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Thursday, 25 January 2018

सोहं सोहं बोल

निज सरूप को भूला
अब तू सोहं सोहं बोल
सोहं सोहं बोल, अब तू सोहं सोहं बोल
एक डाल पर दो पंछी हैं

खट्टे मीठे फल खाता तू
देख रहा भरतार
निज सरूप को भूला,
अब तू सोहं सोहं बोल
सोहं सोहं बोल. अब तू सोहं सोहं बोल

जंगल जंगल परबत परबत
उड़ उड़ हुआ निढाल
काल बाज बन देख रहा है
तुझको नहीं खयाल
निज सरूप को भूला,
अब तू सोहं सोहं बोल
सोहं सोहं बोल, अब तू सोहं सोहं बोल

झूँठी बाट, घाँट झूँठे सब
सच केवल ओंकार
बाहर जग का ढोल बजे
सुन भीतर की झनकार
निज सरूप को भूला,
अब तू सोहं सोहं बोल
सोहं सोहं बोल, अब तू सोहं सोहं बोल
रामनारायण सोनी

Wednesday, 24 January 2018

🔥 क्षितिज दिग्बन्ध 🌦

 फ्यूजन   
  क्षितिज दिग्बन्ध

दोनों क्षितिजों पर अलग अलग
एक सूरज था, एक चाँद निलय
एक ही दिन, और एक समय,
इक सृजन हास, इक महा प्रलय।।

हाथों मेँ हवि के वे पात्र लिये
एक आँगन, एक एक भाव जिये।
    हा! क्यूँ सिंदूरी अकथ बन्ध
    वहँ लसती शीतल मलय गंध।।

रचते वे अपने अपने ही  ध्रुव,
फैला द्वन्द्वों का वह कलरव
लखता उत्तर में अजब बन्ध
एक ले कर मधु सी मलय गन्ध।।

पर एक तरफ है चिर पतझर
दूजे पर झरता मधु बसन्त।
    हा! क्यूँ सिंदूरी अकथ बन्ध
    वहँ लसती शीतल मलय गंध।।
अपना अपना वे भाग्य लिये
कैसे जग में किस भाँति जिये
था नियति नटी का इन्द्रजाल
इस तरफ घिरे हैं विषम व्याल।।

प्राची में रवि का तमस हरण
उस तरफ उठी स्वर्णाभ किरण।
    हा! क्यूँ सिंदूरी अकथ बन्ध
    वहँ लसती शीतल मलय गंध।।

सिद्ध मौन


मौन कितने मौन हो तुम
पर सजगता है तुम्हारी
शोर के भीषण प्रहर में
गहनता तुम में है भारी

मौन तो एक साधना है
यह ईश की आराधना है
साध्य का अनुसंधान है
और सिद्धि का सोपान है

स्वयं का जब द्वार खोले
व्यष्टि तब साकार होवे
शांति का वह महासागर
त्वरा मन की क्षीण होवे

मौन भारी शोर पर है
जब पलटता है स्वयं में
बाँसुरी सुनता मधुर यह
प्रलय के भी उस समय में

Friday, 19 January 2018

सबका सिरजनहारा

*सबका सिरजन हारा*

सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

चौदह भुवन अकासे तारे
अण्ड कटाहे टाँगे
माया जीव जगत जोड़े तब
शुन पर पेर पसारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

घट घट भीतर घट के बाहर
कन कन दिया सँवारा
अलख निरंजन रूप अरूपा
नेति नेति सब बेद उचारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु
तू सबका सिरजन हारा।।

कुल प्रपञ्च की पाँत सवाँरी
पिंजर प्राण पिरोई माला
कैसी अदभुत धमन फुलाई
हिरदै सांस सकारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
ईड़ा पिंगला और सुसमना
ताँत बनी तंबूरा
कुंडल से ले सहस कँवल तक
चक्कर सात पिंगारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

पाँच अगन की जोत जलाई
तिनमें आप समाना
रग रत में तू रमता रहता
बन कर पालनहारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

उन्निस मुख से खावै पीवै
निस दिन भरे उसासा
जीव जतग में पचि पचि मरि है
धापै नहीं बिचारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

जागे सोते सपना देखे
नींद लगी अति भारी
बिना सपन की नीद सिरानी
आणंद का झनकारा
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

माया बैठी इन्द्रजाल बुन
चहुँ दिसि दिखे कुहासा
छिन छिन नटी नचावै सिगरे
कैसा अजब नजारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

चार चतुर चौपाल बिठाए
इक ते इक्क जुड़ाने
मैं मैं करता जीव पुरातन
जीते जी क्यूँ हारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

भूला तन और भूला मन भी
अकल अबोली साधी
चेतन चित प्रभु लागी तो फिर
जीव लखा भिनुसारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु
तू सबका सिरजन हारा।।

लगन लगी जब जीव पिछाणा
कर अरदास पुकारा जी
अनहद नाद बजी तूरा की
अन्तरि फफक उजारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।

माया छूटै बन्धन टूटै
टूटै जम की फाँसी
तीन छलाँगा दूर तुरीया
पूरण ब्रह्म प्रसारा।
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।




जीवनं सर्व भूतेषु।   तेजश्चास्मि विभावसौ    गीता९/७
[18/01, 18:39] रामनारायण सोनी: अण्ड कटाह=ब्रह्माण्ड
रामचरित चरित मानस बाल काण्ड
तूरा= तुरीय
चार चतुर=अन्तःकरण चतुष्टय
नटी माया के लिये प्रयुक्त--रामचरित मानस
उन्नीस मुख = १० इन्दियाँ, ५ प्राण, ४ अन्तःकरण
पाँच अगन= ५ अग्नियाँ (शरीर में स्थित)
अहं वैश्वानरो भूत्वा...पचति = मैं अग्नि में हो कर अन्न को पचाता हूँ। गीता।
ज्योतिषां अपि तज्ज्योति इंद्रियों में उनकी सामर्थ का कारण (कठोपनिषद्)
प्रपञ्च= पंचमहाभूत
[18/01, 19:03] रामनारायण सोनी: जागे सोते सपना देखे
नींद लगी अति भारी
बिना सपन की नीद सिरानी
आणंद का झनकारा
सबका सिरजन हारा प्रभु तू
सबका सिरजन हारा।।
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति, समाधि
क्रमिक अवस्था(माण्डूक्योपनिषद्)

Tuesday, 16 January 2018

अनहद बाज रही

(प्रभाती)
*अमृतवेला में*

*सुन अनहद सिर पर बाज रही*
ये बाज रही और गाज रही।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

बाजे शंख मृदंग बाँसुरी
घन गरजत अति छाज रही।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

सुन सुन मस्त मगन मन मेरा
चंचलता सब भाग रही।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

तन के धरम करम सब छूटे
लोक लोग की लाज गई।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

परमानन्द हृदय में छाया
शून्य समाधि बिराज रही।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

भ्रकुटि अटारी चढ़ कर देखा
जगमग जोत जगाय रही।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

अमृत बरसे, आतम हरसे
नवरस बदरी छाय रही।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

गगन मँडल बिच सेज पिया की
चुन चुन फूल बिछाय रही
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।

तन मन की तो सुध सब बिसरी
सहज सरूप समाय रही।
सुन अनहद सिर पर बाज रही।।



कल हो न हो

एक दिन
जिन्दगी ने कहा मुझ से
खामोश मैं बस सुनता रहा
बोली, कभी आसमान तकते हो
कभी चकाचौंध

मैं गुजरती रही,
तुम बस दौड़ते रहे, बेतहाशा
तुम्हें फुर्सत नही मिली
मिलने की मुझ से

इतनी सी हसरत में
कब से फैलाए खड़ी हूँ बाहें
बैठ लो दो घड़ी गोद में
पता नहीं
कल हो न हो

Saturday, 13 January 2018

ननंद का बीरा आवेगा

(मालवी गीत)
मन तो फूल्यो फूल्यो फरे
   ननंद का बीरा आवेगा।।

बाहर दोडूँ घड़ी घड़ी अने
   बन्दनवार सजइ लूँ
अंगणों लीपी छाबी के ने
  चन्दन चोक पुरइ लूँ।
बीच बीच दिवला की ओली
  कंचन थाळ सजइ लूँ
       मन तो फूल्यो फूल्यो फरे
       ननंद का बीरा आवेगा।।

लाय लगी म्हारा हिरदा मे तो
  छिन छिन भारी हुई गया
पनघट पे म्हारा बासण कूसण
  सगळा रीता रई गया।
सखी सहेली चुहल करे तो
  गाल गुलाबी हुई गया
मन तो फूल्यो फूल्यो फरे
   ननंद का बीरा आवेगा।।
रात चाँदनी लाल हुई जब
  आंख्यां हिंगलू भरइ गयो
बेठ मुंडेरे काळो कौवो
  प्रेम संदेसो दई गयो
नयन अटारी पलक बुहारी
  अंजन कोर धरई गयो
      मन तो फूल्यो फूल्यो फरे
       ननंद का बीरा आवेगा।।

सांस मंजीरा, सांस पखावज
  अंतर बजे तँबूरा रे
आज बावळो होयो हे मन
  खइ के भाँग धतूरा रे।
पाँव पड़ी गइ भँवरी म्हारा
  केसे होय सबूरा रे
      मन तो फूल्यो फूल्यो फरे
       ननंद का बीरा आवेगा।।

Monday, 1 January 2018

हाईकू

नवल नूपुर
स्वरित रुनझुन
भाल भूषित

कुटिल कुंतल
नील नीरज
ललित लोचन

रुचिर रंजित
कोर काजल
धरित धनुही

शर शुशोभित
लक्ष लक्षित
भौंह श्यामल

अधर अरुण
रसित रसना
स्वर सुधामय

पीयूष परिमल
लसित हाला
अलस आनन

चिबुक चुंबित
चारु चंचल
कनक कुण्डल

कलश कंठी
उल्लसित उर
कर सुकोमल

भ्रमित भ्रमर
वलय वेणी
मलय मंडित

भाव भावित
सिक्त नेहिल
मन मनोरम

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