१
यहां किस्म किस्म के
खिलाड़ी मौजूद हैं
ड्रेसिंग रूम में,
पांच सितारा होटलों में,
अंधेरी कोठरियों में
बैठे-बैठे ही खेलते हैं
चेपक में, लॉर्ड्स में, ब्रेबर्न में
जिताते भी हैं, हराते भी हैं,
पर हारते कभी नहीं
२
मेरा घर, हमारा घर है,
इसमें अपने लोग रहते हैं
तुम्हारा हमारा हो ना हो
पर हमारा तुम्हारा है
३
कैसा यह वक्त है
शूलियाँ पंखों पर टंगी हैं,
मरघट सड़कों पर बिखरे पड़े हैं
निर्वस्त्र हो गए हैं पहाड़
नरभक्षी तेंदुए का
आदमी सब्सीट्यूट हो गया है
भेड़ियों की आबादी जंगल में कम,
आबादी में ज्यादा हो गई है
४
यह कैसी भीड़ है
आंखों पर पट्टी बंधी
इसमें कुछ गान्धारियाँ भी हैं
मशीनी हाथों में पत्थर
कुछ धड़ तो वे ही हैं
उन पर लगी हैं
आयातित मुंडिया
धकेल रहे भीतर बाहर के लोग
कुछ रोबोटों के रिमोट
दुश्मनों के हाथ पड़ गए
यह कैसी भीड़ है
मेरे घर में, घर के लोगों की
५
मैं दिया हूँ मिट्टी का
हर बार जलूँगा
टूटने तक
मोमबत्ती नहीं कि
अंधेरे से आई
फिर अंधेरे में मिली
६
उस खंडहर के
टूटे द्वार पर
दस्तक देता हूँ रोज मैं
लेकिन कोई नहीं है वहाँ
मेरी प्रतिध्वनि ही पुकारती है,
फिर फिर भीतर से मुझे
घूम कर घूम कर लौट आता हूँ
मैं खुद मे खुद ही
७
एक दिन
छोटी सी एक कविता मेरी
किताब से निकल कर
चल पड़ी शहर में
ना अपने लोग मिले कोई
न थी अपनी बात भी कोई
केवल कान फोड़ू शोर
मायूस फिर बैठ गई लौट कर
मेरी उसी किताब में
८
राजमहल की
बहुरूपिया कठपुतलियाँ
बंधी है डोर कहीं और ही इनकी
दिखता नहीं सूत्रधार
पीं पीं की आवाज पर
नाचती है पुतलियां
ताली पीटते यह दर्शक
आए थे तमाशा देखने
तमाशा होकर लौट लौट जाएंगे
अपने अपने घर
९
कौन मैं और कौन तुम हो
दो पखेरू डाल पर ऐसे मिले
नैना गुँथ गये।।
लिपट लिपट तमाल से
वल्लरी का रोम हर्षण
चन्द्रिका पहने कलाएँ
सज रही सारी दिशाएँ।
दो हृदय गल हार हो ऐसे मिले
नैना गुँथ गए।।
ओढ़ नीलम तारकों को
सिक्त मन रजनी हुई है
बादलों की ओट ही से
चुलबुले चंचल नयन वे।
दो प्रणय के पुष्प ये ऐसे खिले
नैना गुँथ गए।।
रामनारायण सोनी
१०
एक दिन मैंने
मस्का लगाया जिंदगी को
चल चलें दहाई छोड़
उन इकाई माइलों में
वहाँ पड़ी हैं-
कुछ हाथ की बनी पतंगे,
कुछ गिल्ली डंडे,
टायर सोल की एनटिक चप्पलें,
साइकिल के उतरे टायर
एक तिलिस्मी संदूक में-
भरी पड़ी है यहाँ कुछ चीजें-
पैबंद लगे पट्टेदार नाड़ी वाले पाजामे
टाट के बने हुए झोले
उसमें बस तीन चार किताबें
एक लकड़ी की फ्रेम में स्लेट,
खड़िया की कलम,
गोल्डन शाही की सूखी टिकिया,
निब वाली होल्डर कलम,
बरु वाली कलम मेरी
मिलेंगे कुछ सितोलिये के पत्थर
कांच के वे कंचे अभी वैसे ही रंगीन हैं
पाँचे उन अनगढ़ पत्थरों के
यादें धुंधली पड़ गई है मेरी
पर ऐ जिंदगी!
तेरी पीठ पर सब लदी हैं
यहाँ एक चूड़ीदार बाजा भी हैं
भरी है इसमें मस्त
नाचते उछलते कूदते
बच्चों की किलकारियाँ
चल चलें इन दहाई माइलों को छोड़
उन इकाई माइलों में
उन कच्चे घरों में पक्के रिश्ते होते थे
भोर में खपरैलों में से उठता धुआँ
पनघट पर घिर्रियों की वे आवाजें
खजूर के पत्तों से बनी चटाई पर
धूप सेंकते दादी मां के आसपास बैठे
प्यारे प्यारे वे बच्चे
ऐ जिंदगी! सब लिखा है
फौलादी अक्षरों से तेरे तन बदन पर
तो, चल चलें लौटकर
उन इकाई माइलों पर
मैं ना सही
तू खेल आया कर
कभी कभी उनके साथ
देख जरा! गांव के बाहर
सती के ओटले पर
बिखरे हुए अनाज के "चूगे" पड़े हैं अभी भी
खड़ा है अभी भी वह बूढ़ा बरगद
सुबह शाम चहचाहट करते पंछी देखे हैं तूने
हैरान हो तू इस घुटन से भरे जब-जब
बिना पूछे घूम आया कर
उन इकाई माइलों में
चल चलें फिर इकाई माइलों में