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Friday, 13 October 2017

दीपोत्सवी

अंगुलियों सी दीपशिखा जब
महातिमिर में तैरेगी
किरण किरण हो प्लावित नभ में
संकुल बन फैलेंगी।
आज विजय का शंख बजेगा उन
अंधियारी गलियों में
हार थके बैठे जन गण मन में
अब आशाएँ फैलेंगी।।

माटी के तन त्याग धरा है स्वेद
कणों से दीप भरा है
श्रम के बीज निचोड़े जिसने वो
कुटिया भी महकेगी।
खेतों सिरजी बनी धान पद्म दल
महालक्ष्मी विहरेगी
किरण किरण हो प्लावित नभ के
संकुल बन फैलेंगी।।

चलो सजाएँ चौक पुराएँ मन से
मन का दीप जलाएँ
थाल सजाँए सब ललनाएँ
फुल बगिया महकेगी।
खील बताशे घेवर धानी नयन
भरी हो प्रेम कहानी
किरण किरण हो प्लावित नभ के
संकुल बन फैलेंगी।।


Wednesday, 4 October 2017

तुम ही तो हो

नज़्म
*तुम ही तो हो*
ढूँढने निकला था जिसे सेहरा में
खिली थी गुलशन हो कर
सुनहरी रोशनी बन
ढलती हुई उस शाम 
बादलों के बदन पे
फिर उतरी जो जहन में 
समझ नहीं पाया मैं
कि वो तुम ही हो।।

जमीं की नर्म रेशमी सिलवटें
गुदगुदाती पगथली मेरी
ओढ़े पड़ी दरख्तों के साये
तपती रहीं जो दिन भर
सहलाती रही पोर पोर
समझ नहीं पाया मैं
कि वो तुम ही हो।।

धुँधलके गहरा गए 
तबदील हुए घुप्प चादर में
ओढ़ कर जिन्हें
रात भर बैठा रहा 
पूरे इतमिनान से
मिटा दी तन बदन की
थकन की पीर को
मैं समझ नहीं पाया
कि वो तुम  ही तो हो।।


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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन