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Friday, 16 February 2018

यहीं कहीं हो

एक ख्याल आता जाता रहा
छू-छू कर अन्तस को
बन चुका अपने
बेनाम रिश्ते की,
रिश्ते की एक पहचान

लगता था/लगता था कि
जैसे तुम यहीं कहीं हो
एक आवाज जब-तब
गूँजती ही रहती है
कानो की खोखली कन्दराओं में 

निखालिस खाली पलों में
न जाने अब तुम कहाँ हो?
देखा है सुनसान
ढहते प्राचीरों के
उड़ते धूलों के गुबार
उस पार - इस पार
पर न जाने तुम कहाँ हो?

Tuesday, 13 February 2018

यहाँ प्रेम का मधु है

*यहाँ प्रेम का मधु है*

खुला निमन्त्रण सबको प्यारों...
मेरी मधुशाला में बन्दों
जरा तो आ कर देखो
यहाँ प्रेम का मधु है
बन्धन कैसा? किसका?
हर दिन प्रेम दिवस है

बस प्रेम ही प्रेम यहाँ है
यहँ "मैं" का भान कहाँ है
यहँ मैं नहीं केवल तुम हो
यहँ "मैं" का स्वयं विलय है
प्रेम पियाला छक कर पीना
"मैं" उसमें में घुल जाएगा

प्रेम निवाला खाओ दिल से
"मैं" खुद ही पच जाएगा
पाना प्यारे प्रेम नहीं है,
बस मिटना "मैं" का ही
मानो! पक्का प्रेम यही है
जितनी प्यास बढ़ेगी

उतने प्याले होंगे
मेरी प्रेम नगरिया ऐसी
बस पीने वाले होंगे
मेरी मधुशाला में बन्दों
जरा तो आ कर देखो
यहाँ प्रेम का मधु है..


Monday, 12 February 2018

*पंख धरे पल*

*पंख धरे पल*

मधुमास बौराया
गुलाब के हसीन सुर्ख फूल
कुछ पल महक कर
जिन्दगी महका गए हैं।

गोद में रखा सिर
उन गहरे कुंतलों में
मुस्कराते चाँद से
मन चकोर बनता है।

यादों के बिछौनो पर
मन करवटें लेता है,
कभी तपती धूप को
दुशाला बना कर ओढ़ता है।

घने उस बरगद के तले
गहन शान्त खड़े
नीरव से शिवालय की
घनघनाती घंटियों की आवाज

तैरती हुई आ है
मन निनादित सा है
तो कभी उस अमराई में
कोयल कूक उठती हैं

मुँदे-अधमुँदे नयन अभिराम
उन्नत सा भाल ललाम
भूख से भरा पेट, मन तरबतर
कौर आधे-आधे बँटे-बँटे

अधरों पर उन पोरों की छुअन
आज भी गुदगुदाती हैं
मधुमास; फिर मधुमास है

Thursday, 8 February 2018

भीतर आओ ना


कुछ पलों की चाहना है
तुमसे, तुम्हारे अंतरंग से
मैं वहाँ हूँ, वहीं तो हूँ
चुपचाप,
तुम्हारे इन्तजार में
भीतर लौट आओ

पदचाप मैं तुम्हारी सुनती रही
रागिनी जो प्रीत की, अनुराग की है
लौट गए तुम बिन खटखटाए
द्वार की कुण्डी,
धड़कनें अलाप रही

सुनो ना!
गुम न जाए अनन्त व्योम में
आओ ना!
लौट आओ!
लौट आओ, दीप बुझने से पहले
नयन - नीर, चुकने से पहले
मैं यहाँ हूँ, यहीं तो हूँ
चुपचाप! चुपचाप!!


Friday, 2 February 2018

*छोटी सी बात*

धरा ने कब देखा है
बीज उल्टा गिरा कि सीधा
उसने बस उगा दिया

फिर जडों को सहेजा
पोषण भी किया
न चाह, न अपेक्षा
बस कर्म ही कर्म
और धर्म ही धर्म

धरा जब धरती है
तो उसमें माँ उभरती है

Thursday, 1 February 2018

लेखनी

भावना के श्रोत से जो
मिल सका झरती रही
लेखनी बन पथ सबल
छ्न्द वह लिखती रही

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन