*

*
*

Tuesday, 20 August 2019

यहीं तक

यहीं से यहीं तक

दर्द के अनुबंध ले कर
  पीर छाती में गड़ी है
मौन भाषा प्रेम की है
  प्रीत द्वारे आ खड़ी है।

क्यों हृदय की वीथियाँ
  फिर हुई निस्पंद सी है
छोड़ दो मन का भरम
  यह ऋतु मधुमास सी है।

Saturday, 10 August 2019

कव्य

यह नदी अभिशप्त सी है

जल नही बहता यहाँ
यह लगभग सुप्त सी है

घाट सब मरघट बड़़े है
प्यास पीते जीव जन्तु
धार, लहरें लुप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

पालती थी सभ्यताएँ
धर्ममय और तीर्थमय हो
संस्कृति विक्षिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

खेत बनती थी उपजती
तरबूज, खरबूज ककड़ियाँ
अब रेत केवल तप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

प्राण उसके पी गई
लोलुपी जन की पिपासा
वासनाएँ लिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

हम विकासों के कथानक
तान कर सीना दिखाते
सब शिराएँ रिक्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

बस बाढ़ ही ढोती रहेगी
शेष दिन निःश्वास होंगे
जिन्दगी संक्षिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

रामनारायण सोनी

Saturday, 3 August 2019

दुआएँ उनकी

सब चुप थे..
दुआओं के उठे वे हाथ
..कुछ जाने पहचाने
..कुछ अपने कुछ बेगाने
पता नहीं कहाँ कहाँ से
कब कब आये
पीड़ा, कम्प, भय को
  चले गए चुपचाप
  मुझ से दूर धकेल कर

और मैं, 
   हाँ! मैं!!
जैसे धूल झाड़ कर
फिर खड़ा हो गया हूँ

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन