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Monday, 23 July 2018

एक और अपेक्षा चाहिए

जीवन भरा है 
अपेक्षाओं से ठसाठस
यह भी वास्तविकता ही है।

दिखाई देता है जहाँ तक
सुझाई देता है जहाँ तक
उपलब्धियों को हम उलीचते हैं
फावड़े से मिट्टी की तरह
दीखता नहीं पीछे पड़ा ढेर

एक अपेक्षा को 
एक और अपेक्षा चाहिए
अपेक्षाओं से खाली नहीं है जिन्दगी

Sunday, 22 July 2018

तुम मेरे और मैं तुम्हारा

मैं चलता हूँ
दिग् दिगन्त में
महज चलने के लिए
चाहे तुम मिलो न मिलो
पर कहीं न कहीं हो तुम
जरूर यहीँ कहीं हो तुम
सर्वत्र ही पाता हूँ स्पन्दन तुम्हारा
महसूस करता हूं दिन-रात तुम्हें
इसलिए
मैं तुम्हारे पास होऊं या नही
तुम मेरे पास हो सदा ही
शायद तुम्हें पता ही नहीं
या शायद पता हो भी
पर तुम मेरे हो
और मैं तुम्हारा
सदा सदा 

Wednesday, 18 July 2018

मन के पैर बँधे नूपुर

अभी अभी
आवाज सुनी है
नूपुर की जो तुमने 
मन ने मेरे बाँध रखे हैं

छुअन मेरी
समझी जो तुमने
वह रूहों की अदला बदली है

छलक उठी है
हाथों से जो
वह मेरी प्रीत 
उफन कर बह निकली है

पास होते अगर तुम

पास होते
... अगर तुम
तो देख पाते
कैसे टूटता हूँ
हर रात और
फर्श पर बिखरी
पड़ी वे उम्मीदें

सुन पाते प्रतिध्वनियाँ
उन रुँधी - रुँधी
खामोशियों की

ले पाते खुशबू
हृदय-पुष्प की
बिखरी इन पंखुड़ियों की

पास होते
... अगर तुम

मुक्तक

कलम झूम कर जब रवानी लिखेगी
रगों में मचलती जवानी लिखेगी
सुरों में सजी रागनी भी प्रणय की
निशा चाँदनी की सुहानी लिखेगी

Friday, 13 July 2018

एकत्व का महोत्सव

बिन छुए ही जब
आत्मा आत्मा को गले मिल गयी
"मैं" का "तुम" में और 
तुम्हारी मैं का "मुझ" में 
एकत्व महोत्सव है आज

बहुरंगी इन्द्रधनुष घुल गया 
आत्मा के धवल उजास में
मत करो प्रयास 
पानी पर लकीर खींचने का
अब एक अन्दर से दूसरे अन्दर का
कौन करे फर्क

बिन छुए ही जब
आत्मा आत्मा को गले लग गयी
फिर तन छूने से कैसा प्रयोजन? 
हम हैं पावन, निर्लिप्त, विशुद्ध
शुचि हो तुम, शुचि ही रहोगे
शुचि ही रहेंगे हम।




यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते।।गीता13/32।।
जिस प्रकार सर्वगत आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता। उसी प्रकार सर्वत्र देह में स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।।
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।।गीता2/30।।
हे भारत यह देही आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य है इसलिए समस्त प्राणियों के लिए तुम्हें शोक करना उचित नहीं।।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।गीता13/31।।
कौन्तेय अनादि और निर्गुण होने से यह परमात्मा अव्यय है। शरीर में स्थित हुआ भी वस्तुत वह न करता है और न लिप्त होता है।।

Monday, 2 July 2018

अहसासों का अहसास

मेरे इन अहसासों का
अहसास तुम्हे हो जाए तो
कह देना थोड़ा मुझ को भी
नम आँखों की नमी मेरी
नम कर दे तेरा हृदय कहीं
कह देना थोड़ा मुझ को भी
धड़कन मेरे इस दिल की
धड़कन में मिल न सके तेरे
कह देना थोड़ा मुझ को भी
बोल दिये कुछ अनगढ़ से
बोलों के भाव न भाए तो
कह देना थोड़ा मुझ को भी
गर हो न सका ऐसा कुछ
समझूँगा मुझ में कशिश नहीं
तो सहने दो थोड़ा मुझ को भी


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