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Thursday, 28 June 2018

जीवन-मृत्यु-अमर्त्य

जीवन-मृत्यु-अमर्त्य

साँस आती है, साँस जाती है
जीवन भर फिर फिर दोहराती है
एक दिन एक तरफा हो जाती है
बस एक ही बार नहीं दोहराती है

साँसों के पार भी जीवन था
साँसों के पार भी जीवन होगा
जीवन के उन दोनों छोर परे
जीवन था फिर जीवन होगा

"मैं" था, पर था अनभिव्यक्त
''मैं" हो जाऊँगा फिर अनभिव्यक्त
अक्षुण्ण, अभेद्य, अछेद्य,
अक्लेद्य, अदाह्य, अमृत हूँ "मैं"

रामनारायण सोनी

सुनहरा बालपन

रे मन!
चल फिर बालेपन में।

कैसी रार मची धन जन की
अपने सब कहीं छूट गए हैं
नए नए रिश्ते हैं देश बेगाना
आ! चल चलें बिसरे लोगन में।
      रे मन!
      चल फिर बालेपन में।
महल दुमहले, कनक अटारी
चकाचौंध सब ओर घणी है
बहरा गए कान चिल्ल पों से
लौटें शीतल गाँव गलियन में
      रे मन!
      चल फिर बालेपन में।
ऐसी दौड़ लगी जीवन की
फूली साँस थके अँग अँग
पायो नही विश्राम, घड़ी भर
सो ले मैया की गोदन में।
      रे मन!
      चल फिर बालेपन में।

Tuesday, 26 June 2018

लिखना शेष अभी है

लिखना शेष अभी है मुझको
लोचन में बहते अश्कों को।
करुणा के कातर क्रन्दन और
विगलित तन बुझती पलकों को।।

बहुत लिखा है सोनजुही से
भीनी महकी हुई बगिया को।
कीचड़ भरी तंग बस्ती पर
लिखना शेष अभी है मुझको।।

Sunday, 17 June 2018

प्रार्थना न मैं करूँगा

प्रार्थना न मैं करूँगा
क्योंकि प्रेम करता हूँ तुझे मैं
कर चुका समर्पण खुद ही का
मिट गई सब चाहना अब
चाहने वाला ही खुटा-मिटा ही
और बचा न पाने वाला भी
समर्पण मैंने कर ही दिया है प्रेम में 
मिट ही गया चाहने वाला जब 
शेष कहाँ फिर बचा पाने वाला ? 
तुझ में खोना चाहता था 
सो मैं खो गया। 
ऐसा  कि फिर कोई खोज हो 
तो पता बस तू ही हो
वैसे कि जैसे पानी की बूँद 
समुन्दर से निकली, फिर समुन्दर में समा गई
अब से बूँद का पता समुन्दर ही तो  है।

कबीर ने बड़ा अटपटा बोला -
"प्रेम गली अति सांकरी जा में दोउ न समाय।" 
बस तर्कों की संदूक में ताला लगाया 
चाबी फेंक दी दरिया में 
उसने कहा-
बस प्रेम ही किया, प्रेम
आओ! तुम भी चलो! 
परमात्मा बाहें फैलाए खड़ा है।

बूँद बूँद चू गया

लगता है मेरे प्रेम-घट में
कोई सुराख सा हो गया
सहेजा जिन्दगी भर से
बूँद बूँद कर ही चू गया

मेरी यह प्रीत की दुल्हन
बस झाँकती है अतीत में
जाने कौन घड़ी याद का
सर से दामन सरक गया

अब तो बारिशें खुद ही
उड़ा ले जाती रिमझिम को
वो चाँद भी रोशनी कम
जलन की बौछार कर गया

गुनाह मेरा, मेरे दिल का है
नशा है इश्किया इसका
नहीं पतवार कश्ती में ये
तूफाँ पर भरोसा कर गया

ये कौन सक्ष है..

ये कौन सक्ष है.. 
जो किसी दुखिया के
आँसू से पसीज गया
ये कौन सक्ष है...
गरीब की झोंपड़ी से
दर्द उधार ले गया।
ये कौन सक्ष है...
जो तुम्हारे बुखार से
इतना तप गया
ये सक्ष कौन है...
जो तुम्हारे पग में लगे
काँटों से बिंध गया।
कौन है जो भिखारी के
तन मन में बैठ गया है
जगत की संवेदनाओं का
व्यवहार करता है
कौन है वह जो पढ़ लेता है
एक बूढ़े के चेहरे की
सिलवटों में से अमुभव के छ्न्द
लोग यही समझते हैं
पागल, आवारा, दीवाना, फुर्सती है
शरारती, अक्खड़ लोगों ने
और भी कई उपाधियाँ खोज ली होंगी
पर वह सक्ष दीनों का हमदर्द है
रंगकर्मी है, लेखक है या कवि है

संत भय्यू जी महाराज

जिन्दगी के अजब रंग है
रोशनी ले कर चला वह
पर छाया संग थी
न जान सके वे

सफर में अकेले नहीं
दुखियारे, पतित, असहाय संग थे
यह आधी दुनिया की जीत अधूरी

जंग एक बाहर थी जीत ली
जंग थी एक भीतर से
वह पुरोधा,
बाहर महारथियाँ से लड़ता रहा
पर हार गया
भीतर के पिद्दलों से

बाहर शबाब ही शबाब
भीतर कोलाहल और विक्षेप
संतुलन की अवधारणा
क्यों हुई ध्वस्त
यथार्थ उस कालजयी का
बाहर से कभी नहीं
हा! हार गया भीतर ही से

*इसलिये गीता कहती हैं*

अभ्यास करो उस समन्वय योग का।

*सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।*
*ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।2/38।।*

जयपराजय लाभहानि और सुखदुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा।

रामानारायण सोनी

Saturday, 16 June 2018

छबि तुम्हारी

मैं गिरि का पाहन हूँ
  तुझ में है मलय गंध
मैं बिखरी रज कण
  तू छंदों का मधुर बंध।।

क्रन्दन के गाँव मेरे
  तुम झिलमिल झीलों के
टूटे सुर साज मेरे
  तुम सप्तक शुभ वंशी के।।

मैं दर्पण हूँ कोरा सा
  पर आते तुम जब जब
अलबेली अठखेली
  सजती वो छबि तब तब।।

रामनारायण सोनी

Thursday, 14 June 2018

याद का सन्दूक

कमी जरूर मुझ में ही होगी कहीं
कि
तुम्हारी याद के सन्दूक से
कपूर की तरह उड़ गया,

क़तरा क़तरा बिखर गया
बिखर बिखर मैं,
देखता रहता हूँ
बस तुम्हें ही

पगडंडियों का राहगीर

लहरिया पगडंडियों का राहगिर हूँ
राजपथ के राहियों से तौलना मत।
मंजिलों की सीढ़ियाँ पर्याप्त मुझको
शिखर छूने की मुझे तुम बोलना मत।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।

झेलती झंझा उदधि की हूँ मैं लहर
झील की सी शान्ति मुझ में हैं नहीं ।
पा लिया स्पन्द रव का मस्तियों में
वो चाँद की परछाइयाँ मुझ में हैं नहीं।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।

छ्त मेरी नित नील तारक से मढ़ी है
पवन झलती मन्द शीतल मलय गंंधी।
है हरित वसना धरा की गोद मुद मय
चाहना फिर स्वर्ग की तुम घाेलना मत।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।

प्रिय आत्मन्

Come
Come my dear!

Come aloof
With mind and the Soul

Rejoice within selfness
Let us listen
The holy song
The song of silence
Of that ocean of Peace

आओ!
आओ मेरे प्रिय आत्मन्!

आओ अकेले ही
मन अौर आत्मा के सहित

स्वयं का आनन्द प्राप्त करें
हम सुनें
वह पवित्र गीत
गीत निस्तब्धता का
उस शान्ति के सागर का

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