नज़्म
*तुम ही तो हो*
ढूँढने निकला था जिसे सेहरा में
खिली थी गुलशन हो कर
सुनहरी रोशनी बन
ढलती हुई उस शाम
बादलों के बदन पे
फिर उतरी जो जहन में
समझ नहीं पाया मैं
कि वो तुम ही हो।।
जमीं की नर्म रेशमी सिलवटें
गुदगुदाती पगथली मेरी
ओढ़े पड़ी दरख्तों के साये
तपती रहीं जो दिन भर
सहलाती रही पोर पोर
समझ नहीं पाया मैं
कि वो तुम ही हो।।
धुँधलके गहरा गए
तबदील हुए घुप्प चादर में
ओढ़ कर जिन्हें
रात भर बैठा रहा
पूरे इतमिनान से
मिटा दी तन बदन की
थकन की पीर को
मैं समझ नहीं पाया
कि वो तुम ही तो हो।।

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