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Monday, 24 September 2012

कितना विश्वास अटल है

कितना विश्वास अटल है 


जिन पर शब्द युगों तक ठहरे 
इन अधरों की पीड़ा समझो 
बिछे रहे जो तेरे पथ में 
थकित नयन की साधें समझो। 

जिस उपवन में पतझड़ ठहरा 
उनमें भ्रमर कभी न आते 
जिस कुटीर में छाँह नहीं हो 
उनमें पथिक नहीं रुक पाते। 

खुलें नयन से स्वप्न देखते 
पानी पर क्यों चित्र बनाते 
जो बस्ती वीरान पड़ी हो 
उनमें पाहुन कभी न आते। 

अनछुई छुअन की आस पोर को 
तुहिन कणों की प्यास भोर को 
मैं अनंत का पथिक बिचारा 
खोज रहा अनजान ठौर को। 

मैं आशा का दीप दिवाना 
खुद से ही अनुबंध किये हूँ 
इक दिन तो लौटेंगें साजन   
यह मेरा विश्वास अटल है। 

रामनारायण सोनी 


शिखर की ओर

शिखर की ओर 



Saturday, 8 September 2012

प्रेमदीप तुम दिपते रहना


** दिपते रहना  **

याद करो उस  स्वर्णिम पल को 
मृदुल करों से तुम्हें छुआ था 
चिनगी दान किया था तुमको 
प्रेमदीप तुम तपते रहना

स्वांसों के अंतिम प्रवास तक 
दूर क्षितिज के निकट गाँव में 
द्रवित ह्रदय का तरल सींच कर 
प्रेमदीप तुम  दिपते रहना 

अनछुई छुअन की सिहरन है 
अनखुले  कुटी के वातायन 
अनबुझे सपन की तपन लिए ही 
ज्योतिपुंज तुम झरते रहना 


              



  रामनारायण सोनी 

अभिव्यंजना



** निर्मल प्यार **

निर्मल प्यार की हवाएँ ये बहती रहें
कुछ सुरीली कथाएँ ये कहती रहें
जिन्हें सुन हम आगे बढ़ते रहें
निर्मलता से अपनी राहों पर चलते रहें

--मिताली --

दिनांक :09 सित 2012


Tuesday, 4 September 2012

मेरे अंतर में बस जाओ

01.08.2012

तुम मेरे अंतर में बस जाओ 
मैंने चाहा था कुछ लिखना भूल गया मुझको ही
विषयवस्तु केवल तुम थीं शेष शून्य सा शेष रहा
                  तुम अशेष अन्तर में थीं

तब से अब तक तुमको मैंने मुझ में ही ढूँढा है
शायद स्मृतियाँ तुम में भी यह प्रतिबिंब बना देंगी

मेरा विश्वास फलित होता है तुमको भी विश्वास रहा है
आज चुनौती सुनो हमारी टीस हृदय में उपजा देगा

इसीलिये उद् घोष सुनो तुम अंतर अंतर का बंधन है
मैं तेरे अंतर में रम जाऊँ तुम मेरे अंतर में बस जाओ

                     तुम मेरे अंतर में बस जाओ 


01.08.2012                            रामनारायण सोनी 

Sunday, 2 September 2012

जब प्रीत जगी

 जब प्रीत जगी 
जब नयन बोलने लगे प्रीत के अंकुर फूटे 
अन्तर के सब भेद खुले भाव के निर्झर छूटे
बिन कहे निनादित प्राण-गीत के साज़ झनकते
बिन हिले अधर के आज सुने संवाद  ह्रदय के 
मन बोले मन सुने समझलो यही प्रीत की परिभाषा है
भावों का व्यापार चल पड़े यही प्रीत कि अभिलाषा है
गीतों का माधुर्य छंद में पाकर प्रीत तरुण होती है
जागे जब उल्लास हृदय में तब-तब प्रीत गहन होती है
उसके अन्तर की पीड़ा जब मुझमें तपिश जगाती है 
उसको काँटे चुभे पैर क्यों मुझमें टीस जगाती है 
उसके जीवन में तम छाये मुझमें क्यों संझवाती है
अन्तर के अनुबंधों को ही प्रीत सभी समझाती है
                                            रामनारायण सोनी  

बिंब में प्रतिबिंब

आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा ।

तुम अचानक खो गई थीं खो गया मेरा चमन
सो रहे थे नीड़ में यादें बने थे जो सपन
ले उठा अँगड़ाईयाँ आज विह्वल हो के मन
तुम नहीं थीं बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।

लग गए थे पंख मन को मुक्त है आकाश ऊपर
प्रेम का सागर उमड़ कर आज झोली में सिमट कर
शुष्क उपवन में बहारें खिल उठी मधुमास बन कर
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।

मौन थी सारी दिशाएँ, कुंद थी मेरी शिराएँ
मुग्ध था तन-मन अकम्पित, थिर रही मेरी निगाहें
मूक बन कर स्वास थामे, आज केवल सुन रहा
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।

आज कल में और कल में आज मिश्रित हो रहा
है वही अंदाज़ स्वर में भाव मुखरित हो रहा
बुत बना सुकुमार मन को प्यार से मैं तक रहा
आज इस बिंब में प्रतिबिंब बिम्बित हो रहा।।

रामनारायण सोनी

यादों के झुरमुट से

तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो  । ।

खुले नयन से गहन गगन से, अंतरतम के सरल सृजन से
स्वर्णिम यादों की कड़ियों को,  अवगुंठन में बांध लिया है।  
बसो कहीं या रहो कहीं तुम, मेरी आशालता बनी रहो
मेरे पुष्पित उपवन में मैं, अब एकाकी नहीं रहा हूँ।।

      तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
      सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो।।

सपनों पर अपना जोर नहीं, वह उनका बहशीपन है
ले जावें किस ओर उड़ाकर दिग दिगंत का ठौर नहीं।
किससे पूछूं किससे जानूं मेरे प्रिय की बसर कहाँ है
इस बस्ती से उस नगरी तक बंजारे की डगर कहाँ है।।

     तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो।
     सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती ।।

जब दूर क्षितीज में सांझ ढले, शीतल मंद बयार चले
बरगद की साखों पर पंछी कल-कल कलरव गान करे।
धरती पे हो निविड़ निशा, तारों की चूनर ओढ़ प्रिये
सुरभित पुष्पों की गंध घुली मेरे मन के उपवन  में ।।

    तुम यादों के झुरमुट से मेरे मन आँगन आती हो
    सच मानो रीते जीवन में उल्लास जगा जाती हो ।।

18.09.85

रामनारायण सोनी
  

तुम कितनी सुन्दर हो

तुम  कितनी सुन्दर  हो 

उषा की लालिमा मुख पर
नयन हैं झील से नीले
मलय सी गंधवह साँसें
घनेरे केश सपनीले
मयकलश की स्वामिनी तुम
मैं विहग मरु भूमि का
तुम प्रणय की रागिनी हो
मैं जलद बिन नीर का
है पिपासा उम्र भर की
प्यार से गलहार की
द्वार पे भिक्षुक खड़ा है
आस है अभिसार की 

मनुहार

मनुहार
खड़ी मनुहार में किसकी करों में आरती पुजारन. 
लटों की बेवजा उलझन ध्वजा से चीर का नर्तन
खनकते हाथ के कंगन पायल की मधुर रुनझुन 
मिलन कि साँझ वेला में सँजोये दीप अर्चन के
खड़ी मनुहार में किसकी करों में आरती लेकर पुजारन. 
तनिक सी आह्टों पर नाचते मृगी से तरल चंचल नयन
मृणालिनी टोह में आकुल किसी अभिसार की पहली किरण
विसुध किस कल्पना के दोल पर झूले विवश सा मूक मन
खड़ी मनुहार में किसकी करों में आरती लेकर पुजारन. 
मधुर मधुमास भी है और महकता यह मधुर मधुबन
पृकृति की ताल में सुर घोलती यह भ्रमर गुंजन
फिर है मौन क्यों बुलबुल कि बोझिल आस और तन-मन 
खड़ी मनुहार में किसकी करों में आरती लेकर पुजारन. 
रामनारायण सोनी

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