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Friday, 28 November 2014

गूलर के फूल

होम करके जन्म सौ-सौ ना रुके 
गीत प्रभु हम अर्चना के गा रहे 
मिल सकी कब रेल की दो पटरियाँ 
जान कर भी हम जिए क्यों जा रहे

स्वप्न जन्मे ओढ़ कर झीने कफ़न 
साँझ तक की उम्र ले  होते दफ़न 
क्यों लगे हम बीज बोने आस के 
इस जमीं की उर्वरा को हो नमन 

जन्म से प्यासे दिलों की व्यंजना 
ओस चाटे से बुझी कब ये जलन 
हे दयामय देख लो खुद का सृजन 
क्या अभी भी शेष है तेरा करम  

सब दिशाओं के क्षितिज छलना भरे
आसमां टिकता धरा पर भासता 
है बनी पागल पवन पतझार में 
स्वप्न भी ले उड़ चली झंखाड़ में 

हम कँटीले रास्तों के हमसफ़र 
इस सफर में दर्द की मीठी चुभन 
इस चुभन से याद फिर गहरा गई 
इस चुभन को, याद को, तुमको नमन 

कोई सहलाता नहीं इस दर्द को 
हाथ उनके भी पहुँच पाते नहीं 
कौन तोड़े काटते इस मौन को 
अन्जनों से अश्रु ढल पाते नहीं

दूरियाँ अनगिन युगों की योजनों की 
शुष्क सरिता क्यों पड़ी तट-बंध में 
हौसले, विश्वास थक कर ढेर हैं 
जिंदगी थामे खड़ा, बस प्रेम है 

इस अलौकिक प्रीत में कैसा मिलन 
ये हमारी जीवनी और  प्राण हैं
अब लगे मधुमास भी पतझार है 
याद की छबियां बनी आधार है 







Wednesday, 29 October 2014

ए सुनो मनमीत मेरे !


चल चलें मनमीत, फिर समय की कोख सेपल सुनहले ढूढ़ लाएं बिसरे 

याद के आगोश में
स्वप्न के सागर तले कुछ 
सीपियाँ है पल रही मोती भरी
आओ फिर ढूंढें उन्हें

उस सरोवर के किनारे
सख्त सी चट्टान पर
रेशमी सपने सहेजे ताल में
झिलमिलाती बर्क सी थी चांदनी
मन लगाये पंख उड़ता व्योम में,

वो सरोवर, वो शिला, वे विहग वो चांदनी
सब वहीं है देखता कोई नहीं है
ए सुनो मनमीत मेरे !
जोहती है बाट वह चट्टान अविरल
आओ फिर ढूंढें उन्हें
हमसे जो बिसरे सुनहले पल।। १ 

भग्न सी दीवार पर की  खूँटियाँ

चंचुओं से खेलती जिन पर गोरैया
चहचहाती, फरफराती थी जहाँ
नीड भी दिखता नहीं कोई यहाँ
दूर तक कोई न कलरव भासता
वो मुँडेरें, कोटरें, हैं पड़ी बेजान अब
जोहती है खूँटियाँ वे बाट अविरल । २  
ए सुनो मनमीत मेरे !
आओ फिर ढूंढें उन्हें
हमसे जो बिसरे सुनहले पल

सूर्य की उगती सुनहली रश्मियाँ

व्योम था रुपहले विहंगों से भरा
तुम लरजते थे दिखा कर ये समां
बस अलसते मौन को तब थी जगाती 
लालिमा मुख पर लपेटे कुन्द सी
घनघनाते घंटियों के सुर थी सुनाती,
ओस पीती सी गुलाबी पंखुरी
तुम लजाती फूल भर भर अंजुरी;

वो किरण, वो प्रभाती, नभ; सभी निष्प्राण है
जोहती है बाट उन्मन रश्मि अविरल 
ए सुनो मनमीत मेरे !
आओ फिर ढूंढें उन्हें
हमसे जो बिसरे सुनहले पल

वे कुहकती कोयले निस्पंद क्यों हैं 

क्यों पपीहे अब प्रवासी हो गए 
आचमन करती वो मुनमुन तितलियाँ 
पुष्प जिनकी कर रहा है चिर-प्रतीक्षा 
डाल कर गलहार करती मदभरी 
मंद सी मुस्कान, मस्ती, कुलबुली 
सब्ज अधरों से मुखरती बतकही 
सब कहीं धर कर बिसरती प्रियवदा;

वो पपीहा,कोयलें, अमराइयाँ, वो चमन,
जोहती है बाट मेरी दृष्टि अविरल 
बांह फैलाये खड़ा वट वृक्ष है 
ए सुनो मनमीत मेरे !
आओ फिर ढूंढें उन्हें
हमसे जो बिसरे सुनहले पल

मेघ बनकर मेखला उन तक जुड़े 
सींचते थे भावना के गाँव को 
सौंधियाती मिट्टियों की खुश्बुएं 
दौड़ती इस छोर से उस छोर तक 
चाँद में प्रतिबिम्ब बनता चाँद मेरा 
याद है सब  रास्ते पगडंडियाँ; 

वे सितारे, वो गगन, वे बादलों की बस्तियाँ 
वे नज़ारे, वादियां तो सब यहीं है 
जोहती है बाट प्रिय की आस अविरल । १ 

ए सुनो मनमीत मेरे !
आओ फिर ढूंढें उन्हें
हमसे जो बिसरे सुनहले पल
याद के आगोश में
स्वप्न के शहतीर में
सीपियाँ है पल रही मोती भरी
आओ फिर ढूंढें उन्हें

रामनारायण सोनी

Saturday, 16 August 2014

मेरी आवाज सुनो




मेरी आवाज सुनो

दिल के सागर की गहराइयों पड़ी कुछ सीपियाँ जो तुमने चुन ली.…   
....


वह संग जो जिंदगी का  अज़ीम हिस्सा है  .... 

रूहें जो खुद बातें करती हैं , खिलखिलाती हैं   …










एक आवाज
जो सुतल की गहराइयों में छिपी रहती है;
उस आवाज को तुमने आज सदा दी है
वे भाव
जो केवल अनुभूत हो सकते हैं,
वे स्पर्श
जो तन्हाई में भी गुदगुदाते रहते हैं,
वे यादें
पता नहीं चल पाता है-
कि कब अतीत वर्तमान बन जाता है


हम कभी तनहा क्यों नहीं होते,
बल्कि तनहा हो कर हम और करीब होते हैं
वो तपिश
जो सिर्फ सुकून देती है
वह सुकून
जो जीवन को होने का आनंद देता है;
और लबरेज भरा भरा होने का एहसास देता है,
अधूरापन तो
तुमने हमसे छीन लिया है,
उमड़ घुमड़ कर आये भाव
इस कदर शोर मचा रहे हैं
कि एक लेश ही कह पा रहे हैं
मन का पखेरू
न जाने किस दिशा की और जा रहा था
वह तब  दिशा- दशा पा गया
जब वह
तुम्हारी उंगली थाम कर चल पड़ा
जिंदगी को मकसद मिला
तुम फिर मिले
यह सब
अकेले इस जन्म का तो नहीं हो सकता।


जब हम खामोश होते हैं
तो रूहें बोल पड़ती हैं
कभी-कभी हम ही नहीं समझ पाते हैं; 

कि क्या बातें हो गई
लेकिन जो कुछ घट जाता हैं
वह तन मन को तर-बतर कर जाता है
ये वे शब्द हैं
जो गीत नहीं बन पाये
लेकिन इनमें कहीं न कहीं सरगम रची बसी है
जो बिना साज के लहरियों पर फुदकने लगती है
मन उतावला हो उठता है;
अनंत आकाश को अपनी बाँहों में भींचने को 


मन गा उठता है------
केवल तुम,    हाँ केवल तुम 


https://www.youtube.com/watch?v=eBeEgvmFVCA
https://www.youtube.com/watch?v=nkegknVbmqM


तू ही हक़ीकत ख्वाब तू दरिया तू ही प्यास तू 
तू ही दिल के बेक़रारी तू सुकून तू सुकून

जौ में अब जब जिस जगह पाऊँ में तुझको उस जगह 
साथ हो के ना हूँ तू है रूबरू रूबरू
तू हुमसफर तू हुंकदम तू हमनवा मेरा
तू हुमसफर तू हुंकदम तू हमनवा मेरा

आ तुझे इन बाहों में भरके
और भी कर लून मैं करीब
टू जुड़ा हो तो लगे है 
आता जाता हर पल अजीब 

इस जहां है और ना होगा मुझसा कोई भी खुशनसीब
तूने मुझको दिल दिया है में हूँ तेरे सबसे करीब 
मैं ही तो तेरे दिल मैं हूँ मैं ही तो सासों में बसूं
तेरे दिल की धडकनो में मैं ही हूँ में ही हूँ

तू हुमसफर तू हमकदम तू हमनवा मेरा
तू हुमसफर तू हमकदम तू हमनवा मेरा 

कब भला अब ये वक़्त गुज़रे
कुछ पता चलता ही नहीं जब से मुझको तू मिला है 
होश कुछ भी अपना नहीं उफ्फ़ ये तेरी पलकें घनी सी 
चाव इन की है दिलनशीं

अब किसे डर धूप का है क्यूं की है ये मुझपे बीछी
तेरे बिना ना सांस लू तेरे बिना ना मैं जिऊँ
तेरे बिना ना एक पल भी रह सकू रे सकू

तू ही हक़ीकत ख्वाब तू दरिया तू ही प्यास तू 
तू ही दिल के बेक़रारी तू सुकून तू सुकून

तू ही हक़ीकत ख्वाब तू दरिया तू ही प्यास तू 
तू ही दिल के बेक़रारी तू सुकून तू सुकून

तू हुमसफर तू हुंकदम तू हमनवा मेरा

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Thursday, 24 April 2014

रूहें बोलती हैं


रूह बोलती है

            * आत्मा *

कौन कहता है कि- रूहें बोलती नहीं
हम सुनें न सुनें, रूहें बोलती है

रूह सदा सच बोलती है
सच वही है जो सदा से है, आज भी है, रहेगा भी
रूहें  सदा रहती है इसलिए सबसे बड़ी गवाह है
रूहों को झूँठ बोलना नहीं आता
रूहों के बोल जगत के जाल में फँस कर
झूँठ बन कर रह जाते हैं
इसलिए रूहों को बोलते ही सुन लो
सुन लो और गुन लो,
हार तो जीत का पहला सोपान है
इसलिए जीत से बड़ी हार है

कौन कहता है कि- रूहें बोलती नहीं
हम सुनें न सुनें, रूहें बोलती है
                     *                ’
कौन कहता है कि- रूहें सुनती नहीं
कोई कहे न कहे, रूहें सुनती हैं

रूहों में ज्ञान हो कि न हो भान होता ही है
वे आवाज नहीं भाव सुनती है
क्योंकि आवाज तो भाव की देह है
रूहों के भाव शब्द-रूप धरते हैं
जितने गहरे से उठते हैं, उतने गहरे जाते हैं
रूहों में सच सुनने की सामर्थ्य है
क्योंकि सच को सुनना अदम्य साहस है
रूहों में साहस से ही धृति है , धृति से ही धर्म है 

कौन कहता है कि- रूहें सुनती नहीं
कोई कहे न कहे, रूहें सुनती है
                       *
कौन कहता है कि रूहें बात नहीं करती
कोई बात करे न करे रूहें बात करती है

रूहों के द्वार नहीं होते
खिड़कियों से ही सम्प्रेषण होता है
खिड़कियां कभी बंद नहीं होती
खिड़कियों से अंदर बाहर सब दिखता है
जस का तस , कोई घाल-मेल नहीं
रूहों के संवाद की न कोई भाषा न कोई लिपि
इसलिए रूहों की भाषा मौन है
भावों का आरोह अवरोह इस का संगीत है
न साज न आवाज, फिर भी गीतो की गुन-गुन
रूह से रूह कहती है, रूह को रूह सुनती है
रूह में कोई शोध नहीं, वहाँ बोध ही बोध है
रूह तो पद्म पत्र है, न जल चिपका है-न अलग है
रूहों का कोई नाम नहीं, फिर भी पहचान बड़ी है 
                             *
कौन कहता है कि रूहें बात नहीं करती
कोई बात करे न करे रूहें बात करती है

कौन कहता है कि रूहें नहीं रहतीं
हम रहें न रहें, रूहें रहती हैं 

रूहें हमें पहनती हैं, ओढ़ती है, चलाती है,
रूहें न जलती हैं न जलाती है, न सोंखती है न सुखाती है  
लेकिन, रूहें मिलती है, मिलाती है 
आती है तो जगाती है, जाती है तो सुलाती है 
रूह है तो हम हैं, रूह है तो सब है 
सब में बसी जो रूह है, जिंदगी बस रूह है 
उस की तलब है तो जिंदगी गजब है 
उसका उजास है तो जिंदगी में साँस है 
उसके बगैर बाँक है, और जिंदगी बस ढाक है 
रूहें रहें कहीं भी फिर भी वे पास-पास हैं
करुणा रहे बरसती ये उसका विलास है
कौन कहता है कि रूहें फिर-फिर मिलती नहीं है

कौन कहता है  रूहें रहती नहीं है
हम रहें न रहें, रूहें रहती हैं 
                    *
           *परमात्मा *

जो तेरा है वो मेरा है,
जो सबका है वो अपना है
जगत में नूर उसका है
बिना उसके ये सपना है
रूहें मिले तो समझो, उसका कमाल है
रूहों की खैर रखना ,उसका जमाल है
रूहों कि मजलिसों में चर्चा हो इश्क का
उसके करम से अपनी, दुनिया रसाल है 

कौन कहता है कि- रूहें बोलती नहीं
कौन कहता है कि- रूहें सुनती नहीं
कौन कहता है कि- रूहें बात नहीं करती
कौन कहता है कि- रूहें नहीं रहतीं
कौन कहता है कि- रूहें फिर-फिर मिलती नहीं है


रामनारायण सोनी

Thursday, 3 April 2014

जो मैं कह नहीं पाया

जो मैं रुबरु कह नहीं पाता हूँ उसे मैने कुछ इस तरह लिखने का प्रयास किया है-


मेरे लिए तुम मासूम और खुली किताब की तरह हो,
     जिसमें निश्छल मन को मैं पढता हूं।  

तुम्हारी बातों में इतना सीधापन है
       जो मुझे बहुत भाता है।  

तुम्हारा सदैव मेरे लिए चिंतित रहना
       मुझे 'अपना' होने का एहसास कराता है। 

चाहे कोई भी सम/विषम स्थिति हो,
        तुम हर बात को सिर्फ अपने तक ही रखती हो। 

तुम मेरी हर तकलीफ की
        दवा बन जाती हो।  
 
तुम्हारा संग-
        मेरे अधूरेपन को पूरा करता है।  

तुम मेरी जिंदगी का-
       एक मृदुल एहसास हो।  
 
तुमने मेरी जिंदगी में-
       रोशनी भर दी है।  
 
हम एक-दूसरे की-
        प्रतिच्छाया बन गए हैं।  

तुमने मुझे प्यार के सही मायने सिखाए
        और जिंदगी को बेहतर ढंग से जीना सिखाया।

ये अटूट विश्वास ही है,
        ये मुहब्बत की लौ को जलाए रखता है।  

जब भी कभी मैं उदास होता हूं,
        तो तुम्हारा कंधा हमेशा मुझे सहारा देने के लिए मौजूद होता है। 
 
मेरी हर गैर जरूरी बात को भी तुम्हारा ध्यान से सुनना
        मुझ में एक नया एह्सास जगाता है। 

तुम्हारी प्यार भरी नजर-
         मेरी स्मृति से ओझल ही नहीं होती ।  

तुम्हारा स्नेह -
         मुझे एक परितोष का एहसास कराता है। 
 
तुम्हारे साथ बिताया गया हर पल-
          मेरी जिंदगी की बेशकीमती दौलत है;
          इसे सहेजने में असीम आनंद है।  
 
तुम्हारा मंदस्मित आनन-
         मेरे अन्तर को प्रफुल्लित कर देता है।  

तुम मेरे बिना कहे ही मेरी हर बात जाने कैसे समझ लेती हो,
         मैं जो कहना चाहता हूँ वहाँ तुम पहले से खड़ी होती हो। 
 
अनचाही परिस्थितियों में भी-
         तुम्हारी चाह कभी कम नहीं हुई,
         अब मेरे जीवन का हर पल तुम्हारे लिए है।  
 
तुमसे प्यार की अनगिनत वजहें हैं,

           पर तुमसे प्यार की अहम वजह यही है कि-

                तुम मेरी जिंदगी हो और मैं तुमसे असीम प्यार करता हूं।
                  तुम मेरी जिंदगी हो और मैं तुमसे असीम प्यार करता हूं।


रामनारायण सोनी 



मुझे विश्वास है

संकलन----
तुम पर विश्वास करती हूँ.......!!!
मैं निष्पक्ष,
निस्वार्थ हमेशा तुम्हारे साथ रहती हूँ.....             
इसलिए नही कि ...मैं  तुमसे केवल प्यार ही करती हूँ........
बल्कि इसलिए....तुम पर विश्वास  करती हूँ....
मैं तुम्हारी हर बात पर,
तुम्हारे किये हर फैसले के साथ रहती हूँ.....
इसलिए नही कि ...मैं  तुमसे केवल प्यार ही करती हूँ........
बल्कि इसलिए....तुम  कभी गलत नही होते हो....
मैं तुम पर विश्वास करती हूँ......
मैं तुम्हारे साथ रहती हूँ.
मोड़ चाहे कोई भी हो.....हालात चाहे कोई भी हो.....
मुश्किले हो.... नाकामिया मिले चाहे जितनी .....
मैं तुम्हारे साथ रहती हूँ.
इसलिए नही कि ...मैं  तुमसे केवल प्यार ही करती हूँ........
बल्कि इसलिए.....तुम्हे जीतना आता है.... 
मैं तुम पर विश्वास करती हूँ.....

मुझे विश्वास है कि....तुम समझोगे एक दिन,
खुद से अधिक जब हम किसी पर विश्वास करते है....
तभी हम उससे प्यार करते है.........

Sunday, 23 March 2014

अजनबी कौन हो तुम

अजनबी कौन हो तुम


ए अजनबी तुम कौन हो ?
बचपन से अभी तक तो तुम्हें कहीं देखा नहीं
न किसी ने कोई पहचान बताई

किस देश के हो तुम ?

न कोई कहानी न फलसफा
न मुझमें पूछने का साहस-
न कुछ कहने की हिम्मत
आखिर कौन हो तुम ?

तुम्हें न कहीं पढ़ा- न कभी सुना

न पहले कभी मिले तुम, न तुम्हारी परछाई
ना ही था कोई सुराग तुम्हारा,
न पहले कभी खुद आए न कोई सन्देश
सचमुच कौन हो तुम  ?

तब अचानक रूह मेरी सुगबुगाई

दूर  उस  नेपथ्य से एक रूह बुदबुदाई
तब युगों से अचेते भाव मन के
धुंध के उस पार से सुधियाँ समेटे
पूछने यूँ मैं लगा सहसा ठिठक कर
जाने-पहचाने से अजनबी कौन हो तुम ?

आईने 
पर की गर्द की परतें हटी तो
सामने थे तुम,
तुम्हारा मौन ही सब कह गया
रूह ने बातें कही और रूह ने बातें सुनी
सिलसिले दर सिलसिले वो ही चलते गए
फासले सब कदम दर कदम मिटते गए

प्रश्न विगलित व्योम में काफूर थे

अब कहें क्यों हम ; अजनबी कौन हो तुम ?

रामनारायण सोनी 




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