*

*
*

Friday, 15 December 2017

डायरी

जीवन की डायरी के वे सफ़े
आज जी भर कर देखे
सौंधियाई भीनी महक
पुराने पड़ गए कागज सी
चहक उठी तरुणाई है

कलम वो भी थी
कलम ये भी है
वहाँ रंग थे
अब सियाही
वहाँ पेड़ पौधे
और फूल पत्तियाँ

यहाँ छन्द, बन्द,
गज़ल अौर रुबाई
ढल गई शब्दों में
छन छनती पैंजनियाँ
गल बहियाँ फैलाई
मन के आँगन में
एक गई बासंती बयार,
लौट आई है
चहक उठी तरुणाई है
रामनारायण सोनी

Thursday, 14 December 2017

सिद्ध मौन


मौन कितने मौन हो तुम
पर सजगता है तुम्हारी
शोर के भीषण प्रहर में
गहनता तुममें है भारी

मौन तो एक साधना है
यह ईश की आराधना है
साध्य का अनुसंधान है
और सिद्धि का सोपान है

स्वयं का जब द्वार खोले
व्यष्टि तब साकार होवे
शांति का वह महासागर
त्वरा मन की क्षीण होवे

मौन भारी शोर पर है
जब पलटता है स्वयं में
बाँसुरी सुनता मधुर यह
प्रलय के भी उस समय में
रामनारायण सोनी

Thursday, 7 December 2017

क्षणिका

कभी कभी प्रस्तर तोड़ कर 
पीड़ा प्रकट हो जाती है
रोकते तो वृणों का जन्म हो जाता
इसमें विकल एक आँच है
पर गहरी एक साँच है

Sunday, 3 December 2017

नई किताब हूँ

पुरानी सी जिल्द में मढ़ी  एक नई किताब हूँ मैं
उम्मीद के तारों भरे आसमाँ में  एक महताब हूँ मैं
दो कदम चल सकूँ संग संग हमकदम हो कर मैं
पोशीदा, शोख, सतरंगी ऐसा ही एक ख्वाब हूँ मैं ।।

फिर नई होगी सुबह

 फिर नई होगी सुबह

फिर नई होगी सुबह
फिर नए प्रतिमान होंगे
फिर नए दिनमान होंगे
फिर उड़ानों के परों में
नित नए आसमान होंगे

शेष है बस दिवस तीन
फिर नई होगी सुबह
जो गया इतिहास अपना
कर्म का अभिलेख ले कर
अब खड़ा है आज अपना
हृदय का उल्लास ले कर

फिर नई होगी सुबह
माँ लिये आशीष के वर
अनवरत आधार बनती
यों लगे दिन रात अपनी
श्वास में बन प्राण बसती

फिर नई होगी सुबह
प्रार्थना के मूल में माँ
एक ही अवधारणा है
जिन्दगी आयाम जितने
सृजन करती प्रेरणा है


जाग उठ हुँकार भर

जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

फिर नए प्रतिमान होंगे
फिर नए दिनमान होंगे
फिर उड़ानों के परों में
नित नए आसमान होंगे।।

जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

जो गया इतिहास अपना
कर्म का अभिलेख ले कर
अब खड़ा है आज अपना
हृदय का उल्लास ले कर।।

जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

ईश का आशीष है जब
अनवरत आधार बनता
यों लगे दिन रात अपनी
श्वास में बन प्राण चलता।।

जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

प्रार्थना का मूल प्रभु की
एक ही अवधारणा है
जिन्दगी आयाम जितने
सृजन करती प्रेरणा है।।

जाग उठ हुँकार भर तू
चक्र रुकता कब समय का।।

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन