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Thursday, 8 September 2016

एहसास हमारे होने का

🐥एहसास हमारे होने का🐤

जब तुम न थे
न राग था न रंग थे
अनबूझे इन अधरों पर
प्यास थी न गीत थे
तुम आये, सब लाए
जाने क्यों मन भाए
कुनमुनी प्रीत जगी,
सूने से आँगन के
पीपल की टहनी पर
चंचरीक चहक उठी
जीवन में चाह जगी
कैसे तुम दबे पाँव, चुपके से
हाँ! जीवन में ऐसे तुम आए

फिर!.

जाग उठी संवेदना,
गिरता आत्मविश्वास,
गहराती खामोशियॉ,
एहसास हमारे होने का
और फिर एहसास न होने का,

एक अस्तित्व मेरे होने का
एक आभास तुम्हारे होने का
तुम्हारे संग का असंग का
संग की प्यास का
असंग की पीड़ा का
गाँठ है भारी गठरी सी
यादें भी भरी-भरी सी
पर मन की सभी वीथियाँ
फिर भी क्यों खाली है
चाँदी सी चाँदनी में
रजनी क्यों काली है।

बिछा लिया सुख तो
ओढ़ना दुःख, क्या नियति है?
बुन लिए गर स्वप्न तो
टूटना-बिखरना क्या नियति है?
कभी न समझ पाया मैं
एक बार में एक ही मिलेगा
तुम या एहसास तुम्हारे होने का
मैं या एहसास मेरे होने का
नहीं समझ पाया कभी
दोनों में जलन उतनी ही
तुषार या हो अंगार

मैं रूठा, अब मनाएगा कौन
वक्त की दरार को भरेगा कौन
पतझार हर बरस होगा
पर मधुमास लौटाएगा कौन
फूल तेरा सूख गया पुस्तक में
खुशबू अब लौटाएगा कौन
अंबर में फैली इन बाहों को
गलबहियाँ बनाएगा कौन
अपने इन प्रश्नों के शोर से
बाहर अब लाएगा कौन
कौन? कौन? कौन?

तुम या एहसास तुम्हारे होने का
मैं या एहसास मेरे होने का
या एहसास हमारे होने का।

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