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Sunday, 16 June 2013

हर्षवर्धन

प्रिय आत्मन !
सस्नेह हरि स्मरण

मैं जब अपने सुदूर स्वर्णिम अतीत में झाँकता हूँ एक सहज सौम्य सुह्रद चेहरा सामने आ जाता है. एक ऐसा व्यक्तित्व जो सिर्फ़ देना जानता हो। जिसके चित्त में 'दातव्यमिति' बसता है. वह केवल तुम हो।
मुझे अच्छी तरह से स्मरण है - मेरे जीवन के विकास के प्रथम सोपान पर तुमने और तुम्हारे परिवार ने चढ़ा दिया था तब से एक नई राह, एक नई मंजिल मुझे दिखाई दी थी अन्यथा मैं भी एक अनजान भीड़ में समा गया होता। जो कुछ भी बाद में मैंने पाया वह सब इस प्रथम सोपान के आगे का उत्क्रमण था। एक केनवास और इधर उधर बिखरे पड़े हुए रंगो के बीच एक चित्रकार के आने से कल्पना साकार हो उठती है।
मैं अत्यन्त अभिभूत हूँ कि मुझमें तुममें कोई साम्य नहीं था, बावजूद इसके मैने आप लोगों से जो पाया वह अप्रतिम था, अविश्वस्नीय था, लेकिन अत्यन्त मंजुल था। अतीत के बहुत से अच्छे पलों को यदि मैं सारांश पर ला खड़ा करता हूँ तो वह अवसर मेरे लिए सर्व श्रेष्ठ  है क्योंकि उन पलों के अभाव में मेरे जीवन काल में जो कुछ अच्छा-अच्छा घटित हुआ, कदापि संभव नहीं था। मेरे जीवन की प्रत्येक अच्छी उप्लब्धी को उस परिप्रेक्ष्य में जोड़ा तो वे पल सजीव लगे।
मेरे चित्त में तुम सदैव रहे हो। मुझे कई बार आत्म-ग्लानी हुई कि मैंने मेरी इन अनुभूतियों को समय-समय पर क्यों साझा नही किया। अब जीवन के उत्तर काल में पहुंचने पर भी अपनी सम्वेदनाओं को यदि तुम तक नहीं पहुंचाया तो मैं अपने साथ भी न्याय नहीं कर पाउंगा। वस्तुतः मैं अत्यन्त आंदोलित महसूस कर रहा हूँ। जो कुछ लिख रहा हूँ नितांत सहज है, बल्कि बहुत सोच कर थोड़ा लिख पा रहा हूँ।  मैं सहज कृतज्ञता तुम और तुम्हारे परिवार को ज्ञापित कर रहा हूँ। कृपया इसे स्वीकार करें।
    मैं अपने जीवन में उन्नयन की कई सीढियां चाहे न छू पाया हूँ, लेकिन जब जब जीवन की आत्मिक आनंदानुभूति में उतर पाया हूँ, जब जब इस प्रकार की धनात्मक ऊर्जा मेरे आस पास रही, उन पलों का गहन आभास होता रहा है. इसलिए उन पलों को सदैव जिया और उस परमपिता का इस संसर्ग के लिए धन्यवाद किया। यह मेरा उद्घोष है‌‌- वह नहीं होता तो कदाचित यह सब नहीं होता। इन सब के होने का आधार वही है। जो कल था आज भी वही है। चिरंतन है।
जो देता है उसे परमात्मशक्ति समस्त वान्छाएँ अनायास ही प्रदान कर देती है। एक बौद्धिक संस्थान के सर्वोच्च पदस्थान पर आसीन होना शायद इसी तथ्य का प्रतिपादन है। इस हेतु हम सपरिवार तुम्हे शुभकामना और ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित करते हैं। अफसोस केवल इतना ही है कि मेरी ओर से इतनी सुदीर्घ संवादहीनता मेरे हृदय के किसी कोने में साल रही है। आशा है सदा की तरह अपनी उदारता से इसे निर्विशेष कर देंगे। यदि ऐसा हुआ तो मैं एक प्रवंचना से बच पाऊंगा।

सभी वरिष्ठों को प्रणाम,  आदरणीय भाभी जी को अभिवादन, कनिष्ठों को स्नेह।

सुखी और समृद्ध जीवन की शुभकामनाओं के साथ।

'शिवम् '


रामनारायण सोनी

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