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Saturday, 9 September 2017

बैसाखियाँ


शूल बन कर फूल भी चुभते रहे
अर्थ बिन जो शब्द थे मथते रहे
रश्मियाँ बन उर्मियाँ दलती रही
वे कनक घट विष भरे झरते रहे।।

इन कुहासों में घिरी अतिरंजनाएँ
है सिमटता मुट्ठियों में आसमां भी
हम बिखरते स्वप्न के अंबार में
चाहतों की ही किरच चुनते रहे।।

जिन्दगी बैसाखियों पर चल रही
चू गई संकल्पनाएँ क्षार बन कर
कोंपलें अर्पित हुई पतझार को
हम पिपासा ही लिये चलते रहे।।

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन