*

*
*

Friday, 1 March 2013

मेरे जीवन-धन तुम हो





















मेरे प्रियतम तुम मेरा सब कुछ हो

बोल नहीं जो बता सकूँ मै 
पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।। 

तुम ही हो वे शब्द जिन्हें मैं 
निशि-दिन बोला करती हूँ 
तुम ही हो वे गीत रसीले 
जिनको अधरों पर बुनती हूँ ।।
           बोल नहीं जो बता सकूँ मै 
           पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।। 

दर्द तुम्हारे मेरे अपने
संवेदन बन जाते हैं 
मेरे तो सपने ही तुम हो 
जो सच में ढल जाते हैं ।।
           बोल नहीं जो बता सकूँ मै 
           पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।। 

तुम ही हो वह मेघ बरसते 
जिनमें भींग-भींग जाऊं मैं 
तुम ही हो वह पवन झकोरा ।। 
जिस संग उड़-उड़ जाऊं मैं 
           बोल नहीं जो बता सकूँ मै 
           पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।। 

तुम ही तो वह दर्पण हो 
जिसमें देख दमक जाऊं मैं 
तुम अतीत हो मेरे अपने 
जिसमें छबि मेरी पाऊँ मैं ।।
           बोल नहीं जो बता सकूँ मै 
           पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।। 

तुम हो सुन्दर खिले सुमन 
जिसकी सौरभ मेरी थाती 
तुम ही तो वह कथा जिसे 
मैं फिर-फिर पढ़ने जाती ।।
           बोल नहीं जो बता सकूँ मै 
           पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।। 

स्वाँस मेरी तुम स्पन्दन हो 
तुम ही मेरे  वृन्दावन हो 
प्रेम चुनरिया ओढ़ फिरूँ मैं 
तुम मेरा जीवन धन हो ।। 
           बोल नहीं जो बता सकूँ मै 
           पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।। 





mmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm
वे बोल नहीं है  कि तुम्हे बता सकूँ
पर तुम ही मेरा जीवन हो प्रिय.


तुम्‍हीं तो वो शब्द हो, जिसे मैं बोलती हूँ.
तुम्‍हीं तो वो गीत हो, जिसे मैं गुनगुनाती हूँ.
तुम्‍हीं तो वो दर्द हो, जो मेरा संवेदी हैं.
तुम्‍हीं तो वो बरसात हो, जिसमे भीगना मुझे चाहती  हूँ .
तुम्‍हीं तो वो दर्पण हो प्रिय, जिसमे स्वयं को सुंदर पाती हूँ.
तुम्‍हीं तो मेरा वो रहस्य हो प्रिय, जग से छुपाना चाहती हूँ,
तुम्हें बस अपने ह्रदय के पास रखना चाहती हूँ.
तुम्‍हीं तो वो कथा हो, जिसे फिर फिर पढ़ना चाहती हूँ.
तुम्‍हीं तो वो सपना हो, जिस पर असीम विश्वास रखती हूँ.

तुम्‍हीं तो वो सख्श हो, जिसके के संग उड़ना चाहती हूँ.
तुम मेरी श्वास हो, जो मेरा स्पंदन है,
तुम जो मेरे हो, उस पर मुझे गर्व हैं,
तुम्‍हीं वो भावना हो, जिसे महसूस कर स्वयं को पा जाती हूँ.
तुम्‍हीं तो वो पुष्प हो प्रिय, जिसकी सुगंध लेना चाहती हूँ.
तुम मेरा वो अतीत हो, जिसमें मैं सदा मुस्कुराई हूँ,
तुम्‍हीं तो वो भविष्य हो, जिससे मैं प्रेम करती हूँ.
तुम्‍हीं तो मेरा वह आज हो, जिससे मैं प्रेम ही प्रेम करती हूँ.

क्योंकि तुम मेरा सब कुछ हो प्रिय

मिताली विजय

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन