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Monday, 18 February 2013

गीत बन गये

















आज इस गूँगे हृदय में
क्यों गीत के अंकुर उगे
कंठ था निष्प्राण अब तक
सुप्त वंशी में यकायक सुर जगे

जिंदगी में गीत से परिचय नहीं
फिर अचानक क्यों ये मुखरित हो गए
शब्द थोथे शब्द भर थे
प्यार में तेरे सने तो शुष्क से नम हो गए

गीत जो ना रेंग पाए थे कभी
हो तरंगित अब कुलांचें भर चले
प्राण ! तुमने फूँक दी संजीवनी जब
स्वप्न बन साकार सांचों में ढले

तुमने ही गीतों के अंतर में
अधरों का मधुरस छलकाया
साये पतझड़ के छिटक गए
आह्लाद गगन में सरसाया

गीत हुए पाषाण कभी तो
तुमने ही मृदुल करों की छुअन भरी
श्वासों की डोरी तन मन में
प्रणय गंध की तपन भरी

गीत तो सूने पड़े थे नीड़ में
तेरी चपलता पा गए
लग गए सुर्खाब के पर
रंग सपने पा गए

मेरे छंदों में तुम ही तुम
मेरा इन पर अधिकार नहीं
गीतों की धड़कन तुम ही तुम
अलगाव कोई स्वीकार नहीं

रामनारायण सोनी


 

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन