यहीं से यहीं तक
दर्द के अनुबंध ले कर
पीर छाती में गड़ी है
मौन भाषा प्रेम की है
प्रीत द्वारे आ खड़ी है।
क्यों हृदय की वीथियाँ
फिर हुई निस्पंद सी है
छोड़ दो मन का भरम
यह ऋतु मधुमास सी है।
यहीं से यहीं तक
दर्द के अनुबंध ले कर
पीर छाती में गड़ी है
मौन भाषा प्रेम की है
प्रीत द्वारे आ खड़ी है।
क्यों हृदय की वीथियाँ
फिर हुई निस्पंद सी है
छोड़ दो मन का भरम
यह ऋतु मधुमास सी है।
यह नदी अभिशप्त सी है
जल नही बहता यहाँ
यह लगभग सुप्त सी है
घाट सब मरघट बड़़े है
प्यास पीते जीव जन्तु
धार, लहरें लुप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है
पालती थी सभ्यताएँ
धर्ममय और तीर्थमय हो
संस्कृति विक्षिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है
खेत बनती थी उपजती
तरबूज, खरबूज ककड़ियाँ
अब रेत केवल तप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है
प्राण उसके पी गई
लोलुपी जन की पिपासा
वासनाएँ लिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है
हम विकासों के कथानक
तान कर सीना दिखाते
सब शिराएँ रिक्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है
बस बाढ़ ही ढोती रहेगी
शेष दिन निःश्वास होंगे
जिन्दगी संक्षिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है
रामनारायण सोनी
सब चुप थे..
दुआओं के उठे वे हाथ
..कुछ जाने पहचाने
..कुछ अपने कुछ बेगाने
पता नहीं कहाँ कहाँ से
कब कब आये
पीड़ा, कम्प, भय को
चले गए चुपचाप
मुझ से दूर धकेल कर
और मैं,
हाँ! मैं!!
जैसे धूल झाड़ कर
फिर खड़ा हो गया हूँ