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Friday, 18 September 2015

गगन की अगन

गगन की अगन


दो कल के बीच स्वयं को संभालना मुश्किल है
जो बीत गया बदल सकता नही
जो आएगा वह विधना की लेखनी मे भरा
अस्मिता है उधार के पलों पर ठहरी
उधार, जो साहूकार तय करता है
डेबिट कार्ड क्रेडिट कार्ड मे बदल गया है

क्षण मिले वो आसमां ताकते खर्च हो गए
वो कभी जो आज थे कल हो गए
रेशमी रिमझिम बरसती ये मेघना
वो पपीहे के लिये किस काम की,
सागर भी उसके किस काम का ,
स्वाँति की ना मिल सकी इक बूँद भी
जी रहा अगले बरस की आस में

गर लिखा विधि ने कभी का मिल गया होता
पर पपीहा जानता  इतना फकत
आकाश आस की बल्लियों पर ठहरा है,


बन गया निष्ठुर नियति आकाश अब तो
विधाता स्वाँति लिखना ही भूल गया
प्यास की पहचान उसको है नही
इस गगन मे शेष केवल है अगन ही

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