आज दिन है खास प्रिय का!

सामने हो लक्ष्य का संधान जब
साधना की तुम प्रत्यञ्चा तान लो
आज का दिन हो उजालों से भरा
तुम सफलता के शिखर को चूम लो
अर्क से मैं माँग लाया भोर की पहली किरण
सिंधु से गम्भीर भावों का विभव
बादलों से स्नेह का स्निग्ध अंतर
कोकिला के कंठ से झरता मधुर स्वर
ये सभी व्यक्तित्व के आधार हों
सत्य नित सम्बल बने औ सहज व्यवहार हो
ऐ सुनो! उड़ते पलों, कुछ देर ठहरो
मंद सी बहती हवाएँ कुछ रुको
झर-झराते नीर बहना थाम लो
आज दिन है खास प्रिय का
इस घडी तुम साथ रहलो
प्रीत का एहसास दे कर तुम चले जाना
हर बरस फिर इस तरह ही
लौट कर खुशहाली लाना
उम्र कि दहलीज पर होंगे खड़े
चल चलें उस पार से यादें समेटें
फिर पुरातन गीत में नव स्वर जगाएं
फिर अलसती रात में दीपक जलाकर
नव दिवस के स्वागतों के गीत गाएं
रामनारायण सोनी

सामने हो लक्ष्य का संधान जब
साधना की तुम प्रत्यञ्चा तान लो
आज का दिन हो उजालों से भरा
तुम सफलता के शिखर को चूम लो
अर्क से मैं माँग लाया भोर की पहली किरण
सिंधु से गम्भीर भावों का विभव
बादलों से स्नेह का स्निग्ध अंतर
कोकिला के कंठ से झरता मधुर स्वर
ये सभी व्यक्तित्व के आधार हों
सत्य नित सम्बल बने औ सहज व्यवहार हो
ऐ सुनो! उड़ते पलों, कुछ देर ठहरो
मंद सी बहती हवाएँ कुछ रुको
झर-झराते नीर बहना थाम लो
आज दिन है खास प्रिय का
इस घडी तुम साथ रहलो
प्रीत का एहसास दे कर तुम चले जाना
हर बरस फिर इस तरह ही
लौट कर खुशहाली लाना
उम्र कि दहलीज पर होंगे खड़े
चल चलें उस पार से यादें समेटें
फिर पुरातन गीत में नव स्वर जगाएं
फिर अलसती रात में दीपक जलाकर
नव दिवस के स्वागतों के गीत गाएं
है यही शुभकामना कि
तुम परईश का आशीष हो
शीश पर हर पलों में
'श्री माँ का' मृदुल आँचल हो
रामनारायण सोनी


