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Thursday, 3 April 2014
Sunday, 23 March 2014
अजनबी कौन हो तुम
अजनबी कौन हो तुम
ए अजनबी तुम कौन हो ?
बचपन से अभी तक तो तुम्हें कहीं देखा नहीं
न किसी ने कोई पहचान बताई
किस देश के हो तुम ?
न कोई कहानी न फलसफा
न मुझमें पूछने का साहस-
न कुछ कहने की हिम्मत
आखिर कौन हो तुम ?
तुम्हें न कहीं पढ़ा- न कभी सुना
न पहले कभी मिले तुम, न तुम्हारी परछाई
ना ही था कोई सुराग तुम्हारा,
न पहले कभी खुद आए न कोई सन्देश
सचमुच कौन हो तुम ?
तब अचानक रूह मेरी सुगबुगाई
दूर उस नेपथ्य से एक रूह बुदबुदाई
तब युगों से अचेते भाव मन के
धुंध के उस पार से सुधियाँ समेटे
पूछने यूँ मैं लगा सहसा ठिठक कर
जाने-पहचाने से अजनबी कौन हो तुम ?
आईने पर की गर्द की परतें हटी तो
सामने थे तुम,
तुम्हारा मौन ही सब कह गया
रूह ने बातें कही और रूह ने बातें सुनी
सिलसिले दर सिलसिले वो ही चलते गए
फासले सब कदम दर कदम मिटते गए
प्रश्न विगलित व्योम में काफूर थे
अब कहें क्यों हम ; अजनबी कौन हो तुम ?
रामनारायण सोनी
Thursday, 5 December 2013
है यही शुभकामना
आज दिन है खास प्रिय का!

सामने हो लक्ष्य का संधान जब
साधना की तुम प्रत्यञ्चा तान लो
आज का दिन हो उजालों से भरा
तुम सफलता के शिखर को चूम लो
अर्क से मैं माँग लाया भोर की पहली किरण
सिंधु से गम्भीर भावों का विभव
बादलों से स्नेह का स्निग्ध अंतर
कोकिला के कंठ से झरता मधुर स्वर
ये सभी व्यक्तित्व के आधार हों
सत्य नित सम्बल बने औ सहज व्यवहार हो
ऐ सुनो! उड़ते पलों, कुछ देर ठहरो
मंद सी बहती हवाएँ कुछ रुको
झर-झराते नीर बहना थाम लो
आज दिन है खास प्रिय का
इस घडी तुम साथ रहलो
प्रीत का एहसास दे कर तुम चले जाना
हर बरस फिर इस तरह ही
लौट कर खुशहाली लाना
उम्र कि दहलीज पर होंगे खड़े
चल चलें उस पार से यादें समेटें
फिर पुरातन गीत में नव स्वर जगाएं
फिर अलसती रात में दीपक जलाकर
नव दिवस के स्वागतों के गीत गाएं
रामनारायण सोनी

सामने हो लक्ष्य का संधान जब
साधना की तुम प्रत्यञ्चा तान लो
आज का दिन हो उजालों से भरा
तुम सफलता के शिखर को चूम लो
अर्क से मैं माँग लाया भोर की पहली किरण
सिंधु से गम्भीर भावों का विभव
बादलों से स्नेह का स्निग्ध अंतर
कोकिला के कंठ से झरता मधुर स्वर
ये सभी व्यक्तित्व के आधार हों
सत्य नित सम्बल बने औ सहज व्यवहार हो
ऐ सुनो! उड़ते पलों, कुछ देर ठहरो
मंद सी बहती हवाएँ कुछ रुको
झर-झराते नीर बहना थाम लो
आज दिन है खास प्रिय का
इस घडी तुम साथ रहलो
प्रीत का एहसास दे कर तुम चले जाना
हर बरस फिर इस तरह ही
लौट कर खुशहाली लाना
उम्र कि दहलीज पर होंगे खड़े
चल चलें उस पार से यादें समेटें
फिर पुरातन गीत में नव स्वर जगाएं
फिर अलसती रात में दीपक जलाकर
नव दिवस के स्वागतों के गीत गाएं
है यही शुभकामना कि
तुम परईश का आशीष हो
शीश पर हर पलों में
'श्री माँ का' मृदुल आँचल हो
रामनारायण सोनी
Sunday, 16 June 2013
हर्षवर्धन
प्रिय आत्मन !
सस्नेह हरि स्मरण
मैं जब अपने सुदूर स्वर्णिम अतीत में झाँकता हूँ एक सहज सौम्य सुह्रद चेहरा सामने आ जाता है. एक ऐसा व्यक्तित्व जो सिर्फ़ देना जानता हो। जिसके चित्त में 'दातव्यमिति' बसता है. वह केवल तुम हो।
मुझे अच्छी तरह से स्मरण है - मेरे जीवन के विकास के प्रथम सोपान पर तुमने और तुम्हारे परिवार ने चढ़ा दिया था तब से एक नई राह, एक नई मंजिल मुझे दिखाई दी थी अन्यथा मैं भी एक अनजान भीड़ में समा गया होता। जो कुछ भी बाद में मैंने पाया वह सब इस प्रथम सोपान के आगे का उत्क्रमण था। एक केनवास और इधर उधर बिखरे पड़े हुए रंगो के बीच एक चित्रकार के आने से कल्पना साकार हो उठती है।
मैं अत्यन्त अभिभूत हूँ कि मुझमें तुममें कोई साम्य नहीं था, बावजूद इसके मैने आप लोगों से जो पाया वह अप्रतिम था, अविश्वस्नीय था, लेकिन अत्यन्त मंजुल था। अतीत के बहुत से अच्छे पलों को यदि मैं सारांश पर ला खड़ा करता हूँ तो वह अवसर मेरे लिए सर्व श्रेष्ठ है क्योंकि उन पलों के अभाव में मेरे जीवन काल में जो कुछ अच्छा-अच्छा घटित हुआ, कदापि संभव नहीं था। मेरे जीवन की प्रत्येक अच्छी उप्लब्धी को उस परिप्रेक्ष्य में जोड़ा तो वे पल सजीव लगे।
मेरे चित्त में तुम सदैव रहे हो। मुझे कई बार आत्म-ग्लानी हुई कि मैंने मेरी इन अनुभूतियों को समय-समय पर क्यों साझा नही किया। अब जीवन के उत्तर काल में पहुंचने पर भी अपनी सम्वेदनाओं को यदि तुम तक नहीं पहुंचाया तो मैं अपने साथ भी न्याय नहीं कर पाउंगा। वस्तुतः मैं अत्यन्त आंदोलित महसूस कर रहा हूँ। जो कुछ लिख रहा हूँ नितांत सहज है, बल्कि बहुत सोच कर थोड़ा लिख पा रहा हूँ। मैं सहज कृतज्ञता तुम और तुम्हारे परिवार को ज्ञापित कर रहा हूँ। कृपया इसे स्वीकार करें।
मैं अपने जीवन में उन्नयन की कई सीढियां चाहे न छू पाया हूँ, लेकिन जब जब जीवन की आत्मिक आनंदानुभूति में उतर पाया हूँ, जब जब इस प्रकार की धनात्मक ऊर्जा मेरे आस पास रही, उन पलों का गहन आभास होता रहा है. इसलिए उन पलों को सदैव जिया और उस परमपिता का इस संसर्ग के लिए धन्यवाद किया। यह मेरा उद्घोष है- वह नहीं होता तो कदाचित यह सब नहीं होता। इन सब के होने का आधार वही है। जो कल था आज भी वही है। चिरंतन है।
जो देता है उसे परमात्मशक्ति समस्त वान्छाएँ अनायास ही प्रदान कर देती है। एक बौद्धिक संस्थान के सर्वोच्च पदस्थान पर आसीन होना शायद इसी तथ्य का प्रतिपादन है। इस हेतु हम सपरिवार तुम्हे शुभकामना और ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित करते हैं। अफसोस केवल इतना ही है कि मेरी ओर से इतनी सुदीर्घ संवादहीनता मेरे हृदय के किसी कोने में साल रही है। आशा है सदा की तरह अपनी उदारता से इसे निर्विशेष कर देंगे। यदि ऐसा हुआ तो मैं एक प्रवंचना से बच पाऊंगा।
सभी वरिष्ठों को प्रणाम, आदरणीय भाभी जी को अभिवादन, कनिष्ठों को स्नेह।
सुखी और समृद्ध जीवन की शुभकामनाओं के साथ।
'शिवम् '
रामनारायण सोनी
सस्नेह हरि स्मरण
मैं जब अपने सुदूर स्वर्णिम अतीत में झाँकता हूँ एक सहज सौम्य सुह्रद चेहरा सामने आ जाता है. एक ऐसा व्यक्तित्व जो सिर्फ़ देना जानता हो। जिसके चित्त में 'दातव्यमिति' बसता है. वह केवल तुम हो।
मुझे अच्छी तरह से स्मरण है - मेरे जीवन के विकास के प्रथम सोपान पर तुमने और तुम्हारे परिवार ने चढ़ा दिया था तब से एक नई राह, एक नई मंजिल मुझे दिखाई दी थी अन्यथा मैं भी एक अनजान भीड़ में समा गया होता। जो कुछ भी बाद में मैंने पाया वह सब इस प्रथम सोपान के आगे का उत्क्रमण था। एक केनवास और इधर उधर बिखरे पड़े हुए रंगो के बीच एक चित्रकार के आने से कल्पना साकार हो उठती है।
मैं अत्यन्त अभिभूत हूँ कि मुझमें तुममें कोई साम्य नहीं था, बावजूद इसके मैने आप लोगों से जो पाया वह अप्रतिम था, अविश्वस्नीय था, लेकिन अत्यन्त मंजुल था। अतीत के बहुत से अच्छे पलों को यदि मैं सारांश पर ला खड़ा करता हूँ तो वह अवसर मेरे लिए सर्व श्रेष्ठ है क्योंकि उन पलों के अभाव में मेरे जीवन काल में जो कुछ अच्छा-अच्छा घटित हुआ, कदापि संभव नहीं था। मेरे जीवन की प्रत्येक अच्छी उप्लब्धी को उस परिप्रेक्ष्य में जोड़ा तो वे पल सजीव लगे।
मेरे चित्त में तुम सदैव रहे हो। मुझे कई बार आत्म-ग्लानी हुई कि मैंने मेरी इन अनुभूतियों को समय-समय पर क्यों साझा नही किया। अब जीवन के उत्तर काल में पहुंचने पर भी अपनी सम्वेदनाओं को यदि तुम तक नहीं पहुंचाया तो मैं अपने साथ भी न्याय नहीं कर पाउंगा। वस्तुतः मैं अत्यन्त आंदोलित महसूस कर रहा हूँ। जो कुछ लिख रहा हूँ नितांत सहज है, बल्कि बहुत सोच कर थोड़ा लिख पा रहा हूँ। मैं सहज कृतज्ञता तुम और तुम्हारे परिवार को ज्ञापित कर रहा हूँ। कृपया इसे स्वीकार करें।
मैं अपने जीवन में उन्नयन की कई सीढियां चाहे न छू पाया हूँ, लेकिन जब जब जीवन की आत्मिक आनंदानुभूति में उतर पाया हूँ, जब जब इस प्रकार की धनात्मक ऊर्जा मेरे आस पास रही, उन पलों का गहन आभास होता रहा है. इसलिए उन पलों को सदैव जिया और उस परमपिता का इस संसर्ग के लिए धन्यवाद किया। यह मेरा उद्घोष है- वह नहीं होता तो कदाचित यह सब नहीं होता। इन सब के होने का आधार वही है। जो कल था आज भी वही है। चिरंतन है।
जो देता है उसे परमात्मशक्ति समस्त वान्छाएँ अनायास ही प्रदान कर देती है। एक बौद्धिक संस्थान के सर्वोच्च पदस्थान पर आसीन होना शायद इसी तथ्य का प्रतिपादन है। इस हेतु हम सपरिवार तुम्हे शुभकामना और ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित करते हैं। अफसोस केवल इतना ही है कि मेरी ओर से इतनी सुदीर्घ संवादहीनता मेरे हृदय के किसी कोने में साल रही है। आशा है सदा की तरह अपनी उदारता से इसे निर्विशेष कर देंगे। यदि ऐसा हुआ तो मैं एक प्रवंचना से बच पाऊंगा।
सभी वरिष्ठों को प्रणाम, आदरणीय भाभी जी को अभिवादन, कनिष्ठों को स्नेह।
सुखी और समृद्ध जीवन की शुभकामनाओं के साथ।
'शिवम् '
रामनारायण सोनी
Saturday, 25 May 2013
Wednesday, 6 March 2013
Friday, 1 March 2013
मेरे जीवन-धन तुम हो
मेरे प्रियतम तुम मेरा सब कुछ हो
बोल नहीं जो बता सकूँ मै
पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।।
तुम ही हो वे शब्द जिन्हें मैं
निशि-दिन बोला करती हूँ
तुम ही हो वे गीत रसीले
जिनको अधरों पर बुनती हूँ ।।
बोल नहीं जो बता सकूँ मै
पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।।
दर्द तुम्हारे मेरे अपने
संवेदन बन जाते हैं
मेरे तो सपने ही तुम हो
जो सच में ढल जाते हैं ।।
बोल नहीं जो बता सकूँ मै
पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।।
तुम ही हो वह मेघ बरसते
जिनमें भींग-भींग जाऊं मैं
तुम ही हो वह पवन झकोरा ।।
जिस संग उड़-उड़ जाऊं मैं
बोल नहीं जो बता सकूँ मै
पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।।
तुम ही तो वह दर्पण हो
जिसमें देख दमक जाऊं मैं
तुम अतीत हो मेरे अपने
जिसमें छबि मेरी पाऊँ मैं ।।
बोल नहीं जो बता सकूँ मै
पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।।
तुम हो सुन्दर खिले सुमन
जिसकी सौरभ मेरी थाती
तुम ही तो वह कथा जिसे
मैं फिर-फिर पढ़ने जाती ।।
बोल नहीं जो बता सकूँ मै
पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।।
स्वाँस मेरी तुम स्पन्दन हो
तुम ही मेरे वृन्दावन हो
प्रेम चुनरिया ओढ़ फिरूँ मैं
तुम मेरा जीवन धन हो ।।
बोल नहीं जो बता सकूँ मै
पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।।
mmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm
वे बोल नहीं है कि तुम्हे बता सकूँ
पर तुम ही मेरा जीवन हो प्रिय.
तुम्हीं तो वो शब्द हो, जिसे मैं बोलती हूँ.
तुम्हीं तो वो गीत हो, जिसे मैं गुनगुनाती हूँ.
तुम्हीं तो वो दर्द हो, जो मेरा संवेदी हैं.
तुम्हीं तो वो बरसात हो, जिसमे भीगना मुझे चाहती हूँ .
तुम्हीं तो वो दर्पण हो प्रिय, जिसमे स्वयं को सुंदर पाती हूँ.
तुम्हीं तो मेरा वो रहस्य हो प्रिय, जग से छुपाना चाहती हूँ,
तुम्हें बस अपने ह्रदय के पास रखना चाहती हूँ.
तुम्हीं तो वो कथा हो, जिसे फिर फिर पढ़ना चाहती हूँ.
तुम्हीं तो वो सपना हो, जिस पर असीम विश्वास रखती हूँ.
तुम्हीं तो वो सख्श हो, जिसके के संग उड़ना चाहती हूँ.
तुम मेरी श्वास हो, जो मेरा स्पंदन है,
तुम जो मेरे हो, उस पर मुझे गर्व हैं,
तुम्हीं वो भावना हो, जिसे महसूस कर स्वयं को पा जाती हूँ.
तुम्हीं तो वो पुष्प हो प्रिय, जिसकी सुगंध लेना चाहती हूँ.
तुम मेरा वो अतीत हो, जिसमें मैं सदा मुस्कुराई हूँ,
तुम्हीं तो वो भविष्य हो, जिससे मैं प्रेम करती हूँ.
तुम्हीं तो मेरा वह आज हो, जिससे मैं प्रेम ही प्रेम करती हूँ.
क्योंकि तुम मेरा सब कुछ हो प्रिय
मिताली विजय
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- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन

