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Friday, 26 March 2021
खपरैली बस्ती में
Saturday, 20 March 2021
गाओ! गीत कोई ऐसा
आकाश में घर नहीं बनते
डर लगता है मुझे बहुत
उन ऊँचाइयों पर खड़े होने से
झाकने से झाँई आती है जहाँ से
सोचता हूँ मैं अकसर कि..
तुम कितने ऊँचे हो गये हो
दृष्टि विहंगम तुम्हारी देख ही लेगी
मुझे ज़मीन पर कहीं न कहीं
लगता है अब तो..
जैसे बीहड़ में आ गया हूँ
पर तुम्हारे पंख बड़े हो गये हैं
नजरें भी बादलों को भेद कर
नीहारिकाओं में उलझ गई तुम्हारी
स्मृतियाँ भी फेंक दी है कहीं तुमने!
लौट भी आओ इस बिखरते नीड़ में
अपनी धरती, अपनी शाख पर
शाम होने से पहले!
सुन सको तो सुनो!!
आकाश में घर नहीं बनते!
रामनारायण सोनी
१९.०३.२१
Tuesday, 16 March 2021
कहाँ गए हो!
रूही हो तुम!
तुम्हारा ही शब्दकोष
कैसे कहूँ
Monday, 15 March 2021
अग्निवेश
आँसू
कितने वजनी हैं ये
निकलते ही हलके हुए जाते हो।
आँसू हमारे अन्तस का स्राव है
हँसते मुखौटे के ठीक पीछे
ठण्डे व्रणों से रिसता सैलाब है
भावों का खद-खद कर उबलता
रेंगता फ़िसलता मन्थर रिसाव है
इसे!!
रिसने दो!, बहने दो!,
उठने-गिरने दो!
शायद इन अस्तरों के तले
शान्ति के महीन अंकुर उग आवें
शायद इन अंकुरों से प्रार्थना, पूजा
प्रतिवेदन से अर्चना की
थाल सज्ज हो जावे
और ...
पाप, ताप, शाप के अग्निवेश से
कूट की तरह बाहर निकल जावे।
रामनारायण सोनी
१५.०३.२१
Wednesday, 10 March 2021
अमृता से विष बुझाएँ
Tuesday, 9 March 2021
बूँद बूँद अहसास
दादी की प्रभातियॉँ
Monday, 8 March 2021
सपने हो न सके अपने
वह विभावरी बीत गई, अंचल में हाय! लिये सपने
वे उठे गिरे फिर गिरे उठे, भावों के भ्रमर पिपासु थे
अपनी तरणी फिर फिर टूटी, वे विधि के झंझावात तने
अधरों के द्वार न खोल सके वे शब्द बिचारे थे बौने
ऊषा की गागर भरी नहीं, वे लौटे गये रीते सपने।
सपने हो न सके अपने।।
कहीं ढुलक न जाय कभी, नीरज नयनो से अश्रु प्रिये!
अपनी हस्त लकीरों ने हा! कितने ही आभिशाप जिये
पर महीन से धागों से ही बँधे रहे हैं सजल हिये
कितनी अकथ कहानी छूटी क्रन्दन का अभिसार लिये
अपनी दीपशिखा की लौ में अपने ही मन होम किये
तृषा प्राण की बुझी नहीं, सब बिखर गये रीते सपने।
सपने हो न सके अपने।।
उस उपवन को सजा मिली जिसने बसन्त को पाला था
खाली माटी कलशों में मधु आसव विधु का डाला था
चन्दन रोली के रंग लिये जिसने आँगन रंग डाला था
थोथे जीवन में ढंग लिये हर पल गरल निवाला था
नख से शिख तक ओढ़ा हमने गम का वही दुशाला था
मृषा आस की बेल मरी, और सूख गये अपने सपने।
सपने हो न सके अपने।।
रामनारायण सोनी
०८.०३.२१
Friday, 5 March 2021
मैं और तुम
एक ही तो है
नहीं मिलते हो तो
खोजता फिरता हूँ
तुम्हें पाने को
यहाँ-वहाँ, कहाँ-कहाँ
मिलते हो जब भी तुम
भूल जाता हूँ मैं सब कुछ
और मुझे भी
शायद एक ही हैं
मैं और तुम
Thursday, 4 March 2021
द्वार की वह कुण्डी
थामे रहना
प्रेमकुटी छाई है
मौन छाया बोलती है
मौन है चिर प्रीत मेरी
शब्द में हैं अर्चनाएँ
है अभी तो रक्त में
घुलती हुई संवेदनाएँ
रागिनी से सिक्त है इन
शब्द में ये अर्चनाएँ।
प्राण की वंशी निनादित
हैं गमकती व्यंजनाएँ
पुष्प की सौरभ लिये
गुंजन भरी अभ्यर्थनाएँ।।
रात जागी कामिनी के
कुन्द होते करतलों में
कुनमुनी नलिनी अलापे
प्रीत के मधुरिम पलों में।
रंग रांची है महावर
नव उदित है कोंपलों में
फिर रुहानी सी कहानी
कह रही इन शतदलों में।।
रामनारायण सोनी
२७.१२२०२०
तुम पास हो तुम्हारे
मैं भी वहीं तो हूँ
मैं खो गया मुझी से
मैं भी वहीं तो हूँ
रामनारायण सोनी
२८.१२.२०२०
तुम द्वार किसी के मत जाना
मन के पावन उपवन में जब पुष्पों सी रस गंध न हो
वन्दन अर्चन की समिधा का हवि से ही अनुबन्ध न हो
मंत्रों के अक्षर अक्षर में जब हो शुचिता ना अविरल
कैसे होंगी प्रीत यज्ञ की आहुतियाँ निर्मल निश्छल
तुम द्वार किसी के मत जाना
तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹
खंजन नयनों की आभा में नमी नेह की दिखे नही
आँगन में उर के भीतर जहँ भाव रसीले टिके नही
सँझवाती के आस दीप में चाह की तेल न बाती हो
अधरों पर आगत आवन की ना मुस्कान सुहाती हो
तुम द्वार किसी के मत जाना
तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹
बारिश की झिरमिर बूँदों से मन गीला ना हो पाये
लदे आम्रवन मोरों से पर कोयल कूक नहीं पाये।
मेघों की गर्जन सुन कर भी मन मयूर जहँ मौन रहे
नयनों की कोरों से काजल जमे अश्रु की व्यथा कहे।।
तुम द्वार किसी के मत जाना
तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹
प्रणय पुष्प न झरते हों वन चाहे रहे रसाल भरा
चन्दन रोली न सजती हो मलयाचल हो भरा
भरा
कल कल करते हों प्रपात पर क्षार सिन्धु सा जल हो
तपती माटी के माथे पर मढ़ता कोई गरल हो
तुम द्वार किसी के मत जाना
तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹
रजत रश्मियाँ प्राणों में जब शीतलता संचार करे
कुन्द कली के कानों में जब भ्रमर कोई गुंजार भरे
मन के नन्दन कानन में जब वेणु निनादित हो जाए
किसलय का सा अगन धरे अन्तर्मन आतुर हो जाए।
तुम द्वार अन्य के मत जाना
तुम गीत वृथा के मत गाना🌹
रामनारायण सोनी
१२.०१.२१
यहीं तो हो तुम!
जब तुम न थी
तुम न थी, जब तुम न थी
तुम न थी तब रश्मियों में, उज्ज्वला का भास ना था।
रागिनी में स्वरलता का, कम्प ना था राग ना था।
स्वाँस में प्रश्वास में तो, बस पवन था प्राण ना था
तुम न थी तो उर्मियों में, प्रीत का मधुमास ना था।।
तुम न थी, जब तुम न थी
थे पुहुप बहु रंग के बहु गंध के बहु भाँति के वे
तुम न थी तो वे वियोगी, बाग के अधिभार से थे।
उन मुंडेरों की विधाएँ, थी अहा सुनसान कितनी
मधुपरी के वे अधर भी, रज बिना मधुभार से थे।।
तुम न थी, जब तुम न थी
चाँद की थी ज्योत्सना वह रोप्यमय आभास होती
थी प्रवालों में प्रखर आभा प्रवर प्रतिभास होती।
शून्य सी सम्वेदना थी, चहुँ दिशा अधिवास होती
पर हृदय की वीथियाँ तुम बिन कहाँ रनिवास होती।।
तुम न थी, जब तुम न थी
थे अधर शहदी, मधुप की गुंजनें मल्हार गाती
फरफराती तितलियाँ पुष्प को फिर फिर जगाती।
तुम न थी तो उन पलों की, कामना कैसे सुहाती
तुम न थी तो गीत कैसे, कोकिला ये छ्न्द गाती।।
तुम न थी, जब तुम न थी
तुम मिली अँकुवा गये नव, कोंपलों के गुल्म सारे
सन्दली होती हवाएँ, सब प्रमादी गीत हारे।
वल्लरी वन की लताएँ, झूलती साँझे-सकारे
मुग्ध मन के द्वार तुम बन, प्रीत के पाहुन पधारे।।
तुम न थी, जब तुम न थी
रामनारायण सोनी
११.१२.२०
कविता की कहानी
कोई तो भगीरथ है
छुप्पा-छुप्पी
दीप की लौ सा जलूँ
यादें कैसी कैसी
कुछ की आती नहीं
तो किसी की जाती नहीं
कुछ जा कर लौटती हैं फिर फिर
ले जाती है हमें वहाँ
तो कभी लाती हैं तुम्हें यहाँ
रखती है अकसर
दोनों को जोड़ कर
ये यादें भी ना! बड़ी अजीब है
यादें कैसी कैसी?
कभी आबादी में अकेला
तो कभी वीराने आबाद करती
खेलती हैं कभी छितरे बादलों से
बटोर लाती है वे तुम्हारे सब्ज लफ़्ज़
फुसफुसाती है प्यार से कानों में
बिम्बित करती है तुम्हें
फूलों के महकते परागण में
झिलमिलाते ताल के जल में
दौड़ती ही फिरती हैं
यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ
ये यादें भी ना! कितनी करीब हैं
नाबाद है, पूँजी है, सनद है
मन की तिजोरियों में
रामनारायण सोनी
२६. १ .२१
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- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन