अपनी पीड़ा तुम में जब जब पाता हूँ
मन ही मन मैं और दुःखी हो जाता हूँ
इसीलिये अपने दुखते हुए व्रणों को
चुपचुप अपने में छुपकर सह जाता हूँ
मुस्कानों से ढँका छिपा यह दर्द मेरा
इन सांसों की राह कहीं ना खुल जाए
तेरी मन की इस फुलबगिया में जा
इसी वजह कोई तुषार ना पड़ जाए
मेरे खुले हृदय की हर इक धमनी में
पिघला सीसा संग रुधिर के घूम रहा
उठती गिरती इस जीवन की धारा में
महाकाल हर पल मेरा माथा चूम रहा
