*

*
*

Tuesday, 3 December 2019

धरा गगन आकुल है

कौन कहता है क्षितिज के पार भी आकाश होगा
कौन जाने कुछ दशक के बाद भी मधुमास हाेगा।
देख लो जी भर खिले इन शतदलों को और सर को
कौन जाने कल परिन्दों का नीड़ कोई पास होगा।।

जान लो तुम फिर नदी में रेत ना पानी बचेगा
शान से जो गिरि खड़ा है दुष्ट मानव से डरेगा।
म्यूजियम में बस लिखे इतिहास वापी कूप होंगे
निर्झरों की मृत्यु का सच कोई सावन ही कहेगा।।

फिर कहाँ कलरव सुनोगे कूजते उन पंछियों का
भोर सूनी शाम सूनी बस रुदन अमराइयों का।
बादलों के झुरमुटों में बस धुएँ की चादरें हैं
रोशनी के इस शहर पर डर बड़ी परछाइयों का।।

मौत की दहलीज पर यह विश्व दम साधे खड़ा
जिन्दगी बारूद के गोदाम जैसी लग रही है।
हिमनदों में ज्वार होंगे द्रुमदलों में खार होंगे
इस मलय में इस पवन में ज्वाल जैसी जग रही है।।

क्यों विकास के काँधे पर धरती की अर्थी धरते हो
शस्य श्यामल निखिल सृष्टि में विप्लव क्यों भरते हो।
धरती जल आकाश पवन ही जीवन प्राणाधार है 
अपने हाथों अपने घर में स्वयं पलीता क्यों धरते हो।।

०४.१२.१९

Tuesday, 19 November 2019

खिलखिलाते दो प्रसून

दो फूलों का सहज सौंदर्य
बिखरता है भीतर से बाहर
जैसा भीतर वैसा बाहर
न मुखौटे, न दुराव
न त्याग, न चुनाव

अलौकिक संवाद
न वाद न, न परिवाद
बस मुखर ही मुखर
बस आह्लाद के स्वर

रामनारायण सोनी

Wednesday, 13 November 2019

मन क्यों भिगोते हो

बरस कर प्यार बन हर दिन
  मेरा मन क्यों भिगोते हो
नमी बन कर मेरी आँखों में
  अक्सर क्यों उतरते हो।
नहीं हो सामने फिर भी
  यहाँ हर दम गुजरते हो
रुकी हैं धड़कनें जब भी
  समा कर क्यों धड़कते हो।।

ऋणी हूँ उन हवाओं का
  तुम्हें जो छू के आती है
मधुर सी लोरियाँ बन कर
  प्रणय के गीत गाती है
बजाती पैंजनी मद्दम
  हृदय को गुदगुदाती है
कैसे भूल जाऊँ थपकियाँ
  मुझे जो थपथपाती है

आप हैं तो, हम है

मेरे प्रिय आत्मन्!
अकेला रह कर मैं
कुछ कह सकता हूँ
पर संवाद के लिये...
  आप जरूरी हैं
अकेला रह कर मैं
खुश हो सकता हूँ
पर उत्सव तो..
  आपके बगैर असंभव है
अकेला रह कर मैं
मुस्कुरा तो सकता हूँ
पर उल्लास तो...
  कैसे उतरेगा मन में
अकेला रह कर मेरी
साँसें तो चल जाती हैं
यह जिन्दगी तो
  आपके बगैर अधूरी है
      रामनारायण सोनी

लौटा जीवन में फिर बसन्त

उठ खड़ा हुआ ले अँगड़ाई,
आशा ने चूमा दिग्दिगन्त।
बीत गया दुःख का पतझड़
लौटा जीवन में फिर बसन्त।।  

पथ टेढ़ा मेढ़ा पंकिल हो
पर मन उमंग से भरा रहे।
पग पग पर बाधाएँ होंगी
पर लक्ष्य दृष्टि में धरा रहे।।

कुछ और अभी पल आयेंगे,
पग पग पर आफ़त लाएँगे।
इतिहासों के वे काले पन्ने
वे फिर फिर अब दोहराएँगे।।

कितनी उल्काएँ गिरती हो
भीषण झंझा की भर भेरी।
हो ऊर्जा जो भुजदण्डों में
किस्मत भी बनती है चेरी।।

सपनों के साँचे बड़े रहें
साहस के काँधे चढ़े रहें।
पौरूष भूधर ले खड़े रहें
अपनी धरती से जुड़े रहें।।

मैं पीड़ा का गायक हूँ


दो पल को जागा फिर
बरसों तक सोया हूँ
आशा के पंखो पर
सपनों को ढोया हूँ

साँसों ने मोहलत दी
उतना भर जी पाया
कतरा भर पानी था
सागर में खो आया

आँसू का मोल यहाँ
बालू से सस्ता है
झूँठों की बस्ती में
साँच हुआ खस्ता है

फूलों की सेज सजी
नीचे बस शूल धरे
सूनी इस अमराई में
गिद्धों के शोर भरे

दोहरे इस चेहरे से
दर्पण भी हार गया
जीवन के उपवन को
पाला क्यूँ मार गया

सुर तो सब मीठे है
कँपते उन तारों के
पिटते हैं ढोल सभी
गीत सजे प्यारों के

जीवन की धारा संग
तिनके सा बहता हूँ
भीतर सौ ज्वाल लिये
बाहर से हँसता हूँ

Tuesday, 29 October 2019

इश्क तो बस इश्क है

जो मिलता ही नहीं है
होती है उसकी ही इबादत
ऐसा होता क्यों है इस इश्क में?

इश्क इबादत है?
या इबादत ही इश्क है?
या कि यही सब इश्क ही है?

हदों के पार बेहद है
सिफर का ही सफर जद है
इश्क का सौक ही मद है

इश्क तो इश्क ही बस है

मैं वही मिट्टी हूँ

मिट्टी ने सुगबुगाया
गली मैं, तपी मैं
पर जब बना कुछ
तो नाम मेरा बदल गया
मिट्टी से हो गई हूँ "दिया"

बाहर फिर एक तपन है
बाती में फिर एक अगन है
पर अब मुझसे एक उजास है
तिमिर से तुमूल की प्यास है

गुमसुम ये राहें रोशन हुई
दिशाएँ फैल गई सब ओर
तपन में ढूँढ लिया है
मैने चिर सुख
बाँटते रहने का सुख

मैं वही अमर मिट्टी हूँ
चाहे मैं, दिया हूँ तुम्हारे लिये
मैं फिर भी वही मिट्टी हूँ

रामनारायण सोनी
(२९.१०.१९)

Sunday, 27 October 2019

तमस दीप पर भारी है

है बौने दीप का साहस अँधेरी रात डरती है
भले हो कालिमा भारी अमावस भी सिहरती है।

अँधेरी आस्थाओं में भरम के तन्तु गलते हैं
प्रकट हो रोशनी के क्षण सभी दुःस्वप्न जलते हैं।

किरण का प्रस्फुटन ही विजय की नीव रखता है
तमस पर जीत की लिखी कहानी साथ रखता है

धरा की ओढ़नी में ये सितारे दीप के टाँके
सुहागन रात मस्ती में अहा! मधुकुञ्ज से झाँके

रंगोली मेरे आँगन की ये है प्रीत का परिमल
बताशे खील और धानी सजा इस साँझ का आँचल।

Tuesday, 10 September 2019

जीवंत जीवन

जो लहराते नहीं
  वे झंडे नहीं हैं
जो उगते नहीं
वे बीज नहीं है
जो पसीजे नहीं
  वे मानव नहीं है
जिनमें उमंग नहीं
  वे जीते नहीं है

लकीरों का अग्नि पथ

वक्त चलता ही रहा
हर्फ लिक्खे रह गए
घिसटते हुए साँप की
छूटी उन लकीरों जैसे

कभी चमकती है
लकीरें अग्नि पथ सी
कभी धुँधियाती है
बुझी यादों के धुऐं सी

लकीरें हाथों की
सिलवटें माथों की
गुजरते वक्त की
सियाही रातों की
वक्त चलता ही रहा
हर्फ लिक्खे रह गए

आत्मा तो वही है

पंख बदलने से
आकाश नही बदलता
  सूरज भी तो वही है
जहाज बदलने से
सागर नहीं बदलता
  जल भी तो वही है
सूरत बदलने से
सीरत नही बदलती
  आदमी तो वही है
शरीर बदलने से
चोला बदलता है
  आत्मा तो वही है

ये थके रिश्ते

छन्दों का विन्यास छूटा
छद्मों का जाल टूटा
कविता कुछ फुसफुसाई
दामन में है जुन्हाई

चलो चौपाल पर
बैठे है थके रिश्ते
कुछ बाएँ कुछ दाएँ
अनमने निढाल से
आओ गले लग जाएँ

सुनो!
मुर्गे ने बाँग दी है
डूबा सूरज
फिर ढूँढ लाएँ

तुम्ही आत्मा हो

मैं बैठा था
आँख वाला अंधा
  घिरा सब ओर तमस था
कोई आया अचानक
  नहीं वह कोई नही..
   ...अरे! वह तुम ही तो थे
दिया जला दिया तुमने
  दिखा प्रकाश, दिखा अंधकार भी
   और तब जाना
    तुम भी तो यहीं हो
     तुम्ही ज्ञान हो, तुम्ही प्रकाश हो
       तुम्ही आत्मा हो,
       तुम्ही आत्मा हो

           रामनारायण सोनी

मस्त फ़कीरी

मैं....
मैं अधूरा ही अच्छा हूँ
  और
   भरने को राजी हूँ
    इसीलिये तो शायद
     सुनने, पढ़ने, गुनने को
      खाली हूँ
   मन मेरा मस्त फ़कीरी में

    रामनारायण सोनी

खोये खोये

खोये खोये

कविता में से
आदमी खो गया है
और
आदमी में से
  कविता खो गई है
एक आता है
तो दूसरा जाता है
सब चल रहे हैं
पहुंचेंगे भी कहीं न कहीं
   पर मिलेंगे कैसे
कविता में से
आदमी खो गया है
   वे ढूँढते क्यों नहीं
    एक दूजे को

Thursday, 5 September 2019

वक्त की पोटली में

खुद को छोड़ गए थे मुझ में
फिर मैं तुम में छूट गया
न मैं ख़ुद ही लौट सका
न लौटा पाया तुम्हें भी

बँधे हैं हम अभी भी
वक्त की ख़ूबसूरत पोटली में
साथ साथ, एक साथ

Wednesday, 4 September 2019

राजी हो विराट क्या

हे प्रभो!
राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में

मेरा तो काम ही
बस प्रार्थना भर है
क्या मेरी प्रार्थना में
तैयार हो बँधने को?

राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में

रीत गए हैं नयन
बीत गए वे अयन
श्वास की अभ्यर्थनाएँ
प्राण में बस वर्जनाएँ
इस हृदय की वीथियों में
शेष कुछ अभिव्यंजनाएँ
आस के तन्तु बचे हैं

राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में

शब्दों में, भावों में
श्रद्धा के दावों में
दो जुड़े हाथों में
मुँदी मुँदी आखों में

राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में

Tuesday, 20 August 2019

यहीं तक

यहीं से यहीं तक

दर्द के अनुबंध ले कर
  पीर छाती में गड़ी है
मौन भाषा प्रेम की है
  प्रीत द्वारे आ खड़ी है।

क्यों हृदय की वीथियाँ
  फिर हुई निस्पंद सी है
छोड़ दो मन का भरम
  यह ऋतु मधुमास सी है।

Saturday, 10 August 2019

कव्य

यह नदी अभिशप्त सी है

जल नही बहता यहाँ
यह लगभग सुप्त सी है

घाट सब मरघट बड़़े है
प्यास पीते जीव जन्तु
धार, लहरें लुप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

पालती थी सभ्यताएँ
धर्ममय और तीर्थमय हो
संस्कृति विक्षिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

खेत बनती थी उपजती
तरबूज, खरबूज ककड़ियाँ
अब रेत केवल तप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

प्राण उसके पी गई
लोलुपी जन की पिपासा
वासनाएँ लिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

हम विकासों के कथानक
तान कर सीना दिखाते
सब शिराएँ रिक्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

बस बाढ़ ही ढोती रहेगी
शेष दिन निःश्वास होंगे
जिन्दगी संक्षिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

रामनारायण सोनी

Saturday, 3 August 2019

दुआएँ उनकी

सब चुप थे..
दुआओं के उठे वे हाथ
..कुछ जाने पहचाने
..कुछ अपने कुछ बेगाने
पता नहीं कहाँ कहाँ से
कब कब आये
पीड़ा, कम्प, भय को
  चले गए चुपचाप
  मुझ से दूर धकेल कर

और मैं, 
   हाँ! मैं!!
जैसे धूल झाड़ कर
फिर खड़ा हो गया हूँ

Saturday, 27 July 2019

छुप कर सह जाता हूँ

अपनी पीड़ा तुम में जब जब पाता हूँ
मन ही मन मैं और दुःखी हो जाता हूँ
इसीलिये अपने दुखते हुए व्रणों को
चुपचुप अपने में छुपकर सह जाता हूँ

मुस्कानों से ढँका छिपा यह दर्द मेरा
इन सांसों की राह कहीं ना खुल जाए
तेरी मन की इस फुलबगिया में जा
इसी वजह कोई तुषार ना पड़ जाए

मेरे खुले हृदय की हर इक धमनी में
पिघला सीसा संग रुधिर के घूम रहा
उठती गिरती इस जीवन की धारा में
महाकाल हर पल मेरा माथा चूम रहा

Monday, 22 July 2019

सूखी नदी

तुम नदी हो
एक बहती नदी
रुकोगी नही,
वापस मुड़ोगी भी नही
मैं खड़ा रहा
बाहें फैलाये
समुन्दर बन कर
कि तुम पहुँचोगी
जरूर एक दिन
मुझ तक

नयन अभी भी नीर भरे

करुणा की मेरी झोली में
केवल बासी दर्द भरे हैं
यह कैसा ही बौनापन है
हम हँसने में भी डरे हैं

अनजाने लोगों ने आकर
खुले व्रणों पर नमक धरे हैं
रात गई और प्रात हुई पर
नयन अभी भी नीर भरे हैं

ढली शाम और थके पाँव
विषदंशों के स्राव हरे हैं
हम निर्मम की इस बस्ती में
कितने बेबस आज घिरे हैं

आज इलाजों की मण्डी में
शातिर नश्तर बाज भरे है
कोई जिये मरे कोई भी
सौ सौ पाकिटमार भरे हैं

गुड़िया बन जाऊँ

देखता हूँ जब कभी
चहकते ठुमकते बच्चे को
उन्मुक्त खेलते हुए
जी करता है जी भर कर
वह बच्चा तुम हो जाओ
और मैं हो जाऊं
तुम्हारे हाथों की गुड़िया

सोचता हूँ कभी कभी
छिदी बिंधी बासुरी
बन कर के मैं
अधरों से लग जाऊँ
थोथापन यह है मेरा
एक फूँक से तुम्हारी
मैं रागों से भर जाऊँ

Friday, 19 July 2019

जिन्दगी के नजरिये


एक और शाम हो गई
एक और दिन ढल गया
इस जिन्दगी की किताब से
एक और पन्न्ना फट गया

एक और शाम हो गई
एक और दिन ढल गया
इस जिन्दगी की किताब में
एक और पन्न्ना जुड़ गया

एक और शाम आ गई
एक और दिन सँवर गया
इस जिन्दगी की किताब का
एक और पन्ना  निखर गया

एक शाम आज आई है
एक और दौर चल गया
ग़मों की इस किताब से
एक जाम फिर फिसल गया

एक शाम है धुआँ धुआँ
गगन पहन के गेरूआँ
इस जिंदगी की गोद में
है कँप रहा रुआँ रुआँ

एक और शाम हो गई
एक और दिन ढल गया
इस जिन्दगी की किताब को
किसी ने हौले से  छुआ

Monday, 15 July 2019

इश्क उग आया

वक्त की इस बड़ी इमारत में
दो पलों की दरार में
वह मधुर मुस्कान
अंकुरित हुए
पीपल के बीज की तरह
इश्क उग आया
नव कोंपलें सज गई
पौधा यह ...
...हमारा तुम्हारा

Saturday, 29 June 2019

मृदुहास


मन की कोरी चादर पर कुछ स्वप्न धरे हैं
अधरों पर कुछ प्यास गुलाबी ले कर आना
नयनों की कोरों में श्यामल सांझ खिली हो
मदिर मदिर मौसम का मृदुहास लिये आना।

आज तूलिका अंतस के कुछ रंग भरे बैठी है
उसके प्राणों के रेशों से तुम हौले ख़ुद उतराना।
उलझे कुन्तल के वलय सभी उलझे उलझे हों
प्रखर प्रणय की संध्या के मधुमास लिये आना।।

Tuesday, 18 June 2019

मैं वहाँ तुम यहाँ

"मैं वहाँ तुम यहाँ"

मैं ही उतरा था एक दिन!
जैसे परिंदा कोई
उतरता है तुम्हारे आंगन में
बहती थी जहाँ
शीतल मंद सुगन्धित समीरण

मैं ही तो था वह!
इक नन्हे बच्चे सा
अपनी खोई गिल्लियॉ लेने
आ गया हो ऐसे ही,
महके उस उपवन में
जैसे आ जाती है गोरैया
फरफराती उजालदानों पर

न दी दस्तक ही दरवाजे पर 
सरसराते पत्तों ने
पुकारा था तुम्हे नाम लेकर
देखता रहा वक्त रुक कर
तुम्हारी बाहों के झूले पर
हाँ, था वह मैं ही
सिरहाने थे रेशमी अहसास
उतर न पाए थे बोल 
चिपके रह गए हो जैसे
शहदीले अधरों में

लौट कहाँ पाया
पूरा मैं अब तक
छूट गया कुछ-कुछ मैं ही 
साथ चल रहे हो 
तब से अब तलक तुम भी

छूटे हम, पर छूटे कहाँ
फिर ख़ुद-ब-ख़ुद
एक-दूसरे को पाने को
क्योंकि, मैं हूँ वहाँ, तुम हो यहाँ
निरन्तर, अविरल, अविचल

Sunday, 2 June 2019

"वृक्षों के शव पर बैठे हैं"


वृक्षों के शव पर बैठे हो
प्रश्न तुम्हारे प्रश्न हुए हैं
क्यों तपती है धरती माता
क्यों आँगन अंगार हुए हैं।

शासन और प्रशासन दोनों
डंठल बो कर कागज भरते
जंगल के रखवाले खुद ही
जंगल खा कर मिट्टी करते।

इस पावस में मेघ न बरसे
आकर वापस लौट गए हैं
तपती धरा रही प्यासी ही
ताल तलैया रीत गए हैं।

हरियाली के पोस्टर होंगे
सपनों में जंगल देखोगे
लद गए दादी के वे किस्से
मंगल जिल्दों में देखोगे।

झरनों और प्रपातों के शव
उनकी बयाँ कहानी होगी
शेष रही चट्टानो को ही
व्यथा कथा सब गानी होगी।

पीपल वट ऑवल के तरु की
हम पूजा क्यों करते हैं
वृक्षों में देवत्व बसा है
ढोंग धतूरा क्यों धरते हैं।

मेढ़ों पर बूढ़े वृक्षों की
जड़ में मठ्ठा ही भरते हैं
पंछी आ कर चुग जाएँगे
फसल हमारी हम डरते हैं।

अब अभिशाप भुगतने होंगे
हमने कुदरत से खेला है
कृत्रिम खाद ठूँस दी इतनी
मिट्टी अब केवल ढेला है।

दूर नही दिन लिख लो यारों
प्लास्टिक के ताबूत बनेंगें
बिन लकड़ी के सारे शव ही
बिजली के शव-दाह दहेंगे।

रामनारायण सोनी

(02.06.2019)

Friday, 31 May 2019

गीत अधरों पर बुनो

आज कोकिल कोकिला संग स्वर मिलाती
साज संगत के कहीं रख सुनो तुम भी सुनो
आम्र कुञ्जों में सजा एकल मुखर रव ही
ओ रागिनी के सप्त स्वर गुनो तुम भी गुनो।
                गीत अधरों पर बुनो।।

साँस साधे क्यों खड़े तुम पथिक पाथेय बन
मंजरी के, भ्रमर के संग नवगीत तुम बुनो
गुलमोहर की रक्तिमा भी लाजवन्ती लग रही
स्वर्ण चम्पा केतकी ओ! प्रीत के पाहुन चुनो।
                गीत अधरों पर बुनो।।

रामनारायण सोनी

(३१*५*१९)

Wednesday, 29 May 2019

यह नदी अभिशप्त सी है

यह नदी अभिशप्त सी है

जल नही बहता यहाँ
जान हो यह सुप्त सी है।

घाट सब मरघट बड़़े है
प्यास पीते जीव जन्तु
धार, लहरें लुप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

पालती थी सभ्यताएँ
धर्ममय और तीर्थमय हो
संस्कृति विक्षिप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

खेत बनती थी उपजती
तरबूज, खरबूज ककड़ियाँ
अब रेत केवल तप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

प्राण उसके पी गई
लोलुपी जन की पिपासा
वासनाएँ लिप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

हम विकासों के कथानक
तान कर सीना दिखाते
सब शिराएँ रिक्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

बस बाढ़ ही ढोती रहेगी
शेष दिन निःश्वास होंगे
जिन्दगी संक्षिप्त सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है।।

Thursday, 9 May 2019

मनुज की भूख


भैरवी के स्वर भयानक हो गये
बन्दिशों में बस बिखरता शोर है
उपवनों में है हलाहल घुल रहा
बस्तियाँ जलती लगा यह भोर है।

वासना के गुल्म में बहके कदम
कुन्दनों के बक्स में पत्थर मिले
बाँबियों में विषधरों के वंश हैं
सत्य के तन में घने विषदंश हैं

भट्टियों सी तप रही वसुधा मेरी
मनुज ही का यह भयानक ताप है
पी गया पानी सरों का सरित नद का
इस पवन की शुद्धता सूली चढ़ी है

शिखर की ऊँचाइयाँ गिरने लगी
आदमी की भूख कितनी बढ़ रही
उम्र की पूँजी उड़ी व्यापार बन
धन पिपासा रात दिन यूँ बढ़ रही

Friday, 26 April 2019

मेरी वसीयत

उतर सको तो इस कागज पर
रंगों की बौछार तुम्हारी छबि को रंग डालूँगा।
सँवर सको तो इस दरपन पर
शर्म हया की अरुणिम रोली मल डालूँगा।।

झाँक सको तो मेरे मन में
पारिजात के नव पुष्पों से सेज सजी है।
लाँघ सको तो दाद बहुत दूँगा
मेरे उर के मंदिर की दहलीज अड़ी है।।

माँग सको तो इन प्राणों को
खुद ही चल कर पास तुम्हारे आ जाएँगे।
मोल सको तो मुफ्त मिलूँगा
सब कुछ मेरा, बिना मोल के बिक जाएँगे।।

तुम्हे देखना चाहो तुम तो
अपने ये नयन तुम्हें मैं खुद दे देता हूँ
क्या हो तुम मेरे जीवन मे
हो अजीज कितने मेरे जान तभी पाओगे।।

नहीं पढ़ी है अब तक तुमने
कोरी वसीयत पर केवल मेरे हस्ताक्षर है।
मेरा मुझ पर नही शेष अब
हक सारे के सारा अब से तेरा मुझ पर है।।

Sunday, 7 April 2019

याद का सन्दूक

कमी जरूर होगी कहीं
कि...
तुम्हारी याद के सन्दूक से
कपूर की तरह उड़ गया,

कतरा कतरा बिखर गया
बिखर बिखर मैं
देखता ही रहता हूँ
बस तुम्हे ही

Thursday, 4 April 2019

रूही

कैसे कह दूँ अलग हो तुम
इस रूह की तलब हो तुम
बात रूबरू मिलने की थी
मुझ में घुल ही गये हो तुम

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन