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Thursday, 31 December 2020

अभी तक तुम नहीं आये


सखे! लौटा फिर मधुमास
शरद भर सिहरी पवन यह
फिर मलय की गंध ले आई
सुमन जागे, कामना जागी।
       अभी तक तुम नहीं आये।।

प्रीत के पाहुन मुखर हो
हो चले हैं फिर बटोही
इन अलिन्दों के नगर में
भ्रमर जागे, प्यास जागी।
        अभी तक तुम नहीं आये।।

कोकिला के कंठ जागे
वीतरागी गुल्म भी जागे
मधुपरी के दुःस्वप्न भागे
मीन की फिर आस जागी।
         अभी तक तुम नहीं आये।।

मेरे मन के नन्दन वन में
प्रीत का मधुरास जागा
रागिनी लय छ्न्द ले कर
सुर मुखर धर वेणु जागी।
          अभी तक तुम नहीं आये।।

हर दिशा हर कोण में है
मकरन्द के मदमस्त मेले
हर लता गलबाँह लेती
हर विटप की पीर भागी।
           अभी तक तुम नहीं आये।।

     रामनारायण सोनी
             25.11.20
                         

तन की तह के पार

तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

मन की मन्थर धार शुभे! यह कितनी सुन्दर है।
मन का वैभव मन से दीखे कैसा सुन्दर दरपन है
मुझ से तुम तक गुपचुप जाना सुन्दर आवर्तन है।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

रागों की रसवन्ती ताने मन की वीणा बजा रही
रजनी के माथे चंदा की सुन्दर बेंदी लगा रही।
मन द्वारे साँझ सकारे चितवन चंचल झाँक रही
पलकन की चादर के पीछे मन की शोखी ढाँक रही ।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

मोद भरी अलियों की गुंजन मन का सौरभ पीती
मन के मधुकर की वे रातें अवगुण्ठन में ऐसे बीती।
खामोशी की बीन बजा कर सोन चिरैया रीती
मन कहता मन ही सुनता है मन की न्यारी नीती।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

मन का ही फानूस टँगा है तन के मौन भवन में
चारों ओर उजाले इसके हुई रोशनी नन्दन वन में।
मन के बादल मन की धरती मन के नील गगन में
टिप टिप करती बरखा मन की भीगा मन ही मन में।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

दूर खड़ा तन देख रहा है छबियाँ कितनी दौड़ रही
मन ने मन को अन्दर अन्दर प्रेम कहानी कई कही।
मन के कुन्दन की स्वर्णाभा तप कर कितनी और बही
मन की सरिता मन का पानी मन की शीतल धार बही।।

तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

रामनारायण सोनी
१५.१२.२०२०

Tuesday, 29 December 2020

पतझड़ फिर जीत गया

*पतझड़ फिर जीत गया*

पल पल ढलते सूरज ने
लम्बा कर दिया मेरा अपना साया
एक और दिन की निर्मम
शाम का धुँधलका इसको फिर लील गया

चलो, अलाव जला लें..!
बुझते सपनों को
ताप में गुनगुना बना लें
अनचीते जुगनू से इन पलों की
मशालें फिर से सुलगा लें
मन के बढ़ते रीतेपन में
अपनों में अपने, ढूँढ रहे सपने
मावस की काली रातों में
सांसों की आस घटी, उम्र लगी कटने
जीवन की झोली के पैबन्द लगे फटने
गागर सा रीत गया,
अपना हर मीत गया
बासन्ती इस उपवन मे
पतझड़ फिर जीत गया।।
पतझड़ फिर जीत गया।।

रामनारायण सोनी
२७।१२।२०२०

शब्द में हैं अर्चनाएँ

है अभी तो रक्त में 

घुलती हुई संवेदनाएँ

रागिनी से सिक्त है इन 

शब्द में ये अर्चनाएँ।

प्राण की वंशी निनादित 

हैं गमकती व्यंजनाएँ

पुष्प की सौरभ लिये 

गुंजन भरी अभ्यर्थनाएँ।।


रात जागी कामिनी के 

कुन्द होते करतलों में

कुनमुनी नलिनी अलापे 

प्रीत के मधुरिम पलों में।

रंग रांची है महावर 

नव उदित है कोंपलों में

फिर रुहानी सी कहानी 

कह रही इन शतदलों में।।


Sunday, 20 December 2020

नेह धरा पर उतरें

नेह धरा पर ऐसे उतरें

गीत गगन के गाऊँ मै, तुम गाओ मेघ मल्हार
प्रीत का पावन पावस ले हम नेह धरा पर उतरें।
मेघ बचे न बचे गगन न बोल बचे न बचे अगन
बूँद बनें हम एकल होवें नेह धरा पर ऐसे उतरें।।
                   हम तुम नेह धरा पर ऐसे उतरें।।

मन में मन को ऐसे घोलें जैसे जल में मिसरी
भावों के मीठे पानी से भरी रहे मानस की गगरी।
अरुणिम आभा लेकर ऊषा अपने आँगन उतरी
तेरी मेरी व्यथा-कथा अब तन से मन से बिसरी।।
                 हम तुम नेह धरा पर ऐसे उतरें।।

पवन बसन्ती बनो लहरिया फूले इस उपवन में
मैं पराग शतदल का हो कर संग उडूँ कानन में।
जगती को मिल कर महकाएँ उतरें जन गण मन में
अलग अलग रह हो न सकेगा पड़े नहीं भटकन में।।
                   हम तुम नेह धरा पर ऐसे उतरें।।

रामनारायण सोनी
१६.१२.२०२०

Thursday, 10 December 2020

जब तुम न थी

जब तुम न थी

तुम न थी तो रश्मियों में उज्ज्वला का भास ना था।
रागिनी में स्वरलता का कम्प ना था राग ना था।
स्वाँस में प्रश्वास में तो बस पवन था प्राण ना था
तुम न थी तो उर्मियों में प्रीत का मधुमास ना था।।
                    तुम न थी, जब तुम न थी

थे पुहुप बहु रंग के बहु गंध के बहु भाँति के वे
तुम न थी तो वे वियोगी बाग के अधिभार से थे।
उन मुंडेरों की विधाएँ थी अहा सुनसान कितनी
मधुपरी के वे अधर भी रज बिना मधुभार से थे।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

चाँद की थी ज्योत्सना वह रोप्यमय आभास होती
थी प्रवालों में प्रखर आभा प्रवर प्रतिभास होती।
शून्य सी सम्वेदना थी चहुँ दिशा अदिधवास होती
पर हृदय की वीथियाँ तुम बिन कहाँ रनिवास होती।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

थे अधर शहदी मधुप के गुंजनें मल्हार गाती
फरफराती तितलियाँ पुष्प को फिर फिर जगाती।
तुम न थी तो उन पलों की कामना कैसे सुहाती
तुम न थी तो गीत कैसे कोकिला ये छ्न्द गाती।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

तुम मिली अँकुवा गये नव कोंपलों के गुल्म सारे
सन्दली होती हवाएँ सब प्रमादी गीत हारे।
वल्लरी वन की लताएँ झूलती साँझे सकारे
मुग्ध मन के द्वार तुम हो प्रीत के पाहुन पधारे।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

      रामनारायण सोनी
         ११.१२.२०

Sunday, 6 December 2020

सुनो चुपचाप

मैं चुप हूँ
क्योंकि तुम
  अल्फाजों से नही
    अहसासों से समझ लेते हो
तुम चुप हो
  क्योंकि तुम
   बिना अलफ़ाजों के भी
    सब बयान कर जाते हो
हम चुप रह कर
  कितना बोलते हैं
   है ना?

रामनारायण सोनी
३०.११.२०

तुम प्रिय प्रवास

तुम खुले पृष्ठ की पोथी हो
जिसमें जीवन के सर्ग सप्त
होती अलियों की मधुर तान
मुख पर उन्नत सा भाल तप्त

मौज भरी चितवन अपार
जहँ भरे स्वप्न का नव विलास
उर में है मधुऋतु की सुवास
धड़कन का तुम प्रिय प्रवास

भौहों में खिंचते मदनबाण
किसलय की लघु कलिकाएँ
अधरों पर ठहरा मधु-निकुंज
पलते पराग के मधुर-पुंज

स्मित आनन की छबि ललाम
श्यामल कुन्तल की कुटिल रेख
कानों के कुन्दन कर्णफूल
होता सम्मोहन देख-देख

रेशम सी मन की पर्तों में
यह प्रीत सुहानी पलती है
सुकुमार सलोने सपनीले
भावों की सरिता बहती है

रामनारायण सोनी
३०।११।२०१४

Saturday, 28 November 2020

करता तो तू है

कोई तो भगीरथ है
  जो उतार लाया
   गंगा को स्वर्ग से
न तो मैं गंगा हूँ
  न ही भगीरथ
कौन है वो
  जो कर गया यह सब
   बस एक अहसास है मुझे
   बस एक अबोध सा बोध है
पर जो कुछ भी है
कितना  सुन्दर है
  कृपा का वर्षण है
  तुम-हम बस भींगते रहें

रामनारायण सोनी
३०.११.२०२०

Monday, 23 March 2020

न मैं रहूँ न मेरा कुछ

तू पानी है 
हल्दी हूँ मैं
घुल कर तुझमें 
खो कर खुद ही
बस रंग छोड़ जाऊँगी

तू हथेली है
हिना हूँ मैं
रच कर तुझमें
लकीरों की छाँह में
बस छुप कर रह जाऊँगी

करुणा सागर तू
नन्ही इक बूँद मैं
डूब कर सागर में
न मैं रहूँ न मेरा कुछ 
बस पानी रह जाऊँगी

रामनारायण सोनी



Friday, 14 February 2020

छत पर जाता नहीं हूँ

बहुत दिन हो गये
तुम से मिले
छ्त पर चढ़ कर
सितारे और आकाश गंगाएँ
रोज आती है छत पर, 
लौट जाती है इंतजार कर 
फिर उसी अन्तरिक्ष में

चाँद आता है
सीढ़ियों, खिड़कियों को 
चला जाता है चाँदनी ओढ़ा कर
पर अमावस मेरी जाती नही
वहाँ अब न तुम हो
न इनमें से कोई और ही


रामनारायण सोनी
०८/०२/२०२०

Friday, 7 February 2020

छत पर जाता नहीं हूँ

बहुत दिन हो गये
तुम से मिले
छ्त पर चढ़ कर
सितारे और आकाश गंगाएँ
रोज आती है छत पर, 
लौट जाती है इंतजार कर 
फिर उसी अन्तरिक्ष में

चाँद आता है
सीढ़ियों, खिड़कियों को 
चला जाता है चाँदनी ओढ़ा कर
पर अमावस मेरी जाती नही
वहाँ अब न तुम हो
न इनमें से कोई और ही


रामनारायण सोनी
०८/०२/२०२०

Monday, 3 February 2020

गीत बसन्ती

गीत बसन्ती 

आँगन में उतरी बहार, बसन्ती फूल खिले।
सखि! गाओ सुमंगल गान, बेला झूम चले।।

चम्पा चमेली ने है माँडी रंगोली, 
अँबुवे की डाली पे कोयल बोली,
पपिहे ने कानों में मिसरी है घोली,
टेसू-जुही मिल के करत ठिठोली,
महुए पे छाया खुमार, समीरन चंवर डुले।
आँगन में उतरी बहार, बसन्ती फूल खिले।
सखि! गाओ सुमंगल गान, बेला झूम चले।।

रागों ने छन्दों से रास रचाया,
फागों ने खुशबू का कीच मचाया,
शब्दों ने भावों का उबटन लगाया,
साजों-सुरों ने है अलख जगाया,
गीतों ने ओढ़ा सिंगार, रसिया आन मिले।
आँगन में उतरी बहार, बसन्ती फूल खिले।
सखि! गाओ सुमंगल गान, बेला झूम चले।।

रामनारायण सोनी
०४/०१/२०२०

Wednesday, 29 January 2020

स्वप्न सारे ढह गए


अस्तबल में हिनाहिनाहट, थी गिन्नियों की खनखनाहट।
देखते ही देखते सब बिक गए, हम लुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

सब वचन तख्तियाँ टूटी पड़ी है, बस छलावों का ही कद ऊँचा हुआ।
उन मतों की मौत का मातम लिये, हम घुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

वक्त ने भी बीत कर हमको छला, पाँच वर्षों बाद लौटेगा कभी।
ले मुकद्दर की लकीरें हाथ में, हम मिटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

फिर दुःशासन के कुशासन में फँसी, लोकतंत्री द्रौपदी की लाज है।
उँगलियों में ले सुदर्शन आज इन, हम जुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।

उँगलियों की स्याही भी सूखी नही, पालियों की वे लकीरें मिट गई।
खेल हैं या हैं तमाशे ये सभी, हम लुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

अब हमें कानून ऐसा चाहियेगा, गर बदलते बीच में तुम पन्थ अपना।
मान्यता ही खीच लें वापस तेरी, हम तुम्हे इतना भी क्यों सहते गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

रामनारायण सोनी
२९।०१।२०२०

काले उजाले

क्या तुम्हारी
मेरी, 
हमारी प्रार्थनाएँ
अब कोई नहीं सुनता ?

देखो!
इन उजालदानों से
अँधेरे ही क्यों झाँकते हैं

रामनारायण सोनी

डरा हुआ

मैं अभी व्यस्त हूँ
तुमको, उसको,
किसी और को खोजने में

इस डर से कि
कहीं मुझे मैं न मिल जाऊँ
यहाँ प्रश्न अनेक मुझ में
धधक रहे हैं

Monday, 20 January 2020

दस कविताएँ



यहां किस्म किस्म के 
खिलाड़ी मौजूद हैं 
ड्रेसिंग रूम में, 
पांच सितारा होटलों में,
अंधेरी कोठरियों में
बैठे-बैठे ही खेलते हैं 
चेपक में, लॉर्ड्स में, ब्रेबर्न में 
जिताते भी हैं, हराते भी हैं,
पर हारते कभी नहीं
 
मेरा घर, हमारा घर है, 
इसमें अपने लोग रहते हैं 
तुम्हारा हमारा हो ना हो 
पर हमारा तुम्हारा है

कैसा यह वक्त है 
शूलियाँ पंखों पर टंगी हैं,
मरघट सड़कों पर बिखरे पड़े हैं 
निर्वस्त्र हो गए हैं पहाड़ 
नरभक्षी तेंदुए का 
आदमी सब्सीट्यूट हो गया है 
भेड़ियों की आबादी जंगल में कम,
आबादी में ज्यादा हो गई है

यह कैसी भीड़ है 
आंखों पर पट्टी बंधी 
इसमें कुछ गान्धारियाँ भी हैं 
मशीनी हाथों में पत्थर 
कुछ धड़ तो वे ही हैं 
उन पर लगी हैं 
आयातित मुंडिया 
धकेल रहे भीतर बाहर के लोग 
कुछ रोबोटों के रिमोट 
दुश्मनों के हाथ पड़ गए 
यह कैसी भीड़ है 
मेरे घर में, घर के लोगों की

मैं दिया हूँ मिट्टी का 
हर बार जलूँगा 
टूटने तक 
मोमबत्ती नहीं कि 
अंधेरे से आई 
फिर अंधेरे में मिली


उस खंडहर के 
टूटे द्वार पर  
दस्तक देता हूँ रोज मैं
लेकिन कोई नहीं है वहाँ 
मेरी प्रतिध्वनि ही पुकारती है, 
फिर फिर भीतर से मुझे 
घूम कर घूम कर लौट आता हूँ
मैं खुद मे खुद ही


एक दिन 
छोटी सी एक कविता मेरी 
किताब से निकल कर
चल पड़ी शहर में 
ना अपने लोग मिले कोई 
न थी अपनी बात भी कोई 
केवल कान फोड़ू शोर 
मायूस फिर बैठ गई लौट कर 
मेरी उसी किताब में

राजमहल की 
बहुरूपिया कठपुतलियाँ 
बंधी है डोर कहीं और ही इनकी 
दिखता नहीं सूत्रधार 
पीं पीं की आवाज पर
नाचती है पुतलियां 
ताली पीटते यह दर्शक 
आए थे तमाशा देखने 
तमाशा होकर लौट लौट जाएंगे 
अपने अपने घर



कौन मैं और कौन तुम हो
दो पखेरू डाल पर ऐसे मिले
नैना गुँथ गये।।

लिपट लिपट तमाल से
वल्लरी का रोम हर्षण
चन्द्रिका पहने कलाएँ
सज रही सारी दिशाएँ।

दो हृदय गल हार हो ऐसे मिले
नैना गुँथ गए।।

ओढ़ नीलम तारकों को
सिक्त मन रजनी हुई है
बादलों की ओट ही से
चुलबुले चंचल नयन वे।

दो प्रणय के पुष्प ये ऐसे खिले
नैना गुँथ गए।।


रामनारायण सोनी

१०
एक दिन मैंने 
मस्का लगाया जिंदगी को 
चल चलें दहाई छोड़ 
उन इकाई माइलों में
वहाँ पड़ी हैं-
कुछ हाथ की बनी पतंगे, 
कुछ गिल्ली डंडे, 


टायर सोल की एनटिक चप्पलें, 
साइकिल के उतरे टायर 
एक तिलिस्मी संदूक में- 
भरी पड़ी है यहाँ कुछ चीजें-
पैबंद लगे पट्टेदार नाड़ी वाले पाजामे 
टाट के बने हुए झोले 
उसमें बस तीन चार किताबें 
एक लकड़ी की फ्रेम में स्लेट, 
खड़िया की कलम, 
गोल्डन शाही की सूखी टिकिया, 
निब वाली होल्डर कलम, 
बरु वाली कलम मेरी 
मिलेंगे कुछ सितोलिये के पत्थर 
कांच के वे कंचे अभी वैसे ही रंगीन हैं
पाँचे उन अनगढ़ पत्थरों के
यादें धुंधली पड़ गई है मेरी 
पर ऐ जिंदगी! 
तेरी पीठ पर सब लदी हैं

यहाँ एक चूड़ीदार बाजा भी हैं 
भरी है इसमें मस्त 
नाचते उछलते कूदते 
बच्चों की किलकारियाँ 
चल चलें इन दहाई माइलों को छोड़ 
उन इकाई माइलों में 

उन कच्चे घरों में पक्के रिश्ते होते थे
भोर में खपरैलों में से उठता धुआँ
पनघट पर घिर्रियों की वे आवाजें 
खजूर के पत्तों से बनी चटाई पर 
धूप सेंकते दादी मां के आसपास बैठे 
प्यारे प्यारे वे बच्चे 
ऐ जिंदगी! सब लिखा है 
फौलादी अक्षरों से तेरे तन बदन पर 
तो, चल चलें लौटकर 
उन इकाई माइलों पर

मैं ना सही 
तू खेल आया कर 
कभी कभी उनके साथ 
देख जरा! गांव के बाहर 
सती के ओटले पर 
बिखरे हुए अनाज के "चूगे" पड़े हैं अभी भी
खड़ा है अभी भी वह बूढ़ा बरगद 
सुबह शाम चहचाहट करते पंछी देखे हैं तूने
हैरान हो तू इस घुटन से भरे जब-जब 
बिना पूछे घूम आया कर 
उन इकाई माइलों में 
चल चलें फिर इकाई माइलों में

Thursday, 9 January 2020

तुम ही हो

समीर उसे छू कर क्या आया
दिशाएँ महक उठी

मेघ कोई संदेश क्या लाया 
 कि उम्मीदें दौड़ पड़ी

आँगन का बिरवा यूँ खिलखिलाया
 कि बाछें खिल गई

मन के नगर की अट्टालिकाएँ
 आतुर हो उठी दरस को

     मैं जानता हूँ
       कि वह तुम ही हो!
         हाँ, तुम ही!!

Sunday, 5 January 2020

इन पलों में


यह समय उड़ता रहेगा श्वेत काले पंख ले कर
रुक नही जाना पथिक रात का अँधियार ले कर

फेंक दो तुम आज मन से हीनता के पंक को
राजपथ पर आ मिलो छोड़ गलियों की घुटन को

इन पलों के गर्भ में तो स्वप्न पाँखी पल रहे हैं
आँधियों की छातियों पर हिमशिखर भी गल रह हैं

इन पलों की कुक्षियों में वीर गाथाएँ भरी है
अश्रुओं के शाप से वे वीर बाला कब डरी हैं

इन पलों में ज्योत्स्ना का झर रहा पीयूष नभ से
सन्दली बहती पवन है रात काली फेंक मन से

इन पलों के सर्ग सारे हैं गढ़े नेपथ्य में ही
चल रहे संवाद जो भी हैं बुने संदर्भ में ही

इन पलों के साक्ष्य में ही काल निर्णय हो सकेगा
पथ चुनोगे, श्रम करोगे  संग में पाथेय होगा

इन पलों की साँझ को संध्या बना कर देख लेना
संधि के सुरमई सरोवर में उतर कर डूब लेना

इन पलों में धड़कनों में श्वास है निःश्वास भी है
विष बुझे कुछ तीर है अमरता का वास भी है

इन पलों में शतदलों का पंक में जीवन पला है
शूल के आँगन मुदित हो पुष्प कोई आ खिला है

इन पलों की मांग में तुम साध का सिन्दूर भर लो
सिंह शावक बन विटप में इक नई हुंकार भर लो

इन पलों की भृकुटि में ही तुम त्रिलोचन देख डालो
विघ्न के अभिषाप सारे ज्वाल से तुम भून डालो

इन पलों को मुफ्त में ही जो कोई भी खो रहा है
जिन्दगी में लाश अपनी आप काँधे ढो रहा है

इन पलों के घोष को जयघोष का उत्थान दे दो
भींच कर के मुट्ठियाँ तुम कर्म को आह्वान दे दो

इन पलों में चक्रधारी की प्रतीक्षा व्यर्थ होगी
चीर उसका ही बचेगा जो स्वयं ही पार्थ होगी

उन पलों की स्वस्ति में इन पलों को क्यों गँवाना
इन पलों में फिर धरा पर बीज कर्मों के उगाना

रामनारायण सोनी

06 01 2020

Wednesday, 1 January 2020

शरारती बच्चा

जान बूझ कर उसने पूछा 
दो घटाएँ चौदह में से
तो कितना बचा
जवाब मिला केवल सोलह

गणित के प्रोफेसर हैं वे
पर जवाब दिया था
भीतर मचलते, उछलते, कूदते 
उस शरारती बच्चे ने.... 
क्योंकि..
...हर बूढ़ा अपने भीतर
वो बच्चा ढूँढता रहता है

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