31.12.2012
प्रथम मिलन
प्रथम मिलन की प्रथम दृष्टि में यह कैसा सम्मोहन है
वाणी ने कर दिया समर्पण और चेतना ठिठक गई
दो जुड़े नयन दो जुड़े हृदय जब प्रीत हुई थी प्राण मई
भावों का सैलाब उमड कर रति से जागी अनुभूति नई
कोई बोल नहीं कोई बात नहीं कोई चिन्ह नहीं संकेत नहीं
कोई सोच नहीं कोई साध नहीं संसर्ग नहीं सौगात नहीं
है निर्निमेष नयनों का प्रतिपल संवाद सजल संचार प्रबल
मुदित हृदय की कोमल भुवि पर प्रेम बीज की नई फ़सल
नयनों का नेपथ्य भरा है पूर्ण समर्पण से आमंत्रण से
हृदयों का अनुबंध हुआ तब साक्षी सब बन गई दिशाएँ
देना हो जहाँ धर्म वहाँ पर पावन प्यार सृजित होता है
पाकर निर्मल प्यार जगत् में कुछ पाना शेष नहीं रहता है
रामनारायण सोनी

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