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Tuesday, 29 October 2019

इश्क तो बस इश्क है

जो मिलता ही नहीं है
होती है उसकी ही इबादत
ऐसा होता क्यों है इस इश्क में?

इश्क इबादत है?
या इबादत ही इश्क है?
या कि यही सब इश्क ही है?

हदों के पार बेहद है
सिफर का ही सफर जद है
इश्क का सौक ही मद है

इश्क तो इश्क ही बस है

मैं वही मिट्टी हूँ

मिट्टी ने सुगबुगाया
गली मैं, तपी मैं
पर जब बना कुछ
तो नाम मेरा बदल गया
मिट्टी से हो गई हूँ "दिया"

बाहर फिर एक तपन है
बाती में फिर एक अगन है
पर अब मुझसे एक उजास है
तिमिर से तुमूल की प्यास है

गुमसुम ये राहें रोशन हुई
दिशाएँ फैल गई सब ओर
तपन में ढूँढ लिया है
मैने चिर सुख
बाँटते रहने का सुख

मैं वही अमर मिट्टी हूँ
चाहे मैं, दिया हूँ तुम्हारे लिये
मैं फिर भी वही मिट्टी हूँ

रामनारायण सोनी
(२९.१०.१९)

Sunday, 27 October 2019

तमस दीप पर भारी है

है बौने दीप का साहस अँधेरी रात डरती है
भले हो कालिमा भारी अमावस भी सिहरती है।

अँधेरी आस्थाओं में भरम के तन्तु गलते हैं
प्रकट हो रोशनी के क्षण सभी दुःस्वप्न जलते हैं।

किरण का प्रस्फुटन ही विजय की नीव रखता है
तमस पर जीत की लिखी कहानी साथ रखता है

धरा की ओढ़नी में ये सितारे दीप के टाँके
सुहागन रात मस्ती में अहा! मधुकुञ्ज से झाँके

रंगोली मेरे आँगन की ये है प्रीत का परिमल
बताशे खील और धानी सजा इस साँझ का आँचल।

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