आज जी भर कर देखे
सौंधियाई भीनी महक
पुराने पड़ गए कागज सी
चहक उठी तरुणाई है
कलम ये भी है
वहाँ रंग थे
अब सियाही
वहाँ पेड़ पौधे
और फूल पत्तियाँ
गज़ल अौर रुबाई
ढल गई शब्दों में
छन छनती पैंजनियाँ
गल बहियाँ फैलाई
मन के आँगन में
एक गई बासंती बयार,
लौट आई है
मैं हर रोज सोचता रहता हूँ...
The whole dictionary is a set of 26 letters and a few symbols but by arranging them it becomes a big volume.
A volume of set of expression, emotion, regulation , creations and, of course, emergency life events.
Even if, 25 letters can't complete a bible.
If you withdraw a single letter from your motivational and emotional thoughts,
my work will be no where.
इसलिए तो
मेरी कृतियों से तुम निकल गए
तो उन २५-२६ अक्षरों को कौन पढ़ेगा।
तुम्हें अपने आपको देखना हो
तो मेरी रचनाओं में घूम कर चले जाना
यहाँ तुम ही तुम हो
Ramnarayan Soni.
संघर्ष सारा दीप का तम से नही खुद से हुआ
ढूँढता है संग किसका क्षुब्द क्यों सब से हुआ
यह व्यथा व्यतिरेक की अभिव्यंजना है
कर्म पथ है किरण पथ ही क्यों कहें उद्वेलना है
🔥
मैं हूँ प्यारी सोन चिरैया
धरती के आँगन मैं खेली
बचपन मेरा विभव भरा
यौवन की दहलीज रुपहली
बंधी व्याध की पाश प्रबल मेरी आशाएँ
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो
मैं थी अपना एक गगन था
उम्मीदों में संग पवन था
मेरा मन अपने ही जग में
अपने ही उल्लास मगन था
काल निशा बन जीवन में गहराए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो
तिनका तिनका चुन कर मैंने
नन्हा सा था नीड़ बनाया
नीचे बगिया महक रही थी
चंचरीक था संग संग गाया
दावानल मुट्ठी में भर भर क्यों लाए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो
जुड़ कर टूटी, जुड़ी टूट कर
भीषण संघर्षों की वीथी में
पैर जमाए खड़ी रही हूँ
झंझा के अंधे कलरव में
जीवन-सागर में क्यों सुनामी लाए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो
पंख बँधे हैं फिर भी मेरे
हाथों में पुरुषार्थ भरा है
मेरी चिचियाहट में अब भी
शब्दों का एक कोष भरा है
संकल्पों के कल्प मेरे गिनने आए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो
जिस पल बन्द खुलेंगे मेरे
फिर से होगा गगन मेरा
उफनेगा उल्लास सिंधु का
नाचेगा मन मोद भरा
अपने कर्म बीज मुझे गिनाने आए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो
आज उषा में नवप्रभात है
खण्ड खण्ड वे दम्भ पड़े हैं
पगडण्डी के पथ वे सारे
राजपथों से आज जुड़े हैं
देख उन्हें ही शायद इतने चुँधियाए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो
कलाम भले ही हमारा हो
पर कमाल तो तुम्हारा है
कलम भले ही हमारी है
इसमें शबाब तो तुम्हारा है
दीप-बाती भले ही हमारी हो
रोशनी इसमें कहाँ हमारी है
ह्रदय हमारा भले ही हो पर
इसमें धड़कने सब तुम्हारी हैं
कभी कभी यह सोचता हूँ
मैं तो निकला था फकीरी में
न शब्द थे, न भाव, झोली में
अब लगता है मैं हूँ अमीरों में
पता नहीं चलता कि कब तुम
रोज खीसे में कुछ डाल देते हो
अपनी जेब में सिक्के आपके ही हैं
रामनारायण सोनी
प्रश्न हलाहल का ही नही था
मैं तो हँस कर उसको पी गई।
पर तुमको अचरज होता है
क्यों मैं फिर भी जी गई।।
पर नीली छतरी वाले में
मेरा भी विश्वास अटल है।
फिर हर प्याला ही प्रसाद है
अमिय भरा है या कि गरल है।।
तुमने कालकूट को पूजा
मैं तो प्रभु की चरण शरण हूँ।
तुमने गरल बीज बोए हैं
मैं उस प्रभु की प्रीति-वरण हूँ।।
मेरे गीतों से निकल गए यदि तुम
विराट शून्य होगा मेरे समक्ष
वह अनन्त और निस्सीम है
देख नहीं पोवेंगे उसे नेत्र मेरे
बिखर जाएगा हृदय का स्पन्दन
सुन्दर साज सभी होंगे
पर बिना स्वर के मृत होंगे
शिल्प में सौंदर्य तो होगा अप्रतिम
पाषाण भर होंगे सभी
यदि भीतर तुम न हुए तो
तुम वहाँ मिलोगे कैसे
न शून्य दिखता है,
न पाषाण पसीजता है
न साज गाते हैं
हृदय में तो धड़कनों में
तुम धड़कते हो
मेरे गीत मर न जाए कहीं
बिन तुम्हारे ये बिचारे
ये तुम्हें गाते, नृत्य करते
हथेलियों पर फुदकते
बोलते हैं तुम्हारी इबारतें
ढलते हैं तुम्हारे साँचों में
यदि भीतर तुम न हुए तो
तुम वहाँ मिलोगे कैसे
मैं अक्सर तुम्हें ढूँढ ही लेता हूँ
इनमें, इनकी आत्मा तुम ही हो
घिर चले रंजो-गम के साए
कहीं पूरा न निगल जाए मुझे
तेरी यादों के शोख परिन्दे
खो न जाए ये कहीं अम्बर में
बादलों से झाँकती रुपहली
रोशनी भी न गुम जाए कहीं
इससे पहले कि मैं बिखर जाऊँ
तेरा लौट आना लाजमी है
मेरी इस नज्म की नब्ज
बड़ी मुश्किल से चल पाई है
लाल तपते हुए सेहरा में
बडी मुश्किल से बहार उतरी है
वादियाँ में है मेले खुशबुओं के
बगीचों को न लग जाए कहीं नजर
इससे पहले कि मैं बिखर जाऊँ
तेरा लौट आना लाजमी है
रात भर देते रहे दस्तक
अनजान हवा के झोंके
सहमा सहमा सा, कुछ डरा डरा सा है
दिल का क्या हाल मैं कहूँ तुझसे
कँपकंपाता दिया ये प्रेम का है
कहीं चुक जाए न तैल और बाती
इससे पहले कि मैं बिखर जाऊँ
तेरा लौट आना लाजमी है
तू मेरे गीतों को, मैं तेरी आवाज लिए फिरता हूँ
बिन जुड़े बिन कहे न ये खो जाएँ अँधेरों में
न मिले संग अगर नाव और माँझी का
मिल गई मुझको दुआएँ जी भर के
सौ बरस जिन्दगी को जीने की
पर बरस है हमारा ये कुछ दिन का
जिनको धागों में जमा रक्खा था
मनके टूट कर कुछ तो गिरे बालू में
ढूँढता उनको गर रहा होता मैं
गाँठ के पल भी और खोना था
भींच कर बैठा हूँ कुछ पल मुट्ठी में
जिन्दगी फूटी घड़े सी न चू जाए कहीं
त्रिवेणी तो संगम है तीन नदियों का
देखते हैं गंगा जमना को तो सभी
सरस्वती को गुनिजन ही देखते हैं
इन आँखों की दहलीज पर अभी आँसू ठहरे हैं
पलकों के किनारों पे काजल के सख्त पहरे हैं
रिसते रहे इस रात में पुरजोर दिल के अंदर से
एक सागर है बसा सीने में इनसे ही तो उभरे हैं
सुनसान सर्द रातें
जब मेरे दिल को
बर्फ सा जमाने लगती है
तेरी यांदों के गर्म लिहाफ
खुद पर ढाँप लेता हूँ
ठिठुरते भाव जब मेरे
न हिम-खण्ड हो जाए
सुरीले गीत तेरे
मैं खुद ही
गुनागुना लेता हूँ
तुम हो कही और मैं कहीं
इस की न है परवाह
ढली है रात जब भी
गगन की घुप्प स्याही में
सितारे लाख होते हैं
उभरते हो उन्हीं में से
तुम्हें चुन करके
मन की पीर
मैं खुद ही
सुना लेता हूँ
टूटती वैसाखियों के जोर पर
रेंगता मानव यहाँ पंकिल डगर
आस के पंछी बिछड़ते नीड़ से
शेष अपने भाग्य में छूटा समर
साथ दे कर दो कदम बोझिल हुए
आज साथी वे सयाने हो गए।।
जो खड़े हैं आज नेपथ्य में विद्रूप से
जो डुबोते रोशनी को भी तिमिर में
क्या बुझेगी प्यास शोणित की लहू से
प्रीत की सरिता बहेगी क्या समर में ?
लिखते लिखते.......
......
.......
👉👉👇
तुम कितने निष्ठुर हो।
कितने काँटों की फाँस चुभी बैठी पग में
कितने धूल भरे है इस मैले से दामन में
मेरे जीवन की झगुली में पैबन्द सिले कितने
मुझे देख क्यों फेर लिये ये दृग मुझसे तुमने
सचमुच तुम कितने निष्ठुर हो।
.........
टूटती वैसाखियों के जोर पर
रेंगता मानव यहाँ पंकिल डगर
आस के पंछी बिछड़ते नीड़ से
शेष अपने भाग्य में छूटा समर
साथ दे कर दो कदम बोझिल हुए
आज साथी वे सयाने हो गए।।
जो खड़े हैं आज नेपथ्य में विद्रूप से
जो डुबोते रोशनी को भी तिमिर में
क्या बुझेगी प्यास शोणित की लहू से
प्रीत की सरिता बहेगी क्या समर में ?
साथ दे कर दो कदम बोझिल हुए
आज साथी वे सयाने हो गए।।
निवेदक
रामनारायण सोनी
🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄
हो रही हिंगुल प्रभाती सर्जनाएँ
रोलियाँ छितरी छटा छबि छैल सी
काटती जो उर बसी सब वर्जनाएँ
हो सके तो रश्मियों को अतिमान देना।।
वो जगह तलाश करता हूँ अर्से से
गुजरे वक्त के लमहात जहाँ ठहरे हों
वो दरिया तलाश करता हूँ अर्से से
धारों के कहीं बाकी जहाँ कतरे हों
देती है गवाही ये हसीन वादियाँ जैसे
अभी हाल में तुम ही यहाँ से गुुजरे हों
नजरें हजारों घूरती रहती मुझे दर रोज
ढूँढता हूँ उनमें से जो तुम्हारी नजरें हों
ढूँढता ही रहा मुझे तुझमें एक अर्से से
वो कोई बहाना मुलाकात का तो मिले
अंजाम खोज का कोई न था जब लौटा
मेरे दिल में ढूँढा तो तुम्हीं बाबस्ता मिले
जो लम्हा साथ है उसे जी भर के जी लेना
खिली हो चाँदनी उसे जी भर के पी लेना
भुला कर दर्द के किस्से, अंधेरी रात के साए
मिले खुशियाँ जहाँ से भी, उन्हें जी भर के जी लेना।।
,
तुम अभिव्यक्त हुए उतने
जितनी मुखरित धानी है
रोक सका है कौन गंध को
पुष्पों की नादानी है
खोल किवारे अपने दिल के
और सँवारो मन के मनके
कवि तुम शक्ति लिए बैठे अन्तर में
शव भी बोल पड़े जब सुनके
कवि जब उठ जागेगा
पाषाण पिघल जावेगा
हुंकार सुनेगा यदि लोहा भी
खुद शोणित बन जावेगा
अपने भीतर के कवि को
तुम सदा जगाए रखना
निकल पड़े हो योगी हो कर
नित अलख जगाए रखना
स्वप्न से शब्द तक
शब्द से अर्थ तक,
फर्श से अर्श तक
अपूर्ण-पूर्ण तुम हुई।
चलो दिगंत घूम लें
प्रखर प्रभात चूम लें,
विराट विश्व की प्रभा
धरा हुई कनक मई।।
चुकी विभावरी तमी
भरा है घट अमी-अमी
प्रपात झर-झरा रहे
हुए वितान चम्पई।।
रोलियाँ बरस रही
भिंगो रही हृदय-जमीं
न मैं रहा अपूर्ण और
अपूर्ण-पूर्ण तुम हुई।।
रामनारायण सोनी
आज पुरवा दस दिशाओं से चली है
आज मेंहदी ही स्वयं दिल में घुली है
इस तमस में रोशनी बारात बन कर
चमचमा दी इस नगर की हर गली है।
विगत हुआ है तम, जीवन में
नवप्रभात का आज उदय है।।
साधना की सिद्धि में तप ली अपर्णा
शंभु के आशीष पाने का समय है
घुल गई तम की सुनामी लालिमा में
नीरजा उठ प्राच्य में रवि का उदय है।
विगत हुआ है तम, जीवन में
नवप्रभात का आज उदय है।।
कुन्द सी थी इस शिरा में प्रीत पिघली
बज उठी शहनाइयाँ मन की गली
बोल दो प्रतिहारियों को हों सजग
आज डोली जाएगी प्रीतम - नगर।
विगत हुआ है तम, जीवन में
नवप्रभात का आज उदय है।।
.धरा के वास्ते एक पल कभी भी जी नही पाया ।
सरल पीता रहा हरदम गरल में पी नही पाया ।
निशानी वक्ष पर मेरे सदा देते रहे तुम सब
तुम्हारे घाव के उपहार को मै सी नही पाया ।
कभी होगी रजत सी चाँदनी नभ में
कभी होगी निविड़ तम से भरी रातें
मैं बन कर दीप अपनी रोशनी लेकर
खड़ा हूँ राह में तेरी सहूँगा घोर संघातें
इन आँखों की दहलीज पर अभी आँसू ठहरे हैं
पलकों के किनारों पे काजल के सख्त पहरे हैं
रिसते रहे इस रात में पुरजोर दिल के अंदर से
एक सागर है बसा सीने में इनसे ही तो उभरे हैं
आँसू नहीं समझना ये दर्द उसी रुह का बोलता है
बैठा था दिल के गहरे में खुद को छिपा तहों में कहीं
बहने न दूँगा इनको अभी पलकों की कोर से
मीठे से तेरे इस दिल को करदे ये खारा न कहीं
रामनारायण सोनी
जिस उपवन को छोड़ गए तुम माली हाथो ,
उसका अब दायित्व निभाना धर्म है मेरा "
[06/05, 9:49 a.m.] रामनारायण सोनी:
वो जगह तलाश करता हूँ अर्से से
गुजरे वक्त के लमहात जहाँ ठहरे हों
वो दरिया तलाश करता हूँ अर्से से
धारों के कहीं बाकी जहाँ कतरे हों
देती है गवाही ये हसीन वादियाँ जैसे
अभी हाल में तुम ही यहाँ से गुुजरे हों
नजरें हजारों घूरती रहती मुझे दर रोज
ढूँढता हूँ उनमें से जो तुम्हारी नजरें हों
ढूँढता ही रहा मुझे तुझमें एक अर्से से
वो कोई बहाना मुलाकात का तो मिले
अंजाम खोज का कोई न था जब लौटा
मेरे दिल में ढूँढा तो तुम्हीं बाबस्ता मिले
जो लम्हा साथ है उसे जी भर के जी लेना
खिली हो चाँदनी उसे जी भर के पी लेना
भुला कर दर्द के किस्से, अंधेरी रात के साए
मिले खुशियाँ जहाँ से भी, उन्हें जी भर के जी लेना।।
प्रश्न हलाहल का ही नही था
मैं तो हँस कर उसको पी गई।
पर तुमको अचरज होता है
क्यों मैं फिर भी जी गई।।
पर नीली छतरी वाले में
मेरा भी विश्वास अटल है।
फिर हर प्याला ही प्रसाद है
अमिय भरा है या कि गरल है।।
तुमने कालकूट को पूजा
मैं तो प्रभु की चरण शरण हूँ।
तुमने गरल बीज बोए हैं
मैं उस प्रभु की प्रीति-वरण हूँ।।
तुम अभिव्यक्त हुए उतने
जितनी मुखरित धानी है
रोक सका है कौन गंध को
पुष्पों की नादानी है
खोल किवारे अपने दिल के
और सँवारो मन के मनके
कवि तुम शक्ति लिए बैठे अन्तर में
शव भी बोल पड़े जब सुनके
कवि जब उठ जागेगा
पाषाण पिघल जावेगा
हुंकार सुनेगा यदि लोहा भी
खुद शोणित बन जावेगा
अपने भीतर के कवि को
तुम सदा जगाए रखना
🚣♀ याद का मस्तूल 🚻
तुम्हारी याद का मस्तूल मुझे फिर ले चला मझधार
चलूँ क्यों सुधि सम्हाले मैं माँझी फेंक दो पतवार
साहिल पर अभी भी चौकसी में तनी संगीन क्यूँ हैं
घिरे है सब तरफ तूफां ये फिर भी हौंसले क्यूँ हैं।
इन हाथों की लकीरों में तुम्हें हर रोज देखा है
उमड़ते बादलो पर भी तेरा ही अक्स देखा है
ठहरी साँस है फिर भी धड़कता दिल मेरा क्यूँ है
पलक मुँदती रही फिर सामने चेहरा तेरा क्यूँ है।
सिफर से इस सफर में ही तेरा विश्वास फलता है
सुआओं में तेरा साया सदा ही साथ चलता है
अकेला हूँ बियाबां में पर लगता साथ ही तू है
लगे मस्तूल यादों के सफर भर साथ ही तू है।