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Friday, 22 July 2016

मुक्तक

इस ह्रदय की पीर गल कर, शब्द बनता काव्य है 
काँपती ध्वनियाँ नहीं ये वेदना के घाव हैं 
अश्रु कोरों में रुके जो, मर्म ही का स्राव है 
श्वाँस के हिम खण्ड झरते, क्रन्दनों के भाव हैं 
जिंदगी एक फ़लसफ़ा है, हमें नजरिये की तलाश हो
उम्र बँधी है वक्त से, मंजिल नहीं रास्ते की तलाश हो।
खूबसूरत हो रास्ते तो, मंजिल की पर्वाह मत कर
रास्ते तुझको लगे अच्छे, ग़ाफ़िल न हो, इख़्तियार कर।
मैनें भ्रम पाला, इसी क्षितिज, आकाश धरा से मिलता है 
दो कूल नदी के खड़े निकट, कभी नहीं कोइ मिलता है
चट्टानों से बहते सोते, शायद,  दिल उसका ही झरता है 
मेरा प्रतिबिम्ब दिखा मुझको ही, क्यों दर्पण यूँ रोता है 

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