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Friday, 7 February 2020

छत पर जाता नहीं हूँ

बहुत दिन हो गये
तुम से मिले
छ्त पर चढ़ कर
सितारे और आकाश गंगाएँ
रोज आती है छत पर, 
लौट जाती है इंतजार कर 
फिर उसी अन्तरिक्ष में

चाँद आता है
सीढ़ियों, खिड़कियों को 
चला जाता है चाँदनी ओढ़ा कर
पर अमावस मेरी जाती नही
वहाँ अब न तुम हो
न इनमें से कोई और ही


रामनारायण सोनी
०८/०२/२०२०

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