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Friday, 26 March 2021

खपरैली बस्ती में

खपरैली बस्ती में
आओ फिर लौट चलें, खपरैली बस्ती में

भींच लिये ओंठ और भींची जब आँख मेरी
मन ही मन लगता है अंबर ने पाँख धरी
भैंसों की पीठों पर फिर चढ़ बैठें मस्ती में
पोखर के छिछले से पानी की छप छप में
कनुवे की किलकारी गूँज रही ढप ढप में
आओ फिर लौट चलें, खपरैली बस्ती में।
                           खपरैली बस्ती में।।
तन मन सब भींग गया यादों के झुरमुट में
चूजों संग दौड़ रहा मन घूरे पर सरपट में
बोल रही शीशी में पनचक्की पुक पुक कर 
कोयल जहँ कूक रही आमों के उपवन में
भर ले पोटाश जरा लोहे की गजगुण्डी में
लहसुनिया फोड़ें भित्ती पर चल मण्डी में
                           खपरैली बस्ती में।।
चाचा के चौंतर पर खेलें चंग पौ और चौपड़
तारा और मुन्नी की सुन पाँचों की खड़ खड़ 
मस्तानी टुल्लर जो खेल रही है लंगड़ी भी
खेलें ढप्पी और पव्वा नीम तले दुकड़ी भी
अन्नी-चन्नी की धूम मची चन्दन के औसारे
कपड़े की गेंद बना गधामार टप्पे भर मारे
                           खपरैली बस्ती में।।

रामनारायण सोनी
२६.०३.२०२१

Saturday, 20 March 2021

गाओ! गीत कोई ऐसा

तुमने मेरी पुकार को 
शब्द भर समझा
यार मेरे !
वे मेरे हृदय के स्पन्दन हैं
और,
मेरे संयम की परिधियाँ
मेरी अपनी ही निर्मिति हैं
सागर के साहिल की तरह
मेरा यह प्रेम सागर
किनारों पर लगा होगा छिछला
पर जरा भीतर आओ तो!
डूब कर देखो संग - संग!!

यही जिंदगी है क्या ?
कि रो कर आये
और
रुला कर चल दिये
मुश्किल से मिले इस अधबीच को 
थोथी उम्र से नहीं....
उपलब्धियों, मीठे रिश्तों से नापो, 
फिर..उल्लास से भर लो..

कान, आँख, नाक
यहाँ तक कि स्पर्श को
बाहर रख कर भीतर चलो
तुम्हारा सहोदर 'आनन्द'
प्रतीक्षा में बैठा है।

तुमने इस घने अँधेरे को 
अमावस समझ लिया 
ऐसा बिल्कुल नहीं है, 
तुम्हारे सुन्दर पावन कक्ष के
सभी द्वार और खिड़कियाँ बन्द पड़ी हैं
खुशबू लेकर आई 
मलियानिल दस्तक देकर
लौट - लौट गई।
प्रकाश और ताजगी
द्वार पर खड़ी हैं

वक्त की दीवार पर टँगी
घड़ी की सुइयाँ
अपने पद-चिन्ह नहीं छोड़ती हैं।
ताले नहीं होते हैं
इन मिट्टी की गुल्लकों में
टूट कर बिखरती है
और अपना सब बिखेर भी देती हैं

बो कर देखो
मुस्कुराहटों के बीज
खेत अपना हो या पराया,
संगीत वीणा के तारों में नहीं
उसके स्पन्दन में है।
बैठा नही रह जावे
गीत कोई कण्ठ के उस पार
गुनगुनाओ उसे, क्योंकि
जरूरत है तुम्हें, मुझे और सब को यही

रामनारायण सोनी
२१।०३। २१

आकाश में घर नहीं बनते

डर लगता है मुझे बहुत

उन ऊँचाइयों पर खड़े होने से
झाकने से झाँई आती है जहाँ से
सोचता हूँ मैं अकसर कि..
तुम कितने ऊँचे हो गये हो
दृष्टि विहंगम तुम्हारी देख ही लेगी
मुझे ज़मीन पर कहीं न कहीं
लगता है अब तो..
जैसे बीहड़ में आ गया हूँ
पर तुम्हारे पंख बड़े हो गये हैं
नजरें भी बादलों को भेद कर
नीहारिकाओं में उलझ गई तुम्हारी
स्मृतियाँ भी फेंक दी है कहीं तुमने!
लौट भी आओ इस बिखरते नीड़ में
अपनी धरती, अपनी शाख पर
शाम होने से पहले!
सुन सको तो सुनो!!
आकाश में घर नहीं बनते!

रामनारायण सोनी
१९.०३.२१

Tuesday, 16 March 2021

कहाँ गए हो!

मैंने बादल की ओर देखा
शायद बरसात हो जाए,
फूल को छुआ कि मुझे
शायद तुम्हारी छुअन का
कोमल अहसास हो जाए

कलम उठाई कि तुम्हें लिख डालूँ
पर तुम शब्द तो हो नहीं हो
जुबां भी जिसे न बोल पाए
कि कहीं काँपते अधरों पर ठहरी
नयनों की खारी बूँद न ढुल जाए

मैंने हवाओं की खुशामदें की
कि वे शायद कोई खबर लाए
पर वे लौट गईं उल्टे पाँव ही४ पैरों के वे निशान भी
रास्तों पर से नोच गया है कोई

रामनारायण सोनी

रूही हो तुम!


हाँ तुम!
तुम कौन हो?
क्या तुम वही हो?
नहीं जो लोग देख रहे हैं..
वह तुम नहीं हो..
सुचिते!
मेरे लिये तुम!
"तन्वी नहीं, रूही हो"
मैंने घटती बढ़ती
तुम्हारी देह के पार...
तुम्हारे अन्तर का सौंदर्य
मर्म की सुकोमलता
और मेरी होने का
अहसास देखा है
सिर्फ वही हो
मेरी, तुम!

रामनारायण सोनी

तुम्हारा ही शब्दकोष



मैने कह दी है
अपनी सारी बातें
उस भाषा में ही
सुन और समझ भी रहे हो तुम
अच्छी तरह से
इसीलिये तो...
मैं भाग्यशाली हूँ
मेरी यह भाषा मौन है
जिसका पूरा शब्दकोष
तुमने ही तो लिखा है।

रामनारायण सोनी

कैसे कहूँ



मैंने बादल की ओर देखा
शायद बरसात हो जाए,
फूल को छुआ कि मुझे
शायद तुम्हारी छुअन का
कोमल अहसास हो जाए

कलम उठाई कि तुम्हें लिख डालूँ
पर तुम शब्द तो हो नहीं हो
जुबां भी जिसे न बोल पाए
कि कहीं काँपते अधरों पर ठहरी
नयनों की खारी बूँद न ढुल जाए

मैंने हवाओं की खुशामदें की
कि वे शायद कोई खबर लाए
पर वे लौट गईं उल्टे पाँव ही
तुम्हारे पैरों के वे निशान भी
रास्तों पर से नोच गया है कोई

रामनारायण सोनी

Monday, 15 March 2021

अग्निवेश

आँसू
कितने वजनी हैं ये
निकलते ही हलके हुए जाते हो।
आँसू हमारे अन्तस का स्राव है
हँसते मुखौटे के ठीक पीछे
ठण्डे व्रणों से रिसता सैलाब है
भावों का खद-खद कर उबलता
रेंगता फ़िसलता मन्थर रिसाव है
इसे!!
रिसने दो!, बहने दो!,
उठने-गिरने दो!
शायद इन अस्तरों के तले
शान्ति के महीन अंकुर उग आवें
शायद इन अंकुरों से प्रार्थना, पूजा
प्रतिवेदन से अर्चना की
थाल सज्ज हो जावे
और ...
पाप, ताप, शाप के अग्निवेश से
कूट की तरह बाहर निकल जावे।

रामनारायण सोनी
१५.०३.२१
  

Wednesday, 10 March 2021

अमृता से विष बुझाएँ

मैं नवाऊँ शीश अपना जिस धरा में स्वेद तेरा
पुष्प का परिमल बना है श्रम विरंजित रक्त तेरा
पूष की जाड़ों भरी हो वह सिहरती रात भीषण
जेठ के हों दिन तपिश के कर रहे हों आग वर्षण
तू गला है और तपा है कर्ज माटी का चुकाने
सब लगे हैं उन श्रमों को स्वार्थ में अपने भुनाने
          हाय! ये हतभाग तेरे।

खेत के विज्ञान हमने विश्वभर में खोज डाले
फिर सभी चुन चुन हमारी भूमि में विष घोल डाले
नीड़ और वे पेड़ मेढ़ों के सभी तो काट डाले
कूप वापी नद नदी जल स्रोत सारे सोंख डाले
अब न होंगी मधुपरी वें जो परागण में लगी थी
और कीटों को निगलती पाँखियाँ भी तो लगी थी
          हाय! कितने वे बिचारे।

पूर्ण वसुधा के निवासी थे कुटुम्बी लोग अपने
विश्व अब बाजार बनकर लूटता घर-बार, सपने
गो धनों की थी धुरी पर यह कृषी सम्पन्न सारी
अब मशीनें आग उगलें सभ्यता रौंदी हमारी 
छोड़ कर अपनी विरासत दौड़ अंधी दौड़ लेंगे
अन्त में अपना करम ही पत्थरों से फोड़ लेंगे
          हाय! ये हतभाग मेरे।

आओ लौटें फिर सुनहरी वो चिरैया ढूँढ लाएँ
भारती के भाल से यह विषबुझी कालिख मिटाएँ 
गाय, गौरी, पनघटों की बस्तियाँ फिर ढूँढ लाएँ
शाप देती भूमि के विष अमृता ही से बुझाएँ
फेंक कर घातक रसायन उर्वरा फिर खोज लाएँ
डूबती वैदिक कृषि को फिर नया जीवन दिलाएँ।
          अब न हो हतभाग मेरे।

रामनारायण सोनी
१०.०३.२१

Tuesday, 9 March 2021

बूँद बूँद अहसास

ज्योत्सना भरती कैसा ताप,
  रजतमय रश्मि लगे अभिशाप।
प्रीत के पाहुन बसे विदेश,
  राह पर टिकी दृष्टि अनिमेष।
लुटा है मन का सब अधिकोष,
  दिलाये कौन मुझे परितोष।
जगी है प्राणों में यह प्यास,
  जगा फिर बूँद बूँद अहसास।।१।।

जगा जब बूँद बूँद अहसास,
 निखिल अवनी में गूँजे हास।
जगे नीरव में अस्फुट छन्द,
 महकती मलयज में मकरन्द।
कहीं विकसे सर में शतदल,
 प्रणयिनी तरुणी है आकुल।
तड़ित है अधरों पर मृदु हास,
 जगा जब बूँद बूँद अहसास।।२।।

अजब सा गूँजा है कलरव,
  मधुर से स्वप्न जगे अभिनव।
कुलाचें भरता मन मद-भार,
   बदन में रोम पुलक का भार।
विकम्पित अधरों में निःश्वास,
  नयन में नीर किये अधिवास।
रमा है कण कण में मधुमास,
  जगा जब बूँद बूँद अहसास।।३।।

रामनारायण सोनी
१०.०३.२१

दादी की प्रभातियॉँ

मेरे गाँव की सौंधी मिट्टी पर
मैं जब जब माथा धरता हूँ
दिव्य गंध के दिव्य लोक में
ऐसे ही विचरण करता हूँ

जहँ दादी माँ भिन्सारे में
घट्टी की घुर-घुर ताल मिला
गाती प्रभातियाँ भक्ति मयी
सुन बचपन का फूल खिला

भोर हुए पर प्राची से जब
गुदड़ी बन सूरज आता था
बैठ चटैया पर गोदी में में 
दादी माँ के इतराता था

एक सहेली प्यारी चिड़िया
चिरिप चिरिप कह जाती थी
खिड़की पर से चोंच दिखाती
मुझको  बहुत चिढ़ाती थी

Monday, 8 March 2021

सपने हो न सके अपने

हम तुम दोनो मौन रहे, जग व्यस्त रहा अपने अपने
वह विभावरी बीत गई, अंचल में हाय! लिये सपने
वे उठे गिरे फिर गिरे उठे, भावों के भ्रमर पिपासु थे
अपनी तरणी फिर फिर टूटी, वे विधि के झंझावात तने
अधरों के द्वार न खोल सके वे शब्द बिचारे थे बौने
ऊषा की गागर भरी नहीं, वे लौटे गये रीते सपने।
            सपने हो न सके अपने।।
कहीं ढुलक न जाय कभी, नीरज नयनो से अश्रु प्रिये!
अपनी हस्त लकीरों ने हा! कितने ही आभिशाप जिये
पर महीन से धागों से ही बँधे रहे हैं सजल हिये
कितनी अकथ कहानी छूटी क्रन्दन का अभिसार लिये
अपनी दीपशिखा की लौ में अपने ही मन होम किये
तृषा प्राण की बुझी नहीं, सब बिखर गये रीते सपने।
              सपने हो न सके अपने।।
उस उपवन को सजा मिली जिसने बसन्त को पाला था
खाली माटी कलशों में मधु आसव विधु का डाला था
चन्दन रोली के रंग लिये जिसने आँगन रंग डाला था
थोथे जीवन में ढंग लिये हर पल गरल निवाला था
नख से शिख तक ओढ़ा हमने गम का वही दुशाला था
मृषा आस की बेल मरी, और सूख गये अपने सपने।
            सपने हो न सके अपने।।
रामनारायण सोनी
०८.०३.२१

Friday, 5 March 2021

मैं और तुम

एक ही तो है

नहीं मिलते हो तो
खोजता फिरता हूँ
तुम्हें पाने को
यहाँ-वहाँ, कहाँ-कहाँ

मिलते हो जब भी तुम
भूल जाता हूँ मैं सब कुछ
और मुझे भी
शायद एक ही हैं
मैं और तुम

Thursday, 4 March 2021

द्वार की वह कुण्डी

द्वार की वह कुण्डी
व्यर्थ ही है 
जिसे तुमने खटखटाया नहीं
वे वातायन केवल
दीवार के छेद भर हैं
न प्रवेश करती हों जिनमें से
वे हवाएँ लौटी हों...
तुम्हें छू कर 
अब डोलती रहती हैं
इन दीवारों पर इधर उधर...
..प्रतिच्छायाएँ तुम्हारी
इसलिये इसे मैं घर नहीं मानता
बेवतन-रूह ही
बन गई हैं अब तो
तुम बिन

थामे रहना

छोड़ना मत अब हाथ मेरा
क्योंकि...यकीनन
मैने छोड़ दिया है पूछना अब
दुनिया से भी, 
खुद से भी
..कि हम कहाँ जा रहे हैं?

जोगन

पद्म का 
यह मौन
और पद्मासन
जैसे तुम!

तुम योगी हो गये हो और...
..और
मैं जोगन

        रामनारायण सोनी
२.३.२१

प्रेमकुटी छाई है

नयनों के पथ से आये तुम
अन्तःपुर के खोल किवारे
दिल की प्रेमकुटी में टाँगे 
मैंने प्रीत के  बन्दनवारे

बेंदी माँडों म्हावर माँडो
काजर लाओ, चौक पुराओ
धानी चूनर कोई रंगा दो
देहरी जगमग दीप धराओ

वासन्ती रस रंग रमी है
अंग अंग उमगी अंगनाई
मन की गली गली बजती है
साँसों की सरगम शहनाई

श्याम मेघ अलकावली ओढ़ी
चंचरीक की गुन गुन गाजी
पोर पोर पुरवाई महकी
नयन कोर कजराई आँजी

कोई दिठौना ठोड़़ी धर दो
नजर उतारो, डगर बुहारो
प्रेमनगर की पनिहारी हूँ
रंग पलाश के गागर डारो

रामनारायण सोनी


मौन छाया बोलती है

"मौन छाया बोलती है"

मौन छाया भी बहुत सी बात कहती है
कान मन के तो लगा कर तू सुन जरा।

आज ठहरे इन पलों के पंछियों के साथ हो 
दो घड़ी संग घूम लें तू हाथ थामे सुन जरा।

गुगुदाते मलमली इस दूब को फिर से छुएँ
शाख पर के गुल की महक तो सुन जरा।

शाख के गुल चूमते उस चीर ही की कहानी
यह पवन देता गवाही कान देकर सुन जरा।

ढूँढ लें पदचिन्ह भी इस राह में होंगे कहीं
द्रुम दलों की आहटें यूँ बोलती है सुन जरा।

अंजुरी भर पुष्प की वे पंखुड़ी बिखरी यहाँ
पोर में खुशबू रमी है आज भी तू सुन जरा।

रामनारायण सोनी 

मौन है चिर प्रीत मेरी

मौन है चिर प्रीत मेरी शब्द के विनिमय नहीं है
नयन भींगे वेदना की धूप में अभिनय नहीं है
मौन रजनी, मौन परिमल, मौन है वाचाल तटिनी
मौन उर में बन्दिनी इस प्रीत का परिणय नहीं है
चल चलें फिर गाँव अपने, स्वप्न पाँखी खोल डैने
इस हृदय की प्यास का तो शोर से परिचय नहीं है
       
मौन अधरों के निलय की रक्तिमा कुछ कह रही है
इस निरे निस्पन्द में भी भाव सरिता बह रही है
इन पलक की ओट में ये पुतलियाँ कब चुप रही है
चल चलें फिर गाँव अपने, खोल लें गलबाँह अपनी
इस नगर की धुन्ध में तो सूझता कुछ भी नहीं है

सीख ले इस मौन से तू इस गगन के इस धरा के
गीत सुन तू भाल विधु की चाँदनी की उस सुरा के
धड़कनों की मौन कथनी कह रही मन की त्वरा के
चल चलें फिर गाँव अपने, खोल दें अनुबन्ध सारे
प्रीत की पावन नगर में सुर सजा लें उर धरा के

रामनारायण सोनी
२५.०१.२०२१

शब्द में हैं अर्चनाएँ

है अभी तो रक्त में 

घुलती हुई संवेदनाएँ
रागिनी से सिक्त है इन
शब्द में ये अर्चनाएँ।
प्राण की वंशी निनादित
हैं गमकती व्यंजनाएँ
पुष्प की सौरभ लिये
गुंजन भरी अभ्यर्थनाएँ।।

रात जागी कामिनी के
कुन्द होते करतलों में
कुनमुनी नलिनी अलापे
प्रीत के मधुरिम पलों में।
रंग रांची है महावर
नव उदित है कोंपलों में
फिर रुहानी सी कहानी
कह रही इन शतदलों में।।

रामनारायण सोनी
२७.१२२०२०

तुम पास हो तुम्हारे
मैं भी वहीं तो हूँ
मैं खो गया मुझी से
मैं भी वहीं तो हूँ

रामनारायण सोनी
२८.१२.२०२०

तुम द्वार किसी के मत जाना

मन के पावन उपवन में जब पुष्पों सी रस गंध न हो
वन्दन अर्चन की समिधा का हवि से ही अनुबन्ध न हो
मंत्रों के अक्षर अक्षर में जब हो शुचिता ना अविरल
कैसे होंगी प्रीत यज्ञ की आहुतियाँ निर्मल निश्छल
           तुम द्वार किसी के मत जाना
           तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹

खंजन नयनों की आभा में नमी नेह की दिखे नही
आँगन में उर के भीतर जहँ भाव रसीले टिके नही
सँझवाती के आस दीप में चाह की तेल न बाती हो
अधरों पर आगत आवन की ना मुस्कान सुहाती हो

           तुम द्वार किसी के मत जाना
           तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹

बारिश की झिरमिर बूँदों से मन गीला ना हो पाये
लदे आम्रवन मोरों से पर कोयल कूक नहीं पाये।
मेघों की गर्जन सुन कर भी मन मयूर जहँ मौन रहे
नयनों की कोरों से काजल जमे अश्रु की व्यथा कहे।।
            तुम द्वार किसी के मत जाना
            तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹

प्रणय पुष्प न झरते हों वन चाहे रहे रसाल भरा
चन्दन रोली न सजती हो मलयाचल हो भरा
भरा
कल कल करते हों प्रपात पर क्षार सिन्धु सा जल हो
तपती माटी के माथे पर मढ़ता कोई गरल हो
            तुम द्वार किसी के मत जाना
            तुम गीत प्रीत के मत गाना🌹

रजत रश्मियाँ प्राणों में जब शीतलता संचार करे
कुन्द कली के कानों में जब भ्रमर कोई गुंजार भरे
मन के नन्दन कानन में जब वेणु निनादित हो जाए
किसलय का सा अगन धरे अन्तर्मन आतुर हो जाए।

            तुम द्वार अन्य के मत जाना
            तुम गीत वृथा के मत गाना🌹

     रामनारायण सोनी
      १२.०१.२१

यहीं तो हो तुम!

मन मीत मेरे!
आज अन्तस के
कुम्हलाए पुष्प फिर खिल उठे
जैसे तुम यहीं तो हो
मैंने तो बस सरगम का 
आलाप भर दिया था
पर तुमने कानों में उँडेल दिया
पूरा का पूरा राग विहाग
लगता है जैसे
यहीं तो हो
नही! नहीं!! यहीं हो तुम !!!

जब तुम न थी

तुम न थी, जब तुम न थी

तुम न थी तब रश्मियों में, उज्ज्वला का भास ना था।
रागिनी में स्वरलता का, कम्प ना था राग ना था।
स्वाँस में प्रश्वास में तो, बस पवन था प्राण ना था
तुम न थी तो उर्मियों में, प्रीत का मधुमास ना था।।
                    तुम न थी, जब तुम न थी

थे पुहुप बहु रंग के बहु गंध के बहु भाँति के वे
तुम न थी तो वे वियोगी, बाग के अधिभार से थे।
उन मुंडेरों की विधाएँ, थी अहा सुनसान कितनी
मधुपरी के वे अधर भी, रज बिना मधुभार से थे।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

चाँद की थी ज्योत्सना वह रोप्यमय आभास होती
थी प्रवालों में प्रखर आभा प्रवर प्रतिभास होती।
शून्य सी सम्वेदना थी, चहुँ दिशा अधिवास होती
पर हृदय की वीथियाँ तुम बिन कहाँ रनिवास होती।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

थे अधर शहदी, मधुप की गुंजनें मल्हार गाती
फरफराती तितलियाँ पुष्प को फिर फिर जगाती।
तुम न थी तो उन पलों की, कामना कैसे सुहाती
तुम न थी तो गीत कैसे, कोकिला ये छ्न्द गाती।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

तुम मिली अँकुवा गये नव, कोंपलों के गुल्म सारे
सन्दली होती हवाएँ, सब प्रमादी गीत हारे।
वल्लरी वन की लताएँ, झूलती साँझे-सकारे
मुग्ध मन के द्वार तुम बन, प्रीत के पाहुन पधारे।।
                   तुम न थी, जब तुम न थी

      रामनारायण सोनी
         ११.१२.२०

कविता की कहानी


जब कविता 
थी अपने शैशवकाल में,
नन्हे नन्हे डग चलीं थी
भावनाएँ अँकुआ रही थी
हल्के जर्द पड़े डायरी के पन्नों में 
सूखी वे गुलाब की पंखुडियों
मुस्कुराई, महमहाई...!
काल की कील पर टँगी
सुइयाँ पीछे दौड़ी, 
ठिठकी, कहीं ठहर गई
वहाँ, जहाँ लिखीं थी
ढाई आखर की
छोटी सी विराट कहानी...!

कोई तो भगीरथ है

कोई तो भगीरथ है
  जो उतार लाया 
   गंगा को स्वर्ग से
न तो मैं गंगा हूँ
  न ही भगीरथ
कौन है वो
  जो कर गया यह सब
   बस एक अहसास है मुझे
   बस एक अबोध सा बोध है
पर जो कुछ भी है
 कितना  सुन्दर है
  कृपा का वर्षण है
  तुम-हम बस भींगते रहें

छुप्पा-छुप्पी

छुप्पा-छुप्पी

आओ चलें
छुप्पा-छुप्पी खेलें
मैं अपनी आँखें
अपने हाथों से छुपा लेता हूँ
तुम मुझे पीछे से चपत लगा कर
फिर से कहीं छुप जाओ
चलो वह मासूम सा बचपन
फिर ढूँढ लाएँ
फिर बनें हम संगतराश
चिकनी गीली माटी के
गुड्डे गुड़िया बनाएँ
उन लम्हों में सुनहरे बर्क लगाएँ

दीप की लौ सा जलूँ

दीप की लौ सा जलूँ वह पथ तुम्हें जो दीख जाए
मेघ सा हो कर गलूँ मैं जब धरा पर बीज आए।
कैद सीपी में रहूँ मैं जब तलक मोती न निबजै
बीनता हूँ कटकों को राह तू जिस ओर जाए।।

🌹डबउबाये हैं नयन क्यों क्या कसक मन में धँसी
काँपते कर में विकलता क्यूँ फाँस मन में है फँसी।
मैं खड़ा हूँ सन्तरी बन तुम अभय के शल्क में हो
फेंक दो बीमार सोचें अब अधर पर हो हँसी।।

यादें कैसी कैसी

कुछ की आती नहीं

तो किसी की जाती नहीं
कुछ जा कर लौटती हैं फिर फिर
ले जाती है हमें वहाँ
तो कभी लाती हैं तुम्हें यहाँ
रखती है अकसर
दोनों को जोड़ कर
ये यादें भी ना! बड़ी अजीब है

यादें कैसी कैसी?
कभी आबादी में अकेला
तो कभी वीराने आबाद करती
खेलती हैं कभी छितरे बादलों से
बटोर लाती है वे तुम्हारे सब्ज लफ़्ज़
फुसफुसाती है प्यार से कानों में
बिम्बित करती है तुम्हें
फूलों के महकते परागण में
झिलमिलाते ताल के जल में
दौड़ती ही फिरती हैं
यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ
ये यादें भी ना! कितनी करीब हैं
नाबाद है, पूँजी है, सनद है
मन की तिजोरियों में

रामनारायण सोनी
२६. १ .२१

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