जीवन की डायरी के वे सफ़े
आज जी भर कर देखे
सौंधियाई भीनी महक
पुराने पड़ गए कागज सी
चहक उठी तरुणाई है
आज जी भर कर देखे
सौंधियाई भीनी महक
पुराने पड़ गए कागज सी
चहक उठी तरुणाई है
कलम वो भी थी
कलम ये भी है
वहाँ रंग थे
अब सियाही
वहाँ पेड़ पौधे
और फूल पत्तियाँ
कलम ये भी है
वहाँ रंग थे
अब सियाही
वहाँ पेड़ पौधे
और फूल पत्तियाँ
यहाँ छन्द, बन्द,
गज़ल अौर रुबाई
ढल गई शब्दों में
छन छनती पैंजनियाँ
गल बहियाँ फैलाई
मन के आँगन में
एक गई बासंती बयार,
लौट आई है
गज़ल अौर रुबाई
ढल गई शब्दों में
छन छनती पैंजनियाँ
गल बहियाँ फैलाई
मन के आँगन में
एक गई बासंती बयार,
लौट आई है
चहक उठी तरुणाई है
रामनारायण सोनी
