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Friday, 31 May 2019

गीत अधरों पर बुनो

आज कोकिल कोकिला संग स्वर मिलाती
साज संगत के कहीं रख सुनो तुम भी सुनो
आम्र कुञ्जों में सजा एकल मुखर रव ही
ओ रागिनी के सप्त स्वर गुनो तुम भी गुनो।
                गीत अधरों पर बुनो।।

साँस साधे क्यों खड़े तुम पथिक पाथेय बन
मंजरी के, भ्रमर के संग नवगीत तुम बुनो
गुलमोहर की रक्तिमा भी लाजवन्ती लग रही
स्वर्ण चम्पा केतकी ओ! प्रीत के पाहुन चुनो।
                गीत अधरों पर बुनो।।

रामनारायण सोनी

(३१*५*१९)

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन