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Wednesday, 29 October 2014

ए सुनो मनमीत मेरे !


चल चलें मनमीत, फिर समय की कोख सेपल सुनहले ढूढ़ लाएं बिसरे 

याद के आगोश में
स्वप्न के सागर तले कुछ 
सीपियाँ है पल रही मोती भरी
आओ फिर ढूंढें उन्हें

उस सरोवर के किनारे
सख्त सी चट्टान पर
रेशमी सपने सहेजे ताल में
झिलमिलाती बर्क सी थी चांदनी
मन लगाये पंख उड़ता व्योम में,

वो सरोवर, वो शिला, वे विहग वो चांदनी
सब वहीं है देखता कोई नहीं है
ए सुनो मनमीत मेरे !
जोहती है बाट वह चट्टान अविरल
आओ फिर ढूंढें उन्हें
हमसे जो बिसरे सुनहले पल।। १ 

भग्न सी दीवार पर की  खूँटियाँ

चंचुओं से खेलती जिन पर गोरैया
चहचहाती, फरफराती थी जहाँ
नीड भी दिखता नहीं कोई यहाँ
दूर तक कोई न कलरव भासता
वो मुँडेरें, कोटरें, हैं पड़ी बेजान अब
जोहती है खूँटियाँ वे बाट अविरल । २  
ए सुनो मनमीत मेरे !
आओ फिर ढूंढें उन्हें
हमसे जो बिसरे सुनहले पल

सूर्य की उगती सुनहली रश्मियाँ

व्योम था रुपहले विहंगों से भरा
तुम लरजते थे दिखा कर ये समां
बस अलसते मौन को तब थी जगाती 
लालिमा मुख पर लपेटे कुन्द सी
घनघनाते घंटियों के सुर थी सुनाती,
ओस पीती सी गुलाबी पंखुरी
तुम लजाती फूल भर भर अंजुरी;

वो किरण, वो प्रभाती, नभ; सभी निष्प्राण है
जोहती है बाट उन्मन रश्मि अविरल 
ए सुनो मनमीत मेरे !
आओ फिर ढूंढें उन्हें
हमसे जो बिसरे सुनहले पल

वे कुहकती कोयले निस्पंद क्यों हैं 

क्यों पपीहे अब प्रवासी हो गए 
आचमन करती वो मुनमुन तितलियाँ 
पुष्प जिनकी कर रहा है चिर-प्रतीक्षा 
डाल कर गलहार करती मदभरी 
मंद सी मुस्कान, मस्ती, कुलबुली 
सब्ज अधरों से मुखरती बतकही 
सब कहीं धर कर बिसरती प्रियवदा;

वो पपीहा,कोयलें, अमराइयाँ, वो चमन,
जोहती है बाट मेरी दृष्टि अविरल 
बांह फैलाये खड़ा वट वृक्ष है 
ए सुनो मनमीत मेरे !
आओ फिर ढूंढें उन्हें
हमसे जो बिसरे सुनहले पल

मेघ बनकर मेखला उन तक जुड़े 
सींचते थे भावना के गाँव को 
सौंधियाती मिट्टियों की खुश्बुएं 
दौड़ती इस छोर से उस छोर तक 
चाँद में प्रतिबिम्ब बनता चाँद मेरा 
याद है सब  रास्ते पगडंडियाँ; 

वे सितारे, वो गगन, वे बादलों की बस्तियाँ 
वे नज़ारे, वादियां तो सब यहीं है 
जोहती है बाट प्रिय की आस अविरल । १ 

ए सुनो मनमीत मेरे !
आओ फिर ढूंढें उन्हें
हमसे जो बिसरे सुनहले पल
याद के आगोश में
स्वप्न के शहतीर में
सीपियाँ है पल रही मोती भरी
आओ फिर ढूंढें उन्हें

रामनारायण सोनी

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