~§ एक दूजे के लिए §~
रात भर बुनती रही हूँ भोर को
मैं निशा हूँ कालिमा है देह मेरी
भोर तुम मेरा सृजन हो
यूँ जगत को जगमगा कर,
सो नही जाना।

मैं निशा हूँ कालिमा है देह मेरी
भोर तुम मेरा सृजन हो
यूँ जगत को जगमगा कर,
सो नही जाना।

पुष्प को धरना, सजाना धर्म है
कंटकों से है भरी यह देह मेरी
सींचती हूँ जिंदगी अपनी रगों से
तुम बिखर कर यदि गिरो तो,
बिंध नही जाना।
शब्द ओठों के अहातों मे घिरे
मौन है पीडा शिखर पर देहरी
ओ हृदय की वेदना-अभिव्यंजना
अंजनों से अश्रु बन कर,
बह नही जाना।

मूर्ति बन कर प्रस्तरों में सो बंद हूँ
है कठिन पाषाण की यह देह मेरी
मैं युगों से राह तकती ही रही
चोट के भय से कलाधर,
रुक नही जाना।

स्वप्न जो तुमने सजाये बिंब के
हू-ब-हू साकार बन कर मैं खडी
क्यों प्रतिष्ठित प्रेम मुझमें कर दिया
छोड़ कर अपने सृजन को,
अब नही जाना।
श्वास मे प्रश्वास मे,अधिवास मे, उपहास मे
प्रिय ! प्राण बनकर सहचरी
घोल कर उल्लास मन मे संदली
कंठ से बहती रहो संजीवनी,
रुक नही जाना।
प्रिय ! प्राण बनकर सहचरी
घोल कर उल्लास मन मे संदली
कंठ से बहती रहो संजीवनी,
रुक नही जाना।
श्याम घन बन मै उडूँ जब व्योम मे
दामिनी से तप्त हो कर जब गलूँ
कष्ट सब मैं पी सकूँ यह साध है
रेशमी झरती फुहारों मे प्रिये,
तुम चली आना।
*रामनारायण सोनी*



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