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Friday, 23 December 2016

वहाँ तुम ही हो


उस ऊँचे से शिखर की ढलान से
एक लुढ़कता पत्थर कहता है
वहाँ कोई है मेरा अपना,
अल्हड़ बादल के टुकड़े सा लहराता
मचलता वह सफेद सा दुपट्टा
कह रहा है इशारे से वहाँ तुम ही हो,
फिर आहटें वे फुसपुसाती कुछ
जैसे घुँघरू एक साथ झनक उठे हों
आम के वे सूखे जर्द  पत्ते
कह रहे है जैसे, वहाँ तुम ही हो

मचलती लहराती  रेशमी पगडंडियाँ
ले जाती है रोज तुम्हें इधर से उधर
लाँघती उस विशाल राजपथ को
मटमैली सर्पिल इतराती पगडंडियाँ
मखमली नर्म हरी चादरों में लिपटी
आकाश से रेंगती, उतरती, सरकती
मेरे घर तक, हृदय तक, अंतस तक
दीखती हो तुम कभी कभी न हो कर भी
उडती उस धुल के उस पार जैसे
कह रहा है हवा का झोंका वहाँ तुम ही हो,

मैं जब भी गीत लिखता हूँ

मैं जब भी गीत लिखता हूँ
कलम पर कोई बैठ जाता है
कभी मैं अपने हाथ को 
तो कभी कलम को देखता हूँ
बन करके वो सियाही मेरे
पन्नों पे उतर आता है

बन गया है गीत कोई या बनी गज़ल
लिखता वही हूँ केवल जो

तू आखों से बोल  जाता है

मुक्तक


सोई पड़ी है बिजलियाँ इन आँखों में, अभी मत जगाओ इन्हें।
मुस्कुराहटें सुस्ता रही इन आँखों मे, अभी मत जगाओ इन्हें।।
शोखियाँ दबी पड़ी है आँखों में, अभी मत जगाओ इन्हें।।
पलकें आधी गिरी आधी खुली है, न गिराओ न उठाओ इन्हें।

न खुद देख लेना उठ कर तुम, आइने से बचाओ इन्हें।
बिजलियाँ, शोखियाँ, शरारतें कहीं बिखर न जाए बचाओ इन्हें।।
हया के झीने परदे में ही रहें, बहुत शुमारी से बचाओ इन्हें।
जमाने को रखो ताक में हमारी नजरों से बचाओ इन्हें।।

तलाश करता हूँ अर्से से

वो जगह तलाश करता हूँ अर्से से
गुजरे वक्त के लमहात जहाँ ठहरे हों
वो दरिया तलाश करता हूँ अर्से से
नदिया के कहीं बाकी जहाँ कतरे हों

देती है गवाही ये हसीन वादियाँ जैसे
अभी हाल में फरिश्ते यहाँ से गुुजरे हों
नजरें हजारों घूरती रहती मुझे दर रोज
ढूँढता हूँ इनमें से जो तुम्हारी नजरें हों

ढूँढता रहा मुझे तुझमें एक अर्से से
मुलाकात का कोई रास्ता तो मिले
अंजाम खोज का कोई न था जब लौटा 
मेरे दिल में ढूँढा तो तुम्हीं बाबस्ता मिले

जो लम्हा साथ है उसे जी भर के जी लेना
खिली हो चाँदनी उसे जी भर के पी लेना
भुला कर दर्द के किस्से, अंधेरी रात के साए
मिले खुशियाँ जहाँ से भी, उन्हें जी भर के जी लेना।।

सूख गए फूटते ही अंकुर

सूख गए फूटते ही अंकुर


















पहाड़ की सूनी सी गोद में 
उजड़ी हुई इस बस्ती में
पसरा सन्नाटा, काई भरे परकोटे
यह खंडहर कुछ कहता है 
यहाँ टूटे हर एक पत्थर के तले
दबी पड़ी है एक एक कहानी
यादों के आइने की गर्द के पीछे
काली-लाल फर्शियोँ के वे टुकड़े
ढूँढता हूँ इसी बिखरे मलबे से 
जो बने थे कुछ दीवार, तो कुछ खंभे
कुछ मेहराब, तो कुछ आसंदी 
खेले थे हम "ख्वाबों का आशियाना" 
खो गया वक्त की गहरी खाई में
छोड़ गया गुजरे साँप की सी लकीर
कभी मैं ढूँढता हूँ इस के इर्द गिर्द 

बस एक टुकड़ा खिड़की की 
आधी अधूरी उन सीखचों का 
आवाज देता है मलबे से, मैं यहाँ हूँ
वह कहानी का टुकड़ा बयान करता है
खिड़की इधर भी थी, उधर भी
पीछे से उभर आई स्निग्ध सी सूरत
ताकती वे एक जोड़ी शोख आँखे 
झाँकती, अपनी ओर खींचतीं आँखें
गड़ गई थी सीने में गहरी 
कभी भी न निकलने के लिए
पाता हूँ जहाँ की तहाँ आज भी

तुम्हें याद होगा अब भी वह 
कंकर फेंक कर दुबक जाना
बात बात में मुँह चिढ़ाना
झरनों सी झर-झराती हँसी
सुन रहे है कान मेरे वही अनुगूँज
लगता है बूढ़े बरगद के पीछे से 
दौड़ कर अभी निकल आओगी
खोजता हूँ कहानी के शेष टुकड़े
फेंके गए वे कुछ कंकर, 
बरगद के पीछे तुम्हें, 
यहीं कहीं होगी तुम
ढूँढता हूँ झाड़ियों झंकाड़ों में
काँटों में फँसे ओढ़नी के कुछ रेशे

टुकड़ा खिड़की की सीखचों का 
झरोखा बनता है उसी कहानी का
ख्वाबों के रंगीन आशियाने का 
खिड़की का वह टुकड़ा पड़े पड़े
करता है बातें रूमानी, अब भी अकसर 
उकेरता है एक अधूरी कहानी
जिन्दगी के एक बारीक सुराख से
झाँकती रहती है यह कहानी अक्सर

सपनों के सब्ज बीज से
जैसे सूख गए फूटते ही अंकुर,
उड़ गया हो कपूर थाली से
जैसे आरती के पहिले ही
आ गयी हो रात अंधियारी 
जैसे शाम आने के पहिले ही
खिड़की का वह टुकड़ा पड़े पड़े
करता है बातें रूमानी, अब भी अक्सर 

Sunday, 18 December 2016

🙏"मैं कृतज्ञ हूँ तेरा प्रभुवर"🙏


"मैं कृतज्ञ हूँ तेरा प्रभुवर"

क्यों चले आते अचानक, फँस रहा होता भँवर में
क्यों बढ़ाते हाथ अपने, गिर रहा होता डगर में
कौन हो तुम जो लगे हो, साथ हर दम इस सफर में
कौन काँटे राह के यह बीनता फिरता शहर में।।


डूबता भव सिंधु में जब, कौन माझी आ खड़ा है
जन्म से प्यासे पथिक का, भर रहा खाली घड़ा है
भूलता जब राह अपनी, घेरती जब ज्वाल जग की
कौन भरता अंक में है, वह दयामय ही बड़ा है।।


जानता ही मैं नहीं वह, कौन है आता कहाँ से ?
सिंधु में आनन्द के नित, रसपान करवाता मुझे
थाम करके बाँह मेरी थपकियाँ जो दे रहा
कौन है जो इस हृदय में, साथ मेरे बस रहा।।


है करुण रस धार तेरी, नित निरंतर बह रही
प्रेम बन कर इस जगत में अनवरत ही चल रही
तुम अकारण ही कृपा, इस जीव पर जो कर रहे
यह रहे विश्वास अविचल, जब तलक जीवन रहे।।

पुरानी सी मेरी डायरी के जर्द पड़ गए पृष्ठों में

पुरानी सी मेरी डायरी के
जर्द पड़ गए पृष्ठों में
पृष्ठों में सियाही जो है
मेरी कलम की ही है, पर
हर शब्द में रूह तुम्हारी ही है
सौंधी सी महकती है सुगन्ध बन कर
उन अक्षरों में तुम्हारे तन बदन की
कैसे अजीब संगतराश हैं ये
मिल कर तुम्हारी सूरत बना देते हैं
एक अक्षर पर चढ़ी बिंदी
उतरी थीं तुम्हारे ही माथे से

और कहीं
सपनीले गुलाबी एक पृष्ठ पर
यादों की लेई से चिपके अक्षर
गूँजते रहते हैं अक्सर
रूह की आवाज बन कर
उस खास कमरे में दिल के
नहीं आता जाता जहाँ कोई और
सुनता हूँ इनको मैं जी भर भर कर
"चुपके चुपके कुछ कहते हैं
आसमान के झिलमिल तारे
भाव भरे है ऐसे ही
देखाे ये शब्द हमारे"

और इसमें कहीं
छुपाया था ताजा ताजा
गुलाबी गुलाब का वह फूल
झड़ गया था कहीं सूख कर
वक्त की डाल से टूटे लम्हे की तरह
पन्ने पर छूटे हुए निशान में
एक चेहरा झाँकता है कनखियों से
तकता है मुझे अजनबी की तरह
पूछता है, कौन हो तुम?
और मैं कह उठता हूँ
जिन्दगी की डायरी है गवाह
जानती है केवल तुमको
यहाँ कोई और नहीं,
केवल तुम ही तुम हो।।

इसमें मौजूद है फिंगर प्रिन्ट
टेसू के चटकीले रंग भरे
फेंके थे पीले, गुलाबी रंग तुमने
अकसर पृष्ठ पर से निकल कर
घुस जाते हैं जेहन में
कर जाते तर बतर तन मन
उदास होता मैं जब कभी
दौड़ता हूँ इन पृष्ठों में इधर से उधर
निकलता हूँ ताजा दम हो कर
जिन्दगी की डायरी है गवाह,
जो जानती है केवल तुमको
यहाँ कोई और नहीं,
केवल तुम ही तुम हो।।

पुरानी सी मेरी डायरी के
जर्द पड़ गए पृष्ठों में
पृष्ठों में सियाही जो है
मेरी कलम की ही है
मेरी दौलत है, सनद यही है
इसमें मैं भी नहीं हूँ
हाँ, यहाँ कोई और नहीं,
केवल तुम ही तुम हो।।

सूख गए फूटते ही अंकुर

सूख गए फूटते ही अंकुर

पहाड़ की सूनी सी गोद में
उजड़ी हुई उस बस्ती में
पसरा सन्नाटा, काई भरे परकोटे
यह खंडहर कुछ कहता है
यहाँ टूटे हर एक पत्थर के तले
दबी पड़ी है एक एक कहानी
यादों के आइने की गर्द के पीछे
काली-लाल फर्शियोँ के वे टुकड़े
ढूँढता हूँ इसी मलबे से जो
बने थे कुछ दीवार तो कुछ खंभे
कुछ मेहराब तो कुछ आसंदी
खेले थे हम ख्वाबों का आशियाना
खो गया वक्त की गहरी खाई में
छोड़ गया गुजरे साँप की सी लकीर

बस एक टुकड़ा खिड़की की
आधी अधूरी उन सीखचों का
आवाज देता है मलबे से, मैं यहाँ हूँ
कहानी का टुकड़ा बयान करता है
खिड़की इधर भी थी, उधर भी
पीछे से उभर आई मोहनी सी सूरत
ताकती वे एक जोड़ी शोख आँखे
झाँकती, अपनी ओर खींचतीं आँखें
गड़ गई थी सीने में गहरी तभी
कभी भी न निकलने के लिए
पाता हूँ जहाँ की तहाँ है आज भी

तुम्हें याद होगा अब भी वह
कंकर फेंक कर दुबक जाना
बात बात में मुँह चिढ़ाना
झरनों सी झर-झराती किलकारी
सुन रहे है कान मेरे वही अनुगूँज
लगता है बूढ़े बरगद के पीछे से
दौड़ कर अभी निकल आओगी
खोजता हूँ कहानी के बाक़ी टुकड़े
फेंके गए वे कंकर,
बरगद के पीछे तुम्हें,
यहीं कहीं होगी तुम
ढूँढता हूँ झाड़ियों झंकाड़ों में
काँटों में फँसे ओढ़नी के कुछ रेशे

टुकड़ा खिड़की की सीखचों का
झरोखा बनता है उसी कहानी का
ख्वाबों के रंगीन आशियाने का
हाँ, खिड़की का वह टुकड़ा पड़े पड़े
करता है बातें मुझसे, अब भी
उकेरता है एक अधूरी कहानी
जिन्दगी के एक बारीक सुराख से
झाँकती रहती है वही कहानी अक्सर
सपनों के सब्ज बीज से
जैसे सूख गए फूटते ही अंकुर,
उड़ गया हो कपूर थाली से
जैसे आरती के पहिले ही
आ गयी हो रात अंधियारी
जैसे शाम आने के पहिले ही
खिड़की का वह टुकड़ा पड़े पड़े
करता है बातें मुझसे, अब भी

Wednesday, 14 December 2016

है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे

मैं, अकसर बेखबर सा
खुद को देखता हूँ अचरज से
क्या बताऊँ, किसको बताऊँ
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
न मुड़ कर कभी देखा
न रुक कर कभी सोचा
न अपनी पहिचान रही बाकी
क्योंकि मैं तो स्वयं ही
मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?

है कोई तजबीज या सक्ष कहीं?
जो लगी जंग मेरी अस्मिता को
मुझ से छुड़ा दे
है छिपा कोई रश्मि पुँज मुझमें ही
फूँक कर अज्ञान के कोहरे को
परमज्योति का जो दर्शन करा दे
दूर बज रही है प्रणव की भेरियाँ
कानों पर लगे हैं माया के ढँकने
आकर कोई अब तो हटा दे
मैं मुझसे ही बहुत दूर निकल आया हूँ
है कोई जो मुझे मुझ से मिला दे?

मैं खड़ा था कुण्ठित सा
दुनिया के मोहक मायावी रंगमंच पर
तभी विस्तीर्ण नेपथ्य से
एक छाया सी उतरी
छुआ उसने रेशमी उँगलियों से
तब मैं जगत देख रहा था
उसने मुझे उल्टा घुमा दिया
और जाते जाते यह कह गई
यहाँ से केवल तीन छ्लाँग दूर पर
तुरीय का सत्य बोध है
वैश्वानर से तैजस, तैजस से प्राज्ञ
और प्राज्ञ से ओंकार

यह रूप की नहीं स्वरूप की यात्रा है
यात्रा है अपनी उपाधियों के विसर्जन की
यात्रा है मेरी मुझमें लौटने की
अभी नहीं होगी तो कभी नहीं होगी

यह प्रयाण नहीं आरोहण है
क्योकि मैं तो सिर्फ "मैं" हूँ....
"अहं ब्रह्मास्मि"

पहली छलाँग स्वप्न में
दूसरी सुषुप्ति में और तीसरी
तीसरी उस विराट में, परमचेतना में
छाया नेपथ्य में विलीन हो गई

शायद  मुझे तलाश थी
इसी जामवन्त की,
युगों युगों से
जन्म जन्मान्तरों से

🙏"मैं कृतज्ञ हूँ तेरा प्रभुवर"🙏

🙏🙏  🌺🌺  🙏🙏

🙏"मैं कृतज्ञ हूँ तेरा प्रभुवर"🙏

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क्यों चले आते अचानक, फँस रहा होता भँवर में
क्यों बढ़ाते हाथ अपने, गिर रहा होता डगर में
कौन हो तुम जो लगे हो, साथ हर दम इस सफर में
कौन काँटे राह के यह बीनता फिरता शहर में।।

डूबता भव सिंधु में जब, कौन माझी आ खड़ा है

जन्म से प्यासे पथिक का, भर रहा खाली घड़ा है
भूलता जब राह अपनी, घेरती जब ज्वाल जग की
कौन भरता अंक में है, वह दयामय ही बड़ा है।।

जानता ही मैं नहीं वह, कौन है आता कहाँ से ?

सिंधु में आनन्द के नित, रसपान करवाता मुझे
थाम करके बाँह मेरी थपकियाँ जो दे रहा
कौन है जो इस हृदय में, साथ मेरे बस रहा।।

है करुण रस धार तेरी, नित निरंतर बह रही

प्रेम बन कर इस जगत में अनवरत ही चल रही
तुम अकारण ही कृपा, इस जीव पर जो कर रहे
यह रहे विश्वास अविचल, जब तलक जीवन रहे।।

कृतज्ञ

रामनारायण

Tuesday, 6 December 2016

यादों के झुरमुट से


यादों के झुरमुट से

तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो।।

खुले नयन है गहन गगन में, अंतरतम के सरल सृजन हैं।
स्वर्णिम यादों की परतों में,  मृदुल करों का अवगुंठन है।
बिन छुए छुअन की सिहरन है, स्वाँस- स्वाँस में चन्दन वन है।
प्रीत अरुण ले प्राची में तुम, ऊषा बन कर आती हो।।

      तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
      सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो।।

सपनों पर अपना जोर नहीं, वह उनका बहशीपन है।
ले जावें किस ओर उड़ाकर दिग दिगंत का ठौर नहीं।।
किससे पूछूं किससे जानूं मेरे प्रिय की बसर कहाँ है ।
इस बस्ती से उस नगरी तक बंजारे की डगर कहाँ है।।

     तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
     सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती  हो।।

जब दूर क्षितीज में सांझ ढले, और शीतल मंद बयार चले।
बरगद की साखों पर पंछी, कल-कल कलरव गान करे।।
धरती पे है निविड़ निशा, तारों की चूनर ओढ़ प्रिये।
मेरे मन के उपवन मे तुम, प्रणय प्रसंग लिये आती हो  ।।

    तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो ।।

"जन्मदिन मेरा"

"जन्मदिन मेरा"

कभी यह
अगली सीढ़ी की पायदान है
चढ़ भी सकता हूँ
कामयाबी एक नए शिखर पर
उतर भी सकता हूँ
नीचे किसी गिरते हुए को उठाने
मुड़ भी सकता हूँ
अपने खुशनुमा साथी को
प्यार से संग लाने को
ठहर भी सकता हूँ
टूटते, छूटते, बिखरते रिश्तों को
जोड़ने को संवारने को जिलाने को

कभी यह
पिछली जिन्दगी का झरोखा है
देख सकता हूँ मील के पत्थरों को
गुजिस्ता लम्हों को
जिनमें कुछ पाया, कुछ खोया
कभी उठ कर गिरा, नसीब से
कभी गिर कर उठा, हौंसलों से
कोई मिल कर छूटा, रूठ कर
कोई छूट कर मिला, प्यार से

उतरते चढ़ते, चढ़ते उतरते
जिन्दगी की यह दहलीज है
मंजिल-ए-मकसूद पता नहीं
पर ये रास्ते, ये हम सफर
ये दोस्त, ये रहगुजर
ये मुश्किलें, ये दुश्वारियाँ
चाहे जो मिलें
हौंसले न टूटे, विश्वास न छूटे
यही उस ईश से अभिलाष है
जिन्दगी बस खुशनुमा रहे।।

उन्मद है तन-मन

जब यादों में गहराते हो
अन्तस्तल पर उभर आते हो।।

वे संवाद, वे अवसाद,
वे केकी से कहकते स्वर
और मुस्कराते अरुण अधर
हवाओं में तैरते-लरजते स्पन्दन
हथेलियों पर फुदकते लम्हों
तुम कानों में कुछ कह जाते हो।।

जब यादों में गहराते हो
अन्तस्तल पर उभर आते हो।।

अलकों में उलझते पोर
उन्मद हो जाता मैं अकसर
सहसा कौंधती झुरझुरी
फैलती बाहें, बोलती निगाहें
उतर कर अम्बर से आहिश्ता
जब यादों में गहराते हो।।

जब यादों में गहराते हो
अन्तस्तल पर रुबाई लिख जाते हो।।




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