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Friday, 24 September 2021

मैं सम्पूर्ण हो गया हूँ

सुचिते!
तुम !
और तुम्हारा आस पास का 
वह सब
इनमे से
चाहा और चुना है मैंने 
सिर्फ तुम्हें ही
और देखो! सम्पूर्ण हो गया हूँ मैं

रामनारायण सोनी

मैने लिखना छोड़ दिया है

 

यह प्रदीप, ये नीहारिकाएँ

ये गुल्म और लताएँ

मन और सारी आशाएँ

ठहरे ठहरे और निष्प्राण हैं

अब लौट भी आओ शुभे!

मेरे उस महाप्रयाण से पहले

 

रामनारायण सोनी

 

२४.०९.२१

 

मैंने लिखना छोड़ दिया है

क्योंकि मैं...

किताबों में लिखे चेहरे

और चेहरे पर लिखी किताब

पढ़ना चाहता हूँ

इसलिये मैंने लिखना छोड़ दिया है

 

मैंने कहना छोड़ दिया है

क्योंकि मैं..

तुम्हारी पीड़ा, सुख-दुःख

तुम्हारी अनुभूतियाँ,

जिन्दगी के कड़वे, खट्टे-मीठे

सच सुनना चाहता हूँ

इसलिये मैंने कहना छोड़ दिया है

 

मैंने देखना छोड़ दिया है

अब मुझे महलों दुमहलों की

खिड़कियाँ, मेहराबें और कंगूरे

कुछ भी अच्छे नहीं लगते

क्योंकि मुझे..

पसीने से लथपथ इन मजूरों की

बरसाती से ढँकी वे झुग्गियाँ 

वे निचली बस्तियाँ, बस्तियों में

दौड़ता, हाँफता, बिलखता, आदमी

जहाँ टप्परो से टपकते हैं संत्रास,

उनमें सब और पैली

मच्छरों, मक्खियों के भिनभिनाहट

मुझे चैन से रहने नहीं देती

 

मैंने देखना - दिखाना छोड़ दिया है

जबकि वहाँ...

हमारे - तुम्हारे, इनके-उनके

फेंके गए कबाड़, उतरे- पुतरे

बीनते - बटोरते टालते - टटोलते

वे छोटे बड़े अधमरे जिस्म

मेरे जेहन में, चेतना के संसार में

तैरते रहते हैं

मैं देखता हूँ ठगा - ठिठका

मेरी इन छलछलाई ऑंखों से

नहीं देख पाता हूँ

वे गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ

सभ्यता के शिखरों की चौंधियाती चमक

 

शायद इसलिये

छोड़ दिया है मैंने..

लिखना, कहना और दिखना

 

रामनारायण सोनी

लौट भी आओ!

यह प्रदीप, ये नीहारिकाएँ
ये गुल्म और लताएँ
मन और सारी आशाएँ
ठहरे ठहरे और निष्प्राण हैं
अब लौट भी आओ शुभे!
मेरे उस महाप्रयाण से पहले

रामनारायण सोनी
२४.०९.२१


तीन लघु कविताएँ

मैं 
और जीवन यह मेरा
दीवार पर टँगे दर्पण सा
कैसा यह बीत गया
रीता और क्रपण सा
लोग आये, लोग गये
अपने तन लेकर
और अपने मन लेकर
चुटकी भर धूल
लिपटी ही रही
जीवन के इस दर्पण पर
शायद देख नहीं पायेगा
रीतापन जीवन का

रामनारायण सोनी
५.९.२१

कितनी मजबूर है
उड़ने को चिड़िया
तैरते रहने को मछली
बहने को यह समीर
उठने को धुआँ
मैं भी
तुम्हें निरन्तर याद करने को

रामनारायण सोनी
५.९

दमकता मुखड़ा 
उस सुर्ख गुलाब का
सौंदर्य और सुवास से सिक्त
अभिभूत और स्तब्ध हो
धरती के आँगन में
देखता ही रह गया मैं
और यह क्या कमाल हो गया?
यकायक महक उठा है 
सारा का सारा 
मेरे भीतर का उपवन
हे शुभे!
एक से ही तो हो तुम दोनों

रामनारायण सोनी

दो लघु कविताएँ

पूछना है तो पूछो
इतिहास मेरा, तुम्हारा, उनका
इन कतरनों और पुर्जियों से
आइने तो बस
रनिंग कॉमेन्ट्री सुनाएँगे

रामनारायण सोनी
२३.०८.२१

तुमने कहा था
रहेगा तुम्हारा साया
साथ सदा ही मेरे
पर यहाँ तो और कुछ भी नहीं है
मेरी परछाइयों के सिवा

रामनारायण सोनी
२३.०८.२१


मुक्तक

शब्द नही अहसास लिखो
कहीं दूर नही आसपास लिखो
आईने मे कोई बसा नही 
बस बिम्बों का अहसास लिखो

क्या बताऊँ सुचिते

क्या बताऊँ सुचिते!
ठगे, ठिठके इन नयनों के
ये रास्ते सभी
बहुत खारे और नम हैं
जिनसे तुम
उतरे हो हृदय में,
ये शब्द भी तो
कितने शबनमी हो गए हैं
हिफाजत करता हूँ इनकी
धूप और हवा से
महसूस होती है इनमें
खुशबू तुम्हारी ही

रामनारायण सोनी
११.०८.२१


हाँ यही तो है वह

वो क्या चीज़ है कि

चोट मुझे लगे और दर्द तुम्हें हो
गर मैं खुश नहीं रहता हूँ
तो तुम भी उदास हो जाते हो
गर मैं सोता हूँ
तो सिरहाने बैठे जागते रहते हो
जैसे ही मैं कुछ बोलने जाता हूँ
वह कहने के पहले ही
तुम्हारे मुँह से निकलने लगता है
जैसे ही हम चुप होते हैं 
चुप्पियाँ जोर जोर से बतियाने लगती हैं
जो जुबाँ नही कह सकी
वह दिल बोलता है, आँखे बोलती है
वे बातें बस तुम्हारी हमारी
मुझमें तुम महसूस होने लगते हो
पूरी सिद्धत से
और शायद तुम में भी मैं उसी तरह
क्यों? क्या रूहें घर भी बदलती हैं?
तुम मुझे यहाँ ढूँढते हो
और मैं तुम्हें वहाँ
जब लौटता हूँ तो तुम्हें
हाँ तुम्हें, मुझी में तुम्हें पाता हूँ
क्या यह अलौकिक प्रेम नहीं है?
एक दम निश्छल, अविरल, अविचल
शायद प्रेम यही है, हाँ बिल्कुल यही है
प्रेम वह परमात्म अनुभूति है

रामनारायण सोनी
२९.७.२१

Thursday, 19 August 2021

micro poetry

मैं समझा था
बहुत दूर आ गया हूँ उससे
मगर खाली नहीं है
उससे कोई भी जगह

रामनारायण सोनी
  २. ८.२१


चौंधियाई
मेरी आखें उम्र के साथ साथ
पर आँखें आत्मा की
देखने लगी और भी साफ साफ
फुल्ली मेच्योर्ड

शायद मैं गलत हूँ
और तुम सही
जो भी पढ़ा लिखा तुमने
शीर्ष पर प्रतिष्ठित होने को
पर, मैंने तो बस जीने भर को
संवेदनाएँ बहुत सी
फिर खड़ी हो गई है मुझ में
मेरी गलतियाँ अच्छी लगती है मुझे

There is a distance between possibly and reality we have just to travel through this distance. We have to have courage, commitment and walk through this distance.


Wednesday, 18 August 2021

शतदल

क्या कहते हो!
गरीबी कीचड़ है?
पुखराज, नीलम, और
हीरे निकले हैं इन्ही दलदलों से

तुम से तुम को मिलवाऊँ

तुम से तुम को मिलवाऊँ

आओ तुम्हें मैं हँसना सिखाऊँ
जीवन का वह छोर दिखाऊँ
बैठे हम में सहज सलोने
ईश्वर का दर्शन करवाऊँ।।
तुम भी तो मुझ जैसे ही थे
चंचल चपल हठीले नटखट
हाथ थाम कर आओ संग संग
तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

जाने कौन गली में खोये
गुपचुप क्यों रोया करते हो
जीवन की भारी गठरी को
बेमन से ढोया करते हो ।
कूद पड़ो तुम उस अतीत में
जिसमे मस्ती यूँ झरती थी
किलकारी भरती सखियों की
वो टाँगा टोली तुम्हें दिखाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

कैंची से सीखी थी सायकल
कीचड़ में गेड़ी चलती थी
बीले की खाली खोलों की
कोयल रस्सी से बजती थी।।
लकड़ी के घोड़े पर बैठे
कैसे तुम दौड़े फिरते थे
उस कुलाम डाले की डाली
पर फिर तुमको लटकाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

ढूँढो फिर से उन यारों को
फिर से बचपन खड़ा हो सके
जिनको देख तुम्हारी आँखे
नेह नीर से सजल हो सके
उन भूले बिसरे रिश्तों की
स्वर्णिम सी उन शाम सुबह की
मद मस्ती की उस बस्ती की
मस्त गली में तुम्हे घुमाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

ताल तलैया नदी छापरी
याद तुम्हें भी आती होगी
चुरा लिया करते थे अमिया
उस बगिया को तुम्हें दिखाऊँ।।
टिम टिम कर जलते दीये की
मद्धिम मद्धिम छनी रोशनी
जमी काजली आले की से
चलो डिठौना तुम्हें लगाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

रामनारायण सोनी
१७.०८.२१

शतदल

क्या कहते हो!
गरीबी कीचड़ है?
पुखराज, नीलम, और
हीरे निकले हैं इन्ही दलदलों 

सुचिते

क्या बताऊँ सुचिते!
ठगे, ठिठके इन नयनों के
ये रास्ते सभी
बहुत खारे और नम हैं
जिनसे तुम
उतरे हो हृदय में,
ये शब्द भी तो
कितने शबनमी हो गए हैं
हिफाजत करता हूँ इनकी
धूप और हवा से
महसूस होती है इनमें
खुशबू तुम्हारी ही

रामनारायण सोनी
११.०८.२१


हम, तुम और वे

जैसी ही मैं बाहर निकला

किताबों, धर्मों, जातियों,
देशों-प्रदेशों, लिंगों और रंगों से
तो बिल्कुल एक से हो गए हैं
मैं, तुम, और हम सब
हमारे एक से गुण है-
जन्म और मृत्य,
हँसना और रोना,
जागना और सोना,
प्रेम और घृणा
कटने पर लाल ही खून का बहना
और हाँ
हाथ, पैर, आँख, नाक, कान
गिनतियों में सब बराबर
मैं, तुम, वह! सभी सन्तति हैं
उस असीम की, विराट की
टूक-टूक हो गए हम
हम से मैं और फिर केवल मैं
इन सीमाओं से घिरते ही
मैं अमृत का पुत्र हूँ, तुम भी, वे भी
जिसकी रचना है यह समस्त
भुवनभर हथेलियाँ हैं उसकी
रम रहा है हो कर स्पन्दन
मुझ में, तुम में, सब में

रामनारायण सोनी
०८.०८.२१

सुन ए जिंन्दगी

सुन ए जिन्दगी!
तुम्हारे पास तो मील के कई पत्थर हैं
कुछ सुडौल सुन्दर से हैं उनमें
याद करना मुझे तुम
अपनी ठोड़ी पर उँगली टिकाए
उन सुन्दर पत्थरों पर बैठ कर
फुसफुसाना अपनी जुबान मैं
और सुन कर मैं...
मैं यहाँ बैठ कर मुस्कुराऊँगा
तुम भी मुस्कुराना मेरे संग संग

रामनारायण सोनी
२६.०७.२१

सुन ए जिन्दगी!
शूलों, भूलों और
परेशानियों के पलों में
इन्हे वो कहीं देख न ले
मेरे माथे पर पड़ी सिलवटों को
छिपा कर कही रख देना
बदले में मुट्ठी भर
मुस्कान बिखेर देना!
बस!

   रामनारायण सोनी

मुक्तक

प्रार्थना में बन्धन कहाँ? 
प्रेम में अनुबन्ध कैसा? 
अर्चना में प्रतिबन्ध कैसा? 
आराधना आत्मा की पुकार है 
आस्था जीवन का आधार है
सुमिरन प्रभु नाम की गुंजार है

नव प्रभात यह विहगों का, रव ले कर आया है
नव पल्लव, नव कुसुम, नवल दल, सर नीरज मुस्काया है
रजनी ने नीली चूनर में, तारक थाल सजाया है
नेहसिक्त इस पुण्य धरा ने कण कण यूँ महकाया है

सुनो सुनयने!

सुनो सुनयने!
ये रात और दिन!
रात, जो नींद कम
जाग अधिक ले कर आती है
दिन, जो थकन
और पेशानियों पर
पसीने छोड़ जाता है
लेकिन बीच में!
इसी बीच में थोड़े पलों के लिये
संध्या गौओं की
पावन धूलियाँ ले कर आती है!
मल जाती है गुलाल
तुम्हारे रक्तिम कपोलों पर
निम्बोलियों की कड़वी मीठी
महमहाती गन्ध के बीच
हरियाई डाल पर रक्त कण्ठी सुग्गे
चिटिर-पिटिर करते चिंचियाते हैं
तुम्हारी ही तरह
चुलबुले चंचरीक की गुन-गुन सुर
कानों में मथु घोल जाते हैं
अचानक मेरे स्वप्न पाँखी
प्रीति के गहन आकाश में
डैने फैलाये तुम्हारे
अलकों पर उतर आते है
कुछ भार सा महसूस करता हूँ
अपने काँधे पर
कि तुम हो कर जैसे त्रिभंगी
अपना शीश टिकाए हो
मधुभार से

रामनारायण सोनी
४.७.२१

कौन हो तुम?

कौन हो तुम?
कौन हूँ मैं?
शायद "मैं" और "तुम"
"हम" ही हैं
यह विलय कैवल्य है
यह विलयन प्रेम है
यह प्रेम तब अलौकिक है
यह रसायन अद्भुत है
*"रसो वै सः"*
यह देहात्म भाव शून्यता
हमारे प्रेम का परिमार्जन है
प्रेम दीवानगी है वह
जो पैरों में फुँघरू बाँध देता है
प्रेम धारा है वह
जो हृदय के गर्भ से बहना शुरू करती है।
प्रेम वह आह्लाद है
जो मरुमय जीवन में आनन्द भर देता है
बाहें जहाँ करुणा से फैल जाती हैं
प्रेम में प्रधान तू है और अन्तिम भी तू है 
तो फिर "मैं" हूँ ही कहाँ।
बस तू ही तू है।

रामनारायण सोनी

शब्दों के उस पार
 भावों के सागर में
   बस संधिकाल वही है
  मैं और तुम...

तुम से तुम को मिलवाऊँ

आओ तुम्हें मैं हँसना सिखाऊँ
जीवन का वह छोर दिखाऊँ
बैठे हम में सहज सलोने
ईश्वर का दर्शन करवाऊँ।।
तुम भी तो मुझ जैसे ही थे
चंचल चपल हठीले नटखट
हाथ थाम कर आओ संग संग
तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

जाने कौन गली में खोये
गुपचुप क्यों रोया करते हो
जीवन की भारी गठरी को
बेमन से ढोया करते हो ।
कूद पड़ो तुम उस अतीत में
जिसमे मस्ती यूँ झरती थी
किलकारी भरती सखियों की
वो टाँगा टोली तुम्हें दिखाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

कैंची से सीखी थी सायकल
कीचड़ में गेड़ी चलती थी
बीले की खाली खोलों की
कोयल रस्सी से बजती थी।।
लकड़ी के घोड़े पर बैठे
कैसे तुम दौड़े फिरते थे
उस कुलाम डाले की डाली
पर फिर तुमको लटकाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

ढूँढो फिर से उन यारों को
फिर से बचपन खड़ा हो सके
जिनको देख तुम्हारी आँखे
नेह नीर से सजल हो सके
उन भूले बिसरे रिश्तों की
स्वर्णिम सी उन शाम सुबह की
मद मस्ती की उस बस्ती की
मस्त गली में तुम्हे घुमाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

टिम टिम कर जलते दीये की
मद्धिम मद्धिम छनी रोशनी
जमी काजली आले की से
चलो डिठौना तुम्हें लगाऊँ।।
ताल तलैया नदी छापरी
याद तुम्हें भी आती होगी
चुरा लिया करते थे अमिया
उस बगिया को तुम्हें दिखाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

रामनारायण सोनी
१७.०८.२१


Wednesday, 16 June 2021

Love is a unidirectional



People say, they fall in love. See! Is love a slippery mud well? and/or is it a place of an accident. 
I don't think so. Look! Love is an ocean where one can be submerged into it just not willing to come out of it. 
Love is like a diode having unidirectional feature i.e. it's an act to enter into, certainly which has no exit. Love is an act of purest form in the entire Universe. So love is God.

Ramnarayan Soni
05.05.21

चाँद-रात


रिश्ता मेरा तुम्हारा
जैसे चाँद से रात का
जैसे अल्फ़ाज से आवाज का
जैसे नदी से धार का
जैसे प्रियतम से मनुहार का!!
हाँ!
देखता हूँ तुम्हें!
जब बन्द आखों से
कैसा अप्रतिम सौन्दर्य हो तुम!!
सुनता हूँ तुम्हें
जब कान बन्द कर के
कैसा एक मधुर सा गीत हो तुम!!
छुअन का अहसास
जैसे समीरण सा मृदुभास
मेरी जीवन बगिया का
जैसे मधुरिम मधुमास हो तुम!!

       रामनारायण सोनी
         ०५.०५.२१

प्रकृति का वाद्यवृन्द


आओ!
देखो जरा
केसे धरती और अम्बर
खिल उठे हैं
हवाएँ गुनगुना रही हैं
सागर की ये कैसी अठखेलियाँ
कलियाँ घूँघट खोले खड़ी हैं
तारों ने बाँध लिये हैं
पावों में घुंघरू
पछिपी बाँसुरी
बज उठी नन्दन वन में
देखो! सुनो!! थिरक लो!!!
सृष्टि और समष्टि
का मदिर-मदिर
बज रहा रसाल
प्रकृति का...
मधुरिम वाद्यवृन्द
डूब जाओ इसमें
अभी, हाँ अभी के अभी!!

रामनारायण सोनी
10.10.20

जिन्दगी तीन पगों की

जिन्दगी तीन पगों की

जिन्दगी एक किताब है
सिर्फ कुछ पन्नों की
पहले पर लिखा है जन्म
   जन्म ढाई आखर ही का
आखिरी पर दर्ज है मृत्यु
   सिर्फ ढाई आखर ही का
    पाँच आखर न तुमने लिखे
    न तुम से मिटाए जाएँगे
बीच के पन्ने ऊपर वाले ने
   छोड़े हैं खाली, निखालिस
   लिखो चाहो जो जो, चाहो जैसा जैसा
   लिखना है केवल तुम्हें ही
   कर्म की कलम,
   विवेक की शाई से
   या फिर कहानी, बहा कर खून से
   या तिलक कर दो किसी को
   कुमकुम के, रोली के, चन्दन के
   यही पन्ने कफन में सिल कर जावेंगे
   न रिश्ते, न नाते, न पैंतरे
   और न ही काँधे काम आवेंगे
   नाम के संग संग
   सारे ही इतिहासों में दर्ज किये जावेंगे।
   तो लिखो आज ही से
   प्रेम के ढाई आखर की नित नई कहानी
   सोचो! कितनी वामन है जिन्दगी
   सिर्फ तीन पगों की
   बना लो वामन से विराट जिन्दगी

     रामनारायण सोनी
      17.05.21

Tuesday, 15 June 2021

कैसी चुभन है ये

कैसी चुभन है ये

कुछ काँटे
होते हैं बस झूठ मूठ के
पर सच्ची क्यों होती हैं
चुभन उनकी
और दर्द उनके,
वे कुछेक खास कहानियाँ
बस भावों, शब्दो, अर्थों के साथ
जीने लगती है मुझ में पूरी की पूरी
भुला देती हैं अकसर
कि "मैं कौन हूँ"
लगता है 'मैं' मैं नहीं, वो हूँ
उन नकली सकली सहपात्रों के संग
क्यों चल पड़ता हूँ मैं हमेशा
भँवर में घिरी नाव की तरह
हँस नहीं पाया भले ही,
तुम्हारी हँसी के साथ
पर तुम्हारा दर्द
क्यों सालता है मुझे फाँस की तरह
फिर भी, बार बार
वे काँटे, वह फाँस, वे दर्द
लगते है कितने सगे हैं ये मेरे अपने

रामनारायण सोनी
१६.०६.२१

गीले अहसास

गीले अहसास

पानी पर बनी परछाई
सह नही सकती
हवा का एक हलका सा झोंका भी
बादल में बने
उभरे छिछले नक्श
बिखर जाते हैं आकाश में
पीछे छूटता नहीं कुछ भी
छूट जाते हैं वहाँ टूटे बिखरे पल।
किसने छुआ है
इन अहसासों को
जो अभी तक गीले ही हैं!
तिनकों सी टाँगों वाली और
पीली चोंच वाली यह टिटहरी
आधी रात में भी
यादों की तरह टिटियाती है
और फिर भोर के वे सितारे!!
नजरें जिन पर ठहरी पड़ी थी...
आस की, विश्वास की..
कुछ रोशनियाँ दरोगे की तरह आई
और उठा ले गई उन्हें भी!
टूटी दीवार की अधठुँकी खूँटियों पर
निखालिस टँगा रह गया क्यों
मेरा यह बेचारा मन,
मेले की भीड़ में गुम हुए बच्चे सा..
हाँ यह मन!!
सुन तो ए मेरे मन!
पीछे मुड़, भीतर चल

रामनारायण सोनी
१५.०६.२१

दुबका बैठा जीवन है

इस पसरे सन्नाटे में यह जीवन दुबका बैठा है।
हिरनो जैसी दौड़ छाेड़ टूटी खटिया पर लेटा है।।
घर में हैं घरवाले फिर भी घर क्यों खाली  लगता है।
शोर थमा बाहर का फिर नीरव क्यों गाली लगता है।।

वही हवा और पुष्प सभी वैसी ही सौरभ देते हैं।
फिर भी डरते डरते हम एक पाँव डगर पर धरते हैं।।
जाने कौन दिशा से आ वह चुपचाप पटखनी दे देगा।
हम डरे डरे सहमे घर में कब हमें फिरकनी कर देगा।।

तेरी गलती की सजा मुझे गर तू चुप ना बैठेगा।
तेरे पापों की गठरी को जबरन मेरे सिर रक्खेगा।।
इसीलिये डण्डा ले कर सड़कों पर शासन उतरा है।
संयम की अच्छी साध लिये मानव घर में पसरा है।।

तू छोड़ फिक्र इस दुर्दिन की अच्छे दिन जल्दी आवेंगे।
फिर से फुलबगिया महकेगी घर घर दिये जलायेंगे।।
फिर नई सुबह में नया जोश जीवन फिर से महकेगा।
मेरे इस आँगन में बबली बबुआ फिर से ठुमकेगा।।

रामनारायण सोनी
३०.०५.र१

थके पाँव

थके पाँव

वक्त ने खुद ही
वक्त चुराया है हम से
मेरी दहलीज़ से टकरा कर
क्यों लौट लौट जाती हैं
हवाएँ भी फिर नेपथ्य ही में
सदाओं की उँगली थामे
अब तो तुम ही
मुझी तक चले आओ!!!
निढाल से स्वप्न!थके पाँव!!
धुँधियाते गाँव! चुँधियाती ठाँव!!
रास्तों में बिछे अगिनत अलाव
अब तो तुम ही
मुझी तक चले आओ!!!
अँधेरे ये चिराग तले के
उड़ उड़ कर ढँकने लगे हैं
मद्धिम पड़ती दीपशिखाओं को..
तन की डोली भी उठती नहीं है...
प्राणों की कहारिनों से!
अब तो तुम ही
मुझी तक चले आओ!!!

रामनारायण सोनी
१५.०६.२१

Friday, 28 May 2021

कोरोना के कालमेघ

कोरोना के कालमेघ

नीड़ काँपे श्वांस के प्रस्वास पर प्रतिघात भारी।
क्रन्दनों के कण्ठ में खुद पवन भी है आज हारी।।
नील नभ की तारिका भी उम्र सी ढलती रही।
छातियाँ थी वज्र की पर रेत सी गलती रही।।
         कालिमा वे मेघ की छलती रही।।

आर्तनादी स्वर स्वयं ही चीखते हैं ये निगोड़े।
रक्त के कण विप्लवी ये धार के मारे हथौड़े।।
सहचरी कर जोड़ कर बस प्रार्थना करती रही।
मृत्यु के अभिलेख ही वह रात भर पढ़ती रही।।
         कालिमा वे मेघ की छलती रही।।

थी जहाँ भुजदण्ड में उस शौर्य की गौरव पताका।
पदतलों की ठोंकरों से थी टूटती गिरती शलाका।।
बोझ से पलके झुकी वे अश्रुकण झरती रही।
काँपते इस क्षीण कर से तीलियाँ गिरती रही।
         कालिमा वे मेघ की छलती रही।।

दीखता न शत्रु कोई बिन समर सब लोग हारे।
वेदना से प्राण हारे देखते परिजन बिचारे।।
मृत्यु वे भीषण लकीरें भाल पर लिखती रही।
जीवनी बस आस के पल टूट कर गिनती रही।।
         कालिमा वे मेघ की छलती रही।।

रामनारायण सोनी
२८.०५.२१

Wednesday, 28 April 2021

कर्ज मिट्टी का

कर्ज मिट्टी का

मैं गुनाहों के तले अपने दबा ऐसे
कर्ज मिट्टी का चुकाऊँ मैं कहाँ कैसे?
पेट मेरा उम्र भर से तू सदा भरती रही
भूख मेरी प्यास मेरी क्यूँ अधूरी ही रही
तू जली है, तू गली है पालने संसार ऐसे
कर्ज मिट्टी का चुकाऊँ मैं कहाँ कैसे?

फेंक बीजों को तुझी में सो गया घर में
तू लगी थी रात दिन ही प्यार भर उर में
एक दिन फसलें पकी मैं काट लाया हूँ
गंदगी अपनी वहीं  मैं छोड़ आया हूँ
ग्लानि से अपनी ही मैं तो भर गया ऐसे
कर्ज मिट्टी का चुकाऊँ मैं कहाँ कैसे?

तू धरित्री, पालियित्री इस भुवन को धर रही
इस समूची सृष्टि में ही नित नदी ये बह रही
पादपों के और तृणों के रोम तन में धारती
गर्भ में ज्वालामुखी पर उफ नही उच्चारती
जान कर भी मैं सभी यह हो रहा हूँ मूढ़ ऐसे
कर्ज मिट्टी का चुकाऊँ मैं कहाँ कैसे?

इन रगों में रक्त जो दिन रात बहता है
मेरे इस तन में तेरा ही वास रहता है
मुझ से पहले, बाद में भी तू रहेगी माँ
नस्ल मेरी, पुश्त मेरी फिर कहेगी माँ
भूल पाऊँगा कहाँ एहसान सब कैसे?
कर्ज मिट्टी का चुकाऊँ मैं कहाँ कैसे?

रामनारायण सोनी
२५-०४-२१

Friday, 26 March 2021

खपरैली बस्ती में

खपरैली बस्ती में
आओ फिर लौट चलें, खपरैली बस्ती में

भींच लिये ओंठ और भींची जब आँख मेरी
मन ही मन लगता है अंबर ने पाँख धरी
भैंसों की पीठों पर फिर चढ़ बैठें मस्ती में
पोखर के छिछले से पानी की छप छप में
कनुवे की किलकारी गूँज रही ढप ढप में
आओ फिर लौट चलें, खपरैली बस्ती में।
                           खपरैली बस्ती में।।
तन मन सब भींग गया यादों के झुरमुट में
चूजों संग दौड़ रहा मन घूरे पर सरपट में
बोल रही शीशी में पनचक्की पुक पुक कर 
कोयल जहँ कूक रही आमों के उपवन में
भर ले पोटाश जरा लोहे की गजगुण्डी में
लहसुनिया फोड़ें भित्ती पर चल मण्डी में
                           खपरैली बस्ती में।।
चाचा के चौंतर पर खेलें चंग पौ और चौपड़
तारा और मुन्नी की सुन पाँचों की खड़ खड़ 
मस्तानी टुल्लर जो खेल रही है लंगड़ी भी
खेलें ढप्पी और पव्वा नीम तले दुकड़ी भी
अन्नी-चन्नी की धूम मची चन्दन के औसारे
कपड़े की गेंद बना गधामार टप्पे भर मारे
                           खपरैली बस्ती में।।

रामनारायण सोनी
२६.०३.२०२१

Saturday, 20 March 2021

गाओ! गीत कोई ऐसा

तुमने मेरी पुकार को 
शब्द भर समझा
यार मेरे !
वे मेरे हृदय के स्पन्दन हैं
और,
मेरे संयम की परिधियाँ
मेरी अपनी ही निर्मिति हैं
सागर के साहिल की तरह
मेरा यह प्रेम सागर
किनारों पर लगा होगा छिछला
पर जरा भीतर आओ तो!
डूब कर देखो संग - संग!!

यही जिंदगी है क्या ?
कि रो कर आये
और
रुला कर चल दिये
मुश्किल से मिले इस अधबीच को 
थोथी उम्र से नहीं....
उपलब्धियों, मीठे रिश्तों से नापो, 
फिर..उल्लास से भर लो..

कान, आँख, नाक
यहाँ तक कि स्पर्श को
बाहर रख कर भीतर चलो
तुम्हारा सहोदर 'आनन्द'
प्रतीक्षा में बैठा है।

तुमने इस घने अँधेरे को 
अमावस समझ लिया 
ऐसा बिल्कुल नहीं है, 
तुम्हारे सुन्दर पावन कक्ष के
सभी द्वार और खिड़कियाँ बन्द पड़ी हैं
खुशबू लेकर आई 
मलियानिल दस्तक देकर
लौट - लौट गई।
प्रकाश और ताजगी
द्वार पर खड़ी हैं

वक्त की दीवार पर टँगी
घड़ी की सुइयाँ
अपने पद-चिन्ह नहीं छोड़ती हैं।
ताले नहीं होते हैं
इन मिट्टी की गुल्लकों में
टूट कर बिखरती है
और अपना सब बिखेर भी देती हैं

बो कर देखो
मुस्कुराहटों के बीज
खेत अपना हो या पराया,
संगीत वीणा के तारों में नहीं
उसके स्पन्दन में है।
बैठा नही रह जावे
गीत कोई कण्ठ के उस पार
गुनगुनाओ उसे, क्योंकि
जरूरत है तुम्हें, मुझे और सब को यही

रामनारायण सोनी
२१।०३। २१

आकाश में घर नहीं बनते

डर लगता है मुझे बहुत

उन ऊँचाइयों पर खड़े होने से
झाकने से झाँई आती है जहाँ से
सोचता हूँ मैं अकसर कि..
तुम कितने ऊँचे हो गये हो
दृष्टि विहंगम तुम्हारी देख ही लेगी
मुझे ज़मीन पर कहीं न कहीं
लगता है अब तो..
जैसे बीहड़ में आ गया हूँ
पर तुम्हारे पंख बड़े हो गये हैं
नजरें भी बादलों को भेद कर
नीहारिकाओं में उलझ गई तुम्हारी
स्मृतियाँ भी फेंक दी है कहीं तुमने!
लौट भी आओ इस बिखरते नीड़ में
अपनी धरती, अपनी शाख पर
शाम होने से पहले!
सुन सको तो सुनो!!
आकाश में घर नहीं बनते!

रामनारायण सोनी
१९.०३.२१

Tuesday, 16 March 2021

कहाँ गए हो!

मैंने बादल की ओर देखा
शायद बरसात हो जाए,
फूल को छुआ कि मुझे
शायद तुम्हारी छुअन का
कोमल अहसास हो जाए

कलम उठाई कि तुम्हें लिख डालूँ
पर तुम शब्द तो हो नहीं हो
जुबां भी जिसे न बोल पाए
कि कहीं काँपते अधरों पर ठहरी
नयनों की खारी बूँद न ढुल जाए

मैंने हवाओं की खुशामदें की
कि वे शायद कोई खबर लाए
पर वे लौट गईं उल्टे पाँव ही४ पैरों के वे निशान भी
रास्तों पर से नोच गया है कोई

रामनारायण सोनी

रूही हो तुम!


हाँ तुम!
तुम कौन हो?
क्या तुम वही हो?
नहीं जो लोग देख रहे हैं..
वह तुम नहीं हो..
सुचिते!
मेरे लिये तुम!
"तन्वी नहीं, रूही हो"
मैंने घटती बढ़ती
तुम्हारी देह के पार...
तुम्हारे अन्तर का सौंदर्य
मर्म की सुकोमलता
और मेरी होने का
अहसास देखा है
सिर्फ वही हो
मेरी, तुम!

रामनारायण सोनी

तुम्हारा ही शब्दकोष



मैने कह दी है
अपनी सारी बातें
उस भाषा में ही
सुन और समझ भी रहे हो तुम
अच्छी तरह से
इसीलिये तो...
मैं भाग्यशाली हूँ
मेरी यह भाषा मौन है
जिसका पूरा शब्दकोष
तुमने ही तो लिखा है।

रामनारायण सोनी

कैसे कहूँ



मैंने बादल की ओर देखा
शायद बरसात हो जाए,
फूल को छुआ कि मुझे
शायद तुम्हारी छुअन का
कोमल अहसास हो जाए

कलम उठाई कि तुम्हें लिख डालूँ
पर तुम शब्द तो हो नहीं हो
जुबां भी जिसे न बोल पाए
कि कहीं काँपते अधरों पर ठहरी
नयनों की खारी बूँद न ढुल जाए

मैंने हवाओं की खुशामदें की
कि वे शायद कोई खबर लाए
पर वे लौट गईं उल्टे पाँव ही
तुम्हारे पैरों के वे निशान भी
रास्तों पर से नोच गया है कोई

रामनारायण सोनी

Monday, 15 March 2021

अग्निवेश

आँसू
कितने वजनी हैं ये
निकलते ही हलके हुए जाते हो।
आँसू हमारे अन्तस का स्राव है
हँसते मुखौटे के ठीक पीछे
ठण्डे व्रणों से रिसता सैलाब है
भावों का खद-खद कर उबलता
रेंगता फ़िसलता मन्थर रिसाव है
इसे!!
रिसने दो!, बहने दो!,
उठने-गिरने दो!
शायद इन अस्तरों के तले
शान्ति के महीन अंकुर उग आवें
शायद इन अंकुरों से प्रार्थना, पूजा
प्रतिवेदन से अर्चना की
थाल सज्ज हो जावे
और ...
पाप, ताप, शाप के अग्निवेश से
कूट की तरह बाहर निकल जावे।

रामनारायण सोनी
१५.०३.२१
  

Wednesday, 10 March 2021

अमृता से विष बुझाएँ

मैं नवाऊँ शीश अपना जिस धरा में स्वेद तेरा
पुष्प का परिमल बना है श्रम विरंजित रक्त तेरा
पूष की जाड़ों भरी हो वह सिहरती रात भीषण
जेठ के हों दिन तपिश के कर रहे हों आग वर्षण
तू गला है और तपा है कर्ज माटी का चुकाने
सब लगे हैं उन श्रमों को स्वार्थ में अपने भुनाने
          हाय! ये हतभाग तेरे।

खेत के विज्ञान हमने विश्वभर में खोज डाले
फिर सभी चुन चुन हमारी भूमि में विष घोल डाले
नीड़ और वे पेड़ मेढ़ों के सभी तो काट डाले
कूप वापी नद नदी जल स्रोत सारे सोंख डाले
अब न होंगी मधुपरी वें जो परागण में लगी थी
और कीटों को निगलती पाँखियाँ भी तो लगी थी
          हाय! कितने वे बिचारे।

पूर्ण वसुधा के निवासी थे कुटुम्बी लोग अपने
विश्व अब बाजार बनकर लूटता घर-बार, सपने
गो धनों की थी धुरी पर यह कृषी सम्पन्न सारी
अब मशीनें आग उगलें सभ्यता रौंदी हमारी 
छोड़ कर अपनी विरासत दौड़ अंधी दौड़ लेंगे
अन्त में अपना करम ही पत्थरों से फोड़ लेंगे
          हाय! ये हतभाग मेरे।

आओ लौटें फिर सुनहरी वो चिरैया ढूँढ लाएँ
भारती के भाल से यह विषबुझी कालिख मिटाएँ 
गाय, गौरी, पनघटों की बस्तियाँ फिर ढूँढ लाएँ
शाप देती भूमि के विष अमृता ही से बुझाएँ
फेंक कर घातक रसायन उर्वरा फिर खोज लाएँ
डूबती वैदिक कृषि को फिर नया जीवन दिलाएँ।
          अब न हो हतभाग मेरे।

रामनारायण सोनी
१०.०३.२१

Tuesday, 9 March 2021

बूँद बूँद अहसास

ज्योत्सना भरती कैसा ताप,
  रजतमय रश्मि लगे अभिशाप।
प्रीत के पाहुन बसे विदेश,
  राह पर टिकी दृष्टि अनिमेष।
लुटा है मन का सब अधिकोष,
  दिलाये कौन मुझे परितोष।
जगी है प्राणों में यह प्यास,
  जगा फिर बूँद बूँद अहसास।।१।।

जगा जब बूँद बूँद अहसास,
 निखिल अवनी में गूँजे हास।
जगे नीरव में अस्फुट छन्द,
 महकती मलयज में मकरन्द।
कहीं विकसे सर में शतदल,
 प्रणयिनी तरुणी है आकुल।
तड़ित है अधरों पर मृदु हास,
 जगा जब बूँद बूँद अहसास।।२।।

अजब सा गूँजा है कलरव,
  मधुर से स्वप्न जगे अभिनव।
कुलाचें भरता मन मद-भार,
   बदन में रोम पुलक का भार।
विकम्पित अधरों में निःश्वास,
  नयन में नीर किये अधिवास।
रमा है कण कण में मधुमास,
  जगा जब बूँद बूँद अहसास।।३।।

रामनारायण सोनी
१०.०३.२१

दादी की प्रभातियॉँ

मेरे गाँव की सौंधी मिट्टी पर
मैं जब जब माथा धरता हूँ
दिव्य गंध के दिव्य लोक में
ऐसे ही विचरण करता हूँ

जहँ दादी माँ भिन्सारे में
घट्टी की घुर-घुर ताल मिला
गाती प्रभातियाँ भक्ति मयी
सुन बचपन का फूल खिला

भोर हुए पर प्राची से जब
गुदड़ी बन सूरज आता था
बैठ चटैया पर गोदी में में 
दादी माँ के इतराता था

एक सहेली प्यारी चिड़िया
चिरिप चिरिप कह जाती थी
खिड़की पर से चोंच दिखाती
मुझको  बहुत चिढ़ाती थी

Monday, 8 March 2021

सपने हो न सके अपने

हम तुम दोनो मौन रहे, जग व्यस्त रहा अपने अपने
वह विभावरी बीत गई, अंचल में हाय! लिये सपने
वे उठे गिरे फिर गिरे उठे, भावों के भ्रमर पिपासु थे
अपनी तरणी फिर फिर टूटी, वे विधि के झंझावात तने
अधरों के द्वार न खोल सके वे शब्द बिचारे थे बौने
ऊषा की गागर भरी नहीं, वे लौटे गये रीते सपने।
            सपने हो न सके अपने।।
कहीं ढुलक न जाय कभी, नीरज नयनो से अश्रु प्रिये!
अपनी हस्त लकीरों ने हा! कितने ही आभिशाप जिये
पर महीन से धागों से ही बँधे रहे हैं सजल हिये
कितनी अकथ कहानी छूटी क्रन्दन का अभिसार लिये
अपनी दीपशिखा की लौ में अपने ही मन होम किये
तृषा प्राण की बुझी नहीं, सब बिखर गये रीते सपने।
              सपने हो न सके अपने।।
उस उपवन को सजा मिली जिसने बसन्त को पाला था
खाली माटी कलशों में मधु आसव विधु का डाला था
चन्दन रोली के रंग लिये जिसने आँगन रंग डाला था
थोथे जीवन में ढंग लिये हर पल गरल निवाला था
नख से शिख तक ओढ़ा हमने गम का वही दुशाला था
मृषा आस की बेल मरी, और सूख गये अपने सपने।
            सपने हो न सके अपने।।
रामनारायण सोनी
०८.०३.२१

Friday, 5 March 2021

मैं और तुम

एक ही तो है

नहीं मिलते हो तो
खोजता फिरता हूँ
तुम्हें पाने को
यहाँ-वहाँ, कहाँ-कहाँ

मिलते हो जब भी तुम
भूल जाता हूँ मैं सब कुछ
और मुझे भी
शायद एक ही हैं
मैं और तुम

Thursday, 4 March 2021

द्वार की वह कुण्डी

द्वार की वह कुण्डी
व्यर्थ ही है 
जिसे तुमने खटखटाया नहीं
वे वातायन केवल
दीवार के छेद भर हैं
न प्रवेश करती हों जिनमें से
वे हवाएँ लौटी हों...
तुम्हें छू कर 
अब डोलती रहती हैं
इन दीवारों पर इधर उधर...
..प्रतिच्छायाएँ तुम्हारी
इसलिये इसे मैं घर नहीं मानता
बेवतन-रूह ही
बन गई हैं अब तो
तुम बिन

थामे रहना

छोड़ना मत अब हाथ मेरा
क्योंकि...यकीनन
मैने छोड़ दिया है पूछना अब
दुनिया से भी, 
खुद से भी
..कि हम कहाँ जा रहे हैं?

जोगन

पद्म का 
यह मौन
और पद्मासन
जैसे तुम!

तुम योगी हो गये हो और...
..और
मैं जोगन

        रामनारायण सोनी
२.३.२१

प्रेमकुटी छाई है

नयनों के पथ से आये तुम
अन्तःपुर के खोल किवारे
दिल की प्रेमकुटी में टाँगे 
मैंने प्रीत के  बन्दनवारे

बेंदी माँडों म्हावर माँडो
काजर लाओ, चौक पुराओ
धानी चूनर कोई रंगा दो
देहरी जगमग दीप धराओ

वासन्ती रस रंग रमी है
अंग अंग उमगी अंगनाई
मन की गली गली बजती है
साँसों की सरगम शहनाई

श्याम मेघ अलकावली ओढ़ी
चंचरीक की गुन गुन गाजी
पोर पोर पुरवाई महकी
नयन कोर कजराई आँजी

कोई दिठौना ठोड़़ी धर दो
नजर उतारो, डगर बुहारो
प्रेमनगर की पनिहारी हूँ
रंग पलाश के गागर डारो

रामनारायण सोनी


मौन छाया बोलती है

"मौन छाया बोलती है"

मौन छाया भी बहुत सी बात कहती है
कान मन के तो लगा कर तू सुन जरा।

आज ठहरे इन पलों के पंछियों के साथ हो 
दो घड़ी संग घूम लें तू हाथ थामे सुन जरा।

गुगुदाते मलमली इस दूब को फिर से छुएँ
शाख पर के गुल की महक तो सुन जरा।

शाख के गुल चूमते उस चीर ही की कहानी
यह पवन देता गवाही कान देकर सुन जरा।

ढूँढ लें पदचिन्ह भी इस राह में होंगे कहीं
द्रुम दलों की आहटें यूँ बोलती है सुन जरा।

अंजुरी भर पुष्प की वे पंखुड़ी बिखरी यहाँ
पोर में खुशबू रमी है आज भी तू सुन जरा।

रामनारायण सोनी 

मौन है चिर प्रीत मेरी

मौन है चिर प्रीत मेरी शब्द के विनिमय नहीं है
नयन भींगे वेदना की धूप में अभिनय नहीं है
मौन रजनी, मौन परिमल, मौन है वाचाल तटिनी
मौन उर में बन्दिनी इस प्रीत का परिणय नहीं है
चल चलें फिर गाँव अपने, स्वप्न पाँखी खोल डैने
इस हृदय की प्यास का तो शोर से परिचय नहीं है
       
मौन अधरों के निलय की रक्तिमा कुछ कह रही है
इस निरे निस्पन्द में भी भाव सरिता बह रही है
इन पलक की ओट में ये पुतलियाँ कब चुप रही है
चल चलें फिर गाँव अपने, खोल लें गलबाँह अपनी
इस नगर की धुन्ध में तो सूझता कुछ भी नहीं है

सीख ले इस मौन से तू इस गगन के इस धरा के
गीत सुन तू भाल विधु की चाँदनी की उस सुरा के
धड़कनों की मौन कथनी कह रही मन की त्वरा के
चल चलें फिर गाँव अपने, खोल दें अनुबन्ध सारे
प्रीत की पावन नगर में सुर सजा लें उर धरा के

रामनारायण सोनी
२५.०१.२०२१

शब्द में हैं अर्चनाएँ

है अभी तो रक्त में 

घुलती हुई संवेदनाएँ
रागिनी से सिक्त है इन
शब्द में ये अर्चनाएँ।
प्राण की वंशी निनादित
हैं गमकती व्यंजनाएँ
पुष्प की सौरभ लिये
गुंजन भरी अभ्यर्थनाएँ।।

रात जागी कामिनी के
कुन्द होते करतलों में
कुनमुनी नलिनी अलापे
प्रीत के मधुरिम पलों में।
रंग रांची है महावर
नव उदित है कोंपलों में
फिर रुहानी सी कहानी
कह रही इन शतदलों में।।

रामनारायण सोनी
२७.१२२०२०

तुम पास हो तुम्हारे
मैं भी वहीं तो हूँ
मैं खो गया मुझी से
मैं भी वहीं तो हूँ

रामनारायण सोनी
२८.१२.२०२०

तुम द्वार किसी के मत जाना

मन के पावन उपवन में जब पुष्पों सी रस गंध न हो
वन्दन अर्चन की समिधा का हवि से ही अनुबन्ध न हो
मंत्रों के अक्षर अक्षर में जब हो शुचिता ना अविरल
कैसे होंगी प्रीत यज्ञ की आहुतियाँ निर्मल निश्छल
           तुम द्वार किसी के मत जाना
           तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹

खंजन नयनों की आभा में नमी नेह की दिखे नही
आँगन में उर के भीतर जहँ भाव रसीले टिके नही
सँझवाती के आस दीप में चाह की तेल न बाती हो
अधरों पर आगत आवन की ना मुस्कान सुहाती हो

           तुम द्वार किसी के मत जाना
           तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹

बारिश की झिरमिर बूँदों से मन गीला ना हो पाये
लदे आम्रवन मोरों से पर कोयल कूक नहीं पाये।
मेघों की गर्जन सुन कर भी मन मयूर जहँ मौन रहे
नयनों की कोरों से काजल जमे अश्रु की व्यथा कहे।।
            तुम द्वार किसी के मत जाना
            तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹

प्रणय पुष्प न झरते हों वन चाहे रहे रसाल भरा
चन्दन रोली न सजती हो मलयाचल हो भरा
भरा
कल कल करते हों प्रपात पर क्षार सिन्धु सा जल हो
तपती माटी के माथे पर मढ़ता कोई गरल हो
            तुम द्वार किसी के मत जाना
            तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹

रजत रश्मियाँ प्राणों में जब शीतलता संचार करे
कुन्द कली के कानों में जब भ्रमर कोई गुंजार भरे
मन के नन्दन कानन में जब वेणु निनादित हो जाए
किसलय का सा अगन धरे अन्तर्मन आतुर हो जाए।

            तुम द्वार अन्य के मत जाना
            तुम गीत वृथा के मत गाना🌹

     रामनारायण सोनी
      १२.०१.२१

यहीं तो हो तुम!

मन मीत मेरे!
आज अन्तस के
कुम्हलाए पुष्प फिर खिल उठे
जैसे तुम यहीं तो हो
मैंने तो बस सरगम का 
आलाप भर दिया था
पर तुमने कानों में उँडेल दिया
पूरा का पूरा राग विहाग
लगता है जैसे
यहीं तो हो
नही! नहीं!! यहीं हो तुम !!!

जब तुम न थी

तुम न थी, जब तुम न थी

तुम न थी तब रश्मियों में, उज्ज्वला का भास ना था।
रागिनी में स्वरलता का, कम्प ना था राग ना था।
स्वाँस में प्रश्वास में तो, बस पवन था प्राण ना था
तुम न थी तो उर्मियों में, प्रीत का मधुमास ना था।।
                    तुम न थी, जब तुम न थी

थे पुहुप बहु रंग के बहु गंध के बहु भाँति के वे
तुम न थी तो वे वियोगी, बाग के अधिभार से थे।
उन मुंडेरों की विधाएँ, थी अहा सुनसान कितनी
मधुपरी के वे अधर भी, रज बिना मधुभार से थे।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

चाँद की थी ज्योत्सना वह रोप्यमय आभास होती
थी प्रवालों में प्रखर आभा प्रवर प्रतिभास होती।
शून्य सी सम्वेदना थी, चहुँ दिशा अधिवास होती
पर हृदय की वीथियाँ तुम बिन कहाँ रनिवास होती।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

थे अधर शहदी, मधुप की गुंजनें मल्हार गाती
फरफराती तितलियाँ पुष्प को फिर फिर जगाती।
तुम न थी तो उन पलों की, कामना कैसे सुहाती
तुम न थी तो गीत कैसे, कोकिला ये छ्न्द गाती।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

तुम मिली अँकुवा गये नव, कोंपलों के गुल्म सारे
सन्दली होती हवाएँ, सब प्रमादी गीत हारे।
वल्लरी वन की लताएँ, झूलती साँझे-सकारे
मुग्ध मन के द्वार तुम बन, प्रीत के पाहुन पधारे।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

      रामनारायण सोनी
         ११.१२.२०

कविता की कहानी


जब कविता 
थी अपने शैशवकाल में,
नन्हे नन्हे डग चलीं थी
भावनाएँ अँकुआ रही थी
हल्के जर्द पड़े डायरी के पन्नों में 
सूखी वे गुलाब की पंखुडियों
मुस्कुराई, महमहाई...!
काल की कील पर टँगी
सुइयाँ पीछे दौड़ी, 
ठिठकी, कहीं ठहर गई
वहाँ, जहाँ लिखीं थी
ढाई आखर की
छोटी सी विराट कहानी...!

कोई तो भगीरथ है

कोई तो भगीरथ है
  जो उतार लाया 
   गंगा को स्वर्ग से
न तो मैं गंगा हूँ
  न ही भगीरथ
कौन है वो
  जो कर गया यह सब
   बस एक अहसास है मुझे
   बस एक अबोध सा बोध है
पर जो कुछ भी है
 कितना  सुन्दर है
  कृपा का वर्षण है
  तुम-हम बस भींगते रहें

छुप्पा-छुप्पी

छुप्पा-छुप्पी

आओ चलें
छुप्पा-छुप्पी खेलें
मैं अपनी आँखें
अपने हाथों से छुपा लेता हूँ
तुम मुझे पीछे से चपत लगा कर
फिर से कहीं छुप जाओ
चलो वह मासूम सा बचपन
फिर ढूँढ लाएँ
फिर बनें हम संगतराश
चिकनी गीली माटी के
गुड्डे गुड़िया बनाएँ
उन लम्हों में सुनहरे बर्क लगाएँ

दीप की लौ सा जलूँ

दीप की लौ सा जलूँ वह पथ तुम्हें जो दीख जाए
मेघ सा हो कर गलूँ मैं जब धरा पर बीज आए।
कैद सीपी में रहूँ मैं जब तलक मोती न निबजै
बीनता हूँ कटकों को राह तू जिस ओर जाए।।

🌹डबउबाये हैं नयन क्यों क्या कसक मन में धँसी
काँपते कर में विकलता क्यूँ फाँस मन में है फँसी।
मैं खड़ा हूँ सन्तरी बन तुम अभय के शल्क में हो
फेंक दो बीमार सोचें अब अधर पर हो हँसी।।

यादें कैसी कैसी

कुछ की आती नहीं

तो किसी की जाती नहीं
कुछ जा कर लौटती हैं फिर फिर
ले जाती है हमें वहाँ
तो कभी लाती हैं तुम्हें यहाँ
रखती है अकसर
दोनों को जोड़ कर
ये यादें भी ना! बड़ी अजीब है

यादें कैसी कैसी?
कभी आबादी में अकेला
तो कभी वीराने आबाद करती
खेलती हैं कभी छितरे बादलों से
बटोर लाती है वे तुम्हारे सब्ज लफ़्ज़
फुसफुसाती है प्यार से कानों में
बिम्बित करती है तुम्हें
फूलों के महकते परागण में
झिलमिलाते ताल के जल में
दौड़ती ही फिरती हैं
यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ
ये यादें भी ना! कितनी करीब हैं
नाबाद है, पूँजी है, सनद है
मन की तिजोरियों में

रामनारायण सोनी
२६. १ .२१

Sunday, 7 February 2021

शाम के बाद दिन कहाँ?

वक्त तो वक्त
नज़र भी 
कहीं और ही व्यस्त है।
जानते नहीं?
कि वे फूल 
खिलते है रोज
कि कहीं दृष्टि पड़ जाए 
उन पर भी, पर
शायद पता नहीं इन्सान को
मुरझाई कलियाँ, 
कभी कहाँ खिलती है
आज की नदी आज बही,
कल वही कहाँ मिलती
वक्त है कि मिलता नहीं है
पर वक्त रुकता ही कब है?
*चुक जाऊँ वक्त के साथ*
तो वक्त क्या करे
*शाम के बाद दिन*
*होता ही कब है?*

रामनारायण सोनी

मौन छाया बोलती है

मौन छाया बोलती है

मौन छाया भी बहुत सी बात कहती है
कान मन के तो लगा कर तू सुन जरा।

आज ठहरे इन पलों के पंछियों के साथ हो 
दो घड़ी संग घूम लें तू हाथ थामे सुन जरा।

गुगुदाते मलमली इस दूब को फिर से छुएँ
शाख पर के गुल की महक तो सुन जरा।

शाख के गुल चूमते उस चीर ही की कहानी
यह पवन देता गवाही कान देकर सुन जरा।

ढूँढ लें पदचिन्ह भी इस राह में होंगे कहीं
द्रुम दलों की आहटें यूँ बोलती है सुन जरा।

अंजुरी भर पुष्प की वे पंखुड़ी बिखरी यहाँ
पोर में खुशबू रमी है आज भी तू सुन जरा।

रामनारायण सोनी 

Thursday, 21 January 2021

ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं

"ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं"

मौज में जब चलती हैं
खेलती हैं सरोवर मे शान्त जल से
उछालती हैं अलमस्त लहरों को!!
उपवन के फूलों से चुराती हैं
और ला कर उन सुगन्धों को
डाल जाती है नथुनों में मेरे
....ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं!!

सूखे बिखरे पत्तों को बजाती है
सितार की स्वर तंत्रियों सा
जगाती है उनींदी प्रणयिनी को
खोलती है वे शनै शनै
सुबह-सुबह अलसती अँखुड़ियों को
बिखेर देती है फिर अलकों को
उदात्त से उन स्कन्धों पर
देवदार की गहन छाया
ओढ़ ली हो जैसे बाजुओं पर
...ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं!!

लहरा देती है चीर को
मंदिरो की ध्वजाओं सा
बिछा देती है स्निग्ध  दरियाँ
नदी की देह पर नर्म शैवाल सी
लाती हैं चिट्ठियाँ दूर दूर से
तमाल के भीने पृष्ठों पर
बिन लिखी बिन कही कहानियाँ
...ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं!!

उठाती है गोद में रज कणों को
झुलाती है लाड़ प्यार से
चाँद के झूले पर
बिठाती है शिखर के शीश पर
सुवर्णमयी मुकुट सा
सजाती है रंगोलियाँ
फूलों की पंखुड़ियों से
टेसू, कचनार, अमलतास, गुलमोहर की
...ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं।

ये हवाएँ कभी गर्म है, कभी सर्द
कभी अमृत सी पवित्र
कभी जहर सा कहर
कभी जीवन के प्रहर
कभी पंचतत्व में से एक तत्व
सबके जीवन का सत्व
सुनो सब!!!
मत छीनो इनसे इनका निसर्ग
क्योंकि ये जियेंगी भी
तो सिर्फ हमारे, तुम्हारे, सब के लिये
....ये हवाएँ हमें पुकारती हैं

....ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं।

    रामनारायण सोनी
     २०.०१.२१

समय नही है

समय नहीं है

क्यों? समय नहीं है?
"क्योंकि समय नहीं है,"
या कि समय नहीं है?

घड़ी कि सुइयाँ समय नहीं है
प्रहर की घड़ियाँ समय नहीं है
मील के पत्थर समय नहीं है
काल के चक्र में लिखे पुराण
लिर्फ गाथाएँ है समय नहीं है!!

समय अपने समय से बीतता रहता है
हम बस कहते ही रहते हैं
समय है, पर जाने क्यों
अपने और अपनों के लिये समय नहीं है!!

उठो! जागो!!
समय कहीं यह नहीं कह डाले 
कि मेरे पास....
.....मेरे पास समय नहीं है!!!

      रामनारायण सोनी  
      २२. ०१. २१

Wednesday, 20 January 2021

जीवन कितना जी पाता है


अपने सपनों का इन्द्रजाल, सम्मोहन का महाव्याल

गगन चूमती आशाओं के, मगरी चढ़ते अमित ख्याल
उच्छ्वासों के बीच टँगी भूधर सी लिप्साएँ विशाल
युगों युगों से संघर्षो की यही कहानी दोहराता है
        जीवन कितना जी पाता है

अपने शुष्क मरुस्थल में ही मृगशावक प्यासे दौड़े
अपने घावों को धोने में निज के अश्रु हुए थोड़े
अपने तन में अपनों ने ये रिसते व्रण ही हैं छोड़े
जग के करुण कथानक में क्रन्दन से ही नाता है
             जीवन कितना जी पाता है

इस पाप-पुण्य की पोथी में काले पीले पृष्ठ भरे
कनक घटों के अन्तर में अमिय नहीं हैं जहर भरे
सच के माथे मुकुट चढ़े ये झूँठ जड़े हैं शूल धरे
पल पल के उत्पीड़न में मन टूट टूट जाता है
          जीवन कितना जी पाता है

रंगों से रँगे वितान सभी इक दिन श्याही हो जाते हैं
फूले प्रसून के पादप भी तप कर कहीं बिखर जाते है
श्यामल मेघ सुहानी सुषमा छोड़ छाड़ गल जाते हैं
झर झर करता निर्झर फिर फिर पत्थर से टकराता है
       जीवन कितना जी पाता है

पग पग पर छलती छलना में बाँह थाम कर रखना
तूफानों में इस कश्ती की पतवार थाम कर रखना
कालमेघ के भीषण रव में सिर पर हाथ धरे रहना
तेरी करणा की बरखा में यह मन भींग भींग जाता है
       तब ही जीवन जी पाता है

    रामनारायण सोनी
        २०.०१.२१

Saturday, 16 January 2021

वहीं तो हूँ

तुम पास हो तुम्हारे
मैं भी वहीं तो हूँ
मैं खो गया मुझी से
मैं भी वहीं तो हूँ

रामनारायण सोनी
२८.१२.२०२०

तुम न थी, जब तुम न थी

शब्द में हैं अर्चनाएँ



है अभी तो रक्त में 
घुलती हुई संवेदनाएँ
रागिनी से सिक्त है इन 
शब्द में ये अर्चनाएँ।
प्राण की वंशी निनादित 
हैं गमकती व्यंजनाएँ
पुष्प की सौरभ लिये 
गुंजन भरी अभ्यर्थनाएँ।।

रात जागी कामिनी के 
कुन्द होते करतलों में
कुनमुनी नलिनी अलापे 
प्रीत के मधुरिम पलों में।
रंग रांची है महावर 
नव उदित है कोंपलों में
फिर रुहानी सी कहानी 
कह रही इन शतदलों में।।

रामनारायण सोनी
२७.१२२०२०



पतझड़ फिर जीत गया


पल पल ढलते सूरज ने
लम्बा कर दिया मेरा अपना साया
एक और दिन की निर्मम
शाम का धुँधलका इसको फिर लील गया

चलो, अलाव जला लें..!
बुझते सपनों को
ताप में गुनगुना बना लें
अनचीते जुगनू से इन पलों की
मशालें फिर से सुलगा लें
मन के बढ़ते रीतेपन में
अपनों में अपने, ढूँढ रहे सपने
मावस की काली रातों में
सांसों की आस घटी, उम्र लगी कटने
जीवन की झोली के पैबन्द लगे फटने
गागर सा रीत गया,
अपना हर मीत गया
बासन्ती इस उपवन मे
पतझड़ फिर जीत गया।।
पतझड़ फिर जीत गया।।

रामनारायण सोनी
२७।१२।२०२०

नेह धरा पर ऐसे उतरें


गीत गगन के गाऊँ मै, तुम गाओ मेघ मल्हार
प्रीत का पावन पावस ले हम नेह धरा पर उतरें।
मेघ बचे न बचे गगन न बोल बचे न बचे अगन
बूँद बनें हम एकल होवें नेह धरा पर ऐसे उतरें।।
                   हम तुम नेह धरा पर ऐसे उतरें।।

मन में मन को ऐसे घोलें जैसे जल में मिसरी
भावों के मीठे पानी से भरी रहे मानस की गगरी।
अरुणिम आभा लेकर ऊषा अपने आँगन उतरी
तेरी मेरी व्यथा-कथा अब तन से मन से बिसरी।।
                 हम तुम नेह धरा पर ऐसे उतरें।।

पवन बसन्ती बनो लहरिया फूले इस उपवन में
मैं पराग शतदल का हो कर संग उडूँ कानन में।
जगती को मिल कर महकाएँ उतरें जन गण मन में
अलग अलग रह हो न सकेगा पड़े नहीं भटकन में।।
                   हम तुम नेह धरा पर ऐसे उतरें।।

रामनारायण सोनी
१६.१२.२०२०

तन की तह के पार


तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है
मन की मन्थर धार शुभे! यह कितनी सुन्दर है।
मन का वैभव मन से दीखे कैसा सुन्दर दरपन है
मुझ से तुम तक गुपचुप जाना सुन्दर आवर्तन है।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

रागों की रसवन्ती ताने मन की वीणा बजा रही
रजनी के माथे चंदा की सुन्दर बेंदी लगा रही।
मन द्वारे साँझ सकारे चितवन चंचल झाँक रही
पलकन की चादर के पीछे मन की शोखी ढाँक रही ।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

मोद भरी अलियों की गुंजन मन का सौरभ पीती
मन के मधुकर की वे रातें अवगुण्ठन में ऐसे बीती।
खामोशी की बीन बजा कर सोन चिरैया रीती
मन कहता मन ही सुनता है मन की न्यारी नीती।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

मन का ही फानूस टँगा है तन के मौन भवन में
चारों ओर उजाले इसके हुई रोशनी नन्दन वन में।
मन के बादल मन की धरती मन के नील गगन में
टिप टिप करती बरखा मन की भीगा मन ही मन में।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

दूर खड़ा तन देख रहा है छबियाँ कितनी दौड़ रही
मन ने मन को अन्दर अन्दर प्रेम कहानी कई कही।
मन के कुन्दन की स्वर्णाभा तप कर कितनी और बही
मन की सरिता मन का पानी मन की शीतल धार बही।।

तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

रामनारायण सोनी
१५.१२.२०२०

अभी तक तुम नहीं आये


सखे! लौटा फिर मधुमास
शरद भर सिहरी पवन यह
फिर मलय की गंध ले आई
सुमन जागे, कामना जागी।
       अभी तक तुम नहीं आये।।

प्रीत के पाहुन मुखर हो
हो चले हैं फिर बटोही
इन अलिन्दों के नगर में
भ्रमर जागे, प्यास जागी।
        अभी तक तुम नहीं आये।।

कोकिला के कंठ जागे
वीतरागी गुल्म भी जागे
मधुपरी के दुःस्वप्न भागे
मीन की फिर आस जागी।
         अभी तक तुम नहीं आये।।

मेरे मन के नन्दन वन में
प्रीत का मधुरास जागा
रागिनी लय छ्न्द ले कर
सुर मुखर धर वेणु जागी।
          अभी तक तुम नहीं आये।।

हर दिशा हर कोण में है
मकरन्द के मदमस्त मेले
हर लता गलबाँह लेती
हर विटप की पीर भागी।
           अभी तक तुम नहीं आये।।

     रामनारायण सोनी
             25.11.20
                         

छोटी सी विराट कहानी

जब कविता
थी अपने शैशवकाल में,
नन्हे नन्हे डग चलीं थी
भावनाएँ अँकुआ रही थी
हल्के जर्द पड़े डायरी के पन्नों में
सूखी वे गुलाब की पंखुडियों
मुस्कुराई, महमहाई...!
काल की कील पर टँगी
सुइयाँ पीछे दौड़ी,
ठिठकी, कहीं ठहर गई
वहाँ, जहाँ लिखीं थी
ढाई आखर की
छोटी सी विराट कहानी...!

रामनारायण सोनी
२२. १२. २०२०

स्मित आनन की छबि ललाम

तुम खुले पृष्ठ की पोथी हो
जिसमें जीवन के सर्ग सप्त
होती अलियों की मधुर तान
मुख पर उन्नत सा भाल तप्त

मौज भरी चितवन अपार
जहँ भरे स्वप्न का नव विलास
उर में है मधुऋतु की सुवास
धड़कन का तुम प्रिय प्रवास

भौहों में खिंचते मदनबाण
किसलय की लघु कलिकाएँ
अधरों पर ठहरा मधु-निकुंज
पलते पराग के मधुर-पुंज

स्मित आनन की छबि ललाम
श्यामल कुन्तल की कुटिल रेख
कानों के कुन्दन कर्णफूल
होता सम्मोहन देख-देख

रेशम सी मन की पर्तों में
यह प्रीत सुहानी पलती है
सुकुमार सलोने सपनीले
भावों की सरिता बहती है

रामनारायण सोनी
३०।११।२०१४

मौन क्या क्या कह रहा


मौन कितना बोलता तू सुन कभी
सरसराती पत्तियाँ कुछ कह रहीं।
फूल महके, बाग चहके आज तड़के
भैरवी की तान बुलबुल गा रही।।

मौन साधे महमहाता गुलमोहर
मौन सरिता बह रही तटबंध में।
मौन शिखरों पर रुपहली रश्मियाँ
मौन कितना रम रहा निःसर्ग में।।

मौन मुखरित हो रहा हर पुष्प में
हर लता, हर गुल्म में, मधुगन्ध में।
चन्द्रिका बरसी धरा पर मौन ही
चाँद-चकवा मौन है अनुबन्ध में।।

प्राण कण कण में बसा चुपचाप ही
रक्त वाही धमनियाँ चुपचाप बहतीं
हर शिरा हर पोर में ना शोर कोई
जीवनी-संचेतना चुपचाप चलती

मौन की संकल्पना ही बीज बन
सृष्टिकर्ता के सृजन का मूल है।
पालता सारी प्रजा, पशु, कीट पंछी
शिव समाधि में विलसता मौन है।।

कण्ठ में शिव के बसा विष मौन है
है दधीचि अस्थि में वह कुलिश भी।
मत भरो क्रन्दन कुटिल इस मौन में
नियति के तेवर न तीखे हों कभी।।

रामनारायण सोनी
०६/१२/२०२०

राष्ट्र के प्रहरी बनो

जो कदम तुम चल लिये पदचिह्न बनते जायँगे।

मील के पत्थर सफर के याद बस रह जायँगे।।

युग प्रवर्तन तुम करोगे मुट्ठियों में आग भर लो।

कर्म के लेकर हथौड़े साधना की माँग भर लो।।

इन्द्र का पवि भी दधिचि की अस्थियों ही से बना।
प्रात का रवि भी तमस की गोद से आ कर तना।।
बिन गरल के सर्प भी बस उम्र भर ही रेंगता है।
कोई बिरला छेदने नभ तान पत्थर फेंकता है।।

सिंह की हुंकार गूँजे बीहड़ों बन कुंजरों में।
शक्ति का परिचय भरा चिंघाड़ते करि के सुरों में।।
शंख की ध्वनियाँ महज प्रार्थना का सुर नहीं है।
न जगे पुरुषार्थ-रण जहँ भेरियों के सुर नहीं है।।

हिम शिखर की श्रृंखलाएँ वीर गाथा कह रही है।
सागरों की चीर छाती शक्तियाँ नित जग रही है।।
व्योम में परचम गड़े है गर्जना के पवन सुत के।
वाहिनी बन राष्ट्र रक्षक अहर्निश यहँ जग रही है।।

राष्ट्र के प्रहरी यहाँ जब हाथ में संगीन ले कर।
बन कहर बरपे समर में बाहुओं में वज़्र धर कर।।
काँपते अरिदल छुपे हो बंकरों की आड़ ले कर।
बाँकुरे रण के उन्हें भी ध्वस्त करते ताड़ ले कर।।

रामनारायण सोनी
१४.०१.२१

Wednesday, 6 January 2021

सखे! लौटेगा मधुमास!

अभी अधर अंगार भरे हैं
रुधिर सभी के खार भरे हैं
चन्दन वन के सुरभित तन में
दावानल के त्रास धरे हैं।
दूर क्षितिज में प्राची ले कर
रश्मिपुञ्ज की थाती दे कर
नवल प्रात में नई सुबह ले 
लौटेगा रवि फिर धरती पर।।
  धरो तुम धीरज का आयास
  सखे! फिर लौटेगा मधुमास।।

पवन और पावन पानी में
मही की इस रजधानी में
नगर भर घूम रहा विषधर
घुला है विष ही विष घर घर।
मिलेगा सागर से मधुग्रास
संजीवन है हिमाद्री के पास
यहीं फिर लौटेगा आरोग्य
मिलेगा स्वच्छ सभी को भोग्य।।
     नियति का करना मत उपहास
     सखे! फिर लौटेगा मधुमास।।

नहीं कोई अपना अपने पास
मिली न अपनों की भी लाश
नजर भर देख सके न हम
विदा होते वे अपने खास।
बहुत खोया है हम सब ने
बहुत सी आशा और सपने
दुःखों दर्दों में जो पिसते
थाम लें बाकी सब रिश्ते।।
       शीघ्र ही बीतेगा संत्रास
       सखे! फिर लौटेगा मधुमास।।

रुदन यह कैसा कण कण में
चले हम आये किस रण में
बचे न प्रहरी जन जन के
चुके है कोष सभी धन के।
हमारे मन ना छोटे हों
बुला लो जो ना लौटे हों
भोर के तारे उगने दो
ना टूटे माला के मनके।।
      ना छोड़ो आस, करो विश्वास
      सखे! फिर लौटेगा मधुमास।।

    रामनारायण सोनी
      ०७.०१.२१

https://youtu.be/b8zXbmGtAho

Tuesday, 5 January 2021

मन धरा पर

नील नभ का नयन तारा वह छलकता नीर उसमें
प्रेम की आकाशगंगा मन धरा पर आज उतरी।
खिल उठा उपवन उपासी सर्वदिश मधुगन्ध बिखरी
प्रेम की कमनीय गंगा मन धरा पर आज उतरी।।

द्वार देहरी दीप हुलसे आँगने भर चौक पुरती
प्रेम की चूनर छबील मनधरा पर आज निखरी।
आँज महकी साँझ बेला गेारजों से माँग भरती
प्रेम की ललना लजीली मन धरा पर आज सँवरी।।

स्वप्न जागे प्यास जागी छन्द में अहसास जागे
प्रेम की पागी नगरिया मन धरा पर आज जागी।
जो वियोगी कामिनी के संग सारी रात जागी
प्रेम की सोई सुनयना मन धरा पर आज जागी।।

प्रात की पनिहारियों ने पनघटों पे पग धरे हैं
प्रेम की जल धार ले कर मन धरा के घट भरे हैं।
गा रही परभातियाँ ये किंकीनी कर की खनक से
प्रेम की बेला रुहानी मन धरा पर सुर झरे हैं।।


रामनारायण सोनी
६.१.२१

Sunday, 3 January 2021

क्योंकि

क्योंकि

क्योकि......
तुम पथिक हो,
पाथेय है, प्रसाद भी है
तुम्हारे पास...
उस परमात्मा का!
काल की कील पर घूमते
जीवन चक्र में
प्रेम के निर्मल, स्वच्छन्द
..आकाश में
डैने फैलाओ !
पाँखी हो प्रेम के तुम
क्योंकि...
तुम रुके तो चूके
क्योंकि...
ऐ मेरे हंसा!!!
यादों के मोती भरे पड़े हैं..
मन के इस मानसरोवर में

रामनारायण सोनी
४.१.२१

Saturday, 2 January 2021

तुम भी अवगाहन कर लो

मैं कौन हूँ, 

मेरा नाम तो परिचय है ही मेरा
पर कुछ और भी पहचाने हैं मेरी
मैं चाक चढ़ी मिट्टी हूँ
मैं घाटी में लुढ़का पत्थर हूँ
आँगन का मैं उपवन हूँ
मैं सफेद सी वह चादर हूँ
मैं तुलसी का वह बिरवा हूँ

पर मैं वह अवधू शिल्प हूँ..
मैं गर मिट्टी हूँ तो
...वह दादी थी मेरी कुम्हार,
मैं गर पत्थर हूँ तो
...माँ मेरी मेरी शिल्पकार,
मैं उपवन हूँ मुझे तो
...पिता ने माली बन पाला है
मैं वह दीन हीन था
...इस समाज ने गोदी में बैठाला है
मेरे अंतस में
..दिन-रात खड़ा है वह सद्गुरू
मैं गर आँगन में तुलसी बिरवा हूँ
...मीठे रिश्तों की धूप में नहाया हूँ
मैं एक बहती नदी में हूँ
...""प्रेम" है वह अजस्र धार
  जिसमें आह्लादित हूँ

आओ! तुम भी अवगाहन कर लो!!

रामनारायण सोनी

ले चलो ऐसे ही


यकीं आज भी नहीं होता
 हम कहाँ थे?
   और, अब!!......
ये कहाँ आ गये हम?
 बस चले थे कुछ क़दम ही ...
  और फिर
     न जाने क्यों? कैसे?     
       चलते जा रहे हैं
 ना! ना!! कोई अदृश्य 
  उँगली थामे लिये जा रहा
    हमें पगडंडियों से 
      इन्द्रप्रस्थ में
 अरे! यह तो तुम हो
     ले चलते रहना, ऐसे ही....

      रामनारायण सोनी

Friday, 1 January 2021

दो क्षुद्रिकाएँ

मैं अभी व्यस्त हूँ
तुमको, उसको,
किसी और को खोजने में
इस भय से कि
कहीं मुझे मैं न मिल जाऊँ
यहाँ प्रश्न अनेक मुझ में
धधक रहे है

रामनारायण सोनी
25.01.20

क्या तुम्हारी
मेरी,
हमारी प्रार्थनाएँ
अब कोई नहीं सुनता ?

देखो!
इन उजालदानों से
अँधेरे ही क्यों झाँकते हैं

रामनारायण सोनी
25.01.20



.

सरसराता संगीत

नहीं जानता
इतिहास और उत्पत्ति,
प्रजातियाँ और प्रकल्प
इन फरफराती चिड़ियों का
मुझे बस पसन्द हैं
पंख इनके
नापती है आकाश जिससे
खेलती है हवाओं से
फराफरा कर आ बैठती है
आँगन के चौंतरे पर
टेढ़ी गर्दन कर देखती है
जब एक आँख से
और मैं लालित्य से भर जाता हूँ
छोड़ जाती है कानों में
फड़फड़ाते पंखों का
सरसराता संगीत जिसे
सूने में भी अकसर सुनता रहता हूँ

रामनारायण सोनी
१७.०८.२०

तिल तिल कर रीत गए


जीवन की मोटी पोथी पर
कितने ही कवर बदल गए
हर्फों, लफ़्जों, अहसासों में
मेरी-उसकी कुछ बातों में
बीती घड़ियों में साँसों में
मुट्ठी भर ख्वाब खयालों में
जो लिख्खे वक्त की स्याही ने
वे तिल तिल कर रीत गए

उस वक्त का अब क्या करूँ
तुम बिन जो फक्त हाे गया
फैली मेरी जो बाहें तो मैं
इनमें ख़ुद ही जब्त हो गया।
चाँद सितारे सब मिल कर
ना कर पाये इसको रोशन 
इक बुझता चिराग भी अब
थक हार के बेसिम्त हो गया।।

रामनारायण सोनी

फिर आज की सुबह हुई


अभी अभी अम्बर पर
फैली है अरुणाई
चटखे हैं कुछ डेंडुए कपास के
ले कर कर्म के बीज 
और तुम्हारे प्रेम के झक्क रेशे
चरखा मेरा फिर चलेगा
कातूँगा मलमली धागा
भर कर वक्त के करघे में
श्रम के ताने, विधि के बाने
फिर बुनूँगा अधबुनी चादर को
जीवन की 

रामनारायण सोनी



नैना गुँथ गये

नैना गुँथ गये

कौन मैं और कौन तुम हो
दो पखेरू डाल पर ऐसे मिले
नैना गुँथ गये।।

लिपट लिपट तमाल से
वल्लरी का रोम हर्षण
चन्द्रिका पहने कलाएँ
सज रही सारी दिशाएँ।

दो हृदय गल हार हो ऐसे मिले
नैना गुँथ गए।।

ओढ़ नीलम तारकों को
सिक्त मन रजनी हुई है
बादलों की ओट ही से
चुलबुले चंचल नयन से

दो प्रणय के पुष्प ये ऐसे खिले
नैना गुँथ गए।।

रामनारायण सोनी
३०/०१/२०

तुम कहाँ, मैं कहाँ


मैं गिरि का पाहन हूँ 
 तुझ में है मलय गंध
  मैं बिखरी रज कण 
   तू छंदों का मधुर बंध।।

क्रन्दन के गाँव मेरे 
 तुम झिलमिल झीलों के
  टूटे सुर साज मेरे 
   तुम सप्तक शुभ वंशी के।।

मैं दर्पण हूँ कोरा सा पर 
 आते तुम जब जब
  अलबेली अठखेली सजती 
   वो छबि तब तब।।

    रामनारायण सोनी

*आदमी का शोर है*


 
भैरवी के स्वर भयानक हो गये
बन्दिशों में बस बिखरता शोर है
उपवनों में है हलाहल घुल रहा
बस्तियाँ जलती लगा यह भोर है।
        आदमी का शोर है,
        बस आदमी का शोर है।।
 
वासना के गुल्म में बहके कदम
कुन्दनों के बक्स में पत्थर मिले
बाँबियों में विषधरों के वंश हैं
सत्य के तन में घने विषदंश हैं
        आदमी का शोर है,
        बस आदमीr का शोर है।।
 
भट्टियों सी तप रही वसुधा मेरी
मनुज ही का यह भयानक ताप है
पी गया पानी सरों का सरित नद का
इस पवन की शुद्धता सूली चढ़ी है
        आदमी का शोर है,
        बस आदमी का शोर है।।
 
शिखर की ऊँचाइयाँ गिरने लगी
आदमी की भूख कितनी बढ़ रही
उम्र की पूँजी उड़ी व्यापार बन
धन पिपासा रात दिन यूँ बढ़ रही
        आदमी का शोर है,
        बस आदमी का शोर है।।

रामनारायण सोनी

२ कविताएँ

समीर उसे छू कर क्या आया
दिशाएँ महक उठी

मेघों कोई संदेश क्या लाया 
 कि उम्मीदें दौड़ पड़ी

आँगन का बिरवा यूँ खिलखिलाया
 कि आहटें दस्तक दे गई

मन के नगर की अट्टालिकाएँ
 आतुर हैं दीदार को

मैं जानता हूँ
 कि वह तुम ही तो हो!
   हाँ, तुम ही!!

🌹मैं

दिशाएँ बोलती क्यों है?

वे ध्वनियाँ धन्य हैं
जो ले कर आती हैं
प्रतिध्वनियाँ
फिर फिर

दी थी मैंने
जो दिशाओं को
गूँजती, अनुगूँजती
कि जैसे पुकारती हैं
तुम्हेँ ही
फिर फिर

रामनारायण सोनी

एक ही तो है

एक ही तो है

नहीं मिलते हो तो
खोजता फिरता हूँ
तुम्हें पाने को
यहाँ-वहाँ, कहाँ-कहाँ

मिलते हो जब भी तुम
भूल जाता हूँ मैं सब कुछ
और मुझे भी
शायद एक ही हैं
मैं और तुम

रामनारायण सोनी
३.११.२०

कोरोना से डरो ना

सिक्के के दो पहलू

एक पहलू
अभी जीवन कहीं दुबक गया है
करोना दानव कालमेघ बन
धरती पर उतर गया है,
क्या यह डर है कि..
सागर अपने तटों को लाँघ कर
बस्तियाँ न उजाड़ दे,
अमावस की काली रात में
तारे हम पर न आ गिरें,
बिजली तारों को छोड़
सड़क पर न बहने लगे,
कहीं से नदियाँ मुड़ कर न आ जाए
बहा ले जाएँ घर को अपने
क्या यह डर है कि..
कोरोना वायरस धरती को
जीव रहित न कर दे?
रुको! यह खाली पीली
डर का कल्पित डर है
बस, रहना केवल अपने घर है

दूसरा पहलू
आज शहर से गाँव सुखी हैं
लोग इसीलिये घर को दौड़े हैं
जहाँ दिलों की सिकुड़ी बस्ती
पाँव पड़े अनगिन फोड़े हैं

बन्द पड़ी है गेंगवार, रेप, लूट
अपराधों की भारी गचपच
टी. वी. पर से नेता गायब
थोथे वादों की ना भचभच

कोयल कूक रही आँगन में
पादप पल्लव स्वच्छ धरे हैं
संध्या से अरुणिम ऊषा तक
तारे टिम टिम प्रखर भरे हैं।

गंगा जमना के मिस फूँके अरबों
पर ऐसी निर्मल कब थी माँ गंगे
प्रकृति ने बोला यह मंत्र स्वयं ही
"नमामि यमुने" और "नमामि गंगे"

रामनारायण सोनी
25.05.20

भाव लिखे थे


   १
मैंने अपने भाव लिखे थे
 तुम शब्दों में उलझ गये
   शब्दों के अर्थों को लेकर
     भाव गढ़े  नित नये नये

   २
शाखों से झरते फूलों को
  तुमने पतझड़ ही कह डाला
   पलकों पर ठहरे अश्रु को
     खारा पानी ही कह डाला 

   ३
अभी अभी उतरी मन आँगन
 मेरी प्रीत जुन्हाई ले कर
  वातायन क्यों बन्द कर लिये 
   अपनी ही तनहाई ले कर

   ४
कान लगा कर सुनो जरा तो
 स्पन्दन के गीत बुने हैं
  खिली साँझ की रोली ले कर
   कितने कितने रंग चुने हैं

   ५
मंदिर के अर्चन की ध्वनियाँ
 कोलाहल या शोर नहीं है
  दीप आरती के पावन हैं
   निरी अगन के ठौर नहीं है

   ६
इन शब्दों के पीछे पीछे
 रेले चलते हैं भावों के
  भाव मेरे सब प्रीति सने है
    रस में डूबे अनुभावों के

   ७
इन गीतों में तुम ही तुम हो
 अन्तस का आलाप तुम्ही
  अन्तर के तारों से झरता
   नाद तुम्ही अनुनाद तुम्ही

रामनारायण सोनी

चुप की आवाजें

मैं चुप हूँ
क्योंकि तुम
  अल्फाजों से नही
    अहसासों से समझ लेते हो
तुम चुप हो
  क्योंकि तुम
   बिना अलफ़ाजों के भी
    सब बयान कर जाते हो
हम चुप रह कर
  कितना बोलते हैं
   है ना?

रामनारायण सोनी
३०.११.२०

मौन क्या क्या कह रहा

मौन कितना बोलता तू सुन कभी

सरसराती पत्तियाँ कुछ कह रहीं।
फूल महके, बाग चहके आज तड़के
भैरवी की तान बुलबुल गा रही।।

मौन साधे महमहाता गुलमोहर
मौन सरिता बह रही तटबंध में।
मौन शिखरों पर रुपहली रश्मियाँ
मौन कितना रम रहा निःसर्ग में।।

मौन मुखरित हो रहा हर पुष्प में
हर लता, हर गुल्म में, मधुगन्ध में।
चन्द्रिका बरसी धरा पर मौन ही
चाँद-चकवा मौन है अनुबन्ध में।।

प्राण कण कण में बसा चुपचाप ही
रक्त वाही धमनियाँ चुपचाप बहतीं
हर शिरा हर पोर में ना शोर कोई
जीवनी-संचेतना चुपचाप चलती

मौन की संकल्पना ही बीज बन
सृष्टिकर्ता के सृजन का मूल है।
पालता सारी प्रजा, पशु, कीट पंछी
शिव समाधि में विलसता मौन है।।

कण्ठ में शिव के बसा विष मौन है
है दधीचि अस्थि में वह कुलिश भी।
मत भरो क्रन्दन कुटिल इस मौन में
नियति के तेवर न तीखे हों कभी।।

रामनारायण सोनी
०६/१२/२०२०


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