कितना विश्वास अटल है
जिन पर शब्द युगों तक ठहरे
इन अधरों की पीड़ा समझो
बिछे रहे जो तेरे पथ में
थकित नयन की साधें समझो।
जिस उपवन में पतझड़ ठहरा
उनमें भ्रमर कभी न आते
जिस कुटीर में छाँह नहीं हो
उनमें पथिक नहीं रुक पाते।
खुलें नयन से स्वप्न देखते
पानी पर क्यों चित्र बनाते
जो बस्ती वीरान पड़ी हो
उनमें पाहुन कभी न आते।
अनछुई छुअन की आस पोर को
तुहिन कणों की प्यास भोर को
मैं अनंत का पथिक बिचारा
खोज रहा अनजान ठौर को।
मैं आशा का दीप दिवाना
खुद से ही अनुबंध किये हूँ
इक दिन तो लौटेंगें साजन
यह मेरा विश्वास अटल है।
रामनारायण सोनी









