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Wednesday, 29 January 2020

स्वप्न सारे ढह गए


अस्तबल में हिनाहिनाहट, थी गिन्नियों की खनखनाहट।
देखते ही देखते सब बिक गए, हम लुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

सब वचन तख्तियाँ टूटी पड़ी है, बस छलावों का ही कद ऊँचा हुआ।
उन मतों की मौत का मातम लिये, हम घुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

वक्त ने भी बीत कर हमको छला, पाँच वर्षों बाद लौटेगा कभी।
ले मुकद्दर की लकीरें हाथ में, हम मिटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

फिर दुःशासन के कुशासन में फँसी, लोकतंत्री द्रौपदी की लाज है।
उँगलियों में ले सुदर्शन आज इन, हम जुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।

उँगलियों की स्याही भी सूखी नही, पालियों की वे लकीरें मिट गई।
खेल हैं या हैं तमाशे ये सभी, हम लुटे से देखते ही रह गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

अब हमें कानून ऐसा चाहियेगा, गर बदलते बीच में तुम पन्थ अपना।
मान्यता ही खीच लें वापस तेरी, हम तुम्हे इतना भी क्यों सहते गए।।
स्वप्न सारे ढह गए।।

रामनारायण सोनी
२९।०१।२०२०

काले उजाले

क्या तुम्हारी
मेरी, 
हमारी प्रार्थनाएँ
अब कोई नहीं सुनता ?

देखो!
इन उजालदानों से
अँधेरे ही क्यों झाँकते हैं

रामनारायण सोनी

डरा हुआ

मैं अभी व्यस्त हूँ
तुमको, उसको,
किसी और को खोजने में

इस डर से कि
कहीं मुझे मैं न मिल जाऊँ
यहाँ प्रश्न अनेक मुझ में
धधक रहे हैं

Monday, 20 January 2020

दस कविताएँ



यहां किस्म किस्म के 
खिलाड़ी मौजूद हैं 
ड्रेसिंग रूम में, 
पांच सितारा होटलों में,
अंधेरी कोठरियों में
बैठे-बैठे ही खेलते हैं 
चेपक में, लॉर्ड्स में, ब्रेबर्न में 
जिताते भी हैं, हराते भी हैं,
पर हारते कभी नहीं
 
मेरा घर, हमारा घर है, 
इसमें अपने लोग रहते हैं 
तुम्हारा हमारा हो ना हो 
पर हमारा तुम्हारा है

कैसा यह वक्त है 
शूलियाँ पंखों पर टंगी हैं,
मरघट सड़कों पर बिखरे पड़े हैं 
निर्वस्त्र हो गए हैं पहाड़ 
नरभक्षी तेंदुए का 
आदमी सब्सीट्यूट हो गया है 
भेड़ियों की आबादी जंगल में कम,
आबादी में ज्यादा हो गई है

यह कैसी भीड़ है 
आंखों पर पट्टी बंधी 
इसमें कुछ गान्धारियाँ भी हैं 
मशीनी हाथों में पत्थर 
कुछ धड़ तो वे ही हैं 
उन पर लगी हैं 
आयातित मुंडिया 
धकेल रहे भीतर बाहर के लोग 
कुछ रोबोटों के रिमोट 
दुश्मनों के हाथ पड़ गए 
यह कैसी भीड़ है 
मेरे घर में, घर के लोगों की

मैं दिया हूँ मिट्टी का 
हर बार जलूँगा 
टूटने तक 
मोमबत्ती नहीं कि 
अंधेरे से आई 
फिर अंधेरे में मिली


उस खंडहर के 
टूटे द्वार पर  
दस्तक देता हूँ रोज मैं
लेकिन कोई नहीं है वहाँ 
मेरी प्रतिध्वनि ही पुकारती है, 
फिर फिर भीतर से मुझे 
घूम कर घूम कर लौट आता हूँ
मैं खुद मे खुद ही


एक दिन 
छोटी सी एक कविता मेरी 
किताब से निकल कर
चल पड़ी शहर में 
ना अपने लोग मिले कोई 
न थी अपनी बात भी कोई 
केवल कान फोड़ू शोर 
मायूस फिर बैठ गई लौट कर 
मेरी उसी किताब में

राजमहल की 
बहुरूपिया कठपुतलियाँ 
बंधी है डोर कहीं और ही इनकी 
दिखता नहीं सूत्रधार 
पीं पीं की आवाज पर
नाचती है पुतलियां 
ताली पीटते यह दर्शक 
आए थे तमाशा देखने 
तमाशा होकर लौट लौट जाएंगे 
अपने अपने घर



कौन मैं और कौन तुम हो
दो पखेरू डाल पर ऐसे मिले
नैना गुँथ गये।।

लिपट लिपट तमाल से
वल्लरी का रोम हर्षण
चन्द्रिका पहने कलाएँ
सज रही सारी दिशाएँ।

दो हृदय गल हार हो ऐसे मिले
नैना गुँथ गए।।

ओढ़ नीलम तारकों को
सिक्त मन रजनी हुई है
बादलों की ओट ही से
चुलबुले चंचल नयन वे।

दो प्रणय के पुष्प ये ऐसे खिले
नैना गुँथ गए।।


रामनारायण सोनी

१०
एक दिन मैंने 
मस्का लगाया जिंदगी को 
चल चलें दहाई छोड़ 
उन इकाई माइलों में
वहाँ पड़ी हैं-
कुछ हाथ की बनी पतंगे, 
कुछ गिल्ली डंडे, 


टायर सोल की एनटिक चप्पलें, 
साइकिल के उतरे टायर 
एक तिलिस्मी संदूक में- 
भरी पड़ी है यहाँ कुछ चीजें-
पैबंद लगे पट्टेदार नाड़ी वाले पाजामे 
टाट के बने हुए झोले 
उसमें बस तीन चार किताबें 
एक लकड़ी की फ्रेम में स्लेट, 
खड़िया की कलम, 
गोल्डन शाही की सूखी टिकिया, 
निब वाली होल्डर कलम, 
बरु वाली कलम मेरी 
मिलेंगे कुछ सितोलिये के पत्थर 
कांच के वे कंचे अभी वैसे ही रंगीन हैं
पाँचे उन अनगढ़ पत्थरों के
यादें धुंधली पड़ गई है मेरी 
पर ऐ जिंदगी! 
तेरी पीठ पर सब लदी हैं

यहाँ एक चूड़ीदार बाजा भी हैं 
भरी है इसमें मस्त 
नाचते उछलते कूदते 
बच्चों की किलकारियाँ 
चल चलें इन दहाई माइलों को छोड़ 
उन इकाई माइलों में 

उन कच्चे घरों में पक्के रिश्ते होते थे
भोर में खपरैलों में से उठता धुआँ
पनघट पर घिर्रियों की वे आवाजें 
खजूर के पत्तों से बनी चटाई पर 
धूप सेंकते दादी मां के आसपास बैठे 
प्यारे प्यारे वे बच्चे 
ऐ जिंदगी! सब लिखा है 
फौलादी अक्षरों से तेरे तन बदन पर 
तो, चल चलें लौटकर 
उन इकाई माइलों पर

मैं ना सही 
तू खेल आया कर 
कभी कभी उनके साथ 
देख जरा! गांव के बाहर 
सती के ओटले पर 
बिखरे हुए अनाज के "चूगे" पड़े हैं अभी भी
खड़ा है अभी भी वह बूढ़ा बरगद 
सुबह शाम चहचाहट करते पंछी देखे हैं तूने
हैरान हो तू इस घुटन से भरे जब-जब 
बिना पूछे घूम आया कर 
उन इकाई माइलों में 
चल चलें फिर इकाई माइलों में

Thursday, 9 January 2020

तुम ही हो

समीर उसे छू कर क्या आया
दिशाएँ महक उठी

मेघ कोई संदेश क्या लाया 
 कि उम्मीदें दौड़ पड़ी

आँगन का बिरवा यूँ खिलखिलाया
 कि बाछें खिल गई

मन के नगर की अट्टालिकाएँ
 आतुर हो उठी दरस को

     मैं जानता हूँ
       कि वह तुम ही हो!
         हाँ, तुम ही!!

Sunday, 5 January 2020

इन पलों में


यह समय उड़ता रहेगा श्वेत काले पंख ले कर
रुक नही जाना पथिक रात का अँधियार ले कर

फेंक दो तुम आज मन से हीनता के पंक को
राजपथ पर आ मिलो छोड़ गलियों की घुटन को

इन पलों के गर्भ में तो स्वप्न पाँखी पल रहे हैं
आँधियों की छातियों पर हिमशिखर भी गल रह हैं

इन पलों की कुक्षियों में वीर गाथाएँ भरी है
अश्रुओं के शाप से वे वीर बाला कब डरी हैं

इन पलों में ज्योत्स्ना का झर रहा पीयूष नभ से
सन्दली बहती पवन है रात काली फेंक मन से

इन पलों के सर्ग सारे हैं गढ़े नेपथ्य में ही
चल रहे संवाद जो भी हैं बुने संदर्भ में ही

इन पलों के साक्ष्य में ही काल निर्णय हो सकेगा
पथ चुनोगे, श्रम करोगे  संग में पाथेय होगा

इन पलों की साँझ को संध्या बना कर देख लेना
संधि के सुरमई सरोवर में उतर कर डूब लेना

इन पलों में धड़कनों में श्वास है निःश्वास भी है
विष बुझे कुछ तीर है अमरता का वास भी है

इन पलों में शतदलों का पंक में जीवन पला है
शूल के आँगन मुदित हो पुष्प कोई आ खिला है

इन पलों की मांग में तुम साध का सिन्दूर भर लो
सिंह शावक बन विटप में इक नई हुंकार भर लो

इन पलों की भृकुटि में ही तुम त्रिलोचन देख डालो
विघ्न के अभिषाप सारे ज्वाल से तुम भून डालो

इन पलों को मुफ्त में ही जो कोई भी खो रहा है
जिन्दगी में लाश अपनी आप काँधे ढो रहा है

इन पलों के घोष को जयघोष का उत्थान दे दो
भींच कर के मुट्ठियाँ तुम कर्म को आह्वान दे दो

इन पलों में चक्रधारी की प्रतीक्षा व्यर्थ होगी
चीर उसका ही बचेगा जो स्वयं ही पार्थ होगी

उन पलों की स्वस्ति में इन पलों को क्यों गँवाना
इन पलों में फिर धरा पर बीज कर्मों के उगाना

रामनारायण सोनी

06 01 2020

Wednesday, 1 January 2020

शरारती बच्चा

जान बूझ कर उसने पूछा 
दो घटाएँ चौदह में से
तो कितना बचा
जवाब मिला केवल सोलह

गणित के प्रोफेसर हैं वे
पर जवाब दिया था
भीतर मचलते, उछलते, कूदते 
उस शरारती बच्चे ने.... 
क्योंकि..
...हर बूढ़ा अपने भीतर
वो बच्चा ढूँढता रहता है

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