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Friday, 18 December 2015

मेरे तुम जीवन धन हो

बोल नहीं जो बता सकूँ मैं
पर मेरे तुम जीवन धन हो

तुम ही हो वे शब्द जिसे मैं
निशि-दिन बोला करती हूँ
तुम ही हो वह गीत सुरीले 
जिसको अधरों पर बुनती हूँ। 

 दर्द तुम्हारे मेरे अपने 
संवेदन  बन जाते हैं
मेरे तो सपने ही तुम हो 
जो सच में ढल जाते हैं। 

तुम ही हो वह मेघ बरसते 
जिसमें भींग-भींग जाऊं मैं 
तुम ही हो वह पवन झकोरा 
जिस संग उड़-उड़ जाऊं मैं।

तुम ही तो वह दरपन हो 
जिसमें देख दमक जाऊं मैं 
तुम अतीत हो मेरे अपने 
जिसमे छबि मेरी पाऊँ मैं। 

तुम हो सुन्दर खिले सुमन 
जिसकी सौरभ मेरी थाती 
तुम ही तो हो कथा जिसे मैं 
फिर फिर पढ़ने जाती। 

स्वास मेरी तुम स्पंदन हो 
तुम मेरे ही वृन्दावन हो 
प्रेम-चुनरिया ओढ़ फिरूँ मैं 
तुम मेरा जीवन धन हो। 

          रामनारायण सोनी

दीपोत्सवी



















महा तिमिर में दीप अवलियां  मुक्तावली सी भाती है।
लक्ष्मी की पदरेखी मानो  स्वर्गंगा सी बहाती है ।।

सुकुमारी बालाएं देखो दीप-दान को आई है।
मानो हीरक मुक्ता मणियाँ अंजुरी भर-भर लाई हैं।।

ज्ञान-प्रभा के रश्मिपुञ्ज से आलोकित हो नितनव जीवन।
बना रहे संघर्ष पलों में अविकल अचल अथक अंतर्मन।।

Thursday, 17 December 2015

गूलर के फूल


होम करके जन्म सौ-सौ ना रुके
   गीत प्रभु हम अर्चना के गा रहे
मिल सकीं दो पटरियाँ कब रेल की
   जान कर भी हम जिए क्यों जा रहे।।

स्वप्न जन्मे ओढ़ कर झीने कफ़न
   भोर तक की उम्र ले होते दफ़न
क्यों लगे हम बीज बोने आस के
   इस जमीं की उर्वरा को नमन ।।

जन्म से प्यासे दिलों की व्यंजना
ओस के चाटे बुझी है कब जलन
हे दयामय देख लो खुद का सृजन
क्या अभी भी शेष कोई करम ।।

सब दिशाओं के क्षितिज छलना भरे
   आसमां टिकता धरा पर भासता
क्यों बनी पागल पवन पतझार में
   स्वप्न को ले उड़ चली वीरान में ।।

हम कँटीले रास्तों के हमसफ़र
   इस सफर भर दर्द की गहरी चुभन
इस चुभन से याद फिर गहरा गई
   इस चुभन को, याद को, तुमको नमन ।।

कोइ सहलाता नहीं इस दर्द को
   हाथ भी उनके पहुँच पाते नहीं
कौन तोड़े काटते इस मौन को
   अंजनों से अश्रु बाह पाते नहीं ।।

दूरियां अनगिन युगों की योजनों की
   शुष्क सरिता क्यों पड़ी तट-बंध में
हौसले, विश्वास थक कर चूर है
   जिंदगी थामे खड़ा बस प्यार है ।।

इस अलौकिक प्रीत में कैसा मिलन
   यह हमारी संगिनी है, प्राण है
अब लगे मधुमास भी पतझार है
   याद की छबियां बानी आधार है ।।
   जिंदगी थामे खड़ा बस प्यार है ।।

   रामनारायण सोनी

प्रभु-पद- पद्म

रे मन !

रे मन-मधुप मौन तू  रह कर
प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।
प्रेम-पयस्विनी भक्ति विमल धर
रस-प्रसाद माधुर्य लिए जा।
    रे मन-मधुप मौन तू  रह कर
    प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।

परम पुरुष वह, सञ्चित अघ-हर
ज्योति-पुञ्ज है, अंतर-तम-हर
उस करुणा वरुणालय की तू
रूप-माधुरी नित्य पिए जा।
    रे-मन मधुप मौन तू  रह कर
    प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।

कुलिस कठिन वह, कलिमल हर्ता
कुसुम सुकोमल है सुखकर्ता
कण-कण में सौन्दर्य उसी का
उस पावन का गान किये जा।
    रे मन-मधुप मौन तू  रह कर
    प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।

उस विराट की चरण शरण में
कर अपना सर्वस्व समर्पण
श्रांत-क्लांत अगणित जन्मों से
क्षीर-सिंधु स्नान किये जा।
    रे मन-मधुप मौन तू  रह कर
    प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।

          रामनारायण सोनी


तू शिल्पकार है


अगणित सरवर, तरुवर, गिरिवर
हिम-आच्छदित शैल-शिखर पर
मेघ रुचिर छूते नीलाम्बर l
        इन सबका तू शिल्पकार है l 
       तेरी महिमा अमित अपार है l l

हहर-हहर कर झरते निर्झर
कल-कल बहती सरिता अविरल
हरित-वसन धरि वसुधा सुन्दर
          इन सबका तू शिल्पकार है l
         तेरी महिमा अमित अपार है l l

बिंदु, बिंदु से सिन्धु बनाता
कुंद-इंदु से रस सरसाता
पुष्प-पुष्प में गंध समाता
          इन सबका तू शिल्पकार है l
         तेरी महिमा अमित अपार है l l

अग-जग, अचर-जीव सृष्टि में
रवि-शशि आतप और वृष्टि में
अविरल है क्रम सृजन-क्षरण का
          इन सबका तू शिल्पकार है l
          तेरी महिमा अमित अपार है l l

विश्व सकल तेरा है मंदिर
कण-कण तेरा विलास है
सत्य सनातन मेरे प्रभुवर
          इन सबका तू शिल्पकार है l
          तेरी महिमा अमित अपार है l l
              रामनारायण सोनी 

Saturday, 5 December 2015

खास दिन

है यही शुभकामना

सामने हो लक्ष्य का संधान जब
साधना की धनु-प्रत्यञ्चा तान लो 
का का दिन फिर हो उजालों से भरा 
तुम सफलता के शिखर को चूम लो। 

सूर्य से है मांगली भोर की उजली किरण 
सिंधु से गम्भीर भावों का विभव 
बादलों से मांगता मैं स्निग्ध अंतर 
कोकिला के कंठ से झरता मधुर स्वर। 

ये सभी व्यक्तित्व के आधार हों 
सत्य ही सम्बल बने, औ सहज व्यवहार हो
हो सरल सी लीक सुन्दर
मंद सी स्मित मनोरम हो मुखर

ऐ सुनो! उड़ते पलों, कुछ देर ठहरो 
मंद सी बहती हवाएँ कुछ रुको 
झर-झराते नीर बहना थाम लो 
आज दिन है खास जिसका।

इस घडी तुम साथ रहलो 
प्रीत का एहसास दे कर तुम चले जाना
उम्र की दहलीज पर जब होंगे खड़े 
कल सुबह फिर इस तरह उल्लास लाना। 

चल चलें उस पार से यादें समेटें 
फिर पुरातन गीत में नव स्वर जगाएं 
फिर अलसती रात में दीपक जलाकर 
नव दिवस के स्वागतों के गीत गाएं 

है यही शुभकामना कि ईश का आशीष हो 
शीश पर हरदम  'श्री माँ का' मृदुल आँचल रहे 

Thursday, 3 December 2015

संजा के स्वप्न




बचपन में भित्ति पर संजा मैं खेली थी
गोबर और और फूलों की पँखुड़ी थी, रोली थी;
सपनों में सजनी बन, करती अठखेली थी
सतरंगी धनुवे को, हिरदे में बो ली थी ।।

घेवर थे, चौपड़ थी, क्वांरे थे, छबड़ी थी

सात्याऔर पावन सत-ऋषि की टोली थी;
अठफूले, द्वारे थे, वृद्धों की जोड़ी थी
जोड़ा था मोरों का, केली की घेडी थी ।।

राजे ओ रजवाड़े, किला-कोट कौवे का

परिचय था अपनों का, आगे के सपनों का;
उमगा जब मन मेरा, भींग गया तन मेरा
धड़कन में पैठ गया, अनचीता साँवरिया ।।


गाल लसै कुमकुम और दर्पण अब भाया है

चंचरीक, चम्पक, सा चुलबुल सरमाया है;
खेल रहा फाग मन, रूमानी रंगों से,
पल-पल में कण-कण में अंगराग छाया है ।।

कंठों में गीतों का अमरस है घुलता

बचपन और यौवन की संधि पर ढलता;
पगलाया पौर-पौर, दबे पाँव उपवन में
तन-मन में, मधुबन में ऋतुराज आया है ।।

तन-मन में, मधुबन में ऋतुराज आया है ।।

Wednesday, 23 September 2015

drafts for


जिन पर शब्द युगों तक ठहरे
उन अधरों की पीड़ा समझो
बिछे रहे जो आगम पथ में
थकित नयन की साधें समझो।

जिस उपवन में पतझड़ ठहरा
उसमें भ्रमर नहीं है आते
जिस कुटीर में छाव नहीं हो
उनमें पथिक नहीं रुक पाते।

खुले नयन से स्वप्न देख कर
पानी पर क्यों चित्र बनाते
जो बस्ती वीरान पड़ी हो
उसमें पाहुन कभी न आते।

अनछुई छुअन की आस पोर को
तुहिन कणों की प्यास भोर को
मैं अनंत का पथिक बिचारा 
खोज रहा अनजान ठौर को।

युग बीते तकते ड्योढ़ी को
आशा के दीप धरे बैठा हूँ

कितना विश्वास अटल है

 corrections

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चल जीवन में मधुमास भरें

मूक हृदय के स्पंदन में, विगत युगों की संचयनी है
कोमल भावों के निर्झर में, एहसासों का पानी है
जीवन के छ्न्दों का मधुरिम, निश्चल मन यह निर्विशेष है
आज चेतना संग चली है, मूर्तमान हम-तुम अशेष है

जगती के कोलाहल में, मानस के सूने प्रकोष्ठ में
दिशा दिशा में, वातायन में, तुम ही तुम प्रतिबिंबित हो
सहसा युग से बंद द्वार पर, दस्तक सुन कर उद्वेलित हूँ
प्यासे नयनों में करुण हृदय ने, खोया कोष अभी पाया हूँ

वाणी अब नि:शब्द हुई, मंत्रमुग्ध है मेरा मन
विधि ने भंग विराग किया है, रोम रोम पुलकित है तन
आशा पर आकाश थमा था, पल का कौन हिसाब करे
उस पार शिशिर के मधुबन है, चल जीवन में मधुमास भरें

सागर का अन्तर निश्चल है, सतही ज्वारों से डरो नहीं
मेरे अन्तर की पीड़ा को, फिर घावों से भरो नहीं

क्या दूर् क्षितिज तक धरती और अंबर को किसने नापा है
जीवन सीमा के आगे भी, क्या तुमने सत् में झांका है
इक अशेष चिंगारी में ही, ज्वाल शिराऐं पलती हैं
तुमने इसमें पवन डुलाया, तब स्वच्छंद लरजती है

अपने छोटे आँगन में ये, संचयनी के बीज गुने हैं
सदा सदा से प्यार तरुण है, हम विशुद्ध हैं शुद्ध बुद्ध हैं
युगों युगों के बीते पर नित, नूतन प्रेम हमारा है
उस पार शिशिर के मधुबन है, चल जीवन में मधुमास भरें


Friday, 18 September 2015

गगन की अगन

गगन की अगन


दो कल के बीच स्वयं को संभालना मुश्किल है
जो बीत गया बदल सकता नही
जो आएगा वह विधना की लेखनी मे भरा
अस्मिता है उधार के पलों पर ठहरी
उधार, जो साहूकार तय करता है
डेबिट कार्ड क्रेडिट कार्ड मे बदल गया है

क्षण मिले वो आसमां ताकते खर्च हो गए
वो कभी जो आज थे कल हो गए
रेशमी रिमझिम बरसती ये मेघना
वो पपीहे के लिये किस काम की,
सागर भी उसके किस काम का ,
स्वाँति की ना मिल सकी इक बूँद भी
जी रहा अगले बरस की आस में

गर लिखा विधि ने कभी का मिल गया होता
पर पपीहा जानता  इतना फकत
आकाश आस की बल्लियों पर ठहरा है,


बन गया निष्ठुर नियति आकाश अब तो
विधाता स्वाँति लिखना ही भूल गया
प्यास की पहचान उसको है नही
इस गगन मे शेष केवल है अगन ही

Wednesday, 16 September 2015

क्योंकि तुम हो





















जिंदगी मे जो कुछ अच्छा है
इसलिये कि....
कि जो-जो मिले अच्छे मिले,
कुछ से हम मिले,
शेष उस परमात्मा की अनुकंपा से मिले।

और तुम ....
.... तुमको तो प्रभु  ने ,
खास मेरे लिये नवाजा है,
इसी लिये जिंदगी तरोताजा है,
जानता है वह जीने के लिये
साँस  का होना जरूरी है।

आकाश तो निखालिस खाली है
पर उसने अनगिनत आशाएँ भर डाली है
साँस भी इसकी फिजा मे भरी हवा से ही चलती है
जिंदगी इसीसे चलती है,
इसी आकाश में पलती है, फलती है

शायद तुम यह जानते नही !
इन सांसो को गौर से देखो,
इसमे तुम हो कि नहीं,
स्पन्दन तुम्हारा है कि नही,
सूँघ कर कहो वहीं से आयी  कि नहीं
ये धडकनो का हिसाब है कि नही
इनमे तुम्हारी स्मृतियों का अरमान है कि नही
तुम तलक पहुँच सके- ये प्यास है कि नही
महसूस करो इन्हें ये तुम्हारे आस-पास है कि नही

आशाएँ पकड मे आती नही है,
महज जिंदगी का खालीपन भरती है
बडा सा मेस्मेरिजम है
सुहावना, लुभावना-
जिंदगी इसीका हाथ पकड कर चल रही है
चलती ही चली जा रही है

इसलिये कि कही न कहीं तुम हो
हाथ मे अनपढी सी कोई लकीर
वो तो आस बाँध कर बैठी है
वरना तो मन है महज फकीर

जिंदगी का बीतते चले जाना
किसके बूते में  रोक पाना है 
पल दर पल जिंदगी में खर्च कर दिये,  
अबसे तुम पर खर्च किया जाना है

पल दर पल जिंदगी में खर्च कर दिये,  
अबसे तुम पर खर्च किया जाना है। 

…… रामनारायण सोनी 

Monday, 15 June 2015

वातायन

वातायन 

एक खिड़की जो खुली थी 
एक अरसे से पड़ी वह बंद है। 
आ रही थी जो पवन उस गाँव से 
साथ लाती आहटें, संदेश मधुरिम 

रेशमी आवाज मन को गुदगुदाती 
गुनगुनाती लोरियाँ मुझको सुनाती 
थी कभी रोती कभी मुझको रुलाती 
खुशनुमा रस-रंग में मुझको भिंगाती  

एक खिड़की जो खुली थी 
एक अरसे से पड़ी वह बंद है। 

खिड़कियां होती बिना दहलीज की 
झाँक लें उस पार इतनी ही नियति है 
कर लिया एहसास बस उस पार उनका 
सख्त पहरो से घिरा संसार जिसका 

एक खिड़की जो खुली थी 
एक अरसे से पड़ी वह बंद है। 

एक मुट्ठी रेत से पल किससे रुके 
बन रहे इतिहास झरते उम्र भर 
याद के पंछी विचरते व्योम पर 
लौट कर उनमन सिमटते नीड में 

एक खिड़की जो खुली थी 
एक अरसे से पड़ी वह बंद है। 

क्षुब्ध मन देता निमंत्रण दर्द को 
पीर है लगती मेरी अब सहचरी 
था भला पाषाण उजड़ी बस्तियों का 
क्यों भरी संवेदना अभिभूत हो कर 

एक खिड़की जो खुली थी 
एक अरसे से पड़ी वह बंद है। 

क्या कहें वरदान, या अभिशाप है ?
उम्र बीती नापते बस हाथ भर की दूरियाँ 
चंद बन्दों में सिमटती जिंदगी 
मूढ़ मन करता करता रहा बस बंदगी 

एक खिड़की जो खुली थी 


एक अरसे से पड़ी वह बंद है। 

रामनारायण सोनी 


Saturday, 14 March 2015

एक दूजे के लिए

~§ एक दूजे के लिए §~
👰


रात भर बुनती रही हूँ भोर को
मैं निशा हूँ कालिमा है देह मेरी
भोर तुम मेरा सृजन हो
यूँ जगत को जगमगा कर,
               सो नही जाना।






















पुष्प को धरना, सजाना धर्म है
कंटकों से है भरी यह देह मेरी
सींचती हूँ जिंदगी अपनी रगों से
तुम बिखर कर यदि गिरो तो,
                 बिंध नही जाना।





















शब्द ओठों के अहातों मे घिरे
मौन है पीडा शिखर पर देहरी
ओ हृदय की वेदना-अभिव्यंजना
अंजनों से अश्रु बन कर,
             बह नही जाना।


मूर्ति बन कर प्रस्तरों में सो बंद हूँ
है कठिन पाषाण की यह देह मेरी
मैं युगों से राह तकती ही रही
चोट के भय से कलाधर,
             रुक नही जाना।

















स्वप्न जो तुमने सजाये बिंब के
हू-ब-हू साकार बन कर मैं खडी
क्यों प्रतिष्ठित प्रेम मुझमें कर दिया
छोड़ कर अपने सृजन को,
              अब नही जाना।





















👲

श्वास मे प्रश्वास मे,अधिवास मे, उपहास मे
प्रिय ! प्राण बनकर सहचरी
घोल कर उल्लास मन मे संदली
कंठ से बहती रहो संजीवनी,
                  रुक नही जाना।















श्याम घन बन मै उडूँ जब व्योम मे
दामिनी से तप्त हो कर जब गलूँ
कष्ट सब मैं पी सकूँ यह साध है
रेशमी झरती फुहारों मे प्रिये,
                 तुम चली आना।



            











    *रामनारायण सोनी*

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