दो फूलों का सहज सौंदर्य
बिखरता है भीतर से बाहर
जैसा भीतर वैसा बाहर
न मुखौटे, न दुराव
न त्याग, न चुनाव
अलौकिक संवाद
न वाद न, न परिवाद
बस मुखर ही मुखर
बस आह्लाद के स्वर
रामनारायण सोनी
दो फूलों का सहज सौंदर्य
बिखरता है भीतर से बाहर
जैसा भीतर वैसा बाहर
न मुखौटे, न दुराव
न त्याग, न चुनाव
अलौकिक संवाद
न वाद न, न परिवाद
बस मुखर ही मुखर
बस आह्लाद के स्वर
रामनारायण सोनी
बरस कर प्यार बन हर दिन
मेरा मन क्यों भिगोते हो
नमी बन कर मेरी आँखों में
अक्सर क्यों उतरते हो।
नहीं हो सामने फिर भी
यहाँ हर दम गुजरते हो
रुकी हैं धड़कनें जब भी
समा कर क्यों धड़कते हो।।
ऋणी हूँ उन हवाओं का
तुम्हें जो छू के आती है
मधुर सी लोरियाँ बन कर
प्रणय के गीत गाती है
बजाती पैंजनी मद्दम
हृदय को गुदगुदाती है
कैसे भूल जाऊँ थपकियाँ
मुझे जो थपथपाती है
उठ खड़ा हुआ ले अँगड़ाई,
आशा ने चूमा दिग्दिगन्त।
बीत गया दुःख का पतझड़
लौटा जीवन में फिर बसन्त।।
पथ टेढ़ा मेढ़ा पंकिल हो
पर मन उमंग से भरा रहे।
पग पग पर बाधाएँ होंगी
पर लक्ष्य दृष्टि में धरा रहे।।
कुछ और अभी पल आयेंगे,
पग पग पर आफ़त लाएँगे।
इतिहासों के वे काले पन्ने
वे फिर फिर अब दोहराएँगे।।
कितनी उल्काएँ गिरती हो
भीषण झंझा की भर भेरी।
हो ऊर्जा जो भुजदण्डों में
किस्मत भी बनती है चेरी।।
सपनों के साँचे बड़े रहें
साहस के काँधे चढ़े रहें।
पौरूष भूधर ले खड़े रहें
अपनी धरती से जुड़े रहें।।
दो पल को जागा फिर
बरसों तक सोया हूँ
आशा के पंखो पर
सपनों को ढोया हूँ
साँसों ने मोहलत दी
उतना भर जी पाया
कतरा भर पानी था
सागर में खो आया
आँसू का मोल यहाँ
बालू से सस्ता है
झूँठों की बस्ती में
साँच हुआ खस्ता है
फूलों की सेज सजी
नीचे बस शूल धरे
सूनी इस अमराई में
गिद्धों के शोर भरे
दोहरे इस चेहरे से
दर्पण भी हार गया
जीवन के उपवन को
पाला क्यूँ मार गया
सुर तो सब मीठे है
कँपते उन तारों के
पिटते हैं ढोल सभी
गीत सजे प्यारों के
जीवन की धारा संग
तिनके सा बहता हूँ
भीतर सौ ज्वाल लिये
बाहर से हँसता हूँ