अंगुलियों सी दीपशिखा जब
महातिमिर में तैरेगी
किरण किरण हो प्लावित नभ में
संकुल बन फैलेंगी।
आज विजय का शंख बजेगा उन
अंधियारी गलियों में
हार थके बैठे जन गण मन में
अब आशाएँ फैलेंगी।।
महातिमिर में तैरेगी
किरण किरण हो प्लावित नभ में
संकुल बन फैलेंगी।
आज विजय का शंख बजेगा उन
अंधियारी गलियों में
हार थके बैठे जन गण मन में
अब आशाएँ फैलेंगी।।
माटी के तन त्याग धरा है स्वेद
कणों से दीप भरा है
श्रम के बीज निचोड़े जिसने वो
कुटिया भी महकेगी।
खेतों सिरजी बनी धान पद्म दल
महालक्ष्मी विहरेगी
किरण किरण हो प्लावित नभ के
संकुल बन फैलेंगी।।
कणों से दीप भरा है
श्रम के बीज निचोड़े जिसने वो
कुटिया भी महकेगी।
खेतों सिरजी बनी धान पद्म दल
महालक्ष्मी विहरेगी
किरण किरण हो प्लावित नभ के
संकुल बन फैलेंगी।।
चलो सजाएँ चौक पुराएँ मन से
मन का दीप जलाएँ
थाल सजाँए सब ललनाएँ
फुल बगिया महकेगी।
खील बताशे घेवर धानी नयन
भरी हो प्रेम कहानी
किरण किरण हो प्लावित नभ के
संकुल बन फैलेंगी।।
मन का दीप जलाएँ
थाल सजाँए सब ललनाएँ
फुल बगिया महकेगी।
खील बताशे घेवर धानी नयन
भरी हो प्रेम कहानी
किरण किरण हो प्लावित नभ के
संकुल बन फैलेंगी।।
