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Friday, 15 December 2017

डायरी

जीवन की डायरी के वे सफ़े
आज जी भर कर देखे
सौंधियाई भीनी महक
पुराने पड़ गए कागज सी
चहक उठी तरुणाई है

कलम वो भी थी
कलम ये भी है
वहाँ रंग थे
अब सियाही
वहाँ पेड़ पौधे
और फूल पत्तियाँ

यहाँ छन्द, बन्द,
गज़ल अौर रुबाई
ढल गई शब्दों में
छन छनती पैंजनियाँ
गल बहियाँ फैलाई
मन के आँगन में
एक गई बासंती बयार,
लौट आई है
चहक उठी तरुणाई है
रामनारायण सोनी

Thursday, 14 December 2017

सिद्ध मौन


मौन कितने मौन हो तुम
पर सजगता है तुम्हारी
शोर के भीषण प्रहर में
गहनता तुममें है भारी

मौन तो एक साधना है
यह ईश की आराधना है
साध्य का अनुसंधान है
और सिद्धि का सोपान है

स्वयं का जब द्वार खोले
व्यष्टि तब साकार होवे
शांति का वह महासागर
त्वरा मन की क्षीण होवे

मौन भारी शोर पर है
जब पलटता है स्वयं में
बाँसुरी सुनता मधुर यह
प्रलय के भी उस समय में
रामनारायण सोनी

Thursday, 7 December 2017

क्षणिका

कभी कभी प्रस्तर तोड़ कर 
पीड़ा प्रकट हो जाती है
रोकते तो वृणों का जन्म हो जाता
इसमें विकल एक आँच है
पर गहरी एक साँच है

Sunday, 3 December 2017

नई किताब हूँ

पुरानी सी जिल्द में मढ़ी  एक नई किताब हूँ मैं
उम्मीद के तारों भरे आसमाँ में  एक महताब हूँ मैं
दो कदम चल सकूँ संग संग हमकदम हो कर मैं
पोशीदा, शोख, सतरंगी ऐसा ही एक ख्वाब हूँ मैं ।।

फिर नई होगी सुबह

 फिर नई होगी सुबह

फिर नई होगी सुबह
फिर नए प्रतिमान होंगे
फिर नए दिनमान होंगे
फिर उड़ानों के परों में
नित नए आसमान होंगे

शेष है बस दिवस तीन
फिर नई होगी सुबह
जो गया इतिहास अपना
कर्म का अभिलेख ले कर
अब खड़ा है आज अपना
हृदय का उल्लास ले कर

फिर नई होगी सुबह
माँ लिये आशीष के वर
अनवरत आधार बनती
यों लगे दिन रात अपनी
श्वास में बन प्राण बसती

फिर नई होगी सुबह
प्रार्थना के मूल में माँ
एक ही अवधारणा है
जिन्दगी आयाम जितने
सृजन करती प्रेरणा है


जाग उठ हुँकार भर

जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

फिर नए प्रतिमान होंगे
फिर नए दिनमान होंगे
फिर उड़ानों के परों में
नित नए आसमान होंगे।।

जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

जो गया इतिहास अपना
कर्म का अभिलेख ले कर
अब खड़ा है आज अपना
हृदय का उल्लास ले कर।।

जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

ईश का आशीष है जब
अनवरत आधार बनता
यों लगे दिन रात अपनी
श्वास में बन प्राण चलता।।

जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

प्रार्थना का मूल प्रभु की
एक ही अवधारणा है
जिन्दगी आयाम जितने
सृजन करती प्रेरणा है।।

जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

Monday, 27 November 2017

शब्द - धरा


शब्द जो जिन्दगी भर
साथ चलते है, जीते हैं
हाँ,  वे कभी मरते नहीं हैं
कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो आसमान को
मुट्ठी मे भर लेते हैं

कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो भावों का सागर
चुल्लू में समेट लेते हैं
कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो मेरे भीतर से चल कर
तेरे भीतर जाते हैं

कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो अन्धेरों को चीर कर
बुझे मन के दीप जला जाते हैं
कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो यादों के अंबार में से
खुद को, तुमको ढूँढ लाते है

कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो सूखे हृदय में से भी
करुणा, प्रेम, रस बहाते हैं
कुछ शब्द ऐसे होते हैं
वे न कहीं जाते है न आते हैं
मुझी में घर बना लेते हैं

कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जब जब गिरता हूँ तो
प्यार से उठाते हैं
कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो हौले से आते हैं
डूबते दिल को थपकी दे जाते है

जैसे मैं, तू, तुम, हम, अपन
प्यार, करुणा, दुलार,
ये ऐसे ही कुछ शब्द होते हैं

और...
कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जो जिन्दगी में तो रहते ही हैं
जिन्दगी के बाद भी रह जाते हैं

शब्द सिर्फ अक्षरों का मेल नहीं
भावों की रेल है
शब्द सिर्फ घावों की पीड़ा ही नहीं
मरहम की जेल है
शब्द सिर्फ ज्ञान का आधार नही
जीवन का खेल है
शब्द सिर्फ द्वन्द्व ही नहीं
सुकून का मेल है

अर्थों के, भावों के
इस पार, उस पार
जतन से कहीं धर लें
समय के पंछी के
चुगने से पहले

Tuesday, 21 November 2017

हाइकू

हाइकू

नवल नूपुर
स्वरित रुनझुन
भाल भूषित

कुटिल कुंतल
नील नीरज
ललित लोचन

रुचिर रंजित
कोर काजल
धरित धनुही

शर शुशोभित
लक्ष लक्षित
भौंह श्यामल

अधर अरुण
रसित रसना
स्वर सुधामय

मुखर परिमल
रक्त रंजित
अलस आनन

चिबुक चुंबित
चारु चंचल
कनक कुण्डल

कलश कंठी
भार भूधर
उर सुकोमल

भ्रमित भ्रमर
वलय वेणी
मलय मंडित

अनिल अविरल
मुखर मंथर
मन मनोरम

भाव भावित
सिक्त नेहिल
रामनारायण सोनी

Monday, 20 November 2017

जीवन बहता पानी

*जीवन बहता पानी*

जीवन की सरिता
सरिता के तटबन्ध
तटबन्धों पर सटे सुहाने घाट

घाट साक्षी है -
जीवन प्रवाह के
साक्षी है धार के,
गुजरते पानी के,
चढ़ते उफान के,
झरते प्रपात के,
और जल की शीतलता के,
निर्मलता के, सरलता के
झरोखे इतिहास के

तट हैं जन्म अौर मृत्यु
जीवन है सरिता
तटों के पार देखना,
प्रवाह के उद्गम को समझना,
बहने की ऊर्जा का परम स्रोत,
गन्तव्य (सागर) का प्रबोध

जल का पुनः पुनः लौटना
फिर फिर बहना
प्रतिक्षण बदलती है सरिता
कहने को कहते हैं
'सरिता बहती है'
नहीं, बहता पानी है

जीवन नहीं
समय के पल बहते हैं
उद्गम से पर्यवसान तक
नित्य, निरन्तर, अविरल
कल - कल छल - छल
बहने की चेतना
वह कभी नहीं मरती
बहते पलों के साक्षी ये तट
काल के माइल स्टोन हैं
गवाक्ष हैं

हमने आमने सामने के तटों को देखा
बाएँ से दायें बहते प्रवाह को,
उद्गम और पर्यवसान को,
जल के क्लोज साइकल को
न देख पाए
तो हम अधूरे है

जल का मैं कण हूँ,
यहाँ भी वहाँ भी
मैंने तट देखे, तट बन्ध देखे
श्वासों के अनुबन्ध देखे
उतार देखे, चढ़ाव देखे
मेरी खोज सागर है
बहता हूँ उस ओर
कहीं प्रपात हूँ
कहीं धार हूँ
पर मैं जल का कण हूँ
यहाँ भी वहाँ भी कहीं भी

Thursday, 9 November 2017

धरा गगन

   - धरा गगन -



शाम है धुआँ धुआँ गगन पहन के गेरूआँ

चला धरा की गोद में है कँप रहा रुआँ रुआँ।
चाँद तारे टँक गये लो शामियाने सज गये
धरा गगन सुहाग भर कुछ इस तरह सिमट गए।।



मिट गए है फासले ठहर गए हैं काफिले

वे हार के सिंगार के सिलसिलों पे सिलसिले
हैं ढोलके ढमक उठे समीर से पलास के
माँग भरती किंशुकी गीत सुन हुलास के



झिंगूर झूम गा उठे प्रपात झरझरा उठे

किलोल कर रहा मदन सरित स्वरों की ताल पर।
मराल माल धर धरा विराग छोड़ती मही
बिछे हुए जमी जमी माधवी, कुमुद, जुही।।



अभी विहान दूर है पात सरसरा रहे

विहाग राग भैरवी है बंदि वृन्द गा रहे
चकोर चन्द्र चाँदनी मनोज मान मर्दिनी
प्रणय प्रखर प्रमोद है धरा गगन सुहाग भर...
...कुछ इस तरह सिमट गए।।

Friday, 13 October 2017

दीपोत्सवी

अंगुलियों सी दीपशिखा जब
महातिमिर में तैरेगी
किरण किरण हो प्लावित नभ में
संकुल बन फैलेंगी।
आज विजय का शंख बजेगा उन
अंधियारी गलियों में
हार थके बैठे जन गण मन में
अब आशाएँ फैलेंगी।।

माटी के तन त्याग धरा है स्वेद
कणों से दीप भरा है
श्रम के बीज निचोड़े जिसने वो
कुटिया भी महकेगी।
खेतों सिरजी बनी धान पद्म दल
महालक्ष्मी विहरेगी
किरण किरण हो प्लावित नभ के
संकुल बन फैलेंगी।।

चलो सजाएँ चौक पुराएँ मन से
मन का दीप जलाएँ
थाल सजाँए सब ललनाएँ
फुल बगिया महकेगी।
खील बताशे घेवर धानी नयन
भरी हो प्रेम कहानी
किरण किरण हो प्लावित नभ के
संकुल बन फैलेंगी।।


Wednesday, 4 October 2017

तुम ही तो हो

नज़्म
*तुम ही तो हो*
ढूँढने निकला था जिसे सेहरा में
खिली थी गुलशन हो कर
सुनहरी रोशनी बन
ढलती हुई उस शाम 
बादलों के बदन पे
फिर उतरी जो जहन में 
समझ नहीं पाया मैं
कि वो तुम ही हो।।

जमीं की नर्म रेशमी सिलवटें
गुदगुदाती पगथली मेरी
ओढ़े पड़ी दरख्तों के साये
तपती रहीं जो दिन भर
सहलाती रही पोर पोर
समझ नहीं पाया मैं
कि वो तुम ही हो।।

धुँधलके गहरा गए 
तबदील हुए घुप्प चादर में
ओढ़ कर जिन्हें
रात भर बैठा रहा 
पूरे इतमिनान से
मिटा दी तन बदन की
थकन की पीर को
मैं समझ नहीं पाया
कि वो तुम  ही तो हो।।


Tuesday, 12 September 2017

कुछ कहो ना

आओ.लिख डालें कुछ ऐसा
  स्याही सूखने के पहले
बाँट लें कुछ पल ऐसे
  हाथ के थमने से पहले।।

अभी है गुल भी गुलशन भी
  अंजुरी भर सुरभि पी लें
जला लें दीप नेहिले से
  तमी छाने के कुछ पहले।।

Saturday, 9 September 2017

बैसाखियाँ


शूल बन कर फूल भी चुभते रहे
अर्थ बिन जो शब्द थे मथते रहे
रश्मियाँ बन उर्मियाँ दलती रही
वे कनक घट विष भरे झरते रहे।।

इन कुहासों में घिरी अतिरंजनाएँ
है सिमटता मुट्ठियों में आसमां भी
हम बिखरते स्वप्न के अंबार में
चाहतों की ही किरच चुनते रहे।।

जिन्दगी बैसाखियों पर चल रही
चू गई संकल्पनाएँ क्षार बन कर
कोंपलें अर्पित हुई पतझार को
हम पिपासा ही लिये चलते रहे।।

Thursday, 7 September 2017

Dictionary

मैं हर रोज सोचता रहता हूँ...

The whole dictionary is a set of 26 letters and a few symbols but by arranging them it becomes a big volume.

A volume of set of expression, emotion, regulation , creations and, of course, emergency life events.

Even if, 25 letters can't complete a bible.

If you withdraw a single letter from your motivational and emotional  thoughts,
my work will be no where.

इसलिए तो

मेरी कृतियों से तुम निकल गए
तो उन २५-२६ अक्षरों को कौन पढ़ेगा।
तुम्हें अपने आपको देखना हो
तो मेरी रचनाओं में घूम कर चले जाना
यहाँ तुम ही तुम हो

Ramnarayan Soni.

आराधन

है आज शक्ति का आराधन
अपने शुभ संकल्प सबल होवें
ऊर्जा के कण कण मन मे
जीवन में सत्य प्रबल होवे
रोलियाँ छितरी छटा छबि छैल सी
काटती जो उर बसी सब वर्जनाएँ
हो सके तो रश्मियों को अतिमान देना।।

यह समय की रेख है
काल मेघ घिर चले
पवि-प्रहार साक्ष्य हैं
दर्पणों के टूटने से पहले
स्वयं को निहार लो।
प्रचण्ड वेग वायु है
इस धरा की धूम से
अस्मिता सँवार लो।।


Thursday, 27 July 2017

सम्मान

सम्मान व्यक्ति का नहीं
विभूति का है, कृतित्व का है,
आराधन का है, आह्वान का है 
सिद्धि का है, साधना का है
धर्म का है, धृति का है

श्रम का है, समर्पण का है
मील के उन पत्थरों का है
जो पुरुषार्थ के फूटप्रिन्ट है
उन उपादानों, उद्यानों का है
जो जगत को सुगन्धित करते है

याद रहे! साधना अनन्त है
अतीत एक सुन्दर दर्पण है,
पर दर्प तुम्हें न हो जाए
भगीरथ कहीं ठहर न जाए
खुद अवतर की गई गंगा
उसे बहा न ले जाए

मंथन में पहले हलाहल है,
श्री के उपरान्त ही अमृत है
डर न जाएँ, बिखर न जाए
कहीं यह बात बिसर न जाए
रामनारायण सोनी

Wednesday, 28 June 2017

शमा

प्रज्वलन

पावस रिझाने आ गई

नृत्य करता पवन पागल, ताल पीपल पात भरते
श्रृंग शिखरों पर नशीले मेघ अपना तन सिरजते
प्रेमियों की उर-धरा पर प्रीत बन कर छा रही है
आज पावस मन मयूरों को रिझाने आ गई है।

भींग लें समवेत हो हम मेघना मल्हार गाती
रेशमी फर सी फुहारें झिरमिराते सुर जगाती
खोल लें हर गाँठ मन की रुत छबीली आ रही है
आज पावस मन मयूरों को रिझाने आ गई है।

कूक बनती हूक सी पिउ प्रीत की पाती बना है
मेघना की मांग भर दूँ, मेघ की रुचि-एषणा है
चंचला ले दुति-पताका लरजती लहरा रही है
आज पावस मन मयूरों को रिझाने आ गई है।

चढ़ हिंडोले श्रावणी के युगल झूलें आम्रवन में
गा उठे आल्हा कहीं कजरी कहीं बिरहा यमन में
सौंधियाती हरित वसना यह धरा इतरा रही है
आज पावस मन मयूरों को रिझाने आ गई है।

बूँद उलझे कुंतलों में माल-वेणी से गुँथे हैं
टिप-टिपाते हैं पनाले रागिनी के सुर बंधे हैं
यह मदिर वर्षा प्रणय की सेज बनती जा रही है
आज पावस मन मयूरों को रिझाने आ गई है।
रामनारायण सोनी

Monday, 26 June 2017

दीपा

संघर्ष सारा दीप का तम से नही खुद से हुआ
ढूँढता है संग किसका क्षुब्द क्यों सब से हुआ
यह व्यथा व्यतिरेक की अभिव्यंजना है
कर्म पथ है किरण पथ ही क्यों कहें उद्वेलना है

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Wednesday, 21 June 2017

पंख लगे पल

पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर 
बहुत सा छीन ले जाते पल
भर जाते गागर
पर खुद रीत जाते पल
नियति का चिराग,
जलता है अंधेरों में
जले नहीं अगर तो
खुद अंधेरे में खो जाएगा
जलता रहा तो कभी उन्हें
कभी खुद को दिख जाएगा
कभी नयन लजाते
कभी अकुलाते पल
सिमटते चले गए लकीर में
लकीर का नाम हो कोई भी
"लकीर" हृदय पर खींच गए पल
देखता हूँ कभी इस लकीर को,
कभी अपने ही अतिरेक को
पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर 
बहुत सा छीन ले जाते पल
आशाएँ, निराशाएँ, हताशाएँ
तैरती झील में, कश्ती में
न मल्लाह न मस्तूल
डूबती, उतराती, गहराती
पूछती तारों से स्याह रात में
कहीं देखा है तुमने
उनको, उनकी गति रेख को
दिशाएँ, फिजाएँ, हवाएँ
चिर मौन हैं, स्तब्ध है
जाने कौन से अनुबन्ध हैं
पल पल, आते जाते पल
थोड़ा सा दे कर 
बहुत सा छीन ले जाते पल
रामनारायण सोनी

Monday, 19 June 2017

मैं जला हूँ दीप बन कर

   *मैं जला हूँ दीप बन कर*
मैं तमिस्रा में जला हूँ दीप बन कर
तैल की इक बूँद भी ना शेष होगी।
गंध बुझती बातियों की जब लगे
प्रिय तुम्हारी प्रीत ही अवशेष होगी।।

अंक में ज्वाला समेटे उम्र भर से
जो तिरोहित हो रही नित रश्मियाँ।
पन्थ में तेरे बिछी है आस बन कर
प्रस्तरों के भार सहती संधियाँ।।

सांझ से ही चिर प्रतीक्षा जागती है
हर निशा ही व्यंजना लेकर खड़ी है।
भोर तक है साध में यह लौ अकंपित
भग्न अधरों पर पिपासा हर घड़ी है।।

प्राण में हर पल निरे निःश्वास ही है
जिन्दगी कण-कण तिमिर में घुल रही।
बंधनाएँ वर्जना बस प्राण की है
थाम कर इन धड़कनों को चल रहीं।।

Sunday, 18 June 2017

कविता ने जगा दिया

बड़े सवेरे आज मेरी कविता ने मुझे जगा दिया
तंद्रा टूट न पाई थी कुछ कानों में बुदबुदा दिया
रोज मुझे तुम ले जाते हो अपनी टर्र सुनाते हो
चाहो बस वह कहती हूँ मैं आज तुम्हें ले जाऊँगी
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।

तुमने अम्बर पट पर ऊषा का अरुणिम देखा है
पंछी के कलरव सुने अभी यह मंगल तुमने देखा है
तपती धरती पर नंगे पग जीवन के रिसते वे छाले
ढली सांझ भूखे लौटे उन बच्चों से मिलवाउँगी।
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।

तुम रहे डोलते मस्ती में मस्तों की अल्हड़ टोली में
रसवन्ती रसना में डूबे रसिकों की रसमय बोली में
उन सूखे कंठों, अधरों में करती नृत्य पिपासा में
बच्चों बूढ़ों की आशा के मरघट तुम्हें दिखाऊँगी।
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।

घोड़ों संग दौड़ रही दौलत दाँवों पर दाँव लगे देखे
अंकों की मंडी शाम सुबह वे खुल कर बंद हुए देखे
पर पल पल चूते जीवन की गागर में जहँ दर्द भरे
उन आहों और कराहों का परिचय तुम्हें कराऊंगी
अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।

तुमने छ्त से लटके रोशन फानूस कई देखे होंगे
उनसे रोशन रिश्तों के हमराज कई देखे होंगे
गुमनाम अंधेरी गलियों में वे चीख रहे हैं सन्नाटे
टिम टिम करता मिट्टी का दीपक तुमको दिखलाउँगी।

   अनबूझे अनचीते पल के स्पर्श तुम्हें करवाऊँगी।।

Tuesday, 13 June 2017

आतंकवाद

कौन है जो इन युवाओं में पलीते धर रहा
छीन कर पुरुषार्थ उनमें विप्लवों को बो रहा।
उन जड़ों की ठीक से पहिचान करनी चाहिए
क्यारियाँ केशर की उजड़ी नागफनियाँ धर रहा।।

वक्त है आह्वान का तुम शक्ति का संधान कर लो
अब कसो तूणीर उनमें रण विजय के तीर धर लो।
है धरा के ऋण चुकाने का समय अभिनव खड़ा
धार में अपने परशु को तीक्ष्ण करके आग भर लो।।

जो उठी है विष भरी संभावनाएँ अरिदलों में
शांति के उड़ते कपोतों को लहू से रंग रहे।
नष्ट कर दो ताकतों को जो अनर्गल हो रही
वे नहीं मानव जगत में हिंस्र कितने हो रहे।।

Friday, 9 June 2017

बंधना

मैं हूँ प्यारी सोन चिरैया
धरती के आँगन मैं खेली
बचपन मेरा विभव भरा
यौवन की दहलीज रुपहली

बंधी व्याध की पाश प्रबल मेरी आशाएँ
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

मैं थी अपना एक गगन था
उम्मीदों में संग पवन था
मेरा मन अपने ही जग में
अपने ही उल्लास मगन था

काल निशा बन जीवन में गहराए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

तिनका तिनका चुन कर मैंने
नन्हा सा था नीड़ बनाया
नीचे बगिया महक रही थी
चंचरीक था संग संग गाया

दावानल मुट्ठी में भर भर क्यों लाए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

जुड़ कर टूटी, जुड़ी टूट कर
भीषण संघर्षों की वीथी में
पैर जमाए खड़ी रही हूँ
झंझा के अंधे कलरव में

जीवन-सागर में क्यों सुनामी लाए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

पंख बँधे हैं फिर भी मेरे
हाथों में पुरुषार्थ भरा है
मेरी चिचियाहट में अब भी
शब्दों का एक कोष भरा है

संकल्पों के कल्प मेरे गिनने आए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

जिस पल बन्द खुलेंगे मेरे
फिर से होगा गगन मेरा
उफनेगा उल्लास सिंधु का
नाचेगा मन मोद भरा

अपने कर्म बीज मुझे गिनाने आए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

आज उषा में नवप्रभात है
खण्ड खण्ड वे दम्भ पड़े हैं
पगडण्डी के पथ वे सारे
राजपथों से आज जुड़े हैं

देख उन्हें ही शायद इतने चुँधियाए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

संग तुम्हारा,

कलाम भले ही हमारा हो
पर कमाल तो तुम्हारा है
कलम भले ही हमारी है
इसमें शबाब तो तुम्हारा है

दीप-बाती भले ही हमारी हो
रोशनी इसमें कहाँ हमारी है
ह्रदय हमारा भले ही हो पर
इसमें धड़कने सब तुम्हारी हैं

कभी कभी यह सोचता हूँ
मैं तो निकला था फकीरी में
न शब्द थे, न भाव, झोली में

अब लगता है मैं हूँ अमीरों में
पता नहीं चलता कि कब तुम
रोज खीसे में कुछ डाल देते हो
अपनी जेब में सिक्के आपके ही हैं

रामनारायण सोनी

र्मै फिर भी जी गई


प्रश्न हलाहल का ही नही था
मैं तो हँस कर उसको पी गई।
पर तुमको अचरज होता है
क्यों मैं फिर भी जी गई।।

पर नीली छतरी वाले में
मेरा भी विश्वास अटल है।
फिर हर प्याला ही प्रसाद है
अमिय भरा है या कि गरल है।।

तुमने कालकूट को पूजा
मैं तो प्रभु की चरण शरण हूँ।
तुमने गरल बीज बोए हैं
मैं उस प्रभु की प्रीति-वरण हूँ।।



Sunday, 4 June 2017

क्रन्दन ही क्रन्दन था





माथे की हर एक सिलवट में
पीड़ा के अम्बार भरे हैं
इनमें जो इतिहास लिखे वे
कालिख के प्रतिमान धरे हैं


धुँधियाती बुझती आखें हैं
इनमें अगणित प्रश्न भरे हैं
खामोशी कितनी है फिर भी
सागर जैसे शोर धरे हैं


गहराती जीवन संध्या में
बाकी बस क्रन्दन ही क्रन्दन
तन से बोझिल अब हैं साँसे
छालों से यह विगलित है मन


उठे याचना के हाथों में
मृत्यु माँगती है या जीवन
टूट गई अब वे आशाएँ
पीड़ा में जलता है तन- मन

Tuesday, 30 May 2017

मेरे गीत कहीं मर न जाए

मेरे गीतों से निकल गए यदि तुम
विराट शून्य होगा मेरे समक्ष
वह अनन्त और निस्सीम है
देख नहीं पोवेंगे उसे नेत्र मेरे

बिखर जाएगा हृदय का स्पन्दन
सुन्दर साज सभी होंगे
पर बिना स्वर के मृत होंगे
शिल्प में सौंदर्य तो होगा अप्रतिम
पाषाण भर होंगे सभी
यदि भीतर तुम न हुए तो
तुम वहाँ मिलोगे कैसे

न शून्य दिखता है,
न पाषाण पसीजता है
न साज गाते हैं
हृदय में तो धड़कनों में
तुम धड़कते हो
मेरे गीत मर न जाए कहीं
बिन तुम्हारे ये बिचारे
ये तुम्हें गाते, नृत्य करते
हथेलियों पर फुदकते
बोलते हैं तुम्हारी इबारतें
ढलते हैं तुम्हारे साँचों में

यदि भीतर तुम न हुए तो
तुम वहाँ मिलोगे कैसे
मैं अक्सर तुम्हें ढूँढ ही लेता हूँ
इनमें, इनकी आत्मा तुम ही हो

तेरा लौट आना लाजमी है

घिर चले रंजो-गम के साए
कहीं पूरा न निगल जाए मुझे
तेरी यादों के शोख परिन्दे
खो न जाए ये कहीं अम्बर में
बादलों से झाँकती रुपहली
रोशनी भी न गुम जाए कहीं
इससे पहले कि मैं बिखर जाऊँ
तेरा लौट आना लाजमी है

मेरी इस नज्म की नब्ज
बड़ी मुश्किल से चल पाई है
लाल तपते हुए सेहरा में
बडी मुश्किल से बहार उतरी है
वादियाँ में है मेले खुशबुओं के
बगीचों को न लग जाए कहीं नजर
इससे पहले कि मैं बिखर जाऊँ
तेरा लौट आना लाजमी है

रात भर देते रहे दस्तक
अनजान हवा के झोंके
सहमा सहमा सा, कुछ डरा डरा सा है
दिल का क्या हाल मैं कहूँ तुझसे
कँपकंपाता दिया ये प्रेम का है
कहीं चुक जाए न तैल और बाती
इससे पहले कि मैं बिखर जाऊँ
तेरा लौट आना लाजमी है

मेरे गीतों में तेरी आवाज

तू मेरे गीतों को, मैं तेरी आवाज लिए फिरता हूँ
बिन जुड़े बिन कहे न ये खो जाएँ अँधेरों में
न मिले संग अगर नाव और माँझी का

मिल गई मुझको दुआएँ जी भर के
सौ बरस जिन्दगी को जीने की
पर बरस है हमारा ये कुछ दिन का
जिनको धागों में जमा रक्खा था
मनके टूट कर कुछ तो गिरे बालू में
ढूँढता उनको गर रहा होता मैं
गाँठ के पल भी और खोना था
भींच कर बैठा हूँ कुछ पल मुट्ठी में
जिन्दगी फूटी घड़े सी न चू जाए कहीं

त्रिवेणी तो संगम है तीन नदियों का
देखते हैं गंगा जमना को तो सभी
सरस्वती को गुनिजन ही देखते हैं

इन आँखों की दहलीज पर अभी आँसू ठहरे हैं
पलकों के किनारों पे काजल के सख्त पहरे हैं
रिसते रहे इस रात में पुरजोर दिल के अंदर से
एक सागर है बसा सीने में इनसे ही तो उभरे हैं

अहसास तुम्हारे होने का

सुनसान सर्द रातें
जब मेरे दिल को
बर्फ सा जमाने लगती है
तेरी यांदों के गर्म लिहाफ
खुद पर ढाँप लेता हूँ

ठिठुरते भाव जब मेरे
न हिम-खण्ड हो जाए
सुरीले गीत तेरे
मैं खुद ही
गुनागुना लेता हूँ

तुम हो कही और मैं कहीं
इस की न है परवाह
ढली है रात जब भी
गगन की घुप्प स्याही में
सितारे लाख होते हैं
उभरते हो उन्हीं में से

तुम्हें चुन करके
मन की पीर
मैं खुद ही
सुना लेता हूँ

जारी है


टूटती वैसाखियों के जोर पर
रेंगता मानव यहाँ पंकिल डगर
आस के पंछी बिछड़ते नीड़ से
शेष अपने भाग्य में छूटा समर
साथ दे कर दो कदम बोझिल हुए
आज साथी वे सयाने हो गए।।

जो खड़े हैं आज नेपथ्य में विद्रूप से
जो डुबोते रोशनी को भी तिमिर में
क्या बुझेगी प्यास शोणित की लहू से
प्रीत की सरिता बहेगी क्या समर में ?


लिखते लिखते.......

लिखते लिखते.......
......
.......
👉👉👇

तुम कितने निष्ठुर हो।

कितने काँटों की फाँस चुभी बैठी पग में
कितने धूल भरे है इस मैले से दामन में
मेरे जीवन की झगुली में पैबन्द सिले कितने
मुझे देख क्यों फेर लिये ये दृग मुझसे तुमने
                सचमुच तुम कितने निष्ठुर हो।
           .........

टूटती वैसाखियों के जोर पर
रेंगता मानव यहाँ पंकिल डगर
आस के पंछी बिछड़ते नीड़ से
शेष अपने भाग्य में छूटा समर
साथ दे कर दो कदम बोझिल हुए
आज साथी वे सयाने हो गए।।

जो खड़े हैं आज नेपथ्य में विद्रूप से
जो डुबोते रोशनी को भी तिमिर में
क्या बुझेगी प्यास शोणित की लहू से
प्रीत की सरिता बहेगी क्या समर में ?
साथ दे कर दो कदम बोझिल हुए
आज साथी वे सयाने हो गए।।

निवेदक
रामनारायण सोनी

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

हो रही हिंगुल प्रभाती सर्जनाएँ
रोलियाँ छितरी छटा छबि छैल सी
काटती जो उर बसी सब वर्जनाएँ
हो सके तो रश्मियों को अतिमान देना।।

तलाश जारी है


वो जगह तलाश करता हूँ अर्से से
गुजरे वक्त के लमहात जहाँ ठहरे हों
वो दरिया तलाश करता हूँ अर्से से
धारों के कहीं बाकी जहाँ कतरे हों

देती है गवाही ये हसीन वादियाँ जैसे
अभी हाल में तुम ही यहाँ से गुुजरे हों
नजरें हजारों घूरती रहती मुझे दर रोज
ढूँढता हूँ उनमें से जो तुम्हारी नजरें हों

ढूँढता ही रहा मुझे तुझमें एक अर्से से
वो कोई बहाना मुलाकात का तो मिले
अंजाम खोज का कोई न था जब लौटा
मेरे दिल में ढूँढा तो तुम्हीं बाबस्ता मिले

जो लम्हा साथ है उसे जी भर के जी लेना
खिली हो चाँदनी उसे जी भर के पी लेना
भुला कर दर्द के किस्से, अंधेरी रात के साए
मिले खुशियाँ जहाँ से भी, उन्हें जी भर के जी लेना।।

,

कवि जब उठ जागेगा


तुम अभिव्यक्त हुए उतने
जितनी मुखरित धानी है
रोक सका है कौन गंध को
पुष्पों की नादानी है

खोल किवारे अपने दिल के
और सँवारो मन के मनके
कवि तुम शक्ति लिए बैठे अन्तर में
शव भी बोल पड़े जब सुनके

कवि जब उठ जागेगा
पाषाण पिघल जावेगा
हुंकार सुनेगा यदि लोहा भी
खुद शोणित बन जावेगा

अपने भीतर के कवि को
तुम सदा जगाए रखना
निकल पड़े हो योगी हो कर
नित अलख जगाए रखना

माँ


माँ
जीवन का पहला छोर तू ही
जीवन की पहली भोर तू ही
संसृति की सृजन विधाता तू
शीतल करुणा की छाया तू
            मेरी अर्चन - पूजन तू।
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
मैं गूँगा था, बोल नहीं थे
रिश्तो के कोई बोध नहीं थे
जग का पूरा शब्द कोष ही
प्रथम तुझी ने मुझे दिया है।।
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
अस्थि चर्म और सारे वय में
तू ही अविरल यूँ बहती है
जैसे नभ के कण-कण में
रंजित पावन पवन रची है।
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
छूट गई तू बचपन में ही
मै छुप छुप अश्रु बहाता हूँ
हर माँ की सूरत में तब से
मैं तुझे ढूँढता ही रहता हूँ
            मेरा अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

तू प्रथम आह, तू प्रथम थाह
तू प्रथम भोर,अभिलाषा तू
संसृति की सृजन विधाता सी
शीतल करुणा की छाया तू
            मेरा अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
छूट गई तू बचपन में ही
मै छुप छुप अश्रु बहाता हूँ
हर माँ की सूरत में तब से
मैं तुझे ढूँढता ही रहता हूँ
            मेरा अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

तू प्रथम आह, तू प्रथम थाह
तू प्रथम भोर,अभिलाषा तू
संसृति की सृजन विधाता सी
शीतल करुणा की छाया तू
            मेरा अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

अपूर्ण पूर्ण तुम हुई


स्वप्न से शब्द तक
शब्द से अर्थ तक,
फर्श से अर्श तक
अपूर्ण-पूर्ण तुम हुई।

चलो दिगंत घूम लें
प्रखर प्रभात चूम लें,
विराट विश्व की प्रभा
धरा हुई कनक मई।।

चुकी विभावरी तमी
भरा है घट अमी-अमी
प्रपात झर-झरा रहे
हुए वितान चम्पई।।

रोलियाँ बरस रही
भिंगो रही हृदय-जमीं
न मैं रहा अपूर्ण और
अपूर्ण-पूर्ण तुम हुई।।

    रामनारायण सोनी

नव प्रभात का आज उदय है

आज पुरवा दस दिशाओं से चली है
आज मेंहदी ही स्वयं दिल में घुली है
इस तमस में रोशनी बारात बन कर
चमचमा दी इस नगर की हर गली है।
        विगत हुआ है तम, जीवन में
        नवप्रभात का आज उदय है।।

साधना की सिद्धि में तप ली अपर्णा
शंभु के आशीष पाने का समय है
घुल गई तम की सुनामी लालिमा में
नीरजा उठ प्राच्य में रवि का उदय है।
        विगत हुआ है तम, जीवन में
        नवप्रभात का आज उदय है।।

कुन्द सी थी इस शिरा में प्रीत पिघली
बज उठी शहनाइयाँ मन की गली
बोल दो प्रतिहारियों को हों सजग
आज डोली जाएगी प्रीतम - नगर।
        विगत हुआ है तम, जीवन में
        नवप्रभात का आज उदय है।।

मुक्तक

.धरा के वास्ते एक पल कभी भी जी नही पाया ।
सरल पीता रहा हरदम गरल में पी नही पाया ।
निशानी वक्ष पर मेरे सदा देते रहे तुम सब
तुम्हारे घाव के उपहार को मै सी नही पाया ।

कभी होगी रजत सी चाँदनी नभ में
कभी होगी निविड़ तम से भरी रातें
मैं बन कर दीप अपनी रोशनी लेकर
खड़ा हूँ राह में तेरी सहूँगा घोर संघातें

इन आँखों की दहलीज पर अभी आँसू ठहरे हैं
पलकों के किनारों पे काजल के सख्त पहरे हैं
रिसते रहे इस रात में पुरजोर दिल के अंदर से
एक सागर है बसा सीने में इनसे ही तो उभरे हैं

आँसू नहीं समझना ये दर्द उसी रुह का बोलता है
बैठा था दिल के गहरे में खुद को छिपा तहों में कहीं
बहने न दूँगा इनको अभी पलकों की कोर से
मीठे से तेरे इस दिल को करदे ये खारा न कहीं

       रामनारायण सोनी

जिस उपवन को छोड़ गए तुम माली हाथो ,
उसका अब दायित्व निभाना धर्म है मेरा "
[06/05, 9:49 a.m.] रामनारायण सोनी:

Monday, 29 May 2017

लम्हा लम्हा


वो जगह तलाश करता हूँ अर्से से
गुजरे वक्त के लमहात जहाँ ठहरे हों
वो दरिया तलाश करता हूँ अर्से से
धारों के कहीं बाकी जहाँ कतरे हों

देती है गवाही ये हसीन वादियाँ जैसे
अभी हाल में तुम ही यहाँ से गुुजरे हों
नजरें हजारों घूरती रहती मुझे दर रोज
ढूँढता हूँ उनमें से जो तुम्हारी नजरें हों

ढूँढता ही रहा मुझे तुझमें एक अर्से से
वो कोई बहाना मुलाकात का तो मिले
अंजाम खोज का कोई न था जब लौटा
मेरे दिल में ढूँढा तो तुम्हीं बाबस्ता मिले

जो लम्हा साथ है उसे जी भर के जी लेना
खिली हो चाँदनी उसे जी भर के पी लेना
भुला कर दर्द के किस्से, अंधेरी रात के साए
मिले खुशियाँ जहाँ से भी, उन्हें जी भर के जी लेना।।

मैं फिर भी जी गई


प्रश्न हलाहल का ही नही था
मैं तो हँस कर उसको पी गई।
पर तुमको अचरज होता है
क्यों मैं फिर भी जी गई।।

पर नीली छतरी वाले में
मेरा भी विश्वास अटल है।
फिर हर प्याला ही प्रसाद है
अमिय भरा है या कि गरल है।।

तुमने कालकूट को पूजा
मैं तो प्रभु की चरण शरण हूँ।
तुमने गरल बीज बोए हैं
मैं उस प्रभु की प्रीति-वरण हूँ।।



कवि जब उठ जागेगा


तुम अभिव्यक्त हुए उतने
जितनी मुखरित धानी है
रोक सका है कौन गंध को
पुष्पों की नादानी है

खोल किवारे अपने दिल के
और सँवारो मन के मनके
कवि तुम शक्ति लिए बैठे अन्तर में
शव भी बोल पड़े जब सुनके

कवि जब उठ जागेगा
पाषाण पिघल जावेगा
हुंकार सुनेगा यदि लोहा भी
खुद शोणित बन जावेगा

अपने भीतर के कवि को
तुम सदा जगाए रखना

Sunday, 21 May 2017

‍♀ याद का मस्तूल

    🚣‍♀ याद का मस्तूल 🚻

तुम्हारी याद का मस्तूल मुझे फिर ले चला मझधार
चलूँ क्यों सुधि सम्हाले मैं  माँझी फेंक दो पतवार
साहिल पर अभी भी चौकसी में तनी संगीन क्यूँ हैं
घिरे है सब तरफ तूफां ये फिर भी हौंसले क्यूँ हैं।

इन हाथों की लकीरों में तुम्हें हर रोज देखा है
उमड़ते बादलो पर भी तेरा ही अक्स देखा है
ठहरी साँस है फिर भी धड़कता दिल मेरा क्यूँ है
पलक मुँदती रही फिर सामने चेहरा तेरा क्यूँ है।

सिफर से इस सफर में ही तेरा विश्वास फलता है
सुआओं में तेरा साया सदा ही साथ चलता है
अकेला हूँ बियाबां में पर लगता साथ ही तू है
लगे मस्तूल यादों के सफर भर साथ ही तू है।

Friday, 19 May 2017

"माँ मेरा अभिनन्दन तू"

"माँ मेरा अभिनन्दन तू"

जीवन का पहला छोर तू ही
जीवन की पहली भोर तू ही
संसृति की सृजन विधाता तू
शीतल करुणा की छाया तू
            मेरी अर्चन - पूजन तू।
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

प्रेम पला था तेरे उर में
तब जब मैं जन्मा ही न था
स्वप्न बुने थे तूने तब ही
तब जब मैं अपना ही न था
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

मैं गूँगा था, बोल नहीं थे
रिश्तों का कोई बोध नहीं था
जग का पूरा शब्द कोष ही
प्रथम तुझी ने दिया मुझे था।।
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

अस्थि चर्म और सारे वय में
तू ही अविरल यूँ बहती है
जैसे नभ के कण-कण में
रंजित पावन पवन रची है।
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

मेरा अस्तित्व बनाने के हित
किये आचमन पीड़ा के पल
कैसे मोल चुकाऊँ इसका
नत होता है मस्तक पल-पल
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

Monday, 17 April 2017

तुम्हे याद हो के न याद हो

तुम्हे याद हो के न याद हो

मेरी यादों की तरोताजा जमीन पर मौजू है
वो आँगन की लिजलिजी सी मिट्टी,
बनती कभी मरहम दिल का
वो फर्श पर पड़ी धूल पे ताजा पाँव के निशान,
करती बयाँ कि तुम यहीं कहीं हो
वो डायरी के कुछ फड़फड़ाते पन्ने
जिनमें इबारतें तेरे मेरे इश्क की ही हैं
वो रोशनदान से झाँकती मद्दम रोशनी में
अगरबत्ती का धुआँ बनाता नगरकोट
तुम्हे याद हो के न याद हो।।

वो पेशानी पर पड़ी चंद सिलवटें
चूमती गुनगुनी बदन की झुरझुरी
वो शबनमी आखें बोझल पलकों में दबीं
कहती, सुनती, लरजती कुछ कुछ
वो खिड़की पर टिका अनमना खामोश चेहरा
वो इन्तज़ार करती उल्टी भीगी छतरी
फुहारों की फुनगी लगाए खड़ी
वो शाम के धुँधलके से उभरता अक्स
गली पर, मोड़ पर, साँस के दौर पर
दबे पाँव कोई सहमता, गुजरता जाता
तुम्हें याद हो के न याद हो।।

मेरी यादों की तरोताजा जमीन पर मौजू है
तुम्हें याद हो के न याद हो।।

Sunday, 5 February 2017

एक गुजराती गीत








https://www.youtube.com/watch?v=rqfYxAANwDY
एक गुजराती गीत

🌾🌺 ऋतुराज आया है 🌳🎄

🌾🌺 ऋतुराज आया है 🌳🎄

जागा मधुमास मधुर मन के अरण्य में
किसलय-कलिकाएँ बनती अनल बीज।
दग्ध हुआ शिशिर का वह सघन शीत
ले आया रसवन्ती रसधारा भी सरसिज।।

पगलाया पवन भी ले कर के गन्ध-भार
गदराई अमराई भरती सी मदमत्त धार।
आँगन में उपवन में वीथिन में कुंजन में
बिखरी मधुरस की रसना रसमय अपार।।

शैल बने कनक-श्रृंग स्वर्णिम सी ऊषा में 
पहन लिये पीत वसन अमलतास, सरसों ने ।
ढाँप लिया अग-जग को फूलों की चूनर ने 
फैलाई अगरु गंध जन-जीवन में ऋतुपति ने।।

नव पल्लव नवल लता ले कर के नव विहान
गुंफित अवगुंठित हो रचते सब नव वितान।
अलियों के वृंद-वृंद करते मिल वृन्दगान
मधुपरियाँ जी भर कर करती मकरन्द पान।।

निवेदक
रामनारायण सोनी

🍫"सिरहाने से"🍢

नज़्म :-


"सिरहाने से"

तकिया सिरहाने का
सुनता भी है, कुछ कहता भी है

जो पी चुका है
अनगिनत खारे आँसू
गवाह है मेरे उन 
जागते हुए देखे सपनों का
सोते हुए जागे सपनों का
छत को अपलक निहारती 
पथराई, अलसती आँखों का
याद आती है मुझे कभी
सिरहाना बनी बाहों की
तकिया, धुले हुए काजल को
सहेजा जिसने बड़े जतन से
      तकिया सिरहाने का
      सुनता भी है, कुछ कहता भी है


थपकी देती हूँ इसे
जैसे यह तुम हो
छुअन देती हूँ इसे
जैसे यह तुम ही हो
प्यार का मीठा पैगाम
जैसे तुम तक पहुँचेगा ही
इसके कानों में फुस फुसा कर
कह जाती हूँ कुछ
जैसे सुन लोगे अभी तुम
फिर कहता है हौले से
बाहें वे लौटेंगी जैसे ही
दूर कहीं चला जाऊँगा
      तकिया सिरहाने का
      सुनता भी है, कुछ कहता भी है

शकुन्तला सोनी
(रामनारायण सोनी)

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