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Wednesday, 16 June 2021

Love is a unidirectional



People say, they fall in love. See! Is love a slippery mud well? and/or is it a place of an accident. 
I don't think so. Look! Love is an ocean where one can be submerged into it just not willing to come out of it. 
Love is like a diode having unidirectional feature i.e. it's an act to enter into, certainly which has no exit. Love is an act of purest form in the entire Universe. So love is God.

Ramnarayan Soni
05.05.21

चाँद-रात


रिश्ता मेरा तुम्हारा
जैसे चाँद से रात का
जैसे अल्फ़ाज से आवाज का
जैसे नदी से धार का
जैसे प्रियतम से मनुहार का!!
हाँ!
देखता हूँ तुम्हें!
जब बन्द आखों से
कैसा अप्रतिम सौन्दर्य हो तुम!!
सुनता हूँ तुम्हें
जब कान बन्द कर के
कैसा एक मधुर सा गीत हो तुम!!
छुअन का अहसास
जैसे समीरण सा मृदुभास
मेरी जीवन बगिया का
जैसे मधुरिम मधुमास हो तुम!!

       रामनारायण सोनी
         ०५.०५.२१

प्रकृति का वाद्यवृन्द


आओ!
देखो जरा
केसे धरती और अम्बर
खिल उठे हैं
हवाएँ गुनगुना रही हैं
सागर की ये कैसी अठखेलियाँ
कलियाँ घूँघट खोले खड़ी हैं
तारों ने बाँध लिये हैं
पावों में घुंघरू
पछिपी बाँसुरी
बज उठी नन्दन वन में
देखो! सुनो!! थिरक लो!!!
सृष्टि और समष्टि
का मदिर-मदिर
बज रहा रसाल
प्रकृति का...
मधुरिम वाद्यवृन्द
डूब जाओ इसमें
अभी, हाँ अभी के अभी!!

रामनारायण सोनी
10.10.20

जिन्दगी तीन पगों की

जिन्दगी तीन पगों की

जिन्दगी एक किताब है
सिर्फ कुछ पन्नों की
पहले पर लिखा है जन्म
   जन्म ढाई आखर ही का
आखिरी पर दर्ज है मृत्यु
   सिर्फ ढाई आखर ही का
    पाँच आखर न तुमने लिखे
    न तुम से मिटाए जाएँगे
बीच के पन्ने ऊपर वाले ने
   छोड़े हैं खाली, निखालिस
   लिखो चाहो जो जो, चाहो जैसा जैसा
   लिखना है केवल तुम्हें ही
   कर्म की कलम,
   विवेक की शाई से
   या फिर कहानी, बहा कर खून से
   या तिलक कर दो किसी को
   कुमकुम के, रोली के, चन्दन के
   यही पन्ने कफन में सिल कर जावेंगे
   न रिश्ते, न नाते, न पैंतरे
   और न ही काँधे काम आवेंगे
   नाम के संग संग
   सारे ही इतिहासों में दर्ज किये जावेंगे।
   तो लिखो आज ही से
   प्रेम के ढाई आखर की नित नई कहानी
   सोचो! कितनी वामन है जिन्दगी
   सिर्फ तीन पगों की
   बना लो वामन से विराट जिन्दगी

     रामनारायण सोनी
      17.05.21

Tuesday, 15 June 2021

कैसी चुभन है ये

कैसी चुभन है ये

कुछ काँटे
होते हैं बस झूठ मूठ के
पर सच्ची क्यों होती हैं
चुभन उनकी
और दर्द उनके,
वे कुछेक खास कहानियाँ
बस भावों, शब्दो, अर्थों के साथ
जीने लगती है मुझ में पूरी की पूरी
भुला देती हैं अकसर
कि "मैं कौन हूँ"
लगता है 'मैं' मैं नहीं, वो हूँ
उन नकली सकली सहपात्रों के संग
क्यों चल पड़ता हूँ मैं हमेशा
भँवर में घिरी नाव की तरह
हँस नहीं पाया भले ही,
तुम्हारी हँसी के साथ
पर तुम्हारा दर्द
क्यों सालता है मुझे फाँस की तरह
फिर भी, बार बार
वे काँटे, वह फाँस, वे दर्द
लगते है कितने सगे हैं ये मेरे अपने

रामनारायण सोनी
१६.०६.२१

गीले अहसास

गीले अहसास

पानी पर बनी परछाई
सह नही सकती
हवा का एक हलका सा झोंका भी
बादल में बने
उभरे छिछले नक्श
बिखर जाते हैं आकाश में
पीछे छूटता नहीं कुछ भी
छूट जाते हैं वहाँ टूटे बिखरे पल।
किसने छुआ है
इन अहसासों को
जो अभी तक गीले ही हैं!
तिनकों सी टाँगों वाली और
पीली चोंच वाली यह टिटहरी
आधी रात में भी
यादों की तरह टिटियाती है
और फिर भोर के वे सितारे!!
नजरें जिन पर ठहरी पड़ी थी...
आस की, विश्वास की..
कुछ रोशनियाँ दरोगे की तरह आई
और उठा ले गई उन्हें भी!
टूटी दीवार की अधठुँकी खूँटियों पर
निखालिस टँगा रह गया क्यों
मेरा यह बेचारा मन,
मेले की भीड़ में गुम हुए बच्चे सा..
हाँ यह मन!!
सुन तो ए मेरे मन!
पीछे मुड़, भीतर चल

रामनारायण सोनी
१५.०६.२१

दुबका बैठा जीवन है

इस पसरे सन्नाटे में यह जीवन दुबका बैठा है।
हिरनो जैसी दौड़ छाेड़ टूटी खटिया पर लेटा है।।
घर में हैं घरवाले फिर भी घर क्यों खाली  लगता है।
शोर थमा बाहर का फिर नीरव क्यों गाली लगता है।।

वही हवा और पुष्प सभी वैसी ही सौरभ देते हैं।
फिर भी डरते डरते हम एक पाँव डगर पर धरते हैं।।
जाने कौन दिशा से आ वह चुपचाप पटखनी दे देगा।
हम डरे डरे सहमे घर में कब हमें फिरकनी कर देगा।।

तेरी गलती की सजा मुझे गर तू चुप ना बैठेगा।
तेरे पापों की गठरी को जबरन मेरे सिर रक्खेगा।।
इसीलिये डण्डा ले कर सड़कों पर शासन उतरा है।
संयम की अच्छी साध लिये मानव घर में पसरा है।।

तू छोड़ फिक्र इस दुर्दिन की अच्छे दिन जल्दी आवेंगे।
फिर से फुलबगिया महकेगी घर घर दिये जलायेंगे।।
फिर नई सुबह में नया जोश जीवन फिर से महकेगा।
मेरे इस आँगन में बबली बबुआ फिर से ठुमकेगा।।

रामनारायण सोनी
३०.०५.र१

थके पाँव

थके पाँव

वक्त ने खुद ही
वक्त चुराया है हम से
मेरी दहलीज़ से टकरा कर
क्यों लौट लौट जाती हैं
हवाएँ भी फिर नेपथ्य ही में
सदाओं की उँगली थामे
अब तो तुम ही
मुझी तक चले आओ!!!
निढाल से स्वप्न!थके पाँव!!
धुँधियाते गाँव! चुँधियाती ठाँव!!
रास्तों में बिछे अगिनत अलाव
अब तो तुम ही
मुझी तक चले आओ!!!
अँधेरे ये चिराग तले के
उड़ उड़ कर ढँकने लगे हैं
मद्धिम पड़ती दीपशिखाओं को..
तन की डोली भी उठती नहीं है...
प्राणों की कहारिनों से!
अब तो तुम ही
मुझी तक चले आओ!!!

रामनारायण सोनी
१५.०६.२१

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