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Tuesday, 10 September 2019

जीवंत जीवन

जो लहराते नहीं
  वे झंडे नहीं हैं
जो उगते नहीं
वे बीज नहीं है
जो पसीजे नहीं
  वे मानव नहीं है
जिनमें उमंग नहीं
  वे जीते नहीं है

लकीरों का अग्नि पथ

वक्त चलता ही रहा
हर्फ लिक्खे रह गए
घिसटते हुए साँप की
छूटी उन लकीरों जैसे

कभी चमकती है
लकीरें अग्नि पथ सी
कभी धुँधियाती है
बुझी यादों के धुऐं सी

लकीरें हाथों की
सिलवटें माथों की
गुजरते वक्त की
सियाही रातों की
वक्त चलता ही रहा
हर्फ लिक्खे रह गए

आत्मा तो वही है

पंख बदलने से
आकाश नही बदलता
  सूरज भी तो वही है
जहाज बदलने से
सागर नहीं बदलता
  जल भी तो वही है
सूरत बदलने से
सीरत नही बदलती
  आदमी तो वही है
शरीर बदलने से
चोला बदलता है
  आत्मा तो वही है

ये थके रिश्ते

छन्दों का विन्यास छूटा
छद्मों का जाल टूटा
कविता कुछ फुसफुसाई
दामन में है जुन्हाई

चलो चौपाल पर
बैठे है थके रिश्ते
कुछ बाएँ कुछ दाएँ
अनमने निढाल से
आओ गले लग जाएँ

सुनो!
मुर्गे ने बाँग दी है
डूबा सूरज
फिर ढूँढ लाएँ

तुम्ही आत्मा हो

मैं बैठा था
आँख वाला अंधा
  घिरा सब ओर तमस था
कोई आया अचानक
  नहीं वह कोई नही..
   ...अरे! वह तुम ही तो थे
दिया जला दिया तुमने
  दिखा प्रकाश, दिखा अंधकार भी
   और तब जाना
    तुम भी तो यहीं हो
     तुम्ही ज्ञान हो, तुम्ही प्रकाश हो
       तुम्ही आत्मा हो,
       तुम्ही आत्मा हो

           रामनारायण सोनी

मस्त फ़कीरी

मैं....
मैं अधूरा ही अच्छा हूँ
  और
   भरने को राजी हूँ
    इसीलिये तो शायद
     सुनने, पढ़ने, गुनने को
      खाली हूँ
   मन मेरा मस्त फ़कीरी में

    रामनारायण सोनी

खोये खोये

खोये खोये

कविता में से
आदमी खो गया है
और
आदमी में से
  कविता खो गई है
एक आता है
तो दूसरा जाता है
सब चल रहे हैं
पहुंचेंगे भी कहीं न कहीं
   पर मिलेंगे कैसे
कविता में से
आदमी खो गया है
   वे ढूँढते क्यों नहीं
    एक दूजे को

Thursday, 5 September 2019

वक्त की पोटली में

खुद को छोड़ गए थे मुझ में
फिर मैं तुम में छूट गया
न मैं ख़ुद ही लौट सका
न लौटा पाया तुम्हें भी

बँधे हैं हम अभी भी
वक्त की ख़ूबसूरत पोटली में
साथ साथ, एक साथ

Wednesday, 4 September 2019

राजी हो विराट क्या

हे प्रभो!
राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में

मेरा तो काम ही
बस प्रार्थना भर है
क्या मेरी प्रार्थना में
तैयार हो बँधने को?

राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में

रीत गए हैं नयन
बीत गए वे अयन
श्वास की अभ्यर्थनाएँ
प्राण में बस वर्जनाएँ
इस हृदय की वीथियों में
शेष कुछ अभिव्यंजनाएँ
आस के तन्तु बचे हैं

राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में

शब्दों में, भावों में
श्रद्धा के दावों में
दो जुड़े हाथों में
मुँदी मुँदी आखों में

राजी हो क्या विराट?
बँधने इन पाशों में

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन