हमारे स्वप्न भी
उच्छृंखल हो गए हैं
कभी ये नींद उड़ा देते हैं,
कभी जागते में कहीं ले जाते हैं
बैठ कर हवा के रेशमी परों पर
देखता हूँ माटी का गेरूआ रंग
बौराए आम की घनी छाँव मे
ठहर जाता है वक्त किसी
पलक भूल जाती है
अपना झपकना
उन्मत्त स्वाँसों की
महक उठती है निशिगंध
*
*
Monday, 26 November 2018
स्वप्न की निशिगन्ध
दो दो नयन
स्वप्न भी उच्छृंखल हो गए हैं
कभी नींद उड़ा देते हैं
तो कभी जागते में कहीं ले जाते हैं
बैठ कर हवा के रेशमी परों पर
देखते हैं माटी का गेरूआ रंग
ठहर जाता है वक्त किसी
बौराए आम की घनी छाँव में
पलक भूल जाती है
अपना झपकना
बस नयन ही कहते रहे
सुनते ही रहे नयन
हमारे अयन
तू करुण रसधार
तू करुण रसधार है,
हूँ मैं विरल निश्वास।
नील नभ की पाँख है तू
मैं तृषित अहसास।।
मानिनी मन मोद की तू ,
मैं विखण्डित तार।
ज्योत्सना है तू शरद की,
मैं शिशिर का ज्वार।।
Saturday, 24 November 2018
मेरे एहसास हो तुम
तुम्हे कभी पा नहीं सका
पर एक बड़ी उम्र भर से
तुम्हें खो भी नहीं सका
किसी एक पल भी
अपनी स्मृतियों में अमिट हो
मैं अकेला रहना चाहता हूँ
तो सामने खड़े हो जाते हो
आकाश में विचरते बादलों में
उड़ते रुई के फाए जुड़ जुड़ कर
तस्वीर बना डालते है तुम्हारी
और मैं मगन हो लेता हूँ
मगन हो लेता हूँ
जैसे तुम यहीं हो
आस पास, अंदर बाहर
मेरे एहसास हो तुम
कुनमुनी धूप हो
अनछुई छुअन हो
क्या इतना काफ़ी नही है
मेरे जीने के लिये
Sunday, 4 November 2018
किताब और जीवन का अनुक्रम
किताब की कुछ कविताएँ
कहती हैं यह पन्ना मेरा है
कुछ पन्ने कहते हैं
सुनो! यह कविता मेरी है
तो कहीं कविता पता बन गई
ऐसे ही..
कहीं जीवन के रिश्ते हैं
तो कहीं रिश्तों में जीवन है
कहीं जीवन के अनुबन्ध हैं
तो कहीं अनुबन्धों में जकड़ा जीवन
कोई रास्ते बनाते बनाते खप जाता है
तो कोई रास्तों पर चलते चलते
जो तैर कर तर जाए
दो पहियों की गाड़ी पर चलता है यह
हाँ; जिस तरह किताब समग्रता है
जीवन एक समग्रता है
साँसों की धुरी पर
धुरी पर घूमता है जीवन
साथ साथ ही घूमते हैं
कुछ साबुत, कुछ टूटे रिश्ते
साँस रोक कर सुनो!
साँस खत्म तो रिश्ते खत्म
साँस खत्म तो अनुबन्ध खत्म
जीवन के उस पार
तुम्हारे स्नेह के अखूट खजाने से
मन के अवशोषित भावों की
उस सख्त चट्टान से मैने
मीठे सोते बहते देखे हैं
अतीत के सब्ज लम्हों से
कोई शब्द, कोई संदेश
देना चाहो अगर तो
दे दो अभी
जिसे रख लूँ गिरह में
अब मैं चुक रहा हूँ
प्रयाण के सर्ग
उत्सवी हो चले हैं
मृत्यु के उस पार तक
दिखा दूँगा तब भी
कि मेरी चिर प्रतीक्षा
अमृत पिये खड़ी है
वहाँ भी तुम्हारे हृदय की
दहलीज पर खड़ा मुझे पाओगे
रामनारायण सोनी
About Me
- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन