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Monday, 31 December 2012

प्रथम मिलन



31.12.2012
प्रथम मिलन

प्रथम मिलन की प्रथम दृष्टि में यह कैसा सम्मोहन है
वाणी ने कर दिया समर्पण और चेतना ठिठक गई
दो जुड़े नयन दो जुड़े हृदय जब प्रीत हुई थी प्राण मई
भावों का सैलाब उमड कर रति से जागी अनुभूति नई

कोई बोल नहीं कोई बात नहीं कोई चिन्ह नहीं संकेत नहीं
कोई सोच नहीं कोई साध नहीं संसर्ग नहीं सौगात नहीं
है निर्निमेष नयनों का प्रतिपल संवाद सजल संचार प्रबल
मुदित हृदय की कोमल भुवि पर प्रेम बीज की नई फ़सल

नयनों का नेपथ्य भरा है पूर्ण समर्पण से आमंत्रण से
हृदयों का अनुबंध हुआ तब साक्षी सब बन गई दिशाएँ 
देना हो जहाँ धर्म वहाँ पर पावन प्यार सृजित होता है
पाकर निर्मल प्यार जगत् में कुछ पाना शेष नहीं रहता है 

रामनारायण सोनी

Thursday, 15 November 2012

तुम वही हो

तुम वही हो 

सच्चा प्यार


सच्चा प्यार

हर जन्म सबको सच्चा प्यार कहाँ मिलता है
तेरी चाहत में तो उमर बीता ली मैंने
मुझको जाने कहाँ एहसास मेरे ले जाएँ 
समय के हाथों से एक साध चुरा ली मैंने
बसी रहती है मुझमें अनोखी खुशबू
तेरी यादों से हर एक साँस सजा ली मैंने
जिसकी बातों को सुन के बहुत रोया था
बस वही एक बात जमाने से छुपा ली मैंने
विश्वास अपने प्यार पर इतना है मुझे
मेंरी चाहत को जो देखा तो लौट आई हो
मेरे नैनों के नील सागर में तुम जो डूबी तो
कहीं जाना भी जो चाहा तो जां ना पाए हो
 रामनारायण सोनी 

Monday, 15 October 2012

कैसे इतना प्यार लिखूँ


कैसे इतना प्यार लिखूँ 

कैसे कुछ शब्दों में प्रियतम, इतना सारा प्यार लिखूँ 
सागर से नयनोँ पर अपना, यह सारा संसार लिखूँ 
विगत वेदना लिखूँ प्रिये या, मधुर मिलन का सर लिखूँ 
कैसे कुछ शब्दों में प्रियतम, इतना सारा प्यार लिखूँ 
सांसों का थमना लिखदूँ या, धड़कन का ये ज्वार लिखूँ 
स्वप्नों का अभिसार या, भावों का व्यापार लिखूँ 
कम्पित अधरों भार लिखूँ या, अन्तर की हुंकार लिखूँ 
कैसे कुछ शब्दों में प्रियतम, इतना सारा प्यार लिखूँ 
कुंठित वाणी का हाल लिखूँ या विगलित तन का जार लिखूँ
इस मन का उस मन पर अरु उस मन का इस मन पर
अधिकार लिखूँ, मनुहार लिखूँ, संचार लिखूँ, संवाद लिखूँ 
कैसे कुछ शब्दों में प्रियतम, इतना सारा प्यार लिखूँ 
तप्त धरा की प्यास लिखूँ या, मेघों का मल्हार लिखूँ 
गुमसुम वीणा के तार लिखूँ या, घुंघुरु की झंकार लिखूँ 
उपवन का पतझार लिखूँ या, पसरी बसंत बहार लिखूँ
कैसे कुछ शब्दों में प्रियतम इतना सारा प्यार लिखूँ 
विश्वास लिखूँ, अनुबंध लिखूँ, स्वीकार लिखूँ, गलहार लिखूँ

 क्रमश:  ........

मधुरास


















मधुरास  की मंजुल घडी है

मधुपुरी से मधुपरी को, पुष्प का न्योता मिला है
तब प्रणय की स्वामिनी का चल पड़ा यह सिलसिला है।
स्वाति के इक बूँद को यूँ , आज यह चातक मिला है
गड-गड़ाते मेघ नभ में, सन-सनन बहती पवन है।।

प्रीत की लेकर मथानी, याद का सागर मथें हम
छोड़ कर दम-शील सारे, प्यार निर्मल शुचि करें हम ।
गहन तम से जूझते इस दीप का सिंचन करें हम
प्रणय अभिलाष लेकर, प्यार की बातें करें हम।।

एहसास के सुन्दर नगर में, प्यार का उपवन सजा
मानिनी मन मौज में, मनुहार तेरी कर रहा ।
खोल दो सब गाँठ मन की, ये प्रीत की पावन कड़ी है
अंजुरी में पुष्प भर मधुरास की मंजुल घडी है।।

रामनारायण सोनी

Monday, 24 September 2012

कितना विश्वास अटल है

कितना विश्वास अटल है 


जिन पर शब्द युगों तक ठहरे 
इन अधरों की पीड़ा समझो 
बिछे रहे जो तेरे पथ में 
थकित नयन की साधें समझो। 

जिस उपवन में पतझड़ ठहरा 
उनमें भ्रमर कभी न आते 
जिस कुटीर में छाँह नहीं हो 
उनमें पथिक नहीं रुक पाते। 

खुलें नयन से स्वप्न देखते 
पानी पर क्यों चित्र बनाते 
जो बस्ती वीरान पड़ी हो 
उनमें पाहुन कभी न आते। 

अनछुई छुअन की आस पोर को 
तुहिन कणों की प्यास भोर को 
मैं अनंत का पथिक बिचारा 
खोज रहा अनजान ठौर को। 

मैं आशा का दीप दिवाना 
खुद से ही अनुबंध किये हूँ 
इक दिन तो लौटेंगें साजन   
यह मेरा विश्वास अटल है। 

रामनारायण सोनी 


शिखर की ओर

शिखर की ओर 



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