुलमोहर
मौन सरिता बह रही तटबंध में।
मौन शिखरों पर रुपहली रश्मियाँ
मौन कितना रम रहा निःसर्ग में।।

मौन मुखरित हो रहा हर पुष्प में
हर लता, हर गुल्म में, मधुगन्ध में।
चन्द्रिका बरसी धरा पर मौन ही
चाँद-चकवा मौन है अनुबन्ध में।।

प्राण कण कण में बसा चुपचाप ही
रक्त वाही धमनियाँ चुपचाप बहतीं
हर शिरा हर पोर में ना शोर कोई
जीवनी-संचेतना चुपचाप चलती

मौन की संकल्पना ही बीज बन
सृष्टिकर्ता के सृजन का मूल है।
पालता सारी प्रजा, पशु, कीट पंछी
शिव समाधि में विलसता मौन है।।

कण्ठ में शिव के बसा विष मौन है
है दधीचि अस्थि में वह कुलिश भी।
मत भरो क्रन्दन कुटिल इस मौन में
नियति के तेवर न तीखे हों कभी।।

रामनारायण सोनी
०६/१२/२०२०

राष्ट्र के प्रहरी बनो

जो कदम तुम चल लिये पदचिह्न बनते जायँगे।

मील के पत्थर सफर के याद बस रह जायँगे।।

युग प्रवर्तन तुम करोगे मुट्ठियों में आग भर लो।

कर्म के लेकर हथौड़े साधना की माँग भर लो।।

इन्द्र का पवि भी दधिचि की अस्थियों ही से बना।
प्रात का रवि भी तमस की गोद से आ कर तना।।
बिन गरल के सर्प भी बस उम्र भर ही रेंगता है।
कोई बिरला छेदने नभ तान पत्थर फेंकता है।।

सिंह की हुंकार गूँजे बीहड़ों बन कुंजरों में।
शक्ति का परिचय भरा चिंघाड़ते करि के सुरों में।।
शंख की ध्वनियाँ महज प्रार्थना का सुर नहीं है।
न जगे पुरुषार्थ-रण जहँ भेरियों के सुर नहीं है।।

हिम शिखर की श्रृंखलाएँ वीर गाथा कह रही है।
सागरों की चीर छाती शक्तियाँ नित जग रही है।।
व्योम में परचम गड़े है गर्जना के पवन सुत के।
वाहिनी बन राष्ट्र रक्षक अहर्निश यहँ जग रही है।।

राष्ट्र के प्रहरी यहाँ जब हाथ में संगीन ले कर।
बन कहर बरपे समर में बाहुओं में वज़्र धर कर।।
काँपते अरिदल छुपे हो बंकरों की आड़ ले कर।
बाँकुरे रण के उन्हें भी ध्वस्त करते ताड़ ले कर।।

रामनारायण सोनी
१४.०१.२१

Wednesday, 6 January 2021

सखे! लौटेगा मधुमास!

अभी अधर अंगार भरे हैं
रुधिर सभी के खार भरे हैं
चन्दन वन के सुरभित तन में
दावानल के त्रास धरे हैं।
दूर क्षितिज में प्राची ले कर
रश्मिपुञ्ज की थाती दे कर
नवल प्रात में नई सुबह ले 
लौटेगा रवि फिर धरती पर।।
  धरो तुम धीरज का आयास
  सखे! फिर लौटेगा मधुमास।।

पवन और पावन पानी में
मही की इस रजधानी में
नगर भर घूम रहा विषधर
घुला है विष ही विष घर घर।
मिलेगा सागर से मधुग्रास
संजीवन है हिमाद्री के पास
यहीं फिर लौटेगा आरोग्य
मिलेगा स्वच्छ सभी को भोग्य।।
     नियति का करना मत उपहास
     सखे! फिर लौटेगा मधुमास।।

नहीं कोई अपना अपने पास
मिली न अपनों की भी लाश
नजर भर देख सके न हम
विदा होते वे अपने खास।
बहुत खोया है हम सब ने
बहुत सी आशा और सपने
दुःखों दर्दों में जो पिसते
थाम लें बाकी सब रिश्ते।।
       शीघ्र ही बीतेगा संत्रास
       सखे! फिर लौटेगा मधुमास।।

रुदन यह कैसा कण कण में
चले हम आये किस रण में
बचे न प्रहरी जन जन के
चुके है कोष सभी धन के।
हमारे मन ना छोटे हों
बुला लो जो ना लौटे हों
भोर के तारे उगने दो
ना टूटे माला के मनके।।
      ना छोड़ो आस, करो विश्वास
      सखे! फिर लौटेगा मधुमास।।

    रामनारायण सोनी
      ०७.०१.२१

https://youtu.be/b8zXbmGtAho

Tuesday, 5 January 2021

मन धरा पर

नील नभ का नयन तारा वह छलकता नीर उसमें
प्रेम की आकाशगंगा मन धरा पर आज उतरी।
खिल उठा उपवन उपासी सर्वदिश मधुगन्ध बिखरी
प्रेम की कमनीय गंगा मन धरा पर आज उतरी।।

द्वार देहरी दीप हुलसे आँगने भर चौक पुरती
प्रेम की चूनर छबील मनधरा पर आज निखरी।
आँज महकी साँझ बेला गेारजों से माँग भरती
प्रेम की ललना लजीली मन धरा पर आज सँवरी।।

स्वप्न जागे प्यास जागी छन्द में अहसास जागे
प्रेम की पागी नगरिया मन धरा पर आज जागी।
जो वियोगी कामिनी के संग सारी रात जागी
प्रेम की सोई सुनयना मन धरा पर आज जागी।।

प्रात की पनिहारियों ने पनघटों पे पग धरे हैं
प्रेम की जल धार ले कर मन धरा के घट भरे हैं।
गा रही परभातियाँ ये किंकीनी कर की खनक से
प्रेम की बेला रुहानी मन धरा पर सुर झरे हैं।।


रामनारायण सोनी
६.१.२१

Sunday, 3 January 2021

क्योंकि

क्योंकि

क्योकि......
तुम पथिक हो,
पाथेय है, प्रसाद भी है
तुम्हारे पास...
उस परमात्मा का!
काल की कील पर घूमते
जीवन चक्र में
प्रेम के निर्मल, स्वच्छन्द
..आकाश में
डैने फैलाओ !
पाँखी हो प्रेम के तुम
क्योंकि...
तुम रुके तो चूके
क्योंकि...
ऐ मेरे हंसा!!!
यादों के मोती भरे पड़े हैं..
मन के इस मानसरोवर में

रामनारायण सोनी
४.१.२१

Saturday, 2 January 2021

तुम भी अवगाहन कर लो

मैं कौन हूँ, 

मेरा नाम तो परिचय है ही मेरा
पर कुछ और भी पहचाने हैं मेरी
मैं चाक चढ़ी मिट्टी हूँ
मैं घाटी में लुढ़का पत्थर हूँ
आँगन का मैं उपवन हूँ
मैं सफेद सी वह चादर हूँ
मैं तुलसी का वह बिरवा हूँ

पर मैं वह अवधू शिल्प हूँ..
मैं गर मिट्टी हूँ तो
...वह दादी थी मेरी कुम्हार,
मैं गर पत्थर हूँ तो
...माँ मेरी मेरी शिल्पकार,
मैं उपवन हूँ मुझे तो
...पिता ने माली बन पाला है
मैं वह दीन हीन था
...इस समाज ने गोदी में बैठाला है
मेरे अंतस में
..दिन-रात खड़ा है वह सद्गुरू
मैं गर आँगन में तुलसी बिरवा हूँ
...मीठे रिश्तों की धूप में नहाया हूँ
मैं एक बहती नदी में हूँ
...""प्रेम" है वह अजस्र धार
  जिसमें आह्लादित हूँ

आओ! तुम भी अवगाहन कर लो!!

रामनारायण सोनी

ले चलो ऐसे ही


यकीं आज भी नहीं होता
 हम कहाँ थे?
   और, अब!!......
ये कहाँ आ गये हम?
 बस चले थे कुछ क़दम ही ...
  और फिर
     न जाने क्यों? कैसे?     
       चलते जा रहे हैं
 ना! ना!! कोई अदृश्य 
  उँगली थामे लिये जा रहा
    हमें पगडंडियों से 
      इन्द्रप्रस्थ में
 अरे! यह तो तुम हो
     ले चलते रहना, ऐसे ही....

      रामनारायण सोनी

Friday, 1 January 2021

दो क्षुद्रिकाएँ

मैं अभी व्यस्त हूँ
तुमको, उसको,
किसी और को खोजने में
इस भय से कि
कहीं मुझे मैं न मिल जाऊँ
यहाँ प्रश्न अनेक मुझ में
धधक रहे है

रामनारायण सोनी
25.01.20

क्या तुम्हारी
मेरी,
हमारी प्रार्थनाएँ
अब कोई नहीं सुनता ?

देखो!
इन उजालदानों से
अँधेरे ही क्यों झाँकते हैं

रामनारायण सोनी
25.01.20



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सरसराता संगीत

नहीं जानता
इतिहास और उत्पत्ति,
प्रजातियाँ और प्रकल्प
इन फरफराती चिड़ियों का
मुझे बस पसन्द हैं
पंख इनके
नापती है आकाश जिससे
खेलती है हवाओं से
फराफरा कर आ बैठती है
आँगन के चौंतरे पर
टेढ़ी गर्दन कर देखती है
जब एक आँख से
और मैं लालित्य से भर जाता हूँ
छोड़ जाती है कानों में
फड़फड़ाते पंखों का
सरसराता संगीत जिसे
सूने में भी अकसर सुनता रहता हूँ

रामनारायण सोनी
१७.०८.२०

तिल तिल कर रीत गए


जीवन की मोटी पोथी पर
कितने ही कवर बदल गए
हर्फों, लफ़्जों, अहसासों में
मेरी-उसकी कुछ बातों में
बीती घड़ियों में साँसों में
मुट्ठी भर ख्वाब खयालों में
जो लिख्खे वक्त की स्याही ने
वे तिल तिल कर रीत गए

उस वक्त का अब क्या करूँ
तुम बिन जो फक्त हाे गया
फैली मेरी जो बाहें तो मैं
इनमें ख़ुद ही जब्त हो गया।
चाँद सितारे सब मिल कर
ना कर पाये इसको रोशन 
इक बुझता चिराग भी अब
थक हार के बेसिम्त हो गया।।

रामनारायण सोनी

फिर आज की सुबह हुई


अभी अभी अम्बर पर
फैली है अरुणाई
चटखे हैं कुछ डेंडुए कपास के
ले कर कर्म के बीज 
और तुम्हारे प्रेम के झक्क रेशे
चरखा मेरा फिर चलेगा
कातूँगा मलमली धागा
भर कर वक्त के करघे में
श्रम के ताने, विधि के बाने
फिर बुनूँगा अधबुनी चादर को
जीवन की 

रामनारायण सोनी



नैना गुँथ गये

नैना गुँथ गये

कौन मैं और कौन तुम हो
दो पखेरू डाल पर ऐसे मिले
नैना गुँथ गये।।

लिपट लिपट तमाल से
वल्लरी का रोम हर्षण
चन्द्रिका पहने कलाएँ
सज रही सारी दिशाएँ।

दो हृदय गल हार हो ऐसे मिले
नैना गुँथ गए।।

ओढ़ नीलम तारकों को
सिक्त मन रजनी हुई है
बादलों की ओट ही से
चुलबुले चंचल नयन से

दो प्रणय के पुष्प ये ऐसे खिले
नैना गुँथ गए।।

रामनारायण सोनी
३०/०१/२०

तुम कहाँ, मैं कहाँ


मैं गिरि का पाहन हूँ 
 तुझ में है मलय गंध
  मैं बिखरी रज कण 
   तू छंदों का मधुर बंध।।

क्रन्दन के गाँव मेरे 
 तुम झिलमिल झीलों के
  टूटे सुर साज मेरे 
   तुम सप्तक शुभ वंशी के।।

मैं दर्पण हूँ कोरा सा पर 
 आते तुम जब जब
  अलबेली अठखेली सजती 
   वो छबि तब तब।।

    रामनारायण सोनी

*आदमी का शोर है*


 
भैरवी के स्वर भयानक हो गये
बन्दिशों में बस बिखरता शोर है
उपवनों में है हलाहल घुल रहा
बस्तियाँ जलती लगा यह भोर है।
        आदमी का शोर है,
        बस आदमी का शोर है।।
 
वासना के गुल्म में बहके कदम
कुन्दनों के बक्स में पत्थर मिले
बाँबियों में विषधरों के वंश हैं
सत्य के तन में घने विषदंश हैं
        आदमी का शोर है,
        बस आदमीr का शोर है।।
 
भट्टियों सी तप रही वसुधा मेरी
मनुज ही का यह भयानक ताप है
पी गया पानी सरों का सरित नद का
इस पवन की शुद्धता सूली चढ़ी है
        आदमी का शोर है,
        बस आदमी का शोर है।।
 
शिखर की ऊँचाइयाँ गिरने लगी
आदमी की भूख कितनी बढ़ रही
उम्र की पूँजी उड़ी व्यापार बन
धन पिपासा रात दिन यूँ बढ़ रही
        आदमी का शोर है,
        बस आदमी का शोर है।।

रामनारायण सोनी

२ कविताएँ

समीर उसे छू कर क्या आया
दिशाएँ महक उठी

मेघों कोई संदेश क्या लाया 
 कि उम्मीदें दौड़ पड़ी

आँगन का बिरवा यूँ खिलखिलाया
 कि आहटें दस्तक दे गई

मन के नगर की अट्टालिकाएँ
 आतुर हैं दीदार को

मैं जानता हूँ
 कि वह तुम ही तो हो!
   हाँ, तुम ही!!

🌹मैं

दिशाएँ बोलती क्यों है?

वे ध्वनियाँ धन्य हैं
जो ले कर आती हैं
प्रतिध्वनियाँ
फिर फिर

दी थी मैंने
जो दिशाओं को
गूँजती, अनुगूँजती
कि जैसे पुकारती हैं
तुम्हेँ ही
फिर फिर

रामनारायण सोनी

एक ही तो है

एक ही तो है

नहीं मिलते हो तो
खोजता फिरता हूँ
तुम्हें पाने को
यहाँ-वहाँ, कहाँ-कहाँ

मिलते हो जब भी तुम
भूल जाता हूँ मैं सब कुछ
और मुझे भी
शायद एक ही हैं
मैं और तुम

रामनारायण सोनी
३.११.२०

कोरोना से डरो ना

सिक्के के दो पहलू

एक पहलू
अभी जीवन कहीं दुबक गया है
करोना दानव कालमेघ बन
धरती पर उतर गया है,
क्या यह डर है कि..
सागर अपने तटों को लाँघ कर
बस्तियाँ न उजाड़ दे,
अमावस की काली रात में
तारे हम पर न आ गिरें,
बिजली तारों को छोड़
सड़क पर न बहने लगे,
कहीं से नदियाँ मुड़ कर न आ जाए
बहा ले जाएँ घर को अपने
क्या यह डर है कि..
कोरोना वायरस धरती को
जीव रहित न कर दे?
रुको! यह खाली पीली
डर का कल्पित डर है
बस, रहना केवल अपने घर है

दूसरा पहलू
आज शहर से गाँव सुखी हैं
लोग इसीलिये घर को दौड़े हैं
जहाँ दिलों की सिकुड़ी बस्ती
पाँव पड़े अनगिन फोड़े हैं

बन्द पड़ी है गेंगवार, रेप, लूट
अपराधों की भारी गचपच
टी. वी. पर से नेता गायब
थोथे वादों की ना भचभच

कोयल कूक रही आँगन में
पादप पल्लव स्वच्छ धरे हैं
संध्या से अरुणिम ऊषा तक
तारे टिम टिम प्रखर भरे हैं।

गंगा जमना के मिस फूँके अरबों
पर ऐसी निर्मल कब थी माँ गंगे
प्रकृति ने बोला यह मंत्र स्वयं ही
"नमामि यमुने" और "नमामि गंगे"

रामनारायण सोनी
25.05.20

भाव लिखे थे


   १
मैंने अपने भाव लिखे थे
 तुम शब्दों में उलझ गये
   शब्दों के अर्थों को लेकर
     भाव गढ़े  नित नये नये

   २
शाखों से झरते फूलों को
  तुमने पतझड़ ही कह डाला
   पलकों पर ठहरे अश्रु को
     खारा पानी ही कह डाला 

   ३
अभी अभी उतरी मन आँगन
 मेरी प्रीत जुन्हाई ले कर
  वातायन क्यों बन्द कर लिये 
   अपनी ही तनहाई ले कर

   ४
कान लगा कर सुनो जरा तो
 स्पन्दन के गीत बुने हैं
  खिली साँझ की रोली ले कर
   कितने कितने रंग चुने हैं

   ५
मंदिर के अर्चन की ध्वनियाँ
 कोलाहल या शोर नहीं है
  दीप आरती के पावन हैं
   निरी अगन के ठौर नहीं है

   ६
इन शब्दों के पीछे पीछे
 रेले चलते हैं भावों के
  भाव मेरे सब प्रीति सने है
    रस में डूबे अनुभावों के

   ७
इन गीतों में तुम ही तुम हो
 अन्तस का आलाप तुम्ही
  अन्तर के तारों से झरता
   नाद तुम्ही अनुनाद तुम्ही

रामनारायण सोनी

चुप की आवाजें

मैं चुप हूँ
क्योंकि तुम
  अल्फाजों से नही
    अहसासों से समझ लेते हो
तुम चुप हो
  क्योंकि तुम
   बिना अलफ़ाजों के भी
    सब बयान कर जाते हो
हम चुप रह कर
  कितना बोलते हैं
   है ना?

रामनारायण सोनी
३०.११.२०

मौन क्या क्या कह रहा

मौन कितना बोलता तू सुन कभी

सरसराती पत्तियाँ कुछ कह रहीं।
फूल महके, बाग चहके आज तड़के
भैरवी की तान बुलबुल गा रही।।

मौन साधे महमहाता गुलमोहर
मौन सरिता बह रही तटबंध में।
मौन शिखरों पर रुपहली रश्मियाँ
मौन कितना रम रहा निःसर्ग में।।

मौन मुखरित हो रहा हर पुष्प में
हर लता, हर गुल्म में, मधुगन्ध में।
चन्द्रिका बरसी धरा पर मौन ही
चाँद-चकवा मौन है अनुबन्ध में।।

प्राण कण कण में बसा चुपचाप ही
रक्त वाही धमनियाँ चुपचाप बहतीं
हर शिरा हर पोर में ना शोर कोई
जीवनी-संचेतना चुपचाप चलती

मौन की संकल्पना ही बीज बन
सृष्टिकर्ता के सृजन का मूल है।
पालता सारी प्रजा, पशु, कीट पंछी
शिव समाधि में विलसता मौन है।।

कण्ठ में शिव के बसा विष मौन है
है दधीचि अस्थि में वह कुलिश भी।
मत भरो क्रन्दन कुटिल इस मौन में
नियति के तेवर न तीखे हों कभी।।

रामनारायण सोनी
०६/१२/२०२०


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