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Tuesday, 19 November 2019

खिलखिलाते दो प्रसून

दो फूलों का सहज सौंदर्य
बिखरता है भीतर से बाहर
जैसा भीतर वैसा बाहर
न मुखौटे, न दुराव
न त्याग, न चुनाव

अलौकिक संवाद
न वाद न, न परिवाद
बस मुखर ही मुखर
बस आह्लाद के स्वर

रामनारायण सोनी

Wednesday, 13 November 2019

मन क्यों भिगोते हो

बरस कर प्यार बन हर दिन
  मेरा मन क्यों भिगोते हो
नमी बन कर मेरी आँखों में
  अक्सर क्यों उतरते हो।
नहीं हो सामने फिर भी
  यहाँ हर दम गुजरते हो
रुकी हैं धड़कनें जब भी
  समा कर क्यों धड़कते हो।।

ऋणी हूँ उन हवाओं का
  तुम्हें जो छू के आती है
मधुर सी लोरियाँ बन कर
  प्रणय के गीत गाती है
बजाती पैंजनी मद्दम
  हृदय को गुदगुदाती है
कैसे भूल जाऊँ थपकियाँ
  मुझे जो थपथपाती है

आप हैं तो, हम है

मेरे प्रिय आत्मन्!
अकेला रह कर मैं
कुछ कह सकता हूँ
पर संवाद के लिये...
  आप जरूरी हैं
अकेला रह कर मैं
खुश हो सकता हूँ
पर उत्सव तो..
  आपके बगैर असंभव है
अकेला रह कर मैं
मुस्कुरा तो सकता हूँ
पर उल्लास तो...
  कैसे उतरेगा मन में
अकेला रह कर मेरी
साँसें तो चल जाती हैं
यह जिन्दगी तो
  आपके बगैर अधूरी है
      रामनारायण सोनी

लौटा जीवन में फिर बसन्त

उठ खड़ा हुआ ले अँगड़ाई,
आशा ने चूमा दिग्दिगन्त।
बीत गया दुःख का पतझड़
लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  

पथ टेढ़ा मेढ़ा पंकिल हो
पर मन उमंग से भरा रहे।
पग पग पर बाधाएँ होंगी
पर लक्ष्य दृष्टि में धरा रहे।।

कुछ और अभी पल आयेंगे,
पग पग पर आफ़त लाएँगे।
इतिहासों के वे काले पन्ने
वे फिर फिर अब दोहराएँगे।।

कितनी उल्काएँ गिरती हो
भीषण झंझा की भर भेरी।
हो ऊर्जा जो भुजदण्डों में
किस्मत भी बनती है चेरी।।

सपनों के साँचे बड़े रहें
साहस के काँधे चढ़े रहें।
पौरूष भूधर ले खड़े रहें
अपनी धरती से जुड़े रहें।।

मैं पीड़ा का गायक हूँ


दो पल को जागा फिर
बरसों तक सोया हूँ
आशा के पंखो पर
सपनों को ढोया हूँ

साँसों ने मोहलत दी
उतना भर जी पाया
कतरा भर पानी था
सागर में खो आया

आँसू का मोल यहाँ
बालू से सस्ता है
झूँठों की बस्ती में
साँच हुआ खस्ता है

फूलों की सेज सजी
नीचे बस शूल धरे
सूनी इस अमराई में
गिद्धों के शोर भरे

दोहरे इस चेहरे से
दर्पण भी हार गया
जीवन के उपवन को
पाला क्यूँ मार गया

सुर तो सब मीठे है
कँपते उन तारों के
पिटते हैं ढोल सभी
गीत सजे प्यारों के

जीवन की धारा संग
तिनके सा बहता हूँ
भीतर सौ ज्वाल लिये
बाहर से हँसता हूँ

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